गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

गिफ्ट वाली पायल-2

पिछले भाग से आगे... 


गली में मुड़ते ही उन्हें झुग्गी के आगे तीन चार जन खड़े दिखाई दिये और बेटी के रोने की आवाज़ सुनाई देने लगी। दोनों के कदम तेज हो गये। पहुँचने पर उन्हों ने पाया कि बड़ा बेटा सूरज बेटी को फुसला कर चुप कराने की कोशिश में था और छोटा इकठ्ठे लोगों से लड़ रहा था। दोनों यही सुन पाये – मम्मी नहीं जायेगी। उन्हें देखते ही वे लोग बिखर गये। एक के होठों की कुटिल मुस्कान बिनती से छिप नहीं आई।    
बिनती ने पूछा,”सूरा! क्या हुआ?”
बेटे ने बताया कि बड़ी गाड़ी से कोई आण्टी आई थीं, पापा को पूछ रही थीं।
बिनती के सिर में सींग उग आये – रात गये कोई औरत ढूँढ़ते क्यों आयेगी भला?
“हो जी, कौन?”
सनीप भावहीन स्वर में बोला,“मुझे क्या पता? ... होगी कोई, कल के किसी काम के लिये आई होगी।“
उसने निपटने जाने को  बोतल उठा लिया था। बिनती आगे आ खड़ी हो गई – बताये नहीं? आज तक तो इस तरह से कोई नहीं आया? उसे घर कैसे पता चला?
सनीप मुस्कुरा उठा – कहीं तुम्हें शक़ तो नहीं हो रहा।
बिनती भी मुस्कुराई – हो जी, ऐसी बात नहीं...। उसने रुक कर कहा - खून पी जाऊँगी और आगे से हट गई।
“जल्दी आना... मुझे भूख लगी है।“
रोती बेटी को फिर से सुला कर जिस समय दोनों बेटों के आगे बिनती ने प्लेट रखी, उस समय निपटने जाते सनीप के पैरों में जैसे मन भर बोझा बँधा था – कहीं ...? पुलिया पर आधा घंटा बैठा रहा। निपट कर लौटा तो बच्चे सो रहे थे और बिनती? साफल लैट में उसका चेहरा सफेद हो रहा था।
थाली आगे सरकाते हुये बोली,“हो जी, उसने नीरा से प्यार जताया। सूरा कह रहा था कि उस औरत ने कहा – अपने पापा को सन्नी की याद दिलाना। उसने कल फिर आने को बोला है।“
सन्नी! .... सनीप ने दूसरा कौर ही उठाया था। उसके हाथों से ग्रास गिर पड़ा। अबकी बिनती ने देखा, साफल लैट की सफेदी सनीप के चेहरे पर फैलती चली गई थी।
“क्या हुआ?” बिनती का दिल धक धक करने लगा। सनीप ने थाली किनारे कर दी, पहले सुबकी जैसी आई और फिर बिनआवाज ही रोने लगा। भाग कर बिनती ने उसे ऐसे चिपटा लिया जैसे कोई बच्चा हो – हो जी, ये क्या? ... चुप, चुप...कुछ बताओगे भी? देर तक अहकने के बाद सनीप ने मुँह खोला – हमलोगों ने तुम्हारे परिवार से झूठ बोला था, पहली मरी नहीं थी... अभी जिन्दा है।
इतना बड़ा धोखा! - बिनती को काटो तो खून नहीं! पल भर में ही वह दुलारती भेंड़ से हमले को तैयार भेंड़िये में बदल गई। उसकी गुर्राहट से हो जी गायब था  – पूरी बात बताओ सूरा के पापा! नहीं तो अभी आग लगा दूँगी। पूरी बस्ती खाक हो जायेगी।
