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रविवार, 4 जुलाई 2010

भारत बन्द ... बन्द कीजिए फालतू की नौटंकी !

5 जुलाई को सत्ता के दलालों ने आम जनता को न्यौता दिया है - भारत को बन्द करो ! आप से अनुरोध है कि इस वाहियात न्यौते पर अमल न लाइए। काम कीजिए। इस दिन दो के बजाय चार फाइलें निपटाइए। रुके हुए पेमेंट कराइए। दुकान पर ग्राहकों से थोड़ा और प्रेम से बतियाइए। कोई रुका हुआ फैसला ले लीजिए। ... उन्हें बताइए कि भारत बन्द नहीं हो सकता! गए वो ज़माने !! अब यह देश चल पड़ा है। दौड़ने को कहो दौड़ेगा, रुकने को कहोगे तो तुम्हें रौंदेगा। नौटंकी अब गली गली नहीं रंगशालाओं में ही होगी और कायदे की होगी - भँड़वागीरी नहीं चलेगी।
मैं सत्ता में बैठे लोगों का एजेंट नहीं - कोई भी शासन में होता, इस तरह से भारत बन्द का समर्थन मैं नहीं करता। क्या है मुद्दा ? यही न कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि हुई है ! असलियत मालूम है आप को ? सब्सिडी का खून कब तक चाटते रहेंगे ? रसीला गोस्त तो वे चाभ रहे हैं जिनकी तिजोरियाँ यहाँ नहीं स्विट्जलैण्ड में हैं। होश में आइए !
कितनी बार आप लोगों ने भारत बन्द किया है:
- जब सिनेमा के टिकट के दाम बढ़े हैं ।
- जब किसी मॉल में दो पैसे की चीज दस रुपए में चाभे हैं और चटकारे ले दोस्त परिचितों पर भाव जताए हैं ।
- हर महीने दो महीने पर जब दूध के भाव बढ़े हैं ।
... यह लिस्ट अंतहीन है।
भरतों की संतानों ! जिस रसमलाई की आप को आदत पड़ चुकी है, वह बहुत दिनों तक नहीं मिलने वाली। ज़हर बन कर समूचे तंत्र को डायबिटिक बना रही है। अनुशासित होइए। अभी पहला स्टेज है। गनीमत है। दूसरे स्टेज पर रोग असाध्य हो जाएगा। ज़रा इंटरनेट पर दुनिया के दस सबसे ग़रीब देशों की अवस्था से परिचित हो लीजिए। भारत बहुत अलग नहीं है।
ग़रीबी दान और भीख से नहीं, उद्यम से जाती है। सब्सिडी देने के लिए पिछवाड़े से पैसा काटने का रिवाज अधिक खतरनाक है। बेहतर है कि यह टीस मारते हुए भी कि  उफ! बहुत महँगाई है, सही कीमत अदा की जाय और अनुशासित हुआ जाय।
पेट्रोलियम पदार्थ विकास के लिए अनिवार्य हैं और उनका अनुशासित हो कर उपयोग आवश्यक है । क्यों कि तमाम ग्रीन स्रीन, वार्मिंग ठंडी, सोलर पोलर, हवा हवाई हल्लों के बावजूद मानव सभ्यता अभी तक इनके ऐसे विकल्प ढूँढ़ नहीं पाई है जो इन्हें प्रतिस्थापित कर दें। और ये दिन ब दिन तेज़ी से घट रहे हैं । कारूँ के खजाने नहीं मिल रहे !
भारत सरकार के विज्ञापन से आप लोगों को अवगत कराता हूँ। यह कोरा सरकारी प्रचार नहीं है। इस देश के एक नासूर को खोल कर बताया गया है।
- भारत अपने कच्चे तेल की आवश्यकता का 80% आयात करता है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव से घरेलू कीमतें प्रभावित होनी ही हैं।
- सार्वजनिक वितरण की केरोसीन की क़ीमत रु. 19 प्रति लीटर बढ़नी चाहिए थी जब कि बढ़ी सिर्फ रु. 3 प्रति लीटर।
