कृपया इस आलेख को पढ़ने के पहले ये दो भाग अवश्य पढ़ें: भाग -1, भाग -2
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आ गई एक और गैय्या गार में !
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राग सारंग
मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥
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आत्मालोचन के चरम पर पहुँची सूरदास की उपर्युक्त रचना की ‘प्रथम पंक्ति (-) कामी’ शीर्षकधारी ब्लॉग दो नम्बरी पाया गया है। J यू ट्यूब हिन्दी में ढूँढ़ने पर ‘मो सम कौन’ को संशोधित कर सलमान खान कर देता है ;) विचित्र बात है! इस ब्लॉग के अभिवादन में है ऊपर का राग बृन्दाबनी सारंग आयोजन।
ऐसा क्या है इस ब्लॉग में जो इतना अधिक लोकप्रिय है?
गम्भीर हास्य के साथ जीवन के विधेयात्मक पहलुओं को सम्मान और उभार। साथ ही विसंगतियों पर बेबाक टिप्पणियाँ – सब कुछ बेहद हल्केपन के साथ। मार ऐसी कि भेद जाय लेकिन छ्टपटाते शर्म आये!
विद्वता झाड़ने का कोई रोग नहीं – सब बेहद सादगी से।
पढ़ते हुये लगता है कि किसी बहुत ही सुलझे हुये मित्र के साथ बातचीत हो रही है।
मध्यवर्गपन को लेकर कोई हीन भाव नहीं, उल्टे आत्मविश्वासी हास्य के साथ मजबूती से अपने अस्तित्त्व की स्थापना – यह सब कारण हैं कि यह ब्लॉग इतना लोकप्रिय है।
पढ़िये दिसम्बर 2009 की पहली पोस्ट की खनक!
आ गई एक और गैय्या गार में !
हम मध्यमवर्गीय लोगो ने कम्प्युटर का शुरुआती जलवा या कहें तो सार्वजनिक प्रयोग रेल रिजर्वेशन केन्द्र पर ही देखा था और यही से ललक लगी थी कि हम भले ही इस जादू के पिटारे पर कुछ न कर सके पर बच्चो को कम्प्युटर जरूर ले कर देन्गे ! परमात्मा की क्रपा से अपना ही वास्ता इस से पड गया लेकिन असली खेला तो इन्टरनेट ने शुरु करवाया और हमारा नाम भी राशन कार्ड, हाजिरी पुस्तिका के अलावा कहीं और छप सका ! और फ़िर हमारा तो स्वभाव ही ऐसा है कि किसी का आभार व्यक्त करना हो तो ऐसे करें कि अगला किसी का भला करे तो सोच समझ करे ना कि मन किया और कर दिया किसी को भी प्रेरित । खैर, ईश्वर अर्थात रचनाकार, उसकी सर्वोत्तम रचना अर्थात मानव व इस रचना द्वारा रची गई सभी रचनाओ का धन्यवाद करते इस नाचीज ने यह प्रयास किया है, आशा है महाजनस्य पंथे गिरतम संभलतम हम भी घुट्नों पर चलना सीख लेंगे ।
देखिये एक आम सी बस यात्रा के दौरान जीवन के एक विधायी पक्ष को कैसे उभारता है! हास्य और यथार्थ यथावत ... पानीपत पार कर गई लेकिन फ़ोन काल्स चैन स्मोकिंग की तर्ज पर चैन कालिंग के रूप में जारी रहे। जुमला वही एक, “हां जी, सत श्री अकाल, ठीक-ठाक है जी। खुशखबरी है, किट्टी दे घर एक और किट्टी आ गई है जी। मैं नाना बन गया हां। त्वानूं वी मुबारकां जी, सत श्री अकाल।” मेरी नींद ऐसे भागी जैसे गधे के सर से सींग। मेरा मूड कई शेड्स से होकर गुजर रहा था। पहले झल्लाहट, खीझ, गुस्सा और फ़िर कुछ सहज होते हुये मजा सा आने लगा। इधर सरदार जी नया नंबर मिलाते, बातचीत शुरू करते और मैं भी उनके डायलाग साथ ही साथ बुदबुदाने लगा…
मौका मिलते ही मैने पूछ डाला कि दोहता होता तो शायद आप और ज्यादा खुश होते। सरदारजी बोले, “पुत्तर, मेरी बेटी दी शादी नूं कई साल हो गये सी ते उसदी कोइ औलाद नहीं होई सी। जे उसदे व्याह दे फ़ौरन बाद दोहती पैदा हुंदी ते शायद तेरी गल सच हुंदी …..असी वाहेगुरू अगे एही अरदास करदे सी कि देर नाल सही देवीं पर स्वस्थ गुड्डी देवीं। अज दे टाईम विच धीयां दी जरूरत होर वी वध रही है। ऐ जो खून खराबा, नफ़रत दा महौल चल रया है, कल्ली कुढी ढंग नाल पढ-लिख के तीन घरां नूं सुधार सकदी है।” धीरे-धीरे मेरे मन में उन सज्जन के प्रति श्रद्धा सी होने लगी।...
फत्तू की लाइट में दिवाली देखिये:
खैर, बहरहाल. anyway जो भी हो अपनी तो पहली सरकारी दिल्ली वाली दिवाली है, उम्मीद से हैं :)) जुटे हैं उस्ताद जी के कहे अनुसार ’द वैरी बैस्ट कस्टमर सर्विस’ करने में, जो होगा सिर माथे पर। आगे कभी हो सकता है अपने भी किस्से कोई सुनाकर अपना और दूसरों का टाईम खोटी करें।
:) फ़त्तू पशु मेले से भैंस लेकर आया। घर तक पहुँचते पहुँचते जिस किसी से आमना सामना हुआ, खरीद मूल्य बताते बताते दुखी हो गया। दुखी भी ऐसा कि भैंस बांधते ही कुँए में छलाँग लगा दी। सारा गाँव इकट्ठा होकर फ़त्तू को कुँए से निकलने की पुकार करने लगा, जैसे ब्लॉग जगत में……...। फ़त्तू ने आवाज लगाई और पूछा, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?” जब कन्फ़र्म हो गया कि सब आ लिये तो वो भी बाहर निकल आया और फ़िर अपना सवाल दोहराया, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?” फ़िर से कन्फ़र्मेशन मिल गई तो जोर से बोला, “भैंस आई सै चालीस हजार की, अबके किसी ने पूछ लिया तो उसने इसी कुँए में गेर दूँगा।”
नब्ज़ पर पकड़ रखने वाले इस ब्लॉग की प्रशंसा में पाठक कहते हैं:
- छोटी-२ घटनाओं से जोडकर और हास्य के पुट में गंभीर बातें
- टू द पांईंट पोस्ट,कम और सरल शब्दों का इस्तेमाल पर सटीक ....सही समय पर सही पोस्ट...जिन्दगी के अनुभवों का सार ....
- कुछ भी पढो, कभी भी पढो हमेशा नया ही लगता है...
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(अगले अंक में प्रथम सर्वप्रिय और अन्य बातें)

