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रविवार, 25 मार्च 2018

भोजपुरी -12: रामनवमी : राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा

फागुन रेचक है। वास्तविक मधुउत्सव तो चैत्र में होता है। नौ दिन नवदुर्गा अनुष्ठान, जन जन में रमते राम का नवजन्म नये संवत्सर में।
नवान्न दे पुनः प्रवृत्त होती धरा का स्वेद सिंचन, धूप में सँवरायी गोरी का पिया को आह्वान - गहना गढ़ा दो न, बखार तो सोने से भर ही गयी है!

चैत में शृंगार का परिपाक होता है। गेहूँ कटता है, रोटी की आस बँधती है, मधुमास भिन्न भिन्न अनुभूतियाँ ला रहा होता है एवं ऐसे में उस राम का जन्म होता है जो आगे चल कर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये किंतु उनके जन्मोत्सव में जो भिन्न भिन्न पृष्ठभूमियों के लोकगायकों एवं नर्तकों की हर्षाभिव्यक्ति होती है, उसमें उल्लास स्वर नागर शास्त्रीयता तथा अभिरुचि की मर्यादाओं को तोड़ता दिखता है। इसमें गाये जाने वाले चइता चइती की टेर अरे रामा, हो रामा होती है। 
चइता पुरुष गान है। सुनिये चइता विशाल गगन के स्वर में। 
(अंत तक सुनने पर ही समझ में आयेगा कि चैत क्यों फागुन से श्रेष्ठ!)  

पूरी प्रस्तावना के साथ गान होता है। प्रकृति भी आने वाले के स्वागत में है, रसाल फल गए हैं, महुवा मधुवा गए हैं, पवन कभी लहराता है तो कभी सिहराता है। 
घर में नया अन्न आ गया है, पूजन हो रहा है, मंगल गान है, क्रीड़ा है। मस्ती भरे वातावरण में राम जी जन्म लेते हैं! ढोल की ढमढम के साथ बधाई गीतों की धूम है।

सावन से न भादो दूबर, 
फागुन से ह चइत ऊपर 
गजबे महीना रंगदार रे चइतवा।

आम टिकोराइ जाला
महुवा कोचाइ जाला
रस से रसाइल रसदार रे चइतवा।

कबहू लहर लागे 
कबहू सिहर लागे 
किसिम किसिम बहेला बयार रे चइतवा।

गेंहू के कटाई होला
नवमी के पुजाई होला 
लेके आवे अजबे बहार रे चइतवा।

घरे घरे मंगल होला 
कुस्ती आ दंगल होला 
मस्ती से भरल मजदार रे चइतवा।

ढोल ढमढमाय लागे 
चइता गवाय लागे 
राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा।

बाजे अजोधा में अनघ बधइया 
ए राम रामजी जनमलें 
दसरथ जी के अंगनइया।

बाजे चइत मास गावेला बधइया
ए राम रामजी जनमलें 
दसरथ जी के अंगनइया।


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शृंखला के अन्य गीत 

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रविवार, 8 अप्रैल 2012

लोक : भोजपुरी -11: कन्यादान गीत - कवन गरहनवा पापा रउरा पर लागे?

