मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

गिफ्ट वाली पायल - 4

पहला भाग 
दूसरा भाग 
तीसरा भाग अब आगे ...


पार्लर से वापस आती बिनती के पाँव रुनझुन थे – रजनी! आज देख लेना कि खबसूरती क्या होती है। बड़प्पन का धौंस जमाने आ रही हो न? वक़्त देने का और क्या मतलब हो सकता है? 
सनीप ने बिनती को देखा तो भौंचक रह गया। यह उसकी बिनती है!
“हो जी, ऐसे क्या देख रहे हो? मेहरी नहीं देखे कभी?” इठलाती हुई बिनती ने उसे बाहर जाने को कहा कि वह कपड़े भी बदल ले। सम्मोहित सा सनीप बाहर आ गया। कुछ देर बाद बिनती ने उसे भीतर बुला लिया - कोठी वाली दीदी की मेहरबानी है यह। वहाँ पालर की जो सबसे अच्छी ... बिनती को यह भूल गया कि उसे क्या कहते हैं तो अपना दिमाग लगाते हुये आगे बोली – जो सबसे अच्छी रँगरेजन थी उसने मेरा मेकाप किया।
मुँह बाये सनीप को कुछ न सूझा तो पूछ पड़ा –  रँगरेजन? समझा तो हँस कर बोला – रँगरेजन नहीं बिउटीशियन। बिनती ने जवाब दिया – हाँ, हाँ वही। पहली तो यही करती थी न? जो खुद रँगी रहे और दूसरों को भी रँगे। ऐसे का भेद कोई कैसे जाने?
सनीप गम्भीर हो गया  - यह सब किस लिये बिनतो?
“बियाह की बरसगाँठ मना रही हूँ और क्या? तुम्हारी पहली आ रही है न? उसे भी दिखाना है कि मैं और मेरे बच्चे कैसे हैं? तुम भी जाओ दाढ़ी बनवा कर आ जाओ। तब तक कपड़े निकाल कर रखती हूँ। सूरा और नीरा आयेंगे तो उन्हें भी तैयार करना है। कितना काम है!”
इठलाती बिनती गम्भीर हो गई – हो जी! कहीं उससे मोहा कर चले तो नहीं जाओगे?
हैरान सनीप ने उसे डपटा – फिर कभी ऐसा न कहना और दाढ़ी बनवाने निकल गया। पालर की रँगरेजन नहीं सैलून की ...उसने आगे के शब्द को गुटके के साथ थूक दिया, आओ आज! तुम्हारी खैर नहीं। बिनतो तुम्हारी मलामत कर के छोड़ेगी।



रजनी, सपनों की खान रजनी। सनीप से छुट्टा छुट्टी हुई तो उसने राहत की साँस ली और सीखने  के साथ साथ धन्धे में तन मन से लग गई। समय भागता रहा और मलकिन की कृपायें बढ़ती गईं। सैलून की केवल वही ब्यूटीशियन थी जिसे मलकिन गाड़ी भी दे देती थीं। रजनी ड्राइवर के साथ घूमती, शॉपिंग करती और अपने को भी सजाती रहती। शायद सातवाँ साल था जब उसे देहजी शिकायत हुई। लेडी डॉक्टर के यहाँ गई तो जाँच और टेस्ट के बाद उसने पति के साथ आने को कहा। रजनी असल बात छिपा गई और बताया कि उसकी शादी ही नहीं हुई थी।
डॉक्टर के ललाट पर बल पड़ गये – फिर ऐसा कैसे? और पूछने पर जब रजनी अड़ गई तो डॉक्टर ने बताया – ठीक है, तुम्हारे  निजी जीवन से मुझे क्या लेना देना? इन्फेक्शन है। बच्चेदानी निकलवानी पड़ेगी। लौट कर रजनी ने मलकिन को बताया तो उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई – तो निकलवा दो। हर महीने की चिकचिक से छुट्टी भी मिल जायेगी। बहाना न होने से बने हुये कस्टमर भी खुश रहेंगे।
उस रात रजनी को सनीप बहुत याद आया। वह खूब रोयी लेकिन कर भी क्या सकती थी?

