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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

आभासी संसार का होलिका दहन

जो आ रही है वह ब्लॉगरी प्रारम्भ करने के बाद की मेरी पहली होली होगी। छोटे समयांतराल में ही मैंने हिन्दी ब्लॉगरी को समृद्ध होते देखा है - एक से बढ़ कर एक नगीने जुड़ते रहे हैं। इस आभासी संसार में उत्सव भी तो होने चाहिए। होली आ रही है, क्यों न यहाँ भी मनाएँ ?
आप को पता ही होगा कि होलिका दहन के दिन शरीर में उबटन लगा कर उसकी झिल्ली (छुड़ाया हुआ भाग) होलिका के साथ जला दी जाती है।मंगल कामना रहती है कि घर के हर सदस्य के सारे दु:ख दर्द भस्म हो जाँय।
.. ब्लॉगरी को घर परिवार मानने से कई वस्तुनिष्ठ लोगों को आपत्ति हो सकती है लेकिन फागुन बयार शास्त्रीयता की परवाह ही कहाँ करती है ! जैसे घर के सदस्यों में होता है, मन में ढेर सारा अवसाद का कूड़ा इकठ्ठा हो गया है। कतिपय चर्चाएँ,टिप्पणियाँ और लेख आप के लिए कष्टकारी रहे होंगे। दिख ही रहा है कि बात अब न्यायालय के द्वार पहुँचाने की हो रही है। ऐसे में एक निवेदन है - उन लोगों से जो स्वार्थ वश भद्दी चर्चाएँ, लेख और टिप्पणियाँ करते, लिखते रहे हैं और उनसे भी जो इन सबसे सुलगते रहे हैं, कष्ट पाते रहे हैं - सारे छ्ल, अमंगल, दुर्वाद, कष्ट, क्रोध, आभासी संसार की होलिका में जला दें। उल्लास की नई हवा बह चले। 
पुन: आपसी संवाद की बसंती बयार बह चले।
इस पुनीत कर्म के लिए एक ई मेल पता सृजित किया गया है:
स्पैम से बचने के लिए चित्र में दिखाया गया है। आप को टाइप करना पड़ेगा। 
अपने सारे छ्ल, अमंगल, दुर्वाद, कष्ट, क्रोध इस पते पर भेज दें। उन्हें भेजने के साथ ही उनसे मुक्त हो जाँय। बढ़िया हो  कि जिनसे कष्ट है और जिन्हें कष्ट दिया है, उन्हें मेल, फोन द्वारा - "बुरा न मानो" कह कर हँस हँसा लें।
होलिका दहन के दिन इस आभासी संसार की आभासी होली जलेगी जिसमें सारी नकारात्मक बातों, भावनाओं को भस्म कर दिया जाएगा। कृपया गालियों को होलिका दहन  के दिन चौराहे पर गाने के लिए बचा कर रखें, उन्हें मेल न करें।
मेरे कविता ब्लॉग पर फाग महोत्सव जारी है। शुरुआत यहाँ से है, आगे भी रचनाएँ हैं और जारी भी रहेंगीं  आनन्द उठाते रहें - लेख, कविता, फाग गीत, बन्दिशों का भी और टिप्पणियों का भी।