कल यात्रा में था । आजकल लोग यात्रा में सहयात्रियों से बातें नहीं करते परन्तु मैंने अपने पार्श्व के सज्जन से वार्त्तालाप आरम्भ किया जो कि चार घण्टे चलता रहा। वे मुझसे पिछली पीढ़ी के थे, ताम्ब्रम अर्थात तमिळ ब्राह्मण थे - हिन्दी, संस्कृत एवं तमिळ, तीनों में निष्णात । Chartered Accountant थे, दिल्ली जा रहे थे। एक बात जो यहाँ सामान्यत: ही दिख जाती है, ब्राह्मण बहुत ही सुसंस्कृत होते हैं, बातचीत एवं व्यवहार में सभ्यता सहज ही परिलक्षित होती है। ये सज्जन प्राच्य विद्या एवं पाश्चात्य तकनीकी के संयोग से जीवनयापन के समर्थक थे, DOS, Foxpro, DBase, VB, C++ इन सबमें काम कर चुके थे एवं प्रशिक्षक भी रहे।
बात संस्कृत पर जानी ही थी, मुझे नया कुछ तो नहीं मिला किन्तु प्रेक्षणजनित निज निष्कर्षों की पुष्टि हुई। उनका उत्साह देखते सुनते ही बनता था !
हमने लैपटॉप पर देखते हुये संस्कृत, वैदिक एवं तमिळ की यूनिकोड फॉण्ट व्यवस्थाओं पर भी बातें की।
उन्हों ने उसकी पुष्टि की जो मैं कहता रहा हूँ - हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाये रखें तो शेष भारत के समस्त भाषा भाषी उसे अधिक समझेंगे एवं उत्साह से अपनायेंगे। उनका कहना था कि तमिळनाडु से बाहर होने पर उन्हें उत्तर या पश्चिम भारत की भाषाओं को समझने में कोई समस्या नहीं होती क्योंकि संस्कृत के कारण वह जोड़ कर समझ लेते हैं।
भाषिक क्षेत्र में माँग एवं आपूर्ति में इतना बड़ा अंतर स्यात ही मिले! दक्षिण भारतीय संस्कृतनिष्ठ हिंदी हेतु तड़प रहे हैं जब कि हिंदी जन उसे अरबी फारसी की रखैल बनाने में लगे हुये हैं !
(मुझे ज्ञात है कि इसे पढ़ कर आप के मन में 'भाषा बहता नीर', आधुनिक काल की सबसे अल्प समझी गयी एवं हिंदी के पतित काहिलों द्वारा सर्वाधिक दु:प्रयुक्त उक्ति आ रही होगी किन्तु मेरी बात बहुत ही सीधी है, मैं नदी नहीं, जीभ से बहती नाली की बात कर रहा हूँ।)
उनसे अन्य अनेक विषयों पर चर्चा हुई जिनकी परास बड़ी है। यह भी बता दूँ कि उन्हें तमिळ भाषा पर गर्व था एवं वह उसके 'पतन' से व्यथित थे।
आज प्रात:काल (तमिळ में आज भी प्रात या प्रातकालै या कालै, मध्याह्न एवं सायं प्रचलित हैं, साधारण जन बोलते हैं, हिन्दी पट्टी में कोई बोलता मिल जाय तो मेरे लिये आठवाँ आश्चर्य होगा) जब मैं संस्कृत पाठों हेतु यूट्यूब पर गया तो यह सुन कर व्यथित हुआ कि सभी 'दोस्तो' सम्बोधन का प्रयोग कर रहे थे न कि 'मित्रो' का।
दोस्त पा(फा)रसी मूल का शब्द है जिसका वास्तविक रूप दूस्त है । मेरा ध्यान ऐंवे दोस्त से गोश्त एवं दूस्त से दुष्ट पर चला जाता है। विचार करें कि जब आप 'मित्र' कहते हैं तो ऋग्वैदिक मित्र-वरुण, सूर्य, मैत्री से जुड़ते हैं एवं मंत्र, मंत्रणा जैसे समान वर्ण वाले शब्द भी आप के अंतर्मन में कहीं न कहीं उमड़ते हैं ।
विभाषा के शब्द अपने 'यार' शब्दों को आकर्षित करते हैं दोस्त कहेंगे तो 'जिगरी' आयेगा ही, परंतु मित्र कहेंगे तो 'परम' एवं 'घनिष्ठ' शब्द ही उसके साथ भाषित होंगे। भाषायें ऐसे ही बिगड़ती हैं, प्रदूषित हो जाती हैं। इसे भिन्न प्रकार का अनुनादी प्रभाव भी कह सकते हैं तथा String Theory की इस व्युत्पत्ति से भी जोड़ सकते हैं कि एक तितली यदि पर फड़फड़ाती है तो उससे सुदूर कहीं कोई अट्टालिका भी ध्वस्त हो सकती है ।
दैनिक जीवन की बातचीत से अरबी फारसी शब्दों के प्रयोग क्रमश:, सायास, हटायें, फड़फड़ाहटें हिन्दी को ध्वस्त कर रही हैं।
