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सोमवार, 11 जून 2012

चन्द्रहार ज्यों भारशिव पुरस्कार


मत मारो बेनामी बेलन रे आण्टी!
न भूलो कि तुम नहीं हमारी भाभी।

...जब आप किसी के सुन्दर घर में जाते हैं तो घर की प्रशंसा करते हैं लेकिन उस कालिख पुती दाँत निपोरती  फुटही घूँची के बारे में कुछ भी नहीं कहते या पूछते जो घर वाला दिठौने के तौर पर द्वार पर ऊपर टाँगे रखता है कि पहली नज़र उस पर पड़े और घर को नज़र न लग जाय। दिठौने का कोई खास तर्क नहीं होता। 
ऊपर की पहली दो बोल्ड पंक्तियाँ भी इस ब्लॉग लेख की दिठौना हैं, इनमें कोई तर्क नहीं, अर्थ नहीं, अतर्क्य हैं, इनके बारे में न पूछें और न बातें करें (समझ तो आप लेंगे ही लेकिन कभी कभी मौन वांछित होता है)। इस ब्लॉग को अपनी अभिव्यक्ति और अपनी सदाशयता की सुन्दरता का पूरा भान है, उसे दिठौने पर चर्चा अच्छी नहीं लगेगी ...
...मेरे व्यक्तिगत आयोजन को सफल बनाने के लिये आप सब को धन्यवाद बारम्बार।

अब पुरस्कार:
     ¶ चौथे से सातवें स्थान पाये ब्लॉगों को  प्रथम तीन के साथ अपने चन्द्रहार में स्थान देने की बात बता ही चुका हूँ। उनके पुरस्कार बस यही हैं। (यह बस कितना कस होने वाला है, मुझे पता है J )
     ¶ प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थानों पर आये ब्लॉगों के लिये यही मन कर रहा है कि कोई पुरस्कार न दूँ, मुझमें पात्रता नहीं है लेकिन भाव भव्यता तो है ही ...
...भारतीय इतिहास के अनजाने से चैप्टर में हजारो वर्षों पहले कभी भारशिव हुआ करते थे जो शिव प्रतीकों को मस्तक पर जूड़े की तरह सजाये फिरते थे। वैसे ही इन ब्लॉगों के अद्यतन आलेखों के छोटे अंश सहित लिंक इस ब्लॉग के मस्तक पर 31 दिसम्बर 2012 तक रहेंगे, जिसके लिये मुझे ब्लॉग प्रारूप में परिवर्तन करने पड़ेंगे।
     ¶ हर महीने इन पंचदेवों के पिछ्ले माह भर के आलेखों पर यह ब्लॉग अपनी आलसी कुंजिकाओं को खटखटायेगा। प्रथम सर्वप्रिय के लिये साल भर तक कई ‘सरप्राइज’ भी होंगे!

(मैं यह मान कर चल रहा हूँ कि मानव सभ्यता सम्पूर्ण विनाश की कथित माया भविष्यवाणी के आगे भी बनी रहेगी और मैं भी ऐसे ही आप के बीच बना रहूँगा ;))

आगामी 23 अप्रैल 2013 को हिन्दी ब्लॉगरी के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1 जनवरी 2013 से अगला ब्लॉग पुरस्कार आयोजन प्रारम्भ होगा जो उक्त तिथि को सम्पन्न होगा। आप सबसे इस बारे में राय निमंत्रित है। आप मुझे मेल कर सकते हैं/ सकती हैं। ‘क्रेज़ी से क्रेज़ी आइडिया’ को भी बताने से न चूकें। इस बार की तरह ही विश्वास रखें कि गोपनीयता बनी रहेगी। इस बार अपनी तरह के ही कुछ सनकी व्यक्तियों को भी आयोजक मंडल में जोड़ना चाहूँगा। यह भी विचारणीय होगा कि पुरस्कार क्या हों, कैसे दिये जायँ और आयोजकों के ब्लॉग भी किस तरह से आयोजन में सम्मिलित किये जायँ कि उनके रहते हुये भी वस्तुनिष्ठता और पारदर्शिता बनी रहें?    

अपनी बात:

यह आयोजन नितांत व्यक्तिगत आयोजन था। दुहरा रहा हूँ – नितांत व्यक्तिगत आयोजन, उसी तरह जैसे ब्लॉग लेख होता है – व्यक्तिगत पर सब के लिये खुला।
यह स्थिति ही इस आयोजन की शक्ति थी और सीमा भी। सतही तौर पर देखें तो ऐसे आयोजनों की कोई आवश्यकता नहीं लगती और सब कुछ फिस्स से हँस देने लायक मूर्खता लगती है। अरे भाई बहिनी! लोग अपना अपना कह सुन रहे हैं, खुश हो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं; उन्हें वैसे ही रहने दो न! लेकिन मामला क्या वाकई इतना सरल है? मनुष्य ने अपने अस्तित्त्व से जुड़े किस पक्ष को सरल रहने दिया है?
  जब शब्द और विचार खुल कर, छप कर सामने आ जाते हैं तो वे मूर्तन को आकर्षित करते ही हैं। शिव या अशिव दोनों तरह के हाथ उन्हें लपक सकते हैं, उन्हें मंच पर तमाशे के लिये या यज्ञ के लिये ला सकते हैं। यह आयोजन शिवपक्ष में किया गया। भविष्य कोई नहीं जानता कब पेजर हो जाय और कब मोबाइल! और यह भी कि कब कोई आइडिया 'पैड' हो जाय! 
मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ हर वर्ष ‘प्रशंसा माह’ के आयोजन होते हैं, आभार ज्ञापन आयोजन भी होते हैं। सब लोग काम करते हैं, वेतन पाते हैं, तन ले कर झुके आते हैं, तन लिये तन कर साँझ को घर जाते हैं; क्या आवश्यकता है ऐसे आयोजनों की?
महत्ता तब समझ में आती है जब मेल में आप को यह पता चलता है कि जिस बात को साधारण सी समझ आप भूल चुके थे उसने आप के साथी को कितना द्रवित किया, उसके जीवन में कितना ‘प्लस’ किया? लिखते हुये वह कितना प्रसन्न हुआ होगा!
तब और अच्छा लगता है जब वह आ कर बताता है और सरेआम कहता है। पढ़ते हुये, सुनते हुये और देखते हुये आप आँखों की नमी नहीं रोक पाते। अच्छाइयाँ ऐसे अनुष्ठान माँगती हैं, बुराइयों के अभिचार तो चलते ही रहते हैं। उन्हें न रोक पायें तो क्यों न कुछ छोटा सा ,सच्चा सा कर दें!
हिन्दी ब्लॉगरी की यह वास्तविकता है कि अधिकांश को ब्लॉग लेखक ही पढ़ते हैं। इतने छोटे से संसार में भी उन्मुक्त शिवनृत्य नहीं है तो कुछ भारी गड़बड़ है। पिछले आलेखों में बिखरे कारणों के अतिरिक्त यह आयोजन गड़बड़ ठंड को ऊष्मा दे द्रवित करने के लिये भी था और इसके लिये भी कि आत्मालोचन किया जा सके – कम से कम मैं तो यही चाहता हूँ।
एक बहुत ही सुन्दर सी अंग्रेजी फिल्म है – A Beautiful Mind. विलक्षण प्रतिभा के धनी लेकिन सीजोफ्रेनिया रोग से ग्रसित एक गणितज्ञ के जीवन पर यह फिल्म आधारित है। 
जिस विश्वविद्यालय में गणितज्ञ प्रोफेसर है, वहाँ peer recognition यानि साथियों द्वारा प्रशंसा की एक परिपाटी है। वहाँ के कॉफी हाउस या कैंटीन में जब लोग जुटे खा पी रहे होते हैं तो कोई एक खड़ा होता है और जिसे प्रशंसित करना होता है उसके आगे अपनी पेन रख देता है।... प्रोफेसर जिसे रोग के कारण ऐसे जन दिखते हैं जो वास्तव में होते ही नहीं, एक तरह से स्वीकारा जा चुका है और वह उन आभासी जनों को देखते हुये भी उन पर ध्यान देना बन्द कर चुका होता है। 
 वह साहस कर उस दिन कैंटीन में आता है जब नोबेल पुरस्कार समिति से एक व्यक्ति यह जाँचने के लिये आया होता है कि जिसे पुरस्कार देना है वह प्रोफेसर कहीं पागल तो नहीं? आखिर नोबेल के लेबल की बात है। कैंटीन में बैठा प्रोफेसर स्वीकारता है कि वह क्रेज़ी है, उसे रोग है, वह दवाइयों के बल चल रहा है और उसे अब भी वे लोग दिखते हैं जो हैं ही नहीं! 
ठीक उसी समय किसी  टेबल से कोई एक उठ खड़ा होता है और अपनी पेन प्रोफेसर के सामने रखता है – Professor Nash!... Its good to have you here John! और फिर तो एक एक कर जैसे पेन सामने रखने की झड़ी लग जाती है।
आगंतुक अचम्भित है और प्रोफेसर! आप स्वयं देख लें -  



...एक बहुत बड़ा हाल है ब्लॉगजगत। सब अपने अपने में रमे। ब्लॉग और ब्लॉगर या पाठक के विभेद को रखते हुये भी उसे भुला कर (और कोई राह नहीं थी), मैंने केवल आवाज़ दी कि जिसे पसन्द करते हो उसे कहो तो, उसके आगे अपनी पेन तो रखो!  और लोग अलग अलग मेजों पर पहुँचते गये, प्रशंसितों के नाम अपने आप जुड़ते गये, मैंने कुछ नहीं किया, नाम तक नहीं सुझाया।
...अनेक अनदेखे रह गये। कुमाउँनी चेली, बेचैन आत्मा, सत्यार्थ मित्रसंजय व्यास, मन का पाखी, सुदर्शन, वाणी गीत, अवधी कै अरघान, शिल्पकार के मुख से, महाजाल पर सुरेश चिपलूनकरदशमलव, रेत के महल, सिंहावलोकन, छम्मकछल्लो कहिस, शब्दों का सफर,  मैं घुमंतू, पुरातत्त्ववेत्ता, मल्हार, जय हिन्दी   ... जाने कितने। अनेक। इनमें वे भी हैं जिन्हें टिप्पणी करना छोड़ देने के बाद भी, आज भी मैं ई मेल से अपनी प्रतिक्रियायें भेजता रहता हूँ।  
...यह उनकी नहीं, मेरी सीमा थी, मेरी पहुँच की सीमा थी लेकिन अब मुझे उन तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता!
मैं अपनी पेन उन सबके सामने रखता हूँ आप का यहाँ होना शुभ है।

सीमायें:

लिखते हुये अपने दो आचार्यों की स्मृति हो आई है।  
डा. प्रसाद के सामने जब मैं अपनी थीसिस का ड्राफ्ट ले कर गया तो मेरे निष्कर्षों को देख उन्हों ने सबसे पहले कहा – Bold, too bold for a theorist. ग्रिड फ्लोर सिस्टम पर मैंने काम किया था जो कि कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग और गणितीय मॉडलिंग पर आधारित था। उस युग में मेन फ्रेम का यूनिक्स आधारित वह टाटा एलेक्सी कम्प्यूटर किसी भारतीय संस्थान में लगा दूसरा सबसे तेज कम्प्यूटर था। मुझे किलो के किलो कागजी प्रिंटों के परिणामों पर पूरा भरोसा था। लैब में तो मैं झाँकने तक नहीं गया था कि अनुप्रयोगात्मक अड़चनें आयें। 
इसलिये अपने निष्कर्षों में मैं बोल्ड था, बहुत बोल्ड। डा. प्रसाद ने मुझे अपने संकलन से जो दिखाया उससे मेरी सारी बोल्डनेस हवा हो गई! मैं ऊँचा इसलिये देख पा रहा था कि ऊँचे कदों के कन्धों पर खड़ा था जब कि चश्मा न लगने के बावजूद मेरी प्राकृतिक सी नज़र असल में धुँधली थी...

...फेसबुक, गुगल प्लस, ब्लॉग, ई मेल, चैट आदि तक ही मेरी पहुँच है और उनमें भी स्त्रियों तक तो बहुत ही कम है। तो मैं अपने निष्कर्षों में बोल्ड नहीं हो सकता। विनम्रता मेरे गुरुओं की सीख है। उनसे मुझे पूरी सहमति है।...

... अपने में मस्त रहने वाले एक थे डा. स्वामी ठीक कोमल कवि सुमित्रानन्दन पंत की तरह दिखते। अपनी दोनों बेटियों को अंगुली पकड़ाये झूमते जब आइसक्रीम खिलाने ले जाते तो साँझ पर ममत्त्व की ठंडी सी लेप लग जाती। हम लोग अपने माँ बाप को याद करने लगते। वह सिस्टम एनलिसिस पढ़ाते। सबको कंफ्यूज कर देते और मुझे बहुत समझ में आते।

एक बार उन्हों ने डाटाबेस के महत्त्व के बारे में बताया। उन्हों ने ऐसा कुछ कहा - सच जैसा कुछ होता ही नहीं! आप असल में जो देखते हो, मस्तिष्क उसका विश्लेषण कर चोर रास्ते ढूँढ़ लेता है, दौडा देता है रस्ते पर कि अंत में सच है जब कि वहाँ वैसा कुछ नहीं होता। अजीब है कि संसार ऐसे ही चलता है। 
 (ऐसी बातों के दौरान वे पूरे संसार को सिस्टम मान कुछेक सौ वैरिएबल्स की मदद से हुये एक कागजी अध्ययन की बात भी बताते जिसके अनुसार पर्यावरण पर तत्काल सुधारू कदम न उठाने पर संसार 2020 तक तहस नहस होना था और कदम उठाने पर 2020 तो बचने वाला था लेकिन 2040 में सम्पूर्ण विनाश होना था। मैं सुनता और मन ही मन कहता – सेत्ताराम! सेत्ताराम!!)

वह बोर्ड पर बड़े प्रेम से दो ग्राफ बनाते और बताते कि सच ऐसे ही दिखते हैं यानि कि या तो होते ही नहीं या ठीक उलट होते हैं। 
डाटाबेस की महिमा यहाँ भी लागू है और सर्वत्र भी।  
(टाइम पत्रिका के सर्वे में जाने कितनों ने कम्प्यूटर बदल बदल, ब्राउजर बदल बदल, कनेक्शन बदल बदल एक वोट को हजार वोट किये। मेरे यहाँ तो ऐसा नहीं हुआ, जाने उनका सच है या मेरा? डाटाबेस तो वाकई उनका बहुत बड़ा है।)  


  (मत प्रक्रिया के दौरान पाठकों ने जो कारण बताये वे अपने आप में एक बहुत ही गहन विश्लेषण की माँग करते हैं। उनके बारे में विस्तार से फिर कभी लिखूँगा। अभी तो यही लिखूँगा कि जारी, आलसी जारी है।)


जनप्रियता की चोटियों पर पहुँचे सभी के लिये ढेरों शुभकामनायें। 
उन्हीं की जुबानी कहूँ तो शुभकामनाओं में दायित्त्वों को और भारी करने का भाव अंतर्निहित है।     
     

रविवार, 10 जून 2012

सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार - 4 : चन्द्रहार का सुमेरु

कृपया इस आलेख को पढ़ने के पहले ये तींन भाग अवश्य पढ़ें: भाग -1,   भाग -2 , भाग-3 
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मोज़ार्ट की अपनी प्रिय सिम्फनी जुपिटर को सुनते हुये प्रथम सर्वप्रिय ब्लॉग के बारे में लिखना एक ‘रिच एक्सपीरियेंस’ है, यह ब्लॉग सम्भवत: ‘समृद्ध अनुभव’ नहीं लिखता clip_image002[4]
अविनाश चन्द्र जी ने ब्लॉग और ब्लॉगर के भेद के समाप्त होने की जिस बात की ओर संकेत किया है, वह यहाँ दिखती है।... ‘सुमेरु’! उफ्फ!!... साहित्त सा लगता है।
  पश्चिमी संगीत की इस सिम्फनी को आप सुनेंगे तो पायेंगे कि इसके सुर अनेक स्थानों से ले कर भारतीय फिल्मी संगीत में सम्मिलित कर लिये गये हैं लिहाजा आम जन की रुचि का हिस्सा बन गये हैं, इन सुरों में सॉफिस्टिकेटेड शास्त्रीयता तो है ही। यह ब्लॉग भी ऐसे ही सबको अपने से जोड़ता है। विशिष्ट इस मामले में कि कहीं बनावट नहीं, दिल से आती लिखाई; बीच बीच में अंतर्दृष्टि की झलकियाँ जो सहज ही आ जाती हैं और पाठक को बाँध सी लेती हैं।
 शायद यही कारण है कि इसकी पराश बहुत अधिक है और लोकप्रियता भी – इतनी कि प्लेटफॉर्म बदलने पर भी प्रभाव यथावत ही रहा। जी हाँ, मैं ‘गंगा किनारे वाले’ छोरे के ब्लॉग की बात कर रहा हूँ, जिसकी मानसिक हलचल सबको भाती है। फिर वही ...ब्लॉग और ब्लॉगर का विभेद ‘थिन’ सा लगने लगा। छोरा कहते अजीब भी लग रहा है और नहीं भी।clip_image002[4]

