5 जुलाई को सत्ता के दलालों ने आम जनता को न्यौता दिया है - भारत को बन्द करो ! आप से अनुरोध है कि इस वाहियात न्यौते पर अमल न लाइए। काम कीजिए। इस दिन दो के बजाय चार फाइलें निपटाइए। रुके हुए पेमेंट कराइए। दुकान पर ग्राहकों से थोड़ा और प्रेम से बतियाइए। कोई रुका हुआ फैसला ले लीजिए। ... उन्हें बताइए कि भारत बन्द नहीं हो सकता! गए वो ज़माने !! अब यह देश चल पड़ा है। दौड़ने को कहो दौड़ेगा, रुकने को कहोगे तो तुम्हें रौंदेगा। नौटंकी अब गली गली नहीं रंगशालाओं में ही होगी और कायदे की होगी - भँड़वागीरी नहीं चलेगी।
मैं सत्ता में बैठे लोगों का एजेंट नहीं - कोई भी शासन में होता, इस तरह से भारत बन्द का समर्थन मैं नहीं करता। क्या है मुद्दा ? यही न कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि हुई है ! असलियत मालूम है आप को ? सब्सिडी का खून कब तक चाटते रहेंगे ? रसीला गोस्त तो वे चाभ रहे हैं जिनकी तिजोरियाँ यहाँ नहीं स्विट्जलैण्ड में हैं। होश में आइए !
कितनी बार आप लोगों ने भारत बन्द किया है:
- जब सिनेमा के टिकट के दाम बढ़े हैं ।
- जब किसी मॉल में दो पैसे की चीज दस रुपए में चाभे हैं और चटकारे ले दोस्त परिचितों पर भाव जताए हैं ।
- हर महीने दो महीने पर जब दूध के भाव बढ़े हैं ।
... यह लिस्ट अंतहीन है।
भरतों की संतानों ! जिस रसमलाई की आप को आदत पड़ चुकी है, वह बहुत दिनों तक नहीं मिलने वाली। ज़हर बन कर समूचे तंत्र को डायबिटिक बना रही है। अनुशासित होइए। अभी पहला स्टेज है। गनीमत है। दूसरे स्टेज पर रोग असाध्य हो जाएगा। ज़रा इंटरनेट पर दुनिया के दस सबसे ग़रीब देशों की अवस्था से परिचित हो लीजिए। भारत बहुत अलग नहीं है।
ग़रीबी दान और भीख से नहीं, उद्यम से जाती है। सब्सिडी देने के लिए पिछवाड़े से पैसा काटने का रिवाज अधिक खतरनाक है। बेहतर है कि यह टीस मारते हुए भी कि उफ! बहुत महँगाई है, सही कीमत अदा की जाय और अनुशासित हुआ जाय।
पेट्रोलियम पदार्थ विकास के लिए अनिवार्य हैं और उनका अनुशासित हो कर उपयोग आवश्यक है । क्यों कि तमाम ग्रीन स्रीन, वार्मिंग ठंडी, सोलर पोलर, हवा हवाई हल्लों के बावजूद मानव सभ्यता अभी तक इनके ऐसे विकल्प ढूँढ़ नहीं पाई है जो इन्हें प्रतिस्थापित कर दें। और ये दिन ब दिन तेज़ी से घट रहे हैं । कारूँ के खजाने नहीं मिल रहे !
भारत सरकार के विज्ञापन से आप लोगों को अवगत कराता हूँ। यह कोरा सरकारी प्रचार नहीं है। इस देश के एक नासूर को खोल कर बताया गया है।
- भारत अपने कच्चे तेल की आवश्यकता का 80% आयात करता है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव से घरेलू कीमतें प्रभावित होनी ही हैं।
- सार्वजनिक वितरण की केरोसीन की क़ीमत रु. 19 प्रति लीटर बढ़नी चाहिए थी जब कि बढ़ी सिर्फ रु. 3 प्रति लीटर।
- रसोई गैस की कीमत प्रति सिलिंडर रु.261 बढ़नी चाहिए थी जब कि बढ़ाई गई सिर्फ रु.35 प्रति सिलिंडर। साढ़े ग्यारह करोड़ परिवारों को सप्लाई की जाने वाली इस गैस के कारण अर्थ व्यवस्था पर कितना दबाव है, ज़रा हिसाब लगाइए। कैलकुलेटर लेकर 2599 के आगे कितने शून्य आते हैं ? गिनते रहिए ...