बैसाख का शुक्ल पक्ष खरमास की समाप्ति ले आयेगा और सतुआनि के दिन से लगन खुल जायेगी। यह समय विवाह के लिये शुभ मुहुर्तों को लायेगा। हिन्दू विवाह पद्धति में कन्यादान एक बहुत ही पवित्र प्रथा मानी गई है जो कि आधुनिक पितृसत्तात्मकसमाज में स्त्री की अधिकारघोषयुक्त दखल के साथ ही बहुत ही विवादास्पद भी हो गई है। तर्क यह हैं कि क्या स्त्री सम्पत्ति है जिसका दान कर दिया जाय? एक वयस्क को दान देने का अधिकार दूसरे वयस्कों को कैसे? और यह भी कि यह स्त्री को सम्पत्ति से बेदखल करने के षड़यंत्रों का प्रस्थान विन्दु है। स्त्रीवादी तो यही कहेंगे कि हिन्दू विवाह दिव्यता के बोझ तले स्त्री और उसके अधिकारों को कुचलने और उसे आजन्म शोषित प्रताड़ित बनाये रखने का एक षड़यंत्र भर है!
समाज की विकृतियों को देखें तो ये सारे तर्क अपने स्थान पर सत्य हैं लेकिन मुझे यहाँ यह नहीं बताना है कि क्या सही है, क्या ग़लत? मुझे जो प्रचलित है और उसके पीछे जो तर्क या कुछ और हैं, उन्हें समझने का प्रयास लोकगीत की भावभूमि में करना है।
हिन्दुओं में हर मंगल अवसर के लिये गीत हैं जिन्हें पुरुष नहीं स्त्रियाँ गाती हैं। शुभ अवसरों पर प्रसन्नता की अभिव्यक्ति वे गीत गा कर करती हैं। विवाह का अवसर बहुत ही व्यापक होता है। महीनों पहले से तैयारी प्रारम्भ हो जाती है। संझा पराती, मटिकोड़वा, पितरनेवतनी, बरनेत, कन्यादान, बिदाई आदि आदि हर अवसर के लिये अलग अलग गीत और सभी अर्थगहन। यदि इन गीतों के बोलों पर ध्यान दिया जाय तो अचरज होता है। सीमाओं में बँधी घरनी कितनी सुन्दरता, सादगी और भावप्रवणता के साथ इन अवसरों पर अपने मन की बात कहती आई है! दम्भी पुरुष यदि ध्यान दे तो घर का वातावरण और सुघर हो जाय लेकिन उसे बाहरी संसार के प्रपंचों से कहाँ मुक्ति?
हिन्दू समाज धर्मबुद्धि से संयोजित रहा है। स्मृतियों में विवाह विच्छेद की परिस्थितियाँ और विधियाँ वर्णित हैं लेकिन बात बहुत बिगड़ जाय तब ही वरना विवाह माने जन्म जन्मांतरों का सम्बन्ध ही होता है। यहाँ विवाह संविदा न होकर समाज को चलाने वाले गृहस्थधर्म का प्रस्थानविन्दु है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी, ये सब गृहस्थ के आश्रित हैं। वह धर्मधुरी है जिसकी शक्ति का आश्रय ले समूचा समाज चलता है, सृष्टि चलती है। आश्चर्य नहीं कि हिन्दू विवाह संस्था तमाम मामलों में अनूठी है – कोई मंगल कार्य बिना पत्नी से गाँठ जोड़े पूरा नहीं होता, अकेले की पूछ नहीं! यह उनका सम्मान है जो घर और बाहर दोनों को साध कर जीवन की पावन परम्परा को प्रवाहित रखने में अपना योगदान देते आये हैं, उनका सम्मान है जो समाज को धारण किये हैं। वे मूर्तिमान धर्म हैं।
इतनी उदात्त संकल्पना को आकार कैसे मिले? स्वभावत: विवाह एक बहुत ही जटिल कर्म भी हो जाता है जिसमें समाज के सभी वर्गों को सम्मिलित किया जाता है। इस कारण ही लोक में कई रंग और वैविध्य दिखते हैं। एक के भी बिना काम पूरा नहीं होता। परोक्ष रूप से सभी साक्षी बना लिये जाते हैं और उन्हें इसका भान भी नहीं होता। असल साक्षी कौन होता है? अग्नि। दंड और न्याय विधान विवाद की परिस्थिति में भले अन्य साक्षी ढूँढ़ ले और मान्यता दे दें लेकिन धर्म तो यही कहता है कि पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर तुम दोनों आज पति पत्नी हुये। स्त्रियाँ भी यदि अपने गीतों में बुला कर रखती हैं तो कुलदेवता, कुलदेवी, ग्रामदेवता, अन्य देवता और पितर। चाहे अग्नि हो या ये सब – कौन गवाही देने आयेगा? यह सूक्ष्म नकार स्थूलता का नकार है जो इस संस्था को दिव्यता प्रदान करता है।
पाणिग्रहण के समय मंडप में कन्या का भाई, माता पिता और ब्राह्मण होते हैं और बाहर उन्हें घेरे हुये कन्या पक्ष के लोग। मनबढ़ई में दुल्हे के मित्र भले आ धमकें लेकिन वे होते अनाहूतो प्रविशति ही हैं। वरपक्ष की ओर से मात्र एक व्यक्ति होता है – स्वयं दूल्हा। इस कारुणिक प्रसंग को उसे अकेले दिखाने के पीछे गहन मनोविज्ञान है। उसकी संवेदनाओं को जगाकर सर्वदा के लिये स्मृति में सुरक्षित कर देने का आयोजन है – धर्मपत्नी ने निज गृह को तज बहुत बड़ा त्याग किया है, उसका आजीवन सम्मान होना चाहिये। इसका दायित्त्व केवल तुम पर है!
