गुरुवार, 26 मई 2011

तिब्बत - चीखते अक्षर (4)

पूर्ववर्ती:
तिब्बत - चीखते अक्षर : अपनी बात image
तिब्बत - चीखते अक्षर : प्राक्कथन
तिब्बत – क्षेपक
तिब्बत - चीखते अक्षर (1)
तिब्बत - चीखते अक्षर (2)
तिब्बत - चीखते अक्षर (3)
अब आगे ...


तिब्बती संस्कृति का नियोजित विनाश:
असल में चीनियों की भौतिकवादी विचारधारा के कारण तिब्बती संस्कृति का विनाश अवश्यम्भावी था। वे लोग धर्मसम्बन्धित किसी तरह की अभिव्यक्ति या प्रदर्शन को सह नहीं सकते थे। यह असहिष्णुता इस तथ्य के कारण और प्रबल हो जाती थी कि धर्म तिब्बती राष्ट्रीय पहचान से अलग नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा उनकी सोच चीन की उस वास्तविक दुखद स्थिति से प्रभावित थी जिसके अंतर्गत पीड़ित किसान वहाँ लगातार क्रूर भूस्वामियों के विरुद्ध संघर्षरत रहे, जबकि तिब्बत के इतिहास में कभी भी किसानों के विद्रोह का कोई उल्लेख नहीं मिलता जिसका कुछ कारण जीवन पर बौद्ध धर्म का सम्पूर्ण प्रभाव था और यह तथ्य भी कि वृहत्तर मठों को छोड़ दें तो चीन जैसी निर्धनता और समृद्धि के अतिशय विभेद तिब्बत में नहीं थे। तिब्बत की जनसंख्या भी चीन की तुलना में बहुत कम थी और जनसंख्या घनत्त्व और अन्न उत्पादन में संतुलन की अवस्था को काफी हद तक प्राप्त कर लिया गया था।
इसके बावजूद चीनी लगभग प्रारम्भ से ही बैठकें करने लगे जिनमें वे तिब्बत की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को प्रयासपूर्वक कमजोर करने लगे। बहुत शीघ्र ही यह सब भयानक ‘थामजिंगों’ या ‘संघर्ष सत्रों’ में परिवर्धित हो गया जिनमें धार्मिक व्यक्तियों और स्थानीय नेताओं को पीटा जाता था, यातनायें दी जाती थीं और बाद में प्राय: उनके स्वजनों द्वारा ही उनकी हत्या करा दी जाती थी। उन्हें यह धमकी दी जाती थी कि यदि उन लोगों ने सहयोग नहीं किया तो उनकी भी वही दुर्गति होगी। बच्चों को जबरन उनके माँ बाप को गलियों में घसीटे जाते, पीटे जाते, पत्थर मारे जाते और अंतत: मार दिये जाते हुये देखने पर बाध्य किया जाता था। उनके माँ बाप के अपराध यही थे कि या तो उन लोगों ने पुरानी सरकारों के तहत काम किया था या वे युगों पुराने भूस्वामियों के वंशज थे।
चीनियों ने जान बूझ कर और नियोजित तरीके से तिब्बती मठों और मन्दिरों को डायनामाइट से उड़ाना प्रारम्भ कर दिया।
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उन्हें ध्वस्त करने के पहले विशेष रूप से बनाये गये चीनी दल बहुमूल्य धार्मिक वस्तुओं को छाँट कर बाहर निकाल लेते थे जिनमें से कई को अत्यावश्यक विदेशी मुद्रा प्राप्त करने के लिये विदेशी बाजारों (विशेषकर हांगकांग और नेपाल) में बेच दिया गया। पुरानी धार्मिक कलाकृतियों, अमूल्य तिब्बती थंका (चित्र), कला संग्रह और मूर्तियों को या तो चीनियों द्वारा या उनके द्वारा आतंकित किये जाने के बाद उनकी बात मानते तिब्बतियों द्वारा टुकड़ा टुकड़ा कर नष्ट कर दिया गया। पवित्र मणि पत्थरों से टॉयलेट बनाये गये और जानबूझ कर पुराने मठ प्रांतरों में पशुवध केन्द्र खोले गये।


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पत्थरों पर बौद्ध लोग षडवर्णी महायानी मंत्र 'ओं मणि पद्मे हुम' उकेर देते हैं। वही मणि पत्थर कहलाता है। इस मन्त्र को अवलोकितेश्वर और उनकी अर्धांश मणिपद्म से सम्बन्धित माना जाता है।
बौद्ध धर्म में इसका वही स्थान है जो हिन्दुओं में ॐ या गायत्री मंत्र का। यह मंत्र तांत्रिक वामाचारी संकेत भी लिये हुये है। 
तिब्बती लिपि में कलात्मक रूप से पद्म(कमल) की पंखुड़ियों पर चित्रित मणि मंत्र। तिब्बती लिपि भारत की देन है। 
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_WenWu_2006_02_ILL_1        मणि पत्थरों पर उकेरे गये मंत्र स्पष्ट दिख रहे हैं। 
तिब्बत के सबसे पवित्र मन्दिर मठ जोखांग, ल्हासा को सूअरबाड़े के रूप में इस्तेमाल किया गया और पवित्र धर्मग्रंथों को खाद के साथ खेतों में जोत दिया गया।