डीजल पेट्रोल का भी यही हाल है। एक बड़ा सीधा सा तर्क है कि डीजल का दाम बढ़ने से सारी वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। सही है। इसीलिए यहाँ सरकारी नियंत्रण रखा गया है लेकिन बोझ उठाने की और सहने की भी एक सीमा होती है। जब अति हो जाती है तो ऐसे कदम लेने पड़ते हैं। कोई भी सत्ता में रहेगा, लेगा। तरीके अलग अलग हो सकते हैं । कुछ आप को कम कष्टकारी लग सकते हैं, कुछ अधिक।
जरा अपने ग़रीब पड़ोसियों के यहाँ की क़ीमतों पर नज़र डालिए:
देश | रसोई गैस (रु. प्रति सिलिंडर) | केरोसीन (मिट्टी का तेल) प्रति लीटर |
पाकिस्तान | 577 | 35.97 |
बंगलादेश | 537 | 29.00 |
श्रीलंका | 822 | 21.00 |
नेपाल | 782 | 39.00 |
भारत (दिल्ली की क़ीमतें, बाकी ज़गह थोड़ी कमी बेसी हो सकती है।) | 345 | 12.32 |
कुछ समझ में आ रहा है ? मुर्गी को हलाल न होने दीजिए, सोने के न सही सामान्य अंडे नियमित मिलते रहेंगे। कभी कभी देखभाल का खर्च ज़रूर बढ़ेगा।
अब आप बताइए:
- आप के यहाँ (4 का परिवार) एक सिलिंडर कितने दिनों चलता है ? एक महीने ? एक महीने में रु. 35 अधिक देना हो तो हाय तौबा और मॉल मे एक दफे सिनेमा देखने जाने पर हजार रूपये फूँक देने पर वल्ला वल्ला ! कितनी बार आप सिनेमा देखने जाते हैं - महीने में ? कभी सोचा कि वहाँ 35 रु. की कटौती कर ली जाय? नहीं । क्यों ? - कीजिए। यह सरकार का नहीं आप के देश का सवाल है। बाहर से जब खरीदा जाता है तो डॉलर में भुगतान किया जाता है। विदेशी मुद्रा कोश प्रयोग में लाया जाता है। कुछ समझ में आया?
- कितनी बार रेड लाइट सिगनल पर आप गाड़ी बन्द किए हैं ? एक बार भी नहीं। क्यों ? हरी होते ही फुर्र से निकलने की जल्दी होती है। कितना समय बचता है? किसी पर इम्प्रेशन जमा रहे होते हैं? उस इम्प्रेशन की क़ीमत क्या है ?
- मिट्टी के तेल की चोरबाज़ारी है। सिलिंडर से गैस निकाल ली जाती है। कितनी बार आप लोग गोल बना कर इसके विरुद्ध खड़े हुए हैं? एक बार भी नहीं। क्यों? अपना क्या जाता है?
नेता जी कितनी बार आप को बुलाने आए हैं भारत बन्द कराने के लिए ? एक बार भी नहीं। क्यों? अरे वही तो यह धन्धा सँभाल रहे हैं। मुद्दा उठा कर कौन उन्हें नाराज़ करे ?
ज़रा सोचिए। समस्याएँ आप से ही हैं और आप से/पर ही समाप्त होंगी । अपने भीतर कुछ अनुशासन लाइए।
'भारत बन्द' का व्यय कितना होगा ? फिलहाल तो बढ़ोत्तरी के बावज़ूद तेल सब्सिडी पर व्यय रु.53000 करोड़ सालाना है। आप के पर्स से ही जा रहा है लेकिन जिस तरीके से जा रहा है वह तंत्र को रोगग्रस्त किए हुए है।