कन्या एक घर छोड़ दूसरे के घर जा रही है, अनजान अपरिचित परिवेश को अपना बनाने जा रही है, दूजे की संतति को आगे बढ़ाने जा रही है, उसके देवों और पितरों के आह्वान के लिये होता बन कर जा रही है और अपना अब तक का सब कुछ छोड़ कर जा रही है! इतना बड़ा त्याग और साथ में उससे कई गुना बड़ा दायित्त्व! उसे भान कैसे हो? कोई शपथ काम करेगा? वह तो तब काम करेगा न जब टूट पूर्ण हो जाय? बन्धन में कैसा निर्वाह? तो राह क्या हो?
वह सम्पत्ति नहीं, कलेजे का टुकड़ा है – माँ बाप बेच तो सकते नहीं कि चलो यह चीज आज तक मेरी थी, तुमने मूल्य दिया, अब तुम्हारी हुई? बोल वचन में तो इतनी गुरुता ही नहीं होती कि बस कह दें और काम हो जाय!  तो राह क्या हो?
माता पिता दान करते हैं – सबको दिखते हुये भी गुप्तदान की गरिमा लिये हुये कन्यादान। जाओ तुम्हें दान दिया! अब तुम्हारा हमारा आगम सम्बन्ध गौण हुआ, अब तुम पर हमारा कोई अधिकार नहीं, तुम दूसरे परिवार की हुई। वह तुम्हारा सर्वस्व है।
वधू अनकहे संकेतों को बखूबी समझ जाती है और वर भी समझ जाता है कि कोई स्थूल साक्षी नहीं, कोई मूल्य नहीं, यह दान तो अनमोल है। धर्म विधि से सम्पत्ति का विभाजन भी यहीं हो जाता है – कन्या का अब नैहर की सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं। उसे गृहस्थ परम्परा के वाहक, स्वयं उसके माता पिता, ने वयस्क होने पर दान दे सम्पत्ति से वंचित कर दिया। उनके दिये उपहार ही उसका स्त्रीधन होंगे और वह वरपक्ष की सम्पत्ति की अधिकारी होगी ठीक वैसे ही जैसे उसकी माँ अपने ससुराल में है। कोई भी दो स्थानों की सम्पत्ति पर अधिकारी नहीं हो सकता। 
बिनटूटी जलधार गिराता भाई पाणिग्रहण के समय जैसे यह जता देता है कि हमारा तुम्हारा सम्बन्ध अब इस पानी की धार जैसा ही रहेगा। तरलता रहेगी, अटूट प्रवाह रहेगा लेकिन यहाँ की धरती पर अब केवल मेरा अधिकार रहेगा, तुम्हारा अधिकार अब कहीं और है!
स्त्री के लिये विशिष्टता यहीं आती है कि वह निज गृह छोड़ दूसरे के घर जाती है। यदि पुरुष विवाह के पश्चात स्त्री के घर को विदा होता तो सम्भवत: उसके लिये भी यही सब होता। ऐसी परिपाटी न हो तो न कोई जटिलता रहे और न तर्कविलास को तमाम मुद्दे! आज कल हो रहा है न? माता पिता कहीं और और मियाँ बीवी की दुनिया कहीं और – एकदम अलग थलग। इस दबाव में धीरे धीरे ये सभी विधान घिस जायेंगे लेकिन अभी समय है।
इतना बड़ा कांड हो जाय और करुणा न हो, हो ही नहीं सकता। अनिवार्यत: इस अवसर के गीत रुला देते हैं। सहज, अर्थसम्प्रेषक, भोले, तर्कातीत गीत – स्त्रियों ने सबकी भावनाओं को इन गीतों में अभिव्यक्ति दी है। जामाता को दसवाँ ग्रह बताया जाता है। दुष्ट ग्रह अपने घर में हो तो और बली हो जाता है। मेरी मौसिया सास जी मेरे यहाँ आईं तो मैंने मौके का लाभ उठा कन्यादान गीत का अनुरोध कर डाला। उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था फिर भी निजगृहव्याप्त दुष्ट ग्रह का मान रखते हुये उन्हों ने गाया।
इस गीत में उल्लास भरे घर की तैयारी है, कभी स्त्रीधन रहे दहेज की भयानक कुरीति के बोझ तले दब कर नीचे हो गये पति की दुर्दशा है, सब कुछ चुपचाप स्वीकारती पुत्री का दुख है – माँ बेटी तो आपस में सब कह सुन रो लेती थीं लेकिन प्रस्थान के पूर्व के अवसर पर जो इतना गरिमामय और मर्यादापूर्ण धर्म वातावरण बना है उसमें पिता से पुत्री कहे तो क्या कहे? माँ की ओर से स्त्रियाँ पिता और पुत्री की बातचीत को बयाँ करती हैं। अंत आते आते इतनी कारुणिकता आ जाती है कि सप्तपदी के अग्निकुंड की दाहकता पिता के हृदय में पहले ही व्याप्त हो जाती है, गीत अचानक ही समाप्त हो जाता है – कहने सुनने को कुछ बचा ही नहीं!  