ऑपरेशन के बाद मलकिन ने खूब देखभाल की लेकिन रजनी ने ठंढेपन का अनुभव कर लिया। दिन बीतते रहे और धीरे धीरे रजनी की माँग घटती गयी। मलकिन ने उसे केवल मेकअप के काम में लगा दिया। कमीशन खत्म हो गया लेकिन रजनी की बिगड़ी आदतें तो वैसी ही रहीं। आये दिन चिखचिख होने लगी और एक दिन ताव में आ कर उसने काम छोड़ दिया। शहर भी छोड़ दिया। नई ज़गह एक बहुत ही मशहूर पार्लर में काम मिल गया। अपने काम में दक्ष तो थी ही, हाथों और बातों से स्नेह भी टपकता;  शीघ्र ही पार्लर की सबसे पारंगत ब्यूटीशियन मानी जाने लगी। वेतन भी बढ़ गया लेकिन अब अकेलापन सहा नहीं जाता था। असुरक्षा का भाव और लोगों की शंका भरी दृष्टि उसे सताने लगे।

सनीप ने उसे नि:स्वार्थ प्यार दिया था, क्या अब भी? इस ढलती आयु में? तब जब कि एक ज़वान बीवी भी है?
इसी शहर में तो है सनीप! रजनी ने पता लगाना शुरू कर दिया। महीनों बीत गये लेकिन कुछ पता नहीं चला। मायके या ससुराल में उसने पता नहीं किया। अभी ऐंठन बची थी और समय से पहले पहचाने जाने का खतरा भी था। मन के शैतान ने जाने कितने गणित जोड़ लिये थे। अगर सब कुछ ठीक रहा तो न हर्रे लगे न फिटकरी और रंग चोखा लेकिन सनीप मिले तो?

कुछ तो बात व्यवहार और कुछ प्रभाव – यहाँ भी वह पार्लर की काले काँच वाली स्कॉर्पियो में घूमती थी। झुग्गियों और सस्ते क्वार्टरों वाली गलियों में घूमती रही और एक दिन दिख गया सनीप – झुग्गी में नहीं, मेन मार्केट में ठेला खींचते हुये। सनीप उसकी गाड़ी के पास ही ठेला रोक कर सुस्ताने लगा और काले काँच के पीछे रजनी सुबकती रही। हैरान ड्राइवर को उसने रुकने और नज़र रखने को कहा। तिजहर को जब सनीप घर लौटा तो रजनी सब जान गयी – इतने पास रहता है सनीप और वह जाने कहाँ कहाँ ढूँढ़ती रही! कहीं उसने कभी देख तो नहीं लिया होगा? ड्राइवर को गाड़ी आगे बढ़ाने को कहते हुये रजनी ने सिर झटका – मैं गाड़ी से बाहर होती ही कहाँ हूँ! उसने नहीं देखा होगा। उसकी बीबी और बच्चों को देख ही लूँगी! जल्दी क्या है?
 सड़क के उस पार ही उसे बोर्ड दिखा था – विवेक प्रसाद, एडवोकेट।
रजनी उछ्ल पड़ी – बन गया काम! ड्राइवर ने पता किया तो एडवोकेट घर पर ही थे। सिर ढके और काला चश्मा पहने उनके घर में प्रवेश करती रजनी अपने भाग्य के पलटने पर इतरा रही थी। 