तिब्बतियों के लिये यह सब एक आत्यंतिक सांस्कृतिक तबाही ही थी (है) जो उनकी समृद्ध और प्राचीन संस्कृति को लगातार और जानबूझ कर विनष्ट करने के लिये लाई गई थी। लॉवेल्ल थॉमस ने इस कृत्य को ... हमारे समय में एक देश, उसकी संस्कृति और उसके लोगों की सोद्देश्य और पैशाचिक हत्या का अभूतपूर्व आयोजन ... बताया है। ध्यान देने योग्य है कि इस तबाही का बहुलांश 1966-76 की सांस्कृतिक क्रान्ति के पहले घटित हुआ। चीनी सामान्य तौर पर यह जताते हैं कि तिब्बती संस्कृति का विनाश सांस्कृतिक क्रांति के समय पथभ्रष्ट ‘चार के गैंग’ के शासन काल में हुआ। किंतु ऐसा हरगिज नहीं लगता।
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उदाहरण के लिये देखें तो सांस्कृतिक क्रांति के प्रारम्भ के छ: वर्ष पहले ही 1959 के आते आते खाम(पूर्वी तिब्बत) के रुंगपत्सा क्षेत्र के 6 में से 5 बौद्ध मठ धराशायी किये जा चुके थे। बीस वर्षीय़ युद्ध के दौरान हुई लड़ाइयों में बमबारी के प्रत्यक्ष परिणाम स्वरूप कुछ मठ विनष्ट हुये लेकिन अधिकांश को सोच समझ कर सोद्देश्यपूर्ण तरीके से 1959-61 के दौरान लूटा गया और डायनामाइट से उड़ा दिया गया। ऐसे बहुत से तिब्बतियों ने जो इस समय तिब्बत में उपस्थित थे, इस बात की पुष्टि की है। न्यायविदों के अंतरराष्ट्रीय आयोग ने 1959 और 1960 में जारी अपने परिपत्रों में यह निष्कर्ष दिया कि तिब्बती जातीय नरसंहार झेल रहे थे।
(अगले अंक में - बीस वर्षीय युद्ध)

9 टिप्‍पणियां:

  1. सांस्कृतिक विनाश का यह संगठित प्रयास शायद इस्लाम से भी ज्यादा क्रूर और कट्टर रहा है .....

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  2. विनाश की गाथाओं में तक्षशिला और तिब्बत की नृशंसता कभी नहीं भुलायी जा पायेगी। न जाने कितना ज्ञान नष्ट हो गया है।

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  3. तिब्बत पर चीन के दमन झूठ और हेकड़ी का क्रूरतम संयोग है। मानवता कब जगेगी?

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  4. गहन शोध के उपरान्त लिखा यह आलेख बहुत सी नई जानकारी दे गया।

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  5. तिब्बती इतिहास के ये लोमहर्षक पृष्ठ बड़े घृणास्पद हैं । आपने धैयपूर्वक उन्हें सँयत और नियोजित तरीके से परोसा है । इनकी वास्त्विकतायें कहीं अधिक निर्मम है । आप इसे हिन्दी में प्रस्तुत करके भाषा के प्रति एक महती कार्य कर रहे हैं ।

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  6. यह सत्य, तथ्य सर्वसुलभ करा आप कितना बड़ा काम कर रहे हैं ...अब क्या कहूँ....साधुवाद आपका...ह्रदय से आभारी हैं हम आपके...

    सभ्यता विकसित हो रही है, संसार उन्नति के नए प्रतिमान गढ़ रहा है...सुनना सोचना हास्यास्पद लगता है यह सब देखने सुनने जानने के बाद...
    क्या बदला है ??? शक्ति संपन्न कमजोर को रौंदे चले जा रहे हैं, विश्व समुदाय बंद होंठों खुली आँखों सब देखता चला आ रहा है,सदियों सदियों सदियों से....और यह सिलसिला कभी रुकेगा...लगता है क्या????

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  7. तिब्बत पर आप का विश्लेषण बहुत ज्ञानवर्धक लगता है..एक ऐसा क्रूर इतिहास जिसे अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और चीनी सरकार दबाने पर लगी है..
    अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी...

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  8. बहुत अच्छी जानकारिया दी आप ने इस लेख मे

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