शनिवार, 28 नवंबर 2009

मिलना रस्सी में बाँध कर पकौड़ी छानने वाले से . .

बहुत बेचैनी है . .  
किसी की प्रतीक्षा है - ट्रांजिट हाउस के कमरे में सुबह सुबह।
आलमारी खोल हैंगर गिनता हूँ - उन्हें ठीक करता हूँ ऐसे ही। 
चहलकदमी करता हूँ फिर आइने में केश संवारता हूँ। जाने इम्प्रेशन कैसा पड़े!
कोई आने वाला है - जरूर आएगा। 
चादर सिकुड़ गई है। ठीक करता हूँ ।
समय इतना स्लो क्यों हो गया है?
अरे! टेबल क्लॉक में बैटरी शायद खत्म हो गई है। 
खिड़की पर वेनीसन ब्लाइण्ड को ऐडजस्ट करता हूँ 
बाहर का लैण्डस्केप - लगता है जैसे शीशे में मढ़ दिया गया हो।
लेकिन आने वाला यहाँ क्यों आएगा?
वह आदमी बहुत तेज है - शायद आ ही जाए तो खिड़की पिक्चर परफेक्ट दिखनी चाहिए।
नीचे जूते बिखरे पड़े हैं - दुरुस्त करता हूँ ।
नई साज सज्जा वाले कमरे में दीवार पर एल सी डी टीवी लगा है - सेट टॉप बॉक्स कनेक्सन के साथ ।
लेकिन पाँच सौ चैनलों में कोई काम का क्यों नहीं दिखता ?
..वह कब आएगा?
नहा लूँ - ताजा दिखूँगा।
कुर्ता ही पहने रहूँ या पैण्ट शर्ट ?
पहले नहा तो लूँ!
नहा कर कुर्ता पहन ही रहा हूँ कि फोन ..
आने वाला भटक गया है..
"अरे भाई 9 नम्बर कमरे में आओ, 9 नम्बर बंगले में मत जाओ।"
..अबे , आलमारी तो बन्द कर दे। जाँघिया लटकाए हुए हो।
इतने आतंकित क्यों हो ?  
..टिंग टांग 
घण्टी बजती है ।
पल्ला खोलता हूँ।
सामने मुस्कुराता पूरे शरीर से हास बिखेरता
जूते उतार कर कमरे में घुसने की भंगिमा बनाते..
आने वाला खड़ा है ... अरे, इसी से इतना घबराए हुए थे !
ये तो सही में गँवई आदमी निकला - सॉफ्टवेयर वाला जान आतंकित थे !
....
....
मुम्बई। 25/11/2009
आने वाले व्यक्ति थे -मन हिलोर बतियाने वाले  सतीश पंचम , सफेद घर वाले बिलागर।   
गाँव की बारात का सबसे जीवंत वर्णन करने वाले।
यमराज की खोज खबर लेने वाले ग़जब के विटी अपने सतीश भाई।
पहले से ही मेल कर अपने आने और मिलने की चाहत की सूचना दे दी थी । 24 को मुम्बई एयरपोर्ट से ट्रांजिट हाउस तक की यात्रा का ट्रैफिक जाम नारकीय था। लेकिन कम अखरा - इनके उत्तर की आशा में  मोबाइल पर  मेल चेक करता जा रहा था। न तो मेरे पास इनका मोबाइल नम्बर न इनके पास मेरा ।  बेवकूफी - अरे मेल में मोबाइल नम्बर  तो दे दिए होते! 
..
रात में 8:21 का इनका भेजा उत्तर पढ़ता हूँ 10:30 के आस पास। मोबाइल नम्बर भी है। 
इतनी खुशी होती है जैसे किसान की बिलाई भैंस मिल गई हो !
सम्पर्क करने की ज़द्दोजहद शुरू होती है। ज़द्दोजहद क्यों? भाई साहब मतलब BSNL जी डॉल्फिन की पीठ पर सवार तो हैं लेकिन कह सुन नहीं पाते। एक समय में एक काम - कहो तो सुनाई न पड़े , सुन कर कहो तो कहा दूसरे को न सुनाई पड़े। बिस्तर पर ही मोबाइल एक खास जगह पर फुल सिगनल दिखाता है तो 2 फीट भी हटाए नहीं कि emergency call only स्क्रीन पर छप जाता है। मुम्बई से तो नखलौ ही अच्छा है! कुल 8 प्रयासों के बाद भी काम लायक बात नहीं हो पाती । 
सो जाता हूँ - निश्चिन्त अब तो ढूढ़ ही लूँगा . . । 
25 की सुबह । एस एम एस आया हुआ है। सुबह ही आएँगे। ..हँ चलो बात बनी। जय BSNL ।  
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सतीश जी से मिलने तक मैं आतंकित रहा। सूक्ष्म दृष्टि और ग़जब की सम्प्रेषणीय शक्ति वाली लेखनी ! कुछ चैट सेसनों के बाद तो और भी हैरान परेशान हो गया। एक नमूना नीचे दिया है :