2012-02-12-002

गाई के गोबर अँगना लिपाई गजमति चउका पुराई जी
चउका पर बइठीले बेटी के पापा धीया करीलें कन्यादान जी
काँच ही बाँस के मड़वा छवइले गजमोतियन झालर लगाई जी

जँघिया पर बइठेली बेटी दुलारी मोतियन आँसू बहाई जी
गोदिया में बइठेली बेटी दुलारी मोतियन आँसू बहाई जी

सब केहु बइठेले लाल जजिमवा मोरे प्रभु कुस के चटाई जी
एतना दहेज देइ नीच हो गइनीं सत्रु के धिया मति होस जी

कवन गरहनवा पापा लागे दुपहरिया हे कवन गरहनवा भिनुसार जी
कवन गरहनवा पापा रउरा पर लागे कब दल उग्रिन होस जी

सूरज गरहनवा बेटी लागे दुपहरिया हो चन्द्र गरहनवा भिनुसार जी  
तोहार गरहनवा बेटी हमरा पर लागे जब दल उग्रिन होस जी

कथि बिनु पापा हे खिरवो न सीझे कथि बिनु हुमवो न होस जी
कथि बिनु पापा हे सग्र अन्हार कथि बिनु धर्म न होस जी

दूध बिनु बेटी हो खिरवो न सीझेला घिव बिनु हुमवो न होस जी
पुत्र बिनु बेटी हो स्वर्ग अन्हार धिया बिनु धर्म न होस जी

डलवा में काँपेला दूब अछतिया हे कलसा गंगा जल पानि जी
धिया लिहले काँपीलें बेटी के पापा हे कइसे करीं कन्यादान जी

कास पितल करति मोह न लागे हे, सोनवा कइल नहिं जास जी
धियवा के दान करत हिरदया में लहरे जइसे अगिनिया के कुंड जी  
 

“गाय के गोबर से आँगन लीप दिया है और चौक की पुराई गजमति सरीखी है। चौके में बैठ कर बेटी के पापा कन्यादान कर रहे हैं। उन्हों ने कच्चे बाँस का मंडप छवाया है जिस पर गजमुक्ताओं सी झालर भी लगवाये हैं। पिता की जाँघ पर बैठी दुलारी बेटी आँसुओं के मोती बहा रही है। (बेटियाँ कच्ची होती हैं, जिनमें पक कर घर बनाने की क्षमता होती है – कच्चे बाँस का मंडप यह सन्देश देता है और हरियाली लिये भी होता है कि होने वाला सम्बन्ध जीवंत रहे। परम्परानुसार बेटी को पिता की जाँघ पर बैठना होता है लेकिन उपवास और विछोह के दुख के दुहरे बोझ से उसकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि गोद में सँभालना पड़ता है, वैसे ही जैसे बचपन में। यौवन आने के साथ पिता को ले जो स्वाभाविक संकोच रहता है वह इस अवसर रह ही नहीं पाता)।
बेटी की माँ अपने पति की स्थिति देख कहती है – आज बाराती जन और सभी सगे सम्बन्धी तो लाल रंग के भव्य जाजिम पर बैठे हैं लेकिन मेरे पति कुश की चटाई पर बैठे हैं। कितने कष्ट सह दहेज की व्यवस्था किये! इतना दहेज देकर भी नीचे हो गये हैं जैसे अपनी पुत्री ही शत्रु सरीखी हो गई हो! बेटी इस स्थिति को समझती है, कैसे कहे? पिता को ढाँढ़स कैसे बँधाये?
लोक की दृष्टांत परम्परा में वह पूछती है – पापा! दुपहर में कौन ग्रहण लगता है और भोर में कौन सा? आप के ऊपर कौन सा ग्रहण लगा है, आप कब मुक्त होंगे?
पिता उत्तर देता है – दुपहर में सूर्यग्रहण लगता है और भोर में चन्द्रग्रहण। मेरे ऊपर तो बेटी! तुम्हारा ग्रहण लगा है, तुमसे उऋण होऊँ तो मुक्ति हो।
यह धर्म व्यवस्था के प्रति लोक आक्रोश है। तुम इस परिपाटी को पवित्र और सब शुभ कर्मों का मूल बताते हो न? अरे यह ग्रहण है ग्रहण! देखो तो सही बाप बेटी का क्या हाल हो रखा है? पुत्री न हुई, शत्रु सरीखी हो गई, ग्रहण लगाती दुष्ट छाया हो गई! धिक्कार है तुम्हारी इस परिपाटी पर!
बेटी आगे पूछती है – पापा! खीर किसके बिना नहीं पकती? हवन किसके बिना नहीं होता? किसके बिना स्वर्ग भी अन्धेरे जैसा होता है? किसके बिना धर्म का होश ही नहीं रहता?
यह लोकोपनिषद की प्रश्न परम्परा है जिसमें एक साथ ढाँढ़स, सँभाल और यथार्थ तीनों हैं। गा रही हैं स्त्रियाँ, पूछ रही है बेटी।
उत्तर देता पिता तीनों का साक्षात्कार कर लेता है – दूध के बिना खीर नहीं बनती। घी के बिना हवन नहीं होता। पुत्र के बिना स्वर्ग भी अन्धेरे जैसा होता है और पुत्री के बिना धर्म का होश नहीं होता।
घर में पवित्र अग्नि है, चावल है, शर्करा है लेकिन बिना दूध के खाद्य पायस नहीं बनेगा। नये घर को जाती मेरी पुत्री वहाँ पूर्णता लायेगी। वह अन्न को क्षुधा शांत करने लायक बनायेगी – वह दूध सरीखी होगी- पोषक और पालक। वह गृहस्थ परम्परा की अग्निशाला में घृत आहुति जैसी होगी। उसके बिना कोई पवित्र कार्य सम्पन्न नहीं होगा। उसके तप से, उसकी संतानों से घर आगे बढ़ेगा। बिना संतानों के स्वर्ग भी अन्धेरा है और धर्म का तो ध्यान ही नहीं रहता।
ऐसी पुत्री से धर्म का निर्वाह होता है। पुत्र भले स्वर्ग में स्थान दिला दे लेकिन धर्म तो कन्या से ही होता है, उसके दान से ही होता है कि नया घर बसता है।
सारा सँजोया संयम और ज्ञान यह सोचने पर हवा हो जाते हैं कि दुलारी बेटी घर से जा रही है! पिता की स्थिति डाल में काँपते दूब अक्षत और काँपते गंगाजल जैसी हो गई है। दूब, अक्षत और गंगाजल ये तीन पवित्र तत्त्व भी विछोह के दुख का भार सँभालने में सहायक नहीं हैं। गोद में पुत्री को लिया पिता काँप रहा है – अपनी पुत्री का दान कैसे कर दूँ? उसे अपनी सारी सम्पदा काँसा पीतल की तरह लगती है जब कि पुत्री सोने सरीखी। उसके हृदय में जैसे आग का कुंड प्रज्वलित हो गया है जिसमें सब कुछ भस्म हुआ जा रहा है। (जाओ मेरी सोना बेटी! यह आग तुम्हें कुन्दन बनाये।)“
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बुधवार, 28 मार्च 2012

