रात पहर भर शेष है किन्तु अदृश्य पहरुओं ने जगा दिया है। मैं उस संसार में हूँ जो मेरा नितांत अपना है - मेरा अंत:संसार। वह संसार जहाँ की अनुभूतियाँ मुझे स्वयं के भीतर किसी और का अनुभव कराती हैं और जिनमें डूबते उतराते मैं लिखता हूँ...जाने कितने वर्षों तक अपना अस्तित्त्व पसर गया है- मैं कहीं और हूँ।
ग्रीष्म है, भोर है, गाँव है, गुमधुम रव है। घर के बाहरी चत्वर पर स्त्रियाँ इकठ्ठी हैं - चचेरे भाई का 'लगन लग' गया है। काका किनारे बैठे लाठी पर ठोड़ी टेके प्रतीक्षा में हैं। मैं पास में बैठ जाता हूँ - का होई?
"पराती गावे जुटल बालोऽ, नाहीं जानेलऽ?"
उनके प्रश्न को तोड़ता हुआ एक किशोरी का स्वर - सबके कहि अइनी हो चाचीऽ! सभे आ गइल बाऽ। जैसे चाची यानि मेरी अम्मा को संकेत मिल गया हो। वह कढ़ाती हैं -
ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले।
सधा हुआ ग्राम्य गृहिणी स्वर - ताल, आरोह, अवरोह; किसी सुने हुये से साम्य है। समवेत स्वर जुड़ गये हैं - आह्वान है या प्रार्थना या कामना? आकाशवाणी का स्वरसुधा कार्यक्रम - सामगायन पर आधारित कार्यक्रम। हाँ, कुछ कुछ सामगायन सा लगता है। तो आदिस्वर लोक में ऐसे सुरक्षित हैंं?...
...वर्षों पश्चात - अम्मा पराती गाउ न?
अम्मा हँसती हैं - अरे बेटा, बियाहे में गावल जालाऽ। अइसे कइसे गा दीं?
'अम्मा! तोहनी के बाद के गाई? रिकार्ड क लेब त सबदिन खातिर हो जाई'
'तोहार अम्मा अब बूढ़ हो गइली, ठीक नाहीं आई।' मैं मचल जाता हूँ - गाना पड़ेगा।
वेदध्वनियों को परम्परा ने श्रुति, तप और समर्पण से आज तक सुरक्षित रखा है, लोकसाम को कौन रखेगा, कैसे? यही तो मार्ग है!
अम्मा बताती हैं - बहुत पवित्र गायन है यह! भोर में ही गाया जाता है। हाथ मुँह धो के बसिये मूँहे! वह शुरू करती हैं और मुझे भान होता है - जीवन से प्रेम करने वाली बली आर्य परम्परा का। प्रकृति ने सन्देश दे दिया है, यह आह्वान है - देवों का, पितरों का; इसमें बसने वाले नये घर के लिये मंगल कामना है। घर घरनी की सनातन परम्परा को आदर और आशीष देती अमृत वाणी। कभी ऋषियों ने कहा - अमृतस्य पुत्रा: और लोक में हर विवाह जीवन यज्ञ के प्रारम्भ को अमृत बरसाती गृहिणियाँ कहती हैं - 'एसे हो दूऽध बइठेलाऽ तियुरियाऽ त आऽमृत जोरन'। इसमें आस्था ही आस्था भरी हुई है और कहीं दीन दैन्य नही!
एक भरे पुरे आर्य घर की बात है। दूध दही है। सभा समाज में, जो कि कालक्रम में वैसे ही 'कचहरी' हो गया है जैसे बाबा 'पापा' और मंडप 'खपरैल वाला सवैया घर', परिवार की उपस्थिति बनी रहने की कामना है तो भरे हुये घर की भी। आती हुई उषा को देख वैदिक ऋषि भले नाच कर गा उठा हो, गृहिणी की भाँति उसने चिड़ियों की चहचहाहट से स्वयं को नहीं जोड़ा! देवों का आह्वान यहाँ भी है किंतु पूर्णत: घरेलू गँवई रूप में ...भोर भिनसार हो गयी है और एक चिड़िया कहती है - जाओ! ब्रह्मा और विष्णु को जगाओ, उनसे मेरी गाय दुहवाओ! मेरी गाय अभी बकेना नहीं हुई है, भरपूर दूध देती है। मेरा घर ओसारे वाला सवैया घर है अर्थात उसमें नये जोड़े के लिये पर्याप्त स्थान है। मेरे घर में न्यूनता है तो बस इसकी कि इतने पुत्र नहीं हैं जो सभा में परिवार की उपस्थिति ढंग से करा सकें और इसको भरने वाली पुत्रबधू भी नहीं है। मेरे यहाँ इतना दूध होता है कि उससे जमने वाली दही से निकले मठ्ठे से नाली भर जाती है! यह दूध जब विवाह समारोह के अतिथियों के भोज के लिये बनने वाले चूल्हे पर चढ़ेगा तब उसमें अमृत का जामन पड़ेगा। उस दही को खाने से दूल्हा अमर हो जायेगा और दुल्हन खायेगी तो उसके सिर के सौभाग्य में वृद्धि होगी। ब्रह्मा विष्णु से कहो कि यह झरनेदार पात्र लें, हाथ मुँह धो कर दर्पण देख स्वयं को परख लें और सुराही के पानी से सब कुछ पवित्र कर दें...
... लोकगीतों में महादेव ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु भी घरेलू मनई की भाँति ही हैं। शुभ अवसर पर उनसे स्वयं को एवं अन्य सब कुछ को भी साफ शुद्ध कर दूध दुहने को कहा जा सकता है - मेरे पुत्र का विवाह है, कोई ऐसा वैसा आयोजन थोड़े है! यहाँ दूध में जोरन का पड़ना विवाह संस्कार जनित पवित्र मिलन का प्रतीक है। इससे जो परिवार बढ़ेगा वह समाज और परम्परा दोनों के लिये बढ़ोत्तरी का कारण होगा।...
...आज अनुमान लगा पा रहा हूँ उस आह्लाद भरी पवित्रता की जिसकी अनुभूति विश्वामित्र को हुई होगी और गायत्री अवतरित हुई। समझ पा रहा हूँ अपने उस भाव को जिसने इसे रचवा दिया - तुम्हें नमन है आदित्य!
सुनिये अम्मा का स्वर पुन: जो सामगायन के साथ मिश्रित है - सामस्वर कभी तानपुरे जैसा है तो कभी लोकस्वर को सहारा देता सा लगता है।
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पराती का लड़की के घर गाया जाने वाला रूप भी है। आपलोगों के यहाँ किस भाँति है, यहाँ बताइयेगा।
अगले अंक में:
जामाता दशमो ग्रह: की धौंस में मेरी मौसिया सासू जी का गाया कन्यादान का गीत जिसने मेरी आँखें नम कर दीं।
भिनसारे कौन सा ग्रहण लगता है और भरी दुपहर कौन सा?