10:17 PM me: नमस्कार । पकौड़ी को वहीं छोड़ थोड़ा बाउ के दु:ख की खबर लीजिए।
10:18 PM satish: पकौडी को छोड दूंगा तो तेल में डूब जायेगी :)
  इसलिये रस्सी बांध कर तल रहा हूँ
10:19 PM me: और चैट भी कर रहे हैं ! कितने हाथ हैं तेरे ठाकुर !
 satish: हा हा
  आप लखनउ से हैं न ?
10:20 PM me: हाँ
 satish: लेकिन बोली या शैली आपकी बलिया की तरफ की लग रही है
10:21 PM me: पकौड़ी से कोई सम्बन्ध है क्या?
10:22 PM satish: अरे नहीं, वो तो ऐसे ही fun message लिखते रहता हूँ.....
  कभी रेल के आगे बीन बजाता हूँ तो कभी चाय में केला डुबो कर खाता हूँ :)
10:23 PM just for fun ,
 me: क्यों राज ठाकरे को चुनौती दे रहे हैं?
10:24 PM satish: हां ये बात तो है....फन्नी activity आजकल कुछ ज्यादा ही कर रहा है
10:25 PM मन में तो यही आता है कभी कभी कि यदि हमारे पैतृक गांव या देहात में रोटी पानी का बंदोबस्त हो जाता तो क्यूं आते यहां
10:26 PM C E N S O R E D 
10:28 PM me: आप तो centi हो गए!
10:30 PM satish: कभी कभी centi हो कर ही संतोष करना पडता है।
10:31 PM me: सेंटीसंतोष ' अच्छा शब्द निकल आया
 satish: :)
10:33 PM me: संतोसेंटी और बेहतर होगा
 satish: hmm...
10:34 PM me: अब सोते हैं। मैं जल्दी सो कर जल्दी उठता हूँ। सर्वहारा क्लास की एकमात्र यही आदत बची रह गई है।
  नम्स्कार।
10:35 PM satish: नमस्कार

लेकिन मिलने के कुछ सेकण्डों के भीतर ही ढींठ हो गया। सतीश जी में आत्मीयता इतनी सहज है कि आप आतंकित रह ही नहीं सकते। नाश्ते की टेबल पर खींच ले गया। बातें शुरू हुईं। जाने क्या क्या! संयोग से हमारी कम्पनी इनकी कम्पनी की क्लाइंट निकल आई। मैंने अपने दु:ख गिनाए जिन्हें इन्हों ने एक प्रोफेशनल की तरह निर्विकार हो नहीं सुना बल्कि हँस कर उड़ा दिया।
 फिर आई ब्लॉगरी की बातें - मैंने शिकायत की कि आप कम लिखने पढ़ने लगे हैं। एक जिम्मेदार ब्लॉगर की तरह इन्हों ने सुना और बताया कि मेरी बात सही थी। बेचारे  हिन्दी ब्लॉगरी में चल रही आपसी टाँग खिंचाई से दु:खी थे। कुछ समयाभाव और कुछ अरुचि जैसी बात भी कह गए। मैंने अपनी अक्ल भर समझाया। चाय पिलाई। फोटो खिंचाया 



और फिर विदा  किया - यह तसल्ली हो जाने के बाद कि चाहे रस्सी से बाँध कर पकौड़ी छाननी पड़े, सतीश जी पकौड़ी छानते रहेंगे और अपने ब्लॉग पर हम लोगों का स्वादरंजन करते रहेंगे।  

30 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मजेदार रही यह पोस्ट..... अंत तक एक रवानगी में पढ़ता ही चला गया..... अति सुंदर ....

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  2. सतीश जी से आपकी मिलन कथा बड़ी मनभावन लगी...भले ही आप आतंकित रहे होंगे लेकिन वर्णन आत्मिय रहा. शानदार.

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  3. एक महामिलन यह भी ....अब तो ब्लॉगर ऐसा लकी हो गया है की अगर उसे समुद्र में भी फेक दो तो वह वहां भी किसी ब्लॉगर मछली को मुंह लगा लेगा -अब यह बात दीगर है की कौन किसके पेट में जाएगा -वैसे हमेशा छोटी ही निगली जाती है ! तो मुम्बई में मिले सतीश पंचम ! हमारे जौनपुरी भाई न ? और आप सकुशल पुनरावर्तित हो गए ! राहतहुयी !