सिर गड़ाये सनीप ने सब कुछ उगल दिया। बीस का था तो गवना हुआ था। रजनी आई तो पता चला कि वह उससे दो साल बड़ी थी। बाबू ने एकाध महीने बाद ही कानपुर कमाने भेज दिया। गोरी चिट्टी रजनी को वह काम नहीं करने देता था लेकिन उसने ज़िद कर बड़े साहब की कोठी में काम करना शुरू कर दिया। साहब शहर शहर घूमते, मलकिन घर में अकेली थीं, बच्चे देहरादून स्कूल में। मन बहलाने को औरतों वाला सैलून चलाती थीं जिसके बारे में लोग तरह तरह की बातें करते थे। रजनी को काम देने का प्रस्ताव लेकर वह खुद आई थीं। दिन का काम था और रजनी का मन भी इसलिये सनीप ने हाँ कर दी। घर की कमाई बढ़ गई और उसने झुग्गी छोड़ क्वार्टर ले लिया। साल भर भी नहीं बीता था कि एक दिन तबियत खराब होने पर जब दिन में ही क्वार्टर लौटना पड़ा तो रजनी की खोज में कोठी गया। मलकिन ने नीचे ही बुला लिया। सनीप ने जो देखा, उससे सिर घूमने लगा। भुँइधरा सैलून में उघारू ड्रेस पहने रजनी दो खद्दरधारी मुस्टंडों के बीच बैठी उन्हें पिला रही थी । वह तड़क उठा – ये क्या कर रही है?
मलकिन चकित हो गईं – सनीप! तुम्हें रजनी ने बताया नहीं? ...दुबारा चिल्लाये तो कुत्तों से नुचवा दूँगी, जानते हो कि नहीं? रजनी का हाथ खींचते हुये सनीप बाहर आ गया था। घर पहुँच कर उसे बहुत पीटा और काम छुड़वा दिया लेकिन क़्वार्टर नहीं छोड़ पाया। नतीजन दो महीनों बाद ही मलकिन से उधारी लेनी पड़ी जिसके बदले में रजनी वापस नौकरी में लग गई। मलकिन ने समझाया भी – सनीप, बड़े लोगों के समाज में इस तरह पीना पिलाना चलता है। बड़े घरों की लड़कियाँ औरतें भी जेबखर्च के लिये पार्ट टाइम करती हैं। इसमें बुराई क्या है? कोई ग़लत काम थोड़े कर रही है तुम्हारी रजनी!
तुम्हारी रजनी कहते मलकिन की आँखों में जो भूख दिखी उससे सनीप सहम गया लेकिन हामी भी भर दिया।
सरकार बदली और कोठी पर रेड पड़ी। अखबार रंग गये – पॉश कॉलोनी में दिनदहाड़े चलता चकलाघर। लोगों ने कहा – पुलिस किसी की नहीं होती। उस दिन सन्नाट खाये सनीप ने पुलिस जीप में मलकिन और लड़कियों के साथ रजनी को भी जेल जाते देखा। रिश्ता तार तार हो गया था, अब क्या?
रजनी छूट कर बाहर आई तो सनीप ने अपने बाबू और उसके बाप को शहर ही बुला लिया। दोनों ओर से तय पाया गया कि छुट्टा छुट्टी ही राह है। दोनों अलग हो गये। गाँव गिराम को खबर ही नहीं लगी और सनीप के घर वालों ने रजनी को मरा हुआ प्रचारित कर दिया। छुट्टा छुट्टी के दिन ही रोते हुये रजनी के बाप ने भी कह दिया था – रज्जो! मर गई अब तुम। ज़रा भी शरम हो तो नैहर गाँव पैर न रखना। ऐसी से शरम लाज का क्या वास्ता लेकिन शान में रजनी ने भी बात दुहरा दी – पप्पा! हम पढ़ लिख भी रहे हैं। अब वहाँ जाने की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी। बनीं रहें मलकिन।
चकलाघर यानि लेडीज सैलून फिर से शुरू हो गया था। सनीप ने वह शहर छोड़ा, लखनऊ आ गया। अगले साल ही बिनती से शादी हो गई।