~57
यह ब्लॉग बहुत प्रयोगी भी है। टिप्पणियों को ले कर, स्लाइड शो को लेकर, नेट पर अन्य साधनों के प्रयोग द्वारा पराश बढ़ाने को लेकर और निज अध्ययन को प्रस्तुत करने को लेकर ... हर पहलू में सफल प्रयोगात्मकता झलकती है - निरंतर जीवंतता...
...निरंतर साधनाशील एक चीनी चित्रकार था। एक दिन उसने ऐसा जीवंत चित्र बनाया कि उसमें समा गया... वैसे ही यह ब्लॉग पढ़ाता नहीं, आप को परिदृश्य में समोता चलता है। नदी नारे, सड़क किनारे, कछार कचनार छुक छुक रेल...खेल रहा है एक छोरा गंगा किनारे!
एक अंश देखिये:
मेरी अम्मा ने बताया कि लोग मानते हैं कि आज से गंगाजी में पानी बढ़ना प्रारम्भ हो जाता है। इस दिन से पहले, गंगापार जाने वाली बारात अगर हाथी के साथ हुआ करती थी, तो हाथी पानी में हिल कर गंगापार कर लिया करता था। पर गंगादशहरा के बाद यह नियमबद्ध हो गया था कि हाथी गंगा पार नहीं करेगा। बारात नाव में बैठ पार जाती थी पर हाथी नहीं जाता था।

प्रथम सर्वप्रिय ब्लॉग मानसिक हलचल के पाठक ऐसी बातें करते हैं:
-    गंगा-तट की ऐसी निजी पत्रकारिता/उपस्थिति अन्यत्र कहा!
 कछार से लेकर कोयल तक के सूक्ष्म अवलोकन जैसी जीवंत ब्लॉगिंग मिलती है
...क्यों नहीं पढ़ता , यह जानने के लिये कि उपादान (मैटर) रचना की आत्मा नहीं हो सकता। ...यह मैटर तो मूल्यधारण ही करता है तब, जब रचनाकार की आत्मशक्ति उसमें संयुक्त होती है।
 बहुत लंबे अरसे से बेहद सरल-सहज भाषा में नानाविध विषयों पर औब्ज़र्वेशन पढ़ना मैं कभी नहीं चूकता
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(थक गया हूँ। अन्य बातें, सीमायें और पुरस्कार कल)  


सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार - 3 : चन्द्रहार का 'दो नम्बरी'

कृपया इस आलेख को पढ़ने के पहले ये दो भाग अवश्य पढ़ें: भाग -1,   भाग -2  
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राग सारंग
मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी॥
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी॥
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी॥

~38
त्मालोचन के चरम पर पहुँची सूरदास की उपर्युक्त रचना की ‘प्रथम पंक्ति (-) कामी’ शीर्षकधारी ब्लॉग दो नम्बरी पाया गया है। J यू ट्यूब हिन्दी में ढूँढ़ने पर मो सम कौन को संशोधित कर सलमान खान कर देता है ;)  विचित्र बात है! इस ब्लॉग के अभिवादन में है ऊपर का राग बृन्दाबनी सारंग आयोजन।

ऐसा क्या है इस ब्लॉग में जो इतना अधिक लोकप्रिय है?
गम्भीर हास्य के साथ जीवन के विधेयात्मक पहलुओं को सम्मान और उभार। साथ ही विसंगतियों पर बेबाक टिप्पणियाँ – सब कुछ बेहद हल्केपन के साथ। मार ऐसी कि भेद जाय लेकिन छ्टपटाते शर्म आये!  
विद्वता झाड़ने का कोई रोग नहीं – सब बेहद सादगी से। 
पढ़ते हुये लगता है कि किसी बहुत ही सुलझे हुये मित्र के साथ बातचीत हो रही है।
मध्यवर्गपन को लेकर कोई हीन भाव नहीं, उल्टे आत्मविश्वासी हास्य के साथ मजबूती से अपने अस्तित्त्व की स्थापना – यह सब कारण हैं कि यह ब्लॉग इतना लोकप्रिय है।

पढ़िये दिसम्बर 2009 की पहली पोस्ट की खनक!
        

आ गई एक और गैय्या गार में !