सनीप तैयार हो गया तो बिनती ने उसे सामने बैठा लिया – हो जी, बच्चों के आने तक हम अकेले हैं। मेरे पास रहो। जाने अब फिर से मौका मिले कि नहीं, क्या जाने क्या हो?
सनीप की आँखें उसकी आँखों से जुड़ गईं – तुझे क्या हो गया है? कभी निश्चिंत कर देती हो तो कभी परेशान। दिमाग तो मेरा भी भन्नाया हुआ है लेकिन उससे अधिक तो तुम्हें देख हैरान हो रहा हूँ। काम पर चला गया होता तो ही ठीक था। मन बझा रहता।
बिनती ने उसे पास खींच उसका सिर अपनी गोद में ले लिया – बस ऐसे ही रहो। सनीप के उठते हाथों को उसने रोक दिया – न, न! मेकाप खराब हो जायेगा।
सनीप ने आँखें मूँद लीं – ज़िन्दगी में ऐसा कभी नहीं हुआ। चिंता सुख के पिछवाड़े खड़ी हो गई। उसे पता नहीं चला कि निहारती बिनती के मन में चउवाई बह चली थी। सभी दिशाओं से घेर घेर हवायें, बादल कहीं नहीं। सुहागन अचानक आ धमके सूखे से सुख चुरा रही थी।  

एक युग बीता और बिनती को बच्चों की सुध आई - हो जी,  खाना तो बनाया नहीं! सूरा नीरा आयेंगे तो क्या खायेंगे? तुम्हें भी भूख लग रही होगी।
सनीप को रुपये पकड़ाते हुये उसने बी टी ड्बलू से खाना बँधवा कर लाने को कहा। सनीप कुछ कहना चाहता था लेकिन उसका मन देखते हुये चुप रहा।
सूरज और नीरज के आने पर सबने साथ ही खाना खाया। दोनों बच्चों को अंतर तो दिख ही गया था। सूरज पूछ पड़ा – आज पापा काम पर नहीं गये क्या?
नीरज ने दुलार दिखाते हुये, ऐसा आदतन वह करता रहता था, बिनती के चेहरे को दोनों हाथों से अपनी ओर स्थिर कर पूछा – ऐसे तुम रोज क्यों नहीं रहती मम्मी?
बिनती  निहाल हो गयी – हो जी, देखो तो दोनों समझदार हो गये हैं ... देख नीरा! बरसगाँठ रोज रोज तो नहीं मनाते न?
अब सूरज की बारी थी – बरसगाँठ? बर्थ डे न? किसका है मम्मी?
बिनती इठलायी – मेरा और किसका?
हैरान बच्चों को बिनती ने समझाते हुये बताया – तुम्हारे पापा से शादी कल के दिन हुई थी। शादी के बाद दूल्हे दुल्हन का नया जन्म होता है।
सूरज पूछ पड़ा – अभी तक क्यों नहीं मनाया मम्मी?
नीरज ने जोड़ा – अब तो हर साल मनाओगी न मम्मी? ... हमलोगों का भी मनाना।
सनीप और बिनती की आँखें एक हो गईं।
कितनी बातें! कितना कहें सुनें? क्या कहें, क्या छोड़ें? नया नया जुड़ता जा रहा है। जनम जनम नहीं तो केवल इस जनम ही साथ निभाना  ... न, न! रोना न बिनती, समय का फेर घेर लाया है तो चला भी जायेगा। सँभाल बिनती, सँभाल!
बिनती ने दोनों बेटों को अगल बगल कस लिया – मनाऊँगी , हर बार मनाऊँगी अब तो। तुम लोग याद दिलाना। मम्मी गँवार है, भूल जाती है। बड़े लोग, पढ़े लिखे लोग नहीं भूलते। तुम लोग भी पढ़ लिख कर खूब बड़े बनना...
जाने क्या क्या कहती गई बिनती। सनीप बस सुनता रहा।
पाँच का कुनबा एक दूसरे से चिपका पड़ रहा। दुल्हा दुल्हन बैठे थे और बच्चे नींद में।