सनीप ने सिर उठाया तो महीनों का मरीज लग रहा था। रात गहरा कर कब की सो गई थी लेकिन बिनती के सिर तो रजनी अब जगी थी। ज़िन्दगी के अन्धेरे तो अब शुरू होने वाले थे!  
बारह साल बाद वापस क्यों आई रजनी? पता भी लगा लिया कि सनीप कहाँ रहता है? जगजाहिर है कि झुग्गी बस्ती में रात दस बजे के बाद काले शीशे वाली गाड़ियाँ आती हैं और कुछ औरतें पार्टटाइम पैसा बनाती हैं। बच्चे तक जानते हैं! ऐसी गन्दगी में रहते बिनती सहमती भी है लेकिन करे तो क्या करे? बड़ा बनने के लिये वह भी ...? जो कर रही हैं वही कौन बड़ी हो गईं? बच्चे पढ़ लिख लें तो बन जायँ – यही सोच खुद को समझाती रही है बिनती लेकिन आज? छोटा तक यह समझ बैठा कि अब मम्मी भी...और यह मुआ सनीप? इतना बड़ा धोखा! दे भी तो क्यों नहीं? बड़ों से पुरानी संगत रही है।
मन में धू धू करती आग का धुआँ बर्दाश्त के बाहर हो गया। बिनती ने पायल उतारी और सनीप के मुँह पर फेंक दिया – मुझे तुम्हारी पायल नहीं पहननी मुँहझौंसे! शादी के लिये झूठ तो समझ आता है लेकिन तुमने इतने बरस छिपाये रक्खा! ... नहीं बनना बड़ा हमें ... छोड़, मुझे भी छोड़, बच्चों को ले कहीं चली जाऊँगी।
रोता सनीप उसके पैरों से लिपट गया – ऐसा न कर बिनतो! न कर। मैं कहीं का नहीं रहूँगा। कल की सोच, कल वह आने वाली है। जाने उसके मन में क्या है?
बिनती ने पैर छुड़ा लिये। कुनमुनाती बेटी को गोद में ले सोते हुये दोनों बेटों के बीच जा कर बैठ गई। जाने मन में क्या आया, पायलें फिर से पहन उसने साफल बुझा दिये – हो जी, सो जाओ। कल की कल देखेंगे।
सनीप ने हो जी सुना और उसके सिर से रजनी उतर गई। अंग्रेजी पिये मेहनतकश की पलकों पर रात की लोरियाँ  आर्केस्ट्रा सजाने लगीं। पायलों की विनती मान बिनती पैर हिला रही थी – रुनझुन, रुनझुन...निंदिया आ री! आ री!! (जारी)           

9 टिप्‍पणियां:

  1. भौतिक सुख की चाह में दैहिक सुख भी रास्ता बना ले तो दैविक मूल्य अपने आप विलीन हो जाएंगे।

    इस असार संसार का सारतत्व परोस रहे हैं आप।

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  2. कहानी ने तो पूरा मोड़ ले लिया, पायल को भूतकाल में अपने अधिकार में ले लिया।

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  3. कहानी बढ़ चली उपन्यासिका बनने......यथार्थवादी है पूरी !

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  4. मैं अपने पिछले वक्तव्य पर कायम हूँ...
    आपकी कहानी जब लगे कि खतम हो गयी है या हो रही है, तब्बे शुरू होती है!! इसलिए पूरा सुनने के बादे हम कहेंगे जो कहना है..
    एक अऊर खराबी है आपकी कहानी की.. जब खतम होती है तो कसम से कुच्छो कहने के काबिल नहीं छोडती!!

    कमाल का "गढू" प्लाट निकाला है आपने!! 'चक्र' का लुक्का याद आ गया!!

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    1. अरे नहीं सर जी! बहुत सीधी साधी कहानी है। बस, खुद को संतोष देने के लिये लिख रहा हूँ कि बिनती पर नहीं लिखा तो क्या लिखा?

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