हम मध्यमवर्गीय लोगो ने कम्प्युटर का शुरुआती जलवा या कहें तो सार्वजनिक प्रयोग रेल रिजर्वेशन केन्द्र पर ही देखा था और यही से ललक लगी थी कि हम भले ही इस जादू के पिटारे पर कुछ न कर सके पर बच्चो को कम्प्युटर जरूर ले कर देन्गे ! परमात्मा की क्रपा से अपना ही वास्ता इस से पड गया लेकिन असली खेला तो इन्टरनेट ने शुरु करवाया और हमारा नाम भी राशन कार्ड, हाजिरी पुस्तिका के अलावा कहीं और छप सका ! और फ़िर हमारा तो स्वभाव ही ऐसा है कि किसी का आभार व्यक्त करना हो तो ऐसे करें कि अगला किसी का भला करे तो सोच समझ करे ना कि मन किया और कर दिया किसी को भी प्रेरित । खैर, ईश्वर अर्थात रचनाकार, उसकी सर्वोत्तम रचना अर्थात मानव व इस रचना द्वारा रची गई सभी रचनाओ का धन्यवाद करते इस नाचीज ने यह प्रयास किया है, आशा है महाजनस्य पंथे गिरतम संभलतम हम भी घुट्नों पर चलना सीख लेंगे ।

देखिये एक आम सी बस यात्रा के दौरान जीवन के एक विधायी पक्ष को कैसे उभारता है! हास्य और यथार्थ यथावत  ...  पानीपत पार कर गई लेकिन फ़ोन काल्स चैन स्मोकिंग की तर्ज पर चैन कालिंग के रूप में जारी रहे। जुमला वही एक, “हां जी, सत श्री अकाल, ठीक-ठाक है जी। खुशखबरी है, किट्टी दे घर एक और किट्टी आ गई है जी। मैं नाना बन गया हां। त्वानूं वी मुबारकां जी, सत श्री अकाल।मेरी नींद ऐसे भागी जैसे गधे के सर से सींग। मेरा मूड कई शेड्स से होकर गुजर रहा था। पहले झल्लाहट, खीझ, गुस्सा और फ़िर कुछ सहज होते हुये मजा सा आने लगा। इधर सरदार जी नया नंबर मिलाते, बातचीत शुरू करते और मैं भी उनके डायलाग साथ ही साथ बुदबुदाने लगा
मौका मिलते ही मैने पूछ डाला कि दोहता होता तो शायद आप और ज्यादा खुश होते। सरदारजी बोले, “पुत्तर, मेरी बेटी दी शादी नूं कई साल हो गये सी ते उसदी कोइ औलाद नहीं होई सी। जे उसदे व्याह दे फ़ौरन बाद दोहती पैदा हुंदी ते शायद तेरी गल सच हुंदी …..असी वाहेगुरू अगे एही अरदास करदे सी कि देर नाल सही देवीं पर स्वस्थ गुड्डी देवीं। अज दे टाईम विच धीयां दी जरूरत होर वी वध रही है। ऐ जो खून खराबा, नफ़रत दा महौल चल रया है, कल्ली कुढी ढंग नाल पढ-लिख के तीन घरां नूं सुधार सकदी है।धीरे-धीरे मेरे मन में उन सज्जन के प्रति श्रद्धा सी होने लगी।...

 फत्तू की लाइट में दिवाली देखिये:
खैरबहरहाल. anyway जो भी हो अपनी तो पहली सरकारी दिल्ली वाली दिवाली हैउम्मीद से हैं :))           जुटे हैं उस्ताद जी के कहे अनुसार ’द वैरी  बैस्ट  कस्टमर सर्विसकरने में, जो होगा सिर माथे पर।  आगे कभी हो सकता है अपने भी किस्से कोई सुनाकर अपना और दूसरों का टाईम खोटी करें।

:) फ़त्तू  पशु मेले से भैंस  लेकर आया। घर तक पहुँचते पहुँचते जिस किसी से आमना सामना हुआखरीद मूल्य बताते बताते दुखी हो गया। दुखी भी ऐसा कि भैंस बांधते ही कुँए में छलाँग लगा दी। सारा गाँव इकट्ठा होकर फ़त्तू को कुँए से निकलने की पुकार करने लगा, जैसे ब्लॉग जगत में……...। फ़त्तू ने आवाज लगाई और पूछा, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?”  जब कन्फ़र्म हो गया कि सब आ लिये तो वो भी बाहर निकल आया और फ़िर अपना सवाल दोहराया, “सारे गाम आले आ लिये अक कोई सा रै रया है?”   फ़िर से कन्फ़र्मेशन मिल गई तो जोर से बोला, “भैंस आई सै चालीस हजार की, अबके किसी ने पूछ लिया तो उसने इसी कुँए में गेर दूँगा।

ब्ज़ पर पकड़ रखने वाले इस ब्लॉग की प्रशंसा में पाठक कहते हैं:
-    छोटी-२ घटनाओं से जोडकर और हास्य के पुट में गंभीर बातें
-    टू द पांईंट पोस्ट,कम और  सरल शब्दों का इस्तेमाल पर सटीक ....सही समय पर सही पोस्ट...जिन्दगी के अनुभवों का सार ....
-    कुछ भी पढो, कभी भी पढो हमेशा नया ही लगता है...
_____________
(अगले अंक में प्रथम सर्वप्रिय और अन्य बातें)

सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार - 2 : चन्द्रहार के मोती

पिछले भाग से आगे ...
प्रथम तीन स्थानों का निर्धारण भूली सी विद्या गणित के जटिल अनुप्रयोग को ललचाता रहा। सरलता हेतु बस साधारण अंकगणित और सरल सांख्यिकी के कुछ खुरपेंचों तक ही सीमित रहा। इससे पहले के लेख पर आई टिप्पणियों से लगता है कि निर्णय ठीक ही लिया clip_image002[4]
तीसरे स्थान पर जो तीन ब्लॉग आ जमे उनके इकठ्ठे होने का संयोग इतना चकित कर गया कि मुझे एक्सेल शीट को दुबारा चेक करना पड़ना। चकित इसलिये कि अपनी पसन्द यूँ एक जगह इकठ्ठी होते देखना...
... लिखते हुये राहुल सिंह जी की की यह टिप्पणी ध्यान में आई है:

बढि़या चयन. आप सीधे चुनें तो परिणाम और भी बेहतर हों.
मुझे मेहनत करने की क्या आवश्यकता जब लोग मेरा काम किये दे रहे हैं? clip_image002[4]
हले वह ब्लॉग जो समसामयिक मुद्दों और गाँव के बूढ़े पीपल के नीचे पड़ी खाट पर सुस्ताती हर गली खिरकी की खबर लेती धूप को सोंधेपन के साथ प्रस्तुत करता है - चूल्हे के किनारे थाली में पड़ी गर्मागर्म ललचाती रोटी, अंगुली जलने की परवाह नहीं, कोंच दिये गब्ब से! उठती भाप की महक याद आ जाती है। महानगर में अपनी खटाई, रोटी और प्याज की गठरी को सँभालते भागते गँवई की चुहुल नई उद्भावनाओं के साथ यहाँ मिलती है।
rangi_safediमैं सफेद घर की बात कर रहा हूँ जिसके बारे में दूर अरब में रहते एक भारतीय सज्जन कहते हैं – connects me to my origin (obviously Ballia, UP) 
कोई आश्चर्य नहीं कि यह ब्लॉग ऐसे हर किसी को गुदगुदाता है जो गाँव की पृष्ठभूमि से है या जो महानगरों को सीधे साधे मनई की चतुराई और अक्खड़ता के साथ देखता है। इस ब्लॉग के लिये गाँव की सरल मिठास वाली पहाड़ी के चन्द सुर आधुनिक वाद्य पर - पंजाबी बातचीत के तड़के के साथ:

लिया की गलियाँ हों या मैनहट्ट्न न्यूयार्क के राजमार्ग, पटना का बैरीकूल हो या लिव इन रिलेशनशिप वाली ऋचा, यह ब्लॉग सबके साथ अपनी यारी गाँठ लेता है, कुछ ऐसी यारी कि यह उनकी वे अंतरंग बातें जान जाता है जिन्हें शायद वे स्वयं नहीं जानते! ब्लॉग की याद का एक टुकड़ा देखिये:
...एक दस डॉलर का नोट जिस पर किसी का सिग्नेचर ले लिया था,
उसकी कीमत रुपये के गिरने से नहीं बल्कि वक़्त के बदलने से अब कुछ और ही हो गयी है  
बस एक कागज ही तो रह गया है... नोट तो रहा नहीं,
भगवान पर चढ़ाया फूल हो गया है वो
क्या करूँ उसका? ! 
clip_image002[4]  
एक पाठक का कहना है – बस यूँ ही किसी पेड़ के नीचे बैठ इसे स्क्रीन पर सरकाते पढ़ने का मन करता है. तब जब सामने सड़क पर लोगों को देखने तक की फुरसत नहीं होती. 

ojhwaओझा उवाच के लिये बिथोवन की पैस्टोरल सिम्फनी का वह अंश जिसमें सीमाहीन कलकल बहता जल है और बाँसुरी, क्लेरिनेट में लवा, बुलबुल,कोयल के बोल भी।




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पिट्सबर्ग अमेरिका से लिखा जाता है एक ऐसा ब्लॉग जिसकी बरेली बाँस चढ़ी दृष्टि समूचे संसार पर फिरती है।  clip_image002[4]   इस बहुआयामी और बहुरंगी ब्लॉग की बड़ाई में एक पाठक केवल दो शब्दों में सब कह देता है - honesty, straightforwardness.
smart_ya_vaishnavविविधता, गुणवत्ता और शोध इस ब्लॉग की विशेषतायें हैं। अपनी मिट्टी से जुड़े और वसुधैव कुटुम्बकं की भावना सँजोये इस उदार चरित ब्लॉग बर्ग वार्ता के लिये एक और अंग्रेजी शब्द ध्यान आता है – No nonsense और सम्भवत: यही कारण है कि ‘उपदेशात्मक ब्लॉगों’ से चिढ़ने वाले भी यहाँ के वैसे टोन का बुरा नहीं मानते।  clip_image002[4]   376 फॉलोवर वाले इस ब्लॉग के एक सद्य: लेख से अंश देखिये:
 मैं अपने आसपास के अंतर्जातीय विवाहों पर नज़र दौड़ाता हूँ तो जन्मना ब्राह्मणों को अग्रणी पाता हूँ। प्रेम की तरह शायद कट्टरता के भी कई रूप होते हैं, एक सर्वभूतहितेरतः वाला और दूसरा अहमिन्द्रो न पराजिग्ये वाला। 
ब्राह्मण याने द्विज यानि दूसरे जन्म याने संस्कार से बना हुआ व्यक्ति। मतलब यह कि ब्राह्मण जन्म से होता ही नहीं। ब्राह्मण होने का मतलब ही है आनुवंशिकता के महत्व को नकारकर ज्ञान, शिक्षा और संस्कार के महत्व को प्रतिपादित करना। विश्व के अन्य राष्ट्रों की तरह भारतीय जातियाँ पितृकुल से भी हैं, मातृकुल से भी। लेकिन ब्राह्मण गोत्र इन दोनों से ही नहीं होते हैं। वे बने हैं गुरुकुल से। जातिवाद और ब्राह्मणत्व दो विरोधी प्रवृत्तियाँ हैं। इनका घालमेल करना निपट अज्ञान ही नहीं,
एक तरह से भारतीय परम्परा का निरादर करना भी है।   
इस ब्लॉग के लिये तुलसी की ये पंक्तियाँ:
~ 23
(अगले अंक में द्वितीय स्थान प्राप्त ब्लॉग)              

शनिवार, 9 जून 2012

सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार -1 : चन्द्रहार के मोती


गत 7 जून को अट्ठारह दिनोंकी वह समय सीमा समाप्त हो गई जिसके दौरान आप सब से अपने प्रिय और अप्रिय तीन तीन ब्लॉगों के नाम कारण सहित बताने को कहा गया था। जिन जनों ने अपने मत व्यक्त किये उनका आभार। धन्यवाद।

कारणों को पढ़ना बहुत ही समृद्धकारी अनुभव रहा। फेसबुक और ट्विटर जैसे त्वरित साधनों के होते हुये भी, पुस्तकों के होते हुये भी ब्लॉग लिखने वाले और उन्हें पढ़ने वाले विविध जीवंतता बनाये हुये हैं। ‘सार्वजनिक व्यक्तिगत’ को समेटे अलग तरह का ब्लॉग प्लेटफॉर्म अपने आप में एक संसार है।

उन सबको एक बार पुन: धन्यवाद जिन्हों ने कारण बताये और क्या खूब बताये!