दिन ढल गया लेकिन अभी भी उजाला था। मज़दूर लौटने लगे थे। सनीप ने बाहर से आती अपने नाम की पुकार सुनी। नहीं, एक समय की एक ही पुकार पहले बिनती ने सुनी और सहम गई – यह तो पड़ोस का एडोकेट है!
उसे रात का सपना याद आया और कुछ और भी जो केवल वह और विवेक एडवोकेट जानते थे। भीतर क्रोध उमड़ पड़ा – हो जी! मुझे देखने दो।
तमतमाई बिनती बाहर निकली और जड़ हो गई। साइड में बड़ी गाड़ी लगी थी। कुछ जन एडवोकेट को घेरे हुये थे और उसके साथ कोई और भी थी।
हरहराती बिनती पास आई तो पहचान गयी। उसके हलक का प्रश्न अटक गया।
सामने वह खड़ी थी जिसकी कल्पना तक बिनती ने नहीं की थी – रँगरेजन!
सनीप और बच्चे पीछे आते तब तक नैसर्गिक समझ ने अपना काम कर दिया। पल भर में बिनती के मन ने समय, संयोग और सपने तीनों को अर्थ भरे तारतम्य में ला दिया। सहज समझ ने रजनी के मन में भी वही काम किया।  सनीप को बताने की कोई आवश्यकता नहीं थी, रजनी और बिनती एक दूसरे को पहचान चुके थे।
काले चश्मे के पीछे रजनी की आँखों के आश्चर्य और अविश्वास तो छिप गये लेकिन वह घाघ भी जुबान को रोक नहीं पाई। वाणी लपकी – तुम!...
चुप नहीं रह सकती थी! छ्पाक! - रजनी पर खुद की चोट वैसी ही थी जैसे दाँतों तले किसी तने रबर ने टूट कर चेहरे पर तीखा तमाचा जड़ दिया हो।  
फोन पर रेगुलर कस्टमर के निर्देश मान जिसे पार्लर में सजाया, वह तो दुश्मन निकली!
बिनती की छाती से डर का पहाड़ उड़न छू हो गया - तो ये है बड़े नाज नखरे वाली खेंखर! रुपया मिले तो कुछ भी करती है। रुपया मिलने पर बड़ी बड़ाई वाली तो झुग्गी वाली को भी सजाती है, इससे क्या डरना?
बिफरती हुई वह एडवोकेट पर टूट पड़ी – साहेब! डाइन भी सात घर छोड़ देती है। तुम्हें मैं ही मिली थी? मेरा घर ही मिला था, यह यह ... उसने रजनी की ओर हाथ चमकाये ... यह बड़प्पन दिखाने को?
जुट गये लोग, सनीप, रजनी, बच्चे सब हैरान थे जब कि बिनती के तेवर की ताब ने एडवोकेट विवेक प्रसाद जैसे कुटिल को भी भीतर तक हिला दिया था।
सनीप को अब होश आया था, सबसे उलझ कर तो यह सब बिगाड़ देगी! उसने डाँटा – बिनती!
बिनती उखड़ पड़ी - हो जी, मुझे बोलने दो! (जारी)                  

6 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी में अभी तक सस्पेंस का एलेमेन्ट बना हुआ है.. एक संवाद तो बिलकुल "गृह-प्रवेश" की याद दिला गया.. आपने कहा था यह कहानी बिनती की कहानी है, उसकी ओर से.. इसलिए आप पर बिनती ही छाई है.. गौर करें:
    कमीशन खत्म हो गया लेकिन रजनी की बिगड़ी आदतें तो वैसी ही रहीं। आये दिन चिखचिख होने लगी और एक दिन ताव में आ कर बिनती ने काम छोड़ दिया। शहर भी छोड़ दिया।
    मैं एक साथ ही पढता हूँ, लेकिन यह "जारी" कमाल का है!!

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    1. गृहप्रवेश देखनी ही पड़ेगी :)

      @ बिनती, रजनी घालमेल - एक दूसरा ऐंगल है। थोड़ी सी काव्यात्मक रुझान वाले प्रवाह में कभी कभी समान ध्वनियों वाले शब्दों में चूक कर जाते हैं। दोनों में समान मात्रायें हैं - । । S
      .... हाँ, बिनती तो छायी ही हुई है। चूक ठीक करता हूँ।

      धन्यवाद। सतर्क पाठन के लिये आभार कहते हुये कुछ कम सा लग रहा है। :)

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  2. स्त्रियॉं की नैसर्गिक समझ शिक्षा अशिक्षा की मोहताज नहीं ...
    अगले अंक की प्रतीक्षा मे

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