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  4. मिलने के पहले इत्ता भी क्या शरमाना! अब इसे सतीशजी अपने ब्लाग पर बतायें तो मामला और जमें!

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  5. एक तरफ़ लंठ बाउ..दूसरी तरफ़ झकाझक सफ़ेद घर.......वो भी यूं कि सुना था कि लोगबाग घर जाते हैं...इहां तो घर ..ही खुद आ गया....सब लंठ की महिमा....बीच में विराजमान सौस ...की लाल बोतल.....धूमकेतु समान नजारा....अद्भुत...


    अजय कुमार झा

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  6. बेहद बेहतरीन और आत्मीय वर्णन...लग रहा जैसे कहीं हम भी वहीं बैठे हों..!
    मज़ा आ गया...!

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  7. यह तो इक्कीसवीं सदी का भरत मिलाप हो लिया। परवाह और बेपरवाही के मिश्रण से ऐसे ही आनंद की व्युत्पत्ति होती है।

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  8. मिलने के पहले इतनी बैचेनी और इतनी सारी चीजें सोच ली बहुत अच्छी बात, मिलन कथा जोरदार है।

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  9. रोचक पोस्ट है इस भरत मिलाप की बधाई

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  10. मैं इसे एक सुंदर कविता कहूँगा.
    नई साज सज्जा वाले कमरे में दीवार पर एल सी डी टीवी लगा है - सेट टॉप बॉक्स कनेक्सन के साथ ।
    लेकिन पाँच सौ चैनलों में कोई काम का क्यों नहीं दिखता ?
    ज़िन्दगी के टूट चुके सिरों को देख कर उपजा अवसाद और किस तरह व्यक्त किया जाता है
    साथ ही आपकी इस आत्मीय कविता में छुपी स्नेहिल व्यग्रता कुछ इस तरह लगती है जैसे कोई सोहल साला लड़के से पहली बार कोई हमउम्र मुहब्बत मिलने को आती हो.

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  11. मिलने से पहले की व्यग्रता का एहसास यहाँ तक हो रहा है ।
    आप निराले, सतीश जी दूसरे निराले - दोनों मिल गये फिर....

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  12. मिलने की व्यग्रता शब्द शब्द छलक रही थी
    ....!!

    मुझे ऐसा क्यों लगता है की आपको व्हील स्मार्ट श्रीमती में सपत्निक भाग लेते देखा है ...या कही मुझे वहम हुआ है ...?

    @ Arvind Mishra जी
    हमेशा छोटी मछली को निगलना आसान नहीं होता ...दरअसल मछली के काँटों पर निर्भर करता है...कई बार छोटी छोटी मछिलयां ऊपर से नरम नजर आती हैं ...अन्दर इतने कांटे .. न निगलते बनता है ना उगलते ...किसी भी मांसाहारी से पूछ कर दिख लीजिये ...!!

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  13. कहाँ गायब रहे इतने दिन?

    और मुंबई विचरण का 'इतना' सा विवरण एकदम अपर्याप्त है.......

    ये लिखने में आलस्य बिल्कुल ठीक नहीं है....

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  14. बहुत मजेदार पोस्ट.....!!!
    आत्मीय वर्णन......!!!

    अब सतीश जी के ब्लोगरी मुंह से सुनने की आस !!

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  15. आपकी पोस्ट पर भाई मेरे, दुबारा तिबारा आना पड़ ही जाता है .स्नेह वश ,उत्कंठा वश और अन्यान्य कारणों से भी .देखिये आया तो वाणी संवाद -आह्लाद भी मिल ही गया ! लेकिन अब तक तो वाणी जी को आपने ही बता देना (दिल्ली स्टाईल )था की भैया मेरे खुदै मोहकमाए मछलियान में हैं -मछली /मछलियों की उनकी जानकारी पुख्ता है ,तितलियों में भले ही थोडा बल्कि कभी कभार तगड़ा गच्चा खा जाते हैं ! कैसे भाई हैं आप ? अब पता नहीं वाणी जी इसे पढ़ भी सकेगीं या नहीं -नामालूम वे दुबारा पलट कर देखती भी है या नहीं ,कोई सभीत हिरनी तो हुयी नहीं न ! अब मृगनयनी भी कैसे कहें कभी फोटू तक भी नहीं दिखाया !