उस दौरान फेसबुक, गुगल प्लस, ब्लॉग लेख, इंडीब्लॉगर, ई मेल और चैट आदि का उपयोग इस आयोजन को प्रचारित करने के लिये किया।

अब कुछ जिज्ञासाओं पर अपनी बात कहूँगा।

एक प्रश्न आया था – हिन्दी ब्लॉगरी की छिछली कीच वाली प्रवृत्ति आप में भी? स्पष्टत: संकेत पुरस्कारी आयोजनों की ओर था।

ब्लॉगजगत में सक्रियता के गत तीन चार वर्षों में मैंने बहुत कुछ सीखा है। आप को विश्वास नहीं होगा कि कुछ ब्लॉग लेखों को पढ़ कर दिनों तक मन ही मन सराहता रहा हूँ – ये हुई न बात! कई बार तो इतना प्रभावित हुआ कि आलेखों या कविताओं को अपने ब्लॉग पर शेयर कर दिया – कभी भूमिका के साथ, कभी वैसे ही। क्यों किया?
इसे अनुनाद कहते हैं। जब आवृत्तियाँ मिल जाती हैं तो झंकार की पराश बढ़ जाना स्वाभाविक है। बढ़ी हुई पराश आप को उन अनजान आत्माओं से जोड़ती है जो आप की ही तरह हैं।
साझा करना संतृप्त करता है। ‘व्यक्ति’ को विस्तार दे ‘समष्टि’ से जोड़ता है। इससे हमें सुख मिलता है। यह हमारे शिव को शव होने से बचाता है। बहुत बार सोचा कि ऐसा कौन सा ब्लॉग होगा जिसकी पराश ऐसी होगी कि ढेर सारे विविध क्षेत्रों के लोग उससे जुड़ते हों? कैसे पता चले? यह बहुत ही सरल और ईमानदार उत्कंठा थी। यह भी मन में आया कि ऐसे कई होंगे जो अनजान ही रह गये/जाते होंगे।
मैंने यह भी पाया कि संख्या बहुत कम होने के कारण बातें ब्लॉग से ब्लॉगर और उसके बाद उसकी दुर्बलताओं तक कुछ अधिक ही लपकती थीं। व्यक्तिगत घर्षणों के परिणाम सृजन न हो ध्वंस होते थे – कई गम्भीर और गुणवत्ता वाले ब्लॉगों पर लेखन कम होने लगा। कुछ पर तो बन्द ही हो गया।
अन्धकार अधिक लगने लगे तो दिया जला बाहर आना और लोगों को जोड़ना भी एक विकल्प होता है। फंतासी विधान वाली लेंठड़ा शृंखला यही थी। मेरी सोच यह थी कि चन्द अच्छे लोगों के जुड़ने से कुछ ऐसा निकल कर आ सकता है जो एक ऊँची छलांग साबित हो!

ऐसा कुछ न हुआ और मैं असंतुष्ट रहा। बहुत सी सीमायें थीं। सबसे बड़ी सीमा यह कि सुकून से चन्द अक्षर यहाँ भी नहीं लिखने देते, चाहते क्या हो? मैं एकला चलने की सोचने लगा। लेखन भी चलता रहा लेकिन खुजली गई नहीं।

एक ऐसे ब्लॉगर हैं जिनके साथ बहुत खुला हुआ हूँ। उनसे चैट पर चुटीली बातों के दौरान ही अकेले नि:स्वार्थ कुछ सार्थक करने के उद्देश्य से ‘अर्गलाओं के चन्दहार’ शृंखला प्रस्तुत करने का निर्णय लिया लेकिन इसके लिये चुनाव का आधार क्या हो? केवल व्यक्तिगत प्रियता या कुछ और? मैं स्वयं से उलझता रहा।
अंतत: तय किया कि लोगों से अभिमत लिये जायँ कि उनके प्रिय ब्लॉग कौन से हैं? उपयुक्त अवसर भी दिख गया। मैंने सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार की चुटीली घोषणा कर डाली। कतिपय लोगों ने समसामयिक समाचार संकेत देती हल्की फुल्की लिखाई के कारण मेरे आयोजन को प्रतिक्रिया समझा लेकिन बहुतों ने तो सदाशयता को समझ ही लिया। परिणामत: बहुत ही उत्साहवर्धक ढंग से लोगों ने अपने मत व्यक्त किये। ब्लॉग पर मैंने उन्हें कुछ कम जाने जाते लेकिन गुणी ब्लॉगों के लिंक भी बताये ताकि उनका निर्णय क्षेत्र बढ़े।  
मैं उनकी सराहना करता हूँ। मेरी मान्यता यह है कि प्रकृति खाली स्थान या निर्वात को पसन्द नहीं करती। अगर अच्छे लोग उन्हें नहीं भरेंगे तो कूड़ा कचरा भरेगा। छिछली कीच के विरुद्ध है यह आयोजन जो बिना सम्मिलित हुये नहीं हो सकता। पग तो उठाने ही पड़ेंगे!

