रविवार, 25 नवंबर 2012

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 22

पिछले भाग से आगे...

 

पलँगरी पर भउजी को लिटाने में देह धौंकनी हो गई। मन के बवंडर से बेचैन सी मतवा उखड़ी साँसों को थामने हेतु बाहर आँगन में आ खड़ी हो गईं। दृष्टि अनायास ही घर को सहलाती घूम गई। नथुने हल्के से रमते धूप गन्ध से भीनते चले गये - ई अँगना त रोज धुपियारी होत होई! (इस आँगन तो रोज धूप जलती होगी!)  

 

काठ के खम्भे पर बना सुग्गा जूठी थाली को निहार रहा था जिसके बगल में अगियारी अभी भी सुलग रही थी। पहिले गरास से पहिले लछमी ने अन्न को अगिनदेव को अर्पित किया था - सब जीवों की छुधा शांत करने की प्रार्थना! तुलसी बिरवे की पत्तियों पर चन्दन के निशान थे जिन पर खुला आसमान नील नील बरस रहा था। मतवा ने जाना कि देवी गीत के कुछ बोल अभी भी वहीं ठिठके हुये थे।

नीचे पैकरमा (परिक्रमा) पर चूने की सफेदी थी जिस पर सरसो और चावल बिखरे पड़े थे – खाउ रे चिरइया भर भर पेट!  पूरे घर की जमीन कठभट्ठा माटी से लिपाई सब ओर बराबर थी - एकसार और सिलवट को घेरे आगे तक पियरी माटी की लिपाई। कूँची पीसी गई सुभ हरदी की छिटकन उस घेरे में बिला गई थी। एक गाँठ अभी भी लोढ़े पर पड़ी बता रही थी कि सुभ यहाँ रहने को है!

 

अतिबला_खरैटीकाँच भीत (कच्ची दीवार) पर चहुँओर घेर उज्जर(उजला, सफेद) , उज्जर घेर। घेर के भीतर सुग्गा, फूल पतई, दीया, सीता राम, सीताराम, खरइट(अतिबला, एक वनस्पति) के छपिया, पुरइन दल फूल लेकिन नाग नागिन नपत्ता(लापता), कइसन सुभ रे (यह कैसा शुभ)? दीठ किनारे अटक गई। पास जा कर देखीं तो पता लगा कभी गोबर से बने नाग नागिन झड़ चुके थे और भीत का वह हिस्सा भउजी ने ऐसे ही छोड दिया था। नीचे हाथ के ताजे छापे थे – पीयर, उज्जर, लाल नपत्ता। मतवा को पुरानी गोधन पूजा याद आई, साँसों ने राहत सी पाई और टीसता दुख उँसास के साथ निकल पड़ा – कवन सोहागिन अइसन घर रखले होई रे सोगही! मँगधोवनी रे, तोर छहाँरी छोड़ सोहाग कइसे भागि गइल? सुघर घर घरनी, चलनी भागि! (किस सुहागन ने अपना घर ऐसे रखा होगा रे शोकमयी! माँगधोई रे, तुम्हारी छाया छोड़ सौभाग्य कैसे पलायन कर गया? सुघड़ घर और गृहिणी लेकिन चलनी जैसा भाग्य)  

 

मटिहा कराही में धूप राख हो चुकी थी। करसी(एक तरह का उपला) के टुकड़े मन को तोड़ चले और चेतना ने करवट ली। संयोग ही था कि दुपहर में सोहित और नौकर इसरभर दोनों खेतों को निकल गये थे। मतवा सतर्क हो छिपते छिपते आई थीं कि राह में भी कोई आते न देख ले! पति का संकेत याद आया तो मन मन भर भारी हो गया। अगर सचमुच ऐसा है तो किसी को पता नहीं चलना चाहिये। देह गनगनाने लगी, पेशानी रिस उठी – वह तो अनर्थ के केन्द्र में खड़ी थीं! लछमिनिया की सुघरता से जो मुग्ध भाव उमड़ पड़ा था उस पर अब भय भारी था। जैसे भी हो जल्दी से हाल चाल ले यहाँ से जाना होगा, जाने कब सोहित या इसरभर धमक पड़े!  अइले से समियो नाइँ रोकलें, ऊनहूँ के बुद्धी...(आने से स्वामी ने भी नहीं रोका, उनकी बुद्धि भी ...)