लोक : भोजपुरी - 10: चइता के तीन रंग

चैत माह रबी फसल का माह है। महीनों के श्रम के फल के घर पहुँचने का माह है। ऐसे में कृषि प्रधान लोक में उत्सव न हो, हो ही नहीं सकता! प्रकृति भी ऐसे में नवरसा जाती है। पेंड़ पौधों से लेकर मनुष्यों तक सबमें नवरस का संचार होने लगता है, वायु दिशा बदल देती है, शुष्क हो जाती है। देह में मीठा मीठा दर्द उभर आता है और मन? फागुन में वसंतोत्सव मना कर नेह बन्धनों को प्रगाढ़ कर चुका मन अब फल चखने की तैयारी में लग जाता है। इच्छायें गर्भिणी हो जाती हैं। बागीचों के आम बौरा चुके होते हैं। ऐसे में आती है रामनवमी। ‘राम जी की दुनिया राम जी के खेल’ मानने वाली कृषि संस्कृति तो नमक को भी रामरस कहती आई है! उनके जन्म के बहाने फसल के घर आने का उत्सव आयोजन क्यों न हो जाय!
रामनवमी की रात का पूजन नये गेहूँ या जौ की बनाई पूरियों और हलवा से होता है। कुछ तो जेनेटिक हस्तक्षेप और कुछ ऋतुचक्र की विचलन – अब गेहूँ बैसाख में ही हो पाता है लेकिन पकती हुई बालियों से नया अन्न निकाल कर पुराने में मिला नया पुरान पूजन कर लिया जाता है। मकर संक्रांति से प्रारम्भ हुये अन्न उत्सव का समाहार नये अन्न से बनी नवमी की नौ रोटियों से होता है:
खिचड़ी के खीच खाच, फगुआ के बरी
नवमी के नौ रोटी, तब्बे पेट भरी।
संक्रांति पर्व के मिश्रित अन्न, होली की बड़ी और नवमी की नौ रोटियों के बिना पेट कैसे भर सकता है भला? अब जो ढोल झाल निकलते हैं, उनमें जो उत्साह दिखता है उसका रंग कुछ और ही होता है। चैत माह में चैता, चैती और घोटा गाये जाते हैं। इन्हें अर्धशास्त्रीय पद्धतियों में भी गाया जाता है लेकिन मैं यहाँ लोकरूप ही प्रस्तुत करूँगा।
इन गीतों के बोलों में प्राय: मिलन के पंचम स्वर बोलती कोयल का घर उजाड़ने की बात होती है। कोयल जो अपना घर नहीं बनाती, लोक में घरवाली हो जाती है जिसकी बोली सुन कर या तो सइयाँ सेज छोड़ कर खेत की ओर चल देता है और मिलन पूर्णता नहीं पा पाता या कोयल के स्वर में एक विरहन का आलाप माना जाता है जो कि एकदम नहीं सुहाता। वक्रोक्ति या उलटे ढंग से बात कहने की लोकशैली के दर्शन चैत माह के गीतों में होते हैं। नागर लोग भले कोयल की बोली को सर्वदा वांछित मानते रहें, गाँव की कोइलर तो घरनी सी है जिसकी मधुरता कभी कभी अति मीठेपन के कारण ही नहीं सुहाती। अरे भाई! यह मौसम तो टटका टिकोरे की खटाई, मजूरे से तिताई और पसीने की लुनाई का मौसम है, इसमें मिठाई का क्या काम? तब जब कि समूची सृष्टि ही नवरस से प्रफुल्लित होती है, बगीची तक ‘लरकोर’ यानि संतानवती हो जाती है; प्रिय मिलन की मादक इच्छा की अभिव्यक्ति होने लगती है। पैर नृत्य में अपने आप ही थिरक उठते हैं।
चैता या चइता मुझे पुरुषराग लगता है जिसकी संगी स्त्रीरागधारी चैती है। किसान बदलते मौसम, बड़े होते और उजास उड़ेलते दिन, फलवती होती बगिया – सबका अनुभव करता है और उसे लगता है जैसे अन्धेरे में प्रकाश टपकने लगा हो! प्रीत की डोर लगा मन पतंग हो उड़ उड़ आसमान छूने लगता है। देखिये तो सलेमपुर वासी गिरिधर करुण के गीत को गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रेक्षागृह में सलेमपुर के ही राणा सिंह ‘मेघदूत पूर्वांचल में’ प्रस्तुति में कैसे गाते हैं और क्या खूब गाते हैं!