एक प्रश्न था ऋणात्मक मार्किंग क्यों? 
      
मैं आप के भीतर बैठे शिव पर विश्वास करता हूँ। सामान्यत: बुरा सोचना सबसे आसान होता है, कहना उससे कठिन, लिखना और कठिन और किसी को साक्ष्य रूप लिख कर दे देना महाकठिन। मेरा मानना यह था कि जब तक किसी को कोई ब्लॉग एकदम अवांछित नहीं लगेगा तब तक वह उसे ऋणात्मक प्रविष्टि नहीं देगा। यही कारण था कि ऋणात्मक मत को दुगुना वजन दिया गया।
लोगों ने मेरे इस विश्वास को पुख्ता किया। जिसे ऋणात्मक कहा है उसके लिये पुष्ट कारण भी गिनाये हैं। यह भी कि ऋणात्मक मतों की संख्या कम रही है हालाँकि पाने वालों की संख्या कम नहीं है। बड़ी बात यह है कि पढ़ने वालों में नैराश्य की मात्रा उतनी नहीं है जितनी ब्लॉग जगत लेख और टिप्पणियों में प्रक्षेपित करता रहता है।  
ऋणात्मक अंकों से संतुलन भी आया और यह समझ भी मिली कि जनदृष्टि में किसी ब्लॉग में अवांछित क्या क्या हो सकता है।

अपनी पसन्द के ब्लॉग को ही नापसन्द करने का विकल्प क्यों?

ऐसा उन परफेक्शनिस्टों के लिये किया गया जो हिन्दी ब्लॉगों को पढ़ते तो हैं लेकिन मानते हैं कि अभी ‘वो बात’ नहीं आ पाई। लिहाजा जिसे पसन्द करते हैं, उससे बहुत आशायें रखते हैं और उसकी खामियों को इतनी खुन्नुस के साथ सँभाल कर रखते हैं कि ब्लॉग कोई व्यक्ति हो तो सामने पड़ने पर मार बैठें, ब्लॉगर को तो चीर ही डालें कि तुममें इतनी सम्भावनायें हैं लेकिन तुम उस स्तर का लिखते क्यों नहीं?

ब्लॉगर क्यों नहीं?

इसका उत्तर आयोजन घोषणा वाली पोस्ट में है। पाठक ब्लॉग पढ़ता है, बहुत से ब्लॉगरों को तो जानता तक नहीं। एकाध अच्छे तो छ्द्मनामी भी हैं। तो नाम से क्या लेना देना, काम देखो यारों!
सबसे बड़ी बात यह कि ब्लॉग ‘पुरस्कार बवाल’ नहीं काट सकता और न इनकार कर सकता है। काटेगा या इनकार करेगा तो वह ब्लॉगर होगा जो अपनी ही भद्द करेगा ;) नहीं समझे? छोड़िये भी!...कारण तो बहुत हैं, लेंठड़े के प्रवचन ध्यान से सुनिये।
    
प्रक्रिया बहुत ही सरल थी।

-    (1) ब्लॉगों के नाम नहीं सुझाये गये थे, लोगों को स्वयं बताने थे।
-   (2) एक व्यक्ति पसन्दगी और नापसन्दगी प्रत्येक श्रेणी में तीन तीन ब्लॉग बता सकता था - प्रथम, द्वितीय और तृतीय।
-   (3) प्रथम की तुलना में द्वितीय को 67% और तृतीय को 33% गणितीय महत्त्व दिया गया। प्रियता/अप्रियता के कारण नहीं बताने पर मत का महत्त्व आधा कर दिया गया।
-   (4) इस तरह से प्राप्त सकल गुणित धनात्मक और ऋणात्मक अंकों को जोड़ दिया गया। इस योग से प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थानों पर प्रिय ब्लॉगों का निर्धारण किया गया।

उदाहरण:
मान लीजिये कि आलसी नाम के एक ब्लॉग को लोगों ने कुछ यूँ परखा है:

प्रियता: प्रथम स्थान कुल 36 मत, द्वितीय स्थान कुल 44 मत और तृतीय स्थान कुल 18 मत।
प्रियता के कुल गुणित अंक = 36+0.67x44+0.33x18 यानि 95.54
अप्रियता: प्रथम स्थान कुल 6 मत, द्वितीय स्थान कुल 5 मत और तृतीय स्थान कुल 2 मत।
अप्रियता के गुणित अंक = 2x (6+0.67x5+0.33x2) यानि  20.02
सकल योग = 95.54 – 20.02 यानि 75.52 अंक  

चूँकि सबसे अप्रिय ब्लॉग का चयन निर्धारित नहीं था, इसलिये अप्रियता की श्रेणी के ब्लॉग नहीं बताये जायेंगे। बहुतों के बारे में तो आप सहज ही अंनुमान लगा सकते हैं। J कुल एक तिहाई ब्लॉग ऐसे हैं जिन्हें किसी न किसी ने ऋणात्मक मत दिया।
अट्ठारह ब्लॉग ऐसे हैं जिन्हें एक भी धनात्मक मत नहीं मिला! पढ़ने वाले परखने में कंजूसी नहीं करते।

परिणाम:
लोगों ने पसन्द/नापसन्द के कुल 66 हिन्दी ब्लॉगों के नाम बताये। घोषणानुसार तीन विजेता नाम कल विश्लेषण के साथ बताये जायेंगे लेकिन पहले सातवें से चौथे तक स्थान पाये वे ब्लॉग जो उनसे कम नहीं और जिन्हें जनमत का सम्मान करते हुये पुरस्कार स्वरूप जून से दिसम