- रसोई गैस की कीमत प्रति सिलिंडर रु.261 बढ़नी चाहिए थी जब कि बढ़ाई गई सिर्फ रु.35 प्रति सिलिंडर। साढ़े ग्यारह करोड़ परिवारों को सप्लाई की जाने वाली इस गैस के कारण अर्थ व्यवस्था पर कितना दबाव है, ज़रा हिसाब लगाइए। कैलकुलेटर लेकर 2599 के आगे कितने शून्य आते हैं ? गिनते रहिए ...
डीजल पेट्रोल का भी यही हाल है। एक बड़ा सीधा सा तर्क है कि डीजल का दाम बढ़ने से सारी वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं।  सही है। इसीलिए यहाँ सरकारी नियंत्रण रखा गया है लेकिन बोझ उठाने की और सहने की भी एक सीमा होती है। जब अति हो जाती है तो ऐसे कदम लेने पड़ते हैं। कोई भी सत्ता में रहेगा, लेगा।  तरीके अलग अलग हो सकते हैं । कुछ आप को कम कष्टकारी लग सकते हैं, कुछ अधिक।
जरा अपने ग़रीब पड़ोसियों के यहाँ की क़ीमतों पर नज़र डालिए:
देश
रसोई गैस (रु. प्रति सिलिंडर)
केरोसीन (मिट्टी का तेल) प्रति लीटर
पाकिस्तान
577
    35.97
बंगलादेश
537
    29.00
  श्रीलंका
822
21.00
नेपाल
782
   39.00
भारत (दिल्ली की क़ीमतें, बाकी ज़गह थोड़ी कमी बेसी हो सकती है।)
345
12.32
कुछ समझ में आ रहा है ? मुर्गी को हलाल न होने दीजिए, सोने के न सही सामान्य अंडे नियमित मिलते रहेंगे। कभी कभी देखभाल का खर्च ज़रूर बढ़ेगा।   
अब आप बताइए:
- आप के यहाँ (4 का परिवार) एक सिलिंडर  कितने दिनों चलता है ? एक महीने ? एक महीने में रु. 35 अधिक देना हो तो हाय तौबा और मॉल मे एक दफे सिनेमा देखने जाने पर हजार रूपये फूँक देने पर वल्ला वल्ला ! कितनी बार आप सिनेमा देखने जाते हैं - महीने में ? कभी सोचा कि वहाँ 35 रु. की कटौती कर ली जाय? नहीं । क्यों ? - कीजिए। यह सरकार का नहीं आप के देश का सवाल है। बाहर से जब खरीदा जाता है तो डॉलर में भुगतान किया जाता है। विदेशी मुद्रा कोश प्रयोग में लाया जाता है। कुछ समझ में आया?
- कितनी बार रेड लाइट सिगनल पर आप गाड़ी बन्द किए हैं ? एक बार भी नहीं। क्यों ? हरी होते ही फुर्र से निकलने की जल्दी होती है। कितना समय बचता है? किसी पर इम्प्रेशन जमा रहे होते हैं? उस इम्प्रेशन की क़ीमत क्या है ?
- मिट्टी के तेल की चोरबाज़ारी है। सिलिंडर से गैस निकाल ली जाती है। कितनी बार आप लोग गोल बना कर इसके विरुद्ध खड़े हुए हैं? एक बार भी नहीं। क्यों? अपना क्या जाता है?
नेता जी कितनी बार आप को बुलाने आए हैं भारत बन्द कराने के लिए ?  एक बार भी नहीं। क्यों? अरे वही तो यह धन्धा सँभाल रहे हैं। मुद्दा उठा कर कौन उन्हें नाराज़ करे ?
ज़रा सोचिए। समस्याएँ आप से ही हैं और आप से/पर ही समाप्त होंगी । अपने भीतर  कुछ अनुशासन लाइए।
'भारत बन्द' का व्यय कितना होगा ? फिलहाल तो बढ़ोत्तरी के बावज़ूद तेल सब्सिडी पर व्यय रु.53000 करोड़ सालाना है। आप के पर्स से ही जा रहा है लेकिन जिस तरीके से जा रहा है वह तंत्र को रोगग्रस्त किए हुए है। 