चुवत अन्हरवे अँजोर हो रामा चइत महिनवा

अमवा मउरि गइलें नेहिया बउरि गइलें

देहियाँ टूटेला पोरे पोर हो रामा चइत महिनवा ॥१॥

उड़ि उड़ि मनवा छुवेला असमनवा

बन्हल पिरितिया के डोर हो रामा चइत महिनवा ॥२॥

अँखिया न खर खाले निंदिया उचटि जाले

बगिया भइल लरकोर हो रामा चइत महिनवा ॥३॥

हरपुर नवका टोला के केदार की टोली तो सजनी के सजने के उत्साह को खेत, बारी, हल, बैल सब बेंच कर गहना गढ़ाने की बात कह बयाँ करती है। सँवरने की स्त्री इच्छा पति के स्वरों में ग़जब ढंग से अभिव्यक्ति पाती है। सजनी को साजन से इतना प्यार चाहिये और साजन को भी इतना प्यार उड़ेलना है कि अयुक्ति की इंतहाँ हो जाय! जिन हल, बैल, खेतों के कारण उत्सव मनाने लायक अन्न घर में आया, उन्हें ही बेंच कर इस चैत महीने गहना गढ़ा दो! और तो और यह घर ही बेंच दो जिसकी मैं घरनी हूँ!! अब क्या कहें ऐसी इच्छा पर! 
(रिकॉर्डिंग की खराब क़्वालिटी के लिये खेद है। बन्दे ने गाया था बहुत सुन्दर और बहुत मन से लेकिन मैं ही ठीक से रिकॉर्ड नहीं कर पाया। मेरी अनुभवहीनता के कारण ऐसा हुआ। सॉफ्टवेयर से भी कुछ खास सुधार नहीं हो पाया। )
राग का अतिरेक हो तो मन उच्छृंखल हो ही जाता है। नये जमाने के इस चइता में बिहार के महेश खेसारी जो गाते हैं, उसकी गढ़न देखिये।
प्रेमिका अपनी बहन के साथ गेहूँ की पकी फसल काट रही है (हार्वेस्टर अभी भी सर्वसुलभ नहीं हो पाया है!) नवरस रसायनों के कारण देह में पीर है, ऊपर तेज धूप है जिससे देह की कोमल त्वचा कड़ी हो गई है, पसीना देह के उभारों में गतर गतर पैठ परेशान किये है और कट चुके गेहूँ के पौधे की जो खूँटियाँ खेत में छूट गई हैं, वे पैर में चुभ रही हैं। न बैठा जाता है और न उठा। झुक झुक काटने के कारण कमर में दर्द है। ऐसे में काटा जाने वाला गेहूँ मुट्ठी में नहीं समाता। वह कहती है कि मेरी देह में तो महुवा भर गया है, दीदी! मुझसे कटिया नहीं हो पायेगी। विश्राम के बहाने उसे प्रिय मिलन की आस जो है। गायक बैसाख की उस गरम हवा के झँकोरे को भी नहीं भूलता जिसके कारण सजनी का मन सूखे पुआल जैसा हो आग जोहने लगा है जब कि कामकुम्भों से लोर टपक रही है। देह की ऊष्मा, फसल की ऊष्मा और मौसम की ऊष्मा - प्रेमी इन सबको बयाँ कर रहा है और स्वराभिनय से मिलन की उच्छृंखल कामना को भी व्यक्त कर रहा है। खेत में तो वह भी साथ में काम में लगा है लेकिन जमाना जालिम है, क्या करे? फसल कटाई से लेकर गोदाम में रखे जाने में हुई लसर फसर तक अपनी छिपी कामना को व्यक्त करता प्रेमी अपनी संगी के सारे कष्टों और उनसे मुक्त हो किसी की प्रेमिल छाँव में छँहाने की उत्कट इच्छा को व्यक्त करता है – बस एक कामना है कि अतिश्रम और धूप के कारण काली पड़ चुकी देह को बगीचे में तुम्हारी छाँव में विश्राम दूँ।
इस गीत में रागोत्सव मनाने को सबका आह्वान है। टन टन जीने की शुभेच्छा के साथ तेजू को बुलावा है, जनार्दन को बुलावा है और रामसूरत को भी बुलावा है। इसमें छोटू बाबा हैं, पत्रा देख साइत बताने वाले पवन बाबा हैं (गरमाया पवन मिलन का मुहुर्त बताने वाला पंडित हो गया है!), दिल्ली जा बसे प्रवासियों की भी बात है जो परशुराम बाबा को महेश भैया के साथ गाँव गाड़ा छोड़ महानगर आने को प्रेरित करते रहते हैं। गायक संक्रामक उल्लास में समूचे गाँव को समेट लेता है – चाहे पसन्द करें या न करें!
इस गीत में केदार के गाये चइता में ढोलक का साथ देते स्वर उहूँ, उहुँ, उइ, उइ का रूप उच्छृंखल हो ‘आउ’ के रूप में हर अंतरे के पहले आता है – सुरतक्रीड़ा के नागर स्वर उह या आउच का लोकरूप। इसमें जो जीवन्तता आ गई है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
चढ़ल जवानी हमार भइल बा महुवा
अब न कटाई दीदी हमरा से गँहुवा
बथे कलाई हम चूर चूर न धरातारे मूठी
दिदिया रे! बड़ा गड़ता खूँटी।