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  16. अरे गिरिजेश भाई, आप वहां चादर की सिकुडन ठीक कर रहे थे इधर मेरे माथे पर सिकुडन थी की ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी. जाने कैसी शख्सियत से मिलने जा रहा हूँ. डबल चिन से आपको जानता तो हूँ पर कहीं लेनिन चिन वाले निकल गए तो पहचानना मुश्किल हो जायेगा (लेनिन की ठुड्डी आगे की ओर जो निकली हुई थी :)


    वैसे आपस की बात है किसी से कहना मत....... मेरे मोज़े एक ओर से फटे हुए थे :) और जूते तो वहीँ स्टेशन पर ही पोलिश करवाए थे और आप मेरे जैसे शख्सियत से आक्रांत थे :)

    खैर किसी से कहना मत यह आपस की बात है......ब्लॉगर ही जाने ब्लॉगर की भाखा :)

    अनूप जी और प्रवीणजी से इतना कहना चाहूँगा की एक ठो पोस्ट और लिखने पर वह बात नहीं रह जाएगी जो इस पोस्ट मे है. सब कुछ तो समेट दिए हैं गिरिजेश जी ने.....आप sabhee लोगों के स्नेह को देख अभीभूत हूँ .

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  17. साहेब !
    आपकी मुलाकात पढ़ते हुए मन इतना
    तल्लीन हो गया कि यह भेद ही मिट गया कि ------
    कविता कहाँ है और गद्य कहाँ है ...
    संस्मरण कहाँ है और निबंध कहाँ है ...
    भाव कहाँ है और भाषा कहाँ है ...
    व्यक्ति कहाँ है और समाज कहाँ है ...
    ह्रदय कहाँ और बुद्धि कहाँ है ...
    सच कहूँ तो ,
    चादर कहाँ है और सिकुड़न कहाँ है ...
    :( न न न ..........(: ...और... :) ,जी हाँ अब बनी न बात ...
    आभार साहब ... ...

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  18. इस पोस्ट के दोनो जीव बहुत मस्त हैँ और (भैँस न भी हो सामने, तो भी) बहुत महीन बीन बजाते हैं। दोनो की कलम धार दार है।
    यह इण्टरनेट नहीं होता तो इनसे कहां मुलाकत होती।
    ये दोनो मित्र हृदय से प्रिय हैं।

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  19. क्या संयोग है कि आज ही आपसे दो ब्लॉगरों की मुलाकात का किस्सा पढ़ने को मिला। दोनो मजेदार। यहाँ सतीश जी की टिप्पणी पढ़कर तो ऐसी हँसी छूटी कि साँस ही अटक गयी। श्रीमती जी दौड़ी आयीं कि मुझे हो क्या गया। सारा आइटम दुबारा पढ़कर उन्हें सुनाना पड़ा।

    लगातार लिखने से शैली में जो रवानगी आ जाती है उसे अब आप स्वयं महसूस कर रहे होंगे। ‘आलसी’ नाम अब बदल डालिए। अब यह बीती बात हो गयी है। अब तो आप गजब ढा रहे हैं।

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  20. हम सब एक दूसरे से डरते हैं या एक दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं. भैया! अंत में देखा न ! हम सब एक हैं, एक से हैं.

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  21. फ़लता-फ़ुलता रहे ब्लाग परिवार।अच्छी रही ये मुलाकात।

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  22. जितनी व्यग्रता दिख रही थी हम कहें कोई income tax अधिकारी आ रहा है और इसको potiyana है....
    लेकिन इ तो ब्लॉगर-ब्लॉगर मिलाप था.....
    बहुत बढ़िया.....

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  23. यह डायरी नुमा लेखन अच्छा रंग जमा रहा है .. इसे चलने दीजिये ..चैट मे जो सेंसर है उसे जानने की इच्छा है आदम और हव्वा की संतान है यह आदमी .. स्वर्ग से धकेले जाने के बाद यही स्वर्ग ढूंढता है .. ।

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  24. कई पोस्ट ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़कर आप आनंदित तो होते हैं, भाषाई सौन्दर्य से प्रभावित होते हैं, कलम के चमत्कार पर चमत्कृत भी होते हैं कि कितनी सहज सी बात को कितनी खूबसूरती से कहा गया है...लेकिन जब उस पोस्ट पर प्रतिक्रिया स्वरुप कुछ लिखने बैठो तो कुछ नहीं सूझता। ये वाली पोस्ट कुछ ऐसी ही है।

    ...तो आपको देखा आखिरकार। कुर्ते-पैजामे में आप ही हो ना? बड़े फ़ब रहे हैं।

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  25. अरविंद जी ने सही कहा, अगर कोई ब्लॉगर समुद्र में भी गिरेगा, तो वहाँ भी वह मछली ब्लॉगर को मुंह लगा लेगा।
    संस्मरण वाकई मजेदार है।
    ------------------
    सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
    अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?

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  26. namaskaar! kahte hain k galib ka hai andaz-e-byaan aur! yahi fiqra aap par bhi laagoo hota .
    aagrah ke saath nimantrn hai, mere saajha-sarokaar ki nai post zaroor padhen.

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  27. रोचक और आत्मीय वर्णन!! बाँध के रखता है पढने वाले को.

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