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

.. ये आग नहीं आसाँ

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यह लेख बहुत सरल तरीके से आम जनता और विशेषकर युवा वर्ग को तेल या गैस डिपो में लगने वाली आग के एक अनछुए से पहलू से अवगत कराने के लिए लिखा गया। कृपया तकनीकी बारीकियों की अपेक्षा न रखें।
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आग जिन्दगी है। कोई जिन्दा है कि नहीं, यह उसके शरीर की गर्मी से जाना जाता है। मनुष्य आग जलाना सीखने के बाद ही सभ्य हुआ। इसीलिए दुनिया के सभी पुराने धर्मों में आग को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ऋग्वेद का पहला सूक्त ही अग्नि को समर्पित है। 
आग को जलाने के लिए तीन चीजें आवश्यक हैं – फ्यूल, ऑक्सीजन और स्पार्क। ये तीन मिलते हैं तो आग पैदा होती है। इन्हें फायर ट्रैंगल भी कहा जाता है। तीनों साइड पूरे हों तो आग लगती है। अगर कोई एक नहीं रहेगा तो आग नहीं जलेगी। इस जानकारी का उपयोग आग को रोकने और उसको बुझाने में किया जाता है।
तेल के डिपो या एक्स्प्लोजिव स्टोरेज में यह प्रयास किया जाता है कि स्पार्क न पैदा हो क्यों कि फ्यूल और ऑक्सीजन तो ऐसी जगहों पर रहते ही हैं। इसीलिए ऐसे स्थानों पर स्मोकिंग, कुकिंग वगैरह वर्जित होते हैं। लाइटिंग और स्विच भी स्पार्करोधी होते हैं और विस्फोटक विभाग के लाइसेंस के बाद ही बनाए जाते हैं।   ऐसी जगहों पर यदि किसी कारण से आग लग गई और शुरू के कुछ मिनटों, जी हाँ मिनटों- घंटों नहीं, में नियंत्रित नहीं हुई तो विस्फोटक होने के कारण उसे बुझाया नहीं जा सकता। असल में हवा गर्म होकर उपर उठती है और खाली स्थान भरने को अगल बगल से हवा जोरों से आती है । इस कारण यह पूरा प्रॉसेस दुगुना चौगुना रफ्तार से बढ़ता जाता है। पानी का कोई असर नहीं होता। प्रोडक्ट के पूरी तरह जल जाने पर ही आग बुझती है। कुछ आधुनिक तकनीकें जैसे विस्फोट कर ऑक्सीजन को आग वाले स्थान पर एकदम समाप्त कर देना बहुत महंगी, कठिन और अप्रभावी साबित हुई हैं। बड़ी स्केल की आग को नियंत्रित करना कितना कठिन है यह इससे समझा जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया जैसा विकसित देश भी अपने जंगलों में लगी आग को नियंत्रित नहीं कर पाता है और वहाँ इससे हाल के वर्षों में बहुत नुकसान हुआ है।  ऐसी आग की सूरत में आबादी खाली कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।
आग से बचाव और नागरिकों की सुरक्षा के लिए ही तेल और एल पी जी डिपो आबादी से बहुत दूर बनाए जाते हैं। लेकिन ऐसी जगहों के चारो ओर रोजगार के अवसर बढने से आबादी बसती जाती है। दुर्भाग्य से भारत में नागरिक जागरूक नही हैं और न ही सरकारें आबादी के बसाव को रोकती हैं। लॉ और ऑर्डर का मामला होने के कारण तेल कम्पनियाँ अपनी बाउंड्री के बाहर आबादी की ऐसी बाढ़ को रोकने के लिए कुछ अधिक नहीं कर पातीं । ऐसी आबादी आग लगने का कारण हो सकती है और आग लगने पर उसका आसान शिकार भी।  
डिपो के भीतर सुरक्षा के तमाम इन्तजामात होते हैं। सुरक्षा के उपर खर्च 30 से 35% तक भी हो जाता है। सारे कर्मचारी आग न लगने देने की सावधानियों और आग पर समय रहते काबू पाने के लिए ट्रेंड होते हैं। शेड्यूल के हिसाब से नियमित रूप से मॉक फायर ड्रिलें होती हैं जिनमें प्रशासन और फायर डिपार्टमेंट भी हिस्सा लेता है। आग लगने पर कौन कर्मचारी क्या करेगा, यह सब पूर्व निर्धारित रहता है। मॉक ड्रिल में इसी हिसाब से कर्मचारी ऐक्शन लेते हैं ताकि हादसा होने पर किसी तरह का कंफ्यूजन न हो।
सवाल यह है कि इतनी तैयारी के बाद भी आग लग कैसे जाती है? ऐसे समझिए कि सावधानियों के चलते ही आग की घटनाएँ बहुत कम होती हैं नहीं तो जिस तरह के प्रोडक्ट होते हैं, उनसे बार बार आग लगे ! गैस या पेट्रोल का हवा के साथ मिश्रण बहुत ज्वलनशील होता है। मानवीय चूक या मशीनरी के फेल्योर से अगर इनका लीकेज बहुत देर तक होता रहे तो ये अदृश्य वेपर क्लाउड  बनाते हैं। यह क्लाउड हवा में तैरता रहता है। इस क्लाउड में ऑक्सीजन और फ्यूल का एक निश्चित अनुपात होने पर जरा सी चिनगारी कहर मचा सकती है क्यों कि पूरा क्लाउड एकदम से आग पकड़ता है। अब आप कहेंगे कि चिनगारी आएगी कहाँ से? होता यह है कि हवा के साथ यह अदृश्य क्लाउड बहुत दूर तक डिपो की  बाउंड्री के पार भी चला जा सकता है।  अब यदि आबादी में कहीं किसी ने  कुछ सुलगाया तो आग क्लाउड को पकड़ डिपो तक आ जाती है और फिर तबाही पक्की ! इसीलिए डिपो के चारो ओर आबादी का हिस्सा न बनें और दूसरों को भी ऐसी बस्ती न बनाने के लिए चेताएँ।
अब तो आप समझ ही गए होंगें, ये आग नहीं आसाँ ।