जरता चाम घाम लागता बड़ा
देहिया मुलायम सारा भइल जाता कड़ा
भइल बइमान हमार धुपे में बेना
सुखत नइखे हमरा देह के पसेना
कुहले बदन हमार कोर कोर
हम बइठीं ना ऊठीं
दिदिया रे! बड़ा गड़ता खूँटी।

डाँड़ में दरद होला काटिं जब निहूर के
गोड़वो में चूभे बड़ा रहिलें सिहूर के
लारा पुआर भइल जातालें मनवा
गरम ताव झोंकताने पवनवा
जोबन से चुवतलें लोर लोर
अब देबे ना छूटी
दिदिया रे! बड़ा गड़ता खूँटी।

लागल तारास एगो ईहे बा ईच्छा
महेस खेसारी सँघे बइठीं बगीचा
लसर फसर भइल चाचा गोदाम में
अब नाहिं मन हमार लागता काम में
करिया हो गइल देह गोर गोर
बड़ा फेंक त लूटीं
दिदिया रे! बड़ा गड़ता खूँटी।

शनिवार, 17 मार्च 2012

लोक: भोजपुरी- 9: पराती, घरनियों का सामगायन

रात पहर भर शेष है किन्‍तु अदृश्य पहरुओं ने जगा दिया है। मैं उस संसार में हूँ जो मेरा नितांत अपना है - मेरा अंत:संसार। वह संसार जहाँ की अनुभूतियाँ मुझे स्वयं के भीतर किसी और का अनुभव कराती हैं और जिनमें डूबते उतराते मैं लिखता हूँ...जाने कितने वर्षों तक अपना अस्तित्त्व पसर गया है- मैं कहीं और हूँ।
ग्रीष्म है, भोर है, गाँव है, गुमधुम रव है। घर के बाहरी चत्वर पर स्त्रियाँ इकठ्ठी हैं - चचेरे भाई का 'लगन लग' गया है। काका किनारे बैठे लाठी पर ठोड़ी टेके प्रतीक्षा में हैं। मैं पास में बैठ जाता हूँ - का होई?
"पराती गावे जुटल बालोऽ, नाहीं जानेलऽ?"
उनके प्रश्न को तोड़ता हुआ एक किशोरी का स्वर - सबके कहि अइनी हो चाचीऽ! सभे आ गइल बाऽ। जैसे चाची यानि मेरी अम्मा को संकेत मिल गया हो। वह कढ़ाती हैं -    
ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले।
सधा हुआ ग्राम्य गृहिणी स्वर - ताल, आरोह, अवरोह; किसी सुने हुये से साम्य है। समवेत स्वर जुड़ गये हैं - आह्वान है या प्रार्थना या कामना? आकाशवाणी का स्वरसुधा कार्यक्रम - सामगायन पर आधारित कार्यक्रम। हाँ, कुछ कुछ सामगायन सा लगता है। तो आदिस्वर लोक में ऐसे सुरक्षित हैंं?...
...वर्षों पश्चात - अम्मा पराती गाउ न?
अम्मा हँसती हैं - अरे बेटा, बियाहे में गावल जालाऽ। अइसे  कइसे गा दीं?
'अम्मा! तोहनी के बाद के गाई? रिकार्ड क लेब त सबदिन खातिर हो जाई'
'तोहार अम्मा अब बूढ़ हो गइली, ठीक नाहीं आई।' मैं मचल जाता हूँ - गाना पड़ेगा।
वेदध्वनियों को परम्परा ने श्रुति, तप और समर्पण से आज तक सुरक्षित रखा है, लोकसाम को कौन रखेगा, कैसे? यही तो मार्ग है! 
अम्मा बताती हैं - बहुत पवित्र गायन है यह! भोर में ही गाया जाता है। हाथ मुँह धो के बसिये मूँहे! वह शुरू करती हैं और मुझे भान होता है - जीवन से प्रेम करने वाली बली आर्य परम्परा का। प्रकृति ने सन्देश दे दिया है, यह आह्वान है - देवों का, पितरों का; इसमें बसने वाले नये घर के लिये मंगल कामना है। घर घरनी की सनातन परम्परा को आदर और आशीष देती अमृत वाणी। कभी ऋषियों ने कहा - अमृतस्य पुत्रा: और लोक में हर विवाह जीवन यज्ञ के प्रारम्भ को अमृत बरसाती गृहिणियाँ कहती हैं  -  'एसे हो दूऽध बइठेलाऽ तियुरियाऽ त आऽमृत जोरन'। इसमें आस्था ही आस्था भरी हुई है और कहीं दीन दैन्य नही!    
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ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले
ए भोरऽ भऽइल भीनुसहराऽ चिरइया एक बोलेले 
 