 

पीठ पर स्पर्श से मतवा ऐसे चिहुकीं जैसे किसी ने अचानक ठंढा पानी डाल दिया हो! मुड़तीं तब तक हाथों में आँचल जोड़े भउजी जमीन पर प्रणाम मुद्रा में आ चुकी थी। होश आ गइल! (होश आ गया!) मतवा ने राहत की साँस लेते बस इतना कहा – उठावs और आगे का आशीर्वाद नयनों से निकल भउजी के हाथ टपका – टप्प! दोनों चुपचाप भीतर चली गईं। मतवा पलँगरी पर और भउजी नीचे पीढ़े पर।

“हम अभागी के दुआरे राउर गोड़ परल, हम तरि गइनी ए मतवा!” (मुझ अभागी के घर आप के पाँव पड़े, मैं तर गई मतवा!)  

मतवा की आँखों में आश्वस्ति का वह भाव था जो बस सहज मानुष विश्वास को निथार लेता है। भउजी कहती चली गई। बियाह, सँवाग का प्रेम, वैधव्य, गाँव और नैहर की उपेक्षा, प्रताड़ना, अपना दुर्भाग्य, देवर की नालायकी और कुल खानदान पर नाश का घिरता अन्धेरा – का पुरनियन के केहू नामलेवा नाहीं बची? हमार जिनगी बिरथा जाई? (क्या पुरखों का कोई नामलेवा नहीं बचेगा? मेरी ज़िन्दगी व्यर्थ ही चुक जायेगी?)  

“जौने घरे अइसन पतोहि, वो घरे नास, नाहीं रे!” (जिस घर में ऐसी बहू हो, उस घर में नाश, नहीं रे!)

“जनि धीरज धराव ए मतवा!” (धैर्य मत बँधाइये मतवा!) यम माँग पोंछ ले गये, देवर लखेरा।

“...हम का करतीं ए मतवा? बबुना न बियाह करें, न कवनो के अइसहीं राखें। आपन मोहिनी देखवलीं कि दीया त जरे! फसिल हो गइले पर खेत्ते के काच कीच केकरा के मन परेला? अकेल बबुना के हाथे खेत नाहीं रुकिहें ...हम से पाप भइल ए मतवा! दियना जरा के हम बुता जाइब, हमार मुगती कइसे होई ए मतवा, बाबा से पूछबि!” “(मैं क्या करती मतवा? देवर न विवाह करे और न किसी को ऐसे ही रख ले। अपनी मोहिनी दिखाई कि दीप तो जले! फसल हो जाने पर खेत की कीच काच किसको याद रहती है? अकेले देवर के हाथ खेती नहीं रुकने वाली ...मुझसे पाप हुआ है मतवा! दीप जला कर मैं बुझ जाऊँगी, मेरी मुक्ति कैसे होगी मतवा, बाबा से पूछियेगा!)

भउजी डहँको पहँको(फूट फूट)रोने लगी। नीचे उतर कर मतवा ने उसे गोद में ले लिया। जैसे वर्षों बाद माँ की छाँव मिली हो, भउजी बच्चे सी सिमट कर गोल हो गई। पियरी को निहारती मतवा के मन में सुवास उठी – गेना फूल (गेंदे का फूल)

 

उन्हों ने समझाना और सांत्वना देना शुरू किया – सोहित आ इसरभर कवने ओर गइल बाँड़े (सोहित और इसरभर किस ओर गये हैं)? मतवा को यह जान राहत हुई कि साँझ तक वापस नहीं आने वाले।

“जौन भइल तौन भइल। खुश रहल कर। भगवान सब ठीक करिहें। रहता निकली न! कवनो बाति होखे त हमके जरूर जनइहे। खबरदार जो मुअले के बाति सोचलू! (जो हुआ सो हुआ। प्रसन्न रहा करो। भगवान सब ठीक करेंगे। रास्ता निकलेगा न! कोई बात हो तो मुझे अवश्य खबर करना। खबरदार जो मरने की बात सोची!

“कइसे जनाइब ए मतवा? के हमार निस्तार करी? (मैं कैसे खबर करूँगी मतवा? मेरा निस्तारण कौन करेगा?)