ए जाइ रे जगवहू बरमा बिस्णू बाबा जासो दुहावन
ए नाहिं मोराऽ धेनूऽ बकेनाऽ सवइया घरे ओसर 
 
ए पुतवा नऽ भरेलाऽ कचहरीऽ पतोहियाऽ न घर भरे
ए दुधवाऽ के चलेलाऽ दहेड़ियाऽ त मठवाऽ के नारि बहे
 
एसे हो दूऽध बइठेलाऽ तियुरियाऽ त आऽमृत जोरन
एसे हो दहियाऽ खइलें दुऽलहे बाबू होंइहें अख्खे अम्मर 
 
एसे हो दहियाऽ खइहें दुलहिनिया देईऽ सिर के सोहाग बढ़ो
ए झाँझर लेइ मुख धोवें आरसि ले परीखें त सूरही सनोहें 
 
ए नाहिं मोरा धेनू बकेनाऽ...
एक भरे पुरे आर्य घर की बात है। दूध दही है। सभा समाज में, जो कि कालक्रम में वैसे ही 'कचहरी' हो गया है जैसे बाबा 'पापा' और मंडप 'खपरैल वाला सवैया घर', परिवार की उपस्थिति बनी रहने की कामना है तो भरे हुये घर की भी। आती हुई उषा को देख वैदिक ऋषि भले नाच कर गा उठा हो, गृहिणी की भाँति उसने चिड़ियों की चहचहाहट से स्वयं को नहीं जोड़ा! देवों का आह्वान यहाँ भी है किंतु पूर्णत: घरेलू गँवई रूप में ...भोर भिनसार हो गयी है और एक चिड़िया कहती है - जाओ! ब्रह्मा और विष्णु को जगाओ, उनसे मेरी गाय दुहवाओ!  मेरी गाय अभी बकेना नहीं हुई है, भरपूर दूध देती है। मेरा घर ओसारे वाला सवैया घर है अर्थात उसमें नये जोड़े के लिये पर्याप्त स्थान है। मेरे घर में न्यूनता है तो बस इसकी कि इतने पुत्र नहीं हैं जो सभा में परिवार की उपस्थिति ढंग से करा सकें और इसको भरने वाली पुत्रबधू भी नहीं है। मेरे यहाँ इतना दूध होता है कि उससे जमने वाली दही से निकले मठ्ठे से नाली भर जाती है! यह दूध जब विवाह समारोह के अतिथियों के भोज के लिये बनने वाले चूल्हे पर चढ़ेगा तब उसमें अमृत का जामन पड़ेगा। उस दही को खाने से दूल्हा अमर हो जायेगा और दुल्हन खायेगी तो उसके सिर के सौभाग्य में वृद्धि होगी। ब्रह्मा विष्णु से कहो कि यह झरनेदार पात्र लें, हाथ मुँह धो कर दर्पण देख स्वयं को परख लें और सुराही के पानी से सब कुछ पवित्र कर दें...
... लोकगीतों में महादेव ही नहीं, ब्रह्मा विष्णु भी घरेलू मनई की भाँति ही हैं। शुभ अवसर पर उनसे स्वयं को एवं अन्य सब कुछ को भी साफ शुद्ध कर  दूध दुहने को कहा जा सकता है - मेरे पुत्र का विवाह है, कोई ऐसा वैसा आयोजन थोड़े है!  यहाँ दूध में जोरन का पड़ना विवाह संस्कार जनित पवित्र मिलन का प्रतीक है। इससे जो परिवार बढ़ेगा वह समाज और परम्परा दोनों के लिये बढ़ोत्तरी का कारण होगा।...
...आज अनुमान लगा पा रहा हूँ उस आह्लाद भरी पवित्रता की जिसकी अनुभूति विश्वामित्र को हुई होगी और गायत्री अवतरित हुई। समझ पा रहा हूँ अपने उस भाव को जिसने इसे रचवा दिया - तुम्हें नमन है आदित्य!
सुनिये अम्मा का स्वर पुन: जो सामगायन के साथ मिश्रित है - सामस्वर कभी तानपुरे जैसा है तो कभी लोकस्वर को सहारा देता सा लगता है।     
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पराती का लड़की के घर गाया जाने वाला रूप भी है। आपलोगों के यहाँ किस भाँति है, यहाँ बताइयेगा। 

अगले अंक में:
जामाता दशमो ग्रह: की धौंस में मेरी मौसिया सासू जी का गाया कन्यादान का गीत जिसने मेरी आँखें नम कर दीं।
भिनसारे कौन सा ग्रहण लगता है और भरी दुपहर कौन सा?