मतवा ने गाढ़ी पियरी को एक बार पुन: देखा और उत्तर दिया – ई लुग्गा अब जनि पहिर। सहेज के राखि ल। कब्बो हमार ताक लागे त बइठका के छान्ही एके पसार दीह, हम चलि आइब। ... अब हम जाइबि (यह धोती अब मत पहना करो। सँभाल कर रख लो। कभी मेरी आवश्यकता हो तो बैठक की फूस वाली छत पर इसे फैला देना, मैं आ जाऊँगी। ... अब मैं चलूँ)

 

लछ्मी उठी और आँचल की खुँटिया खोल मुट्ठी भर ली। घरदुआरी से मतवा को विदा करती भउजी ने सिर को भूमि पर नवाया और उनके पाँवों पर सिक्के रख दिये। मतवा ने उठाया। चाँदी का रुपया और चवन्नी, कुल बीस आना।

“ई का ए पतोहा (यह क्या बहू)?”

“घरे आइल देवता खाली हाथ नाहिं बिदा कइल जाला। ... राखि लेईं, कामे आई। बस बीस डग बाकी बा अब (घर आये देवता को खाली हाथ विदा नहीं किया जाता।... रख लीजिये, काम आयेंगे। अब तो बस बीस पग चलने को बाकी हैं)।“ और भउजी मुड़ गई।

 

लौटती मतवा को किसी ने नहीं देखा। रस्ते के पिछुउड़ एक लँगड़ा उचका भर था। तेज कानों ने गोड़हरा पछेले(एक तरह के पाँव के आभूषण)के स्वर पहचान लिये थे – खदेरन इहाँ के मतवा, एँहर? का करे? (खदेरन के घर की मतवा, इधर? क्या करने?)

तकिये के नीचे से उसने बही निकाला। खोल कर पुराना पड़ गया ललछौंहा कपड़ा फेंका और नये कपड़े पर लाल टीका लगा उसमें बही को लपेटने लगा। कपड़े का रंग पीला था - शुभ गाढ़ा पीला।

...पियरी को उतार गगरी में रख पलँगरी के नीचे छिपाने के बाद भउजी की नज़र सोहित के अँगरखे पर पड़ी। सुई में धागा पिरो मुस्कुराती उसने खुद से कहा – मतवा! और सिलने लगी।

बाहर ललछौंह कपड़े को खींचते फाड़ते कुकुरों की रार थी लेकिन कुकुरझौंझ से बेखबर भउजी गीत तुरुप रही थी:        

साँझ सेनुरवा नयन भरमावेला, अँखिया अँसुवन लोर रे

हमरे बोलवले सजना न आवें, भुइयाँ भइल बिना छोर रे!

(जारी)

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत हीं मार्मिक लगा यह भाग... पता नही क्यों लेकिन जी भर आया और साथ ही आँखें भी...

    सादर

    ललित

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  2. Padh raha hoon. Adjective kab ke khatam ho chuke hain,lekin dhyan laga hua hai. BAU KA DEEWANA.

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    1. BAU KA DEEWANA........
      बाउ के दीवाने मुँह खोलकर आयें तो कलेजे से लगा कर मस्त-मस्त हो जाऊँ!

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    2. "काँच भीत (कच्ची दीवार) पर चहुँओर घेर उज्जर(उजला, सफेद) , उज्जर घेर। घेर के भीतर सुग्गा, फूल पतई, दीया, सीता राम, सीताराम, खरइट(अतिबला, एक वनस्पति) के छपिया, पुरइन दल फूल लेकिन नाग नागिन नपत्ता(लापता), कइसन सुभ रे (यह कैसा शुभ)?"

      यह तो इस ठाँव की ही करामात है!
      बउरा जाते हैं हम तो!

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  3. Pandey ji ko.......abhi to main Bau katha ka rasaswadan kar raha hoon,masti chhai hai. Katha ko viram dene ke baad ek meeting honi chahiye jisme Bau ke sab chahnewale milen aur Bau evam Bau ke bahane Bau katha ki hazaron adhbhut baaton par moonh kholen.Sapna dekha hai ,poora hoga... iska bharosa hai....kyonki jab Bau ke kaarname saadharan nahin hain to unke chahnewale saadharan kaam to kar hi sakte hain.

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  4. कमाल की लेखनी है, वह देश-काल साक्षात हो गया है ...

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  5. रेडू जी के बाद पहली बार आप की रचना बहुत अच्छी लगी ।आगे की कहानी भी जल्दी पूरी करे जी ।-डॉ गोविन्द पाण्डेय 01-04-2013

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  6. रेडू जी के बाद पहली बार आप की रचना बहुत अच्छी लगी ।आगे की कहानी भी जल्दी पूरी करे जी ।-डॉ गोविन्द पाण्डेय 01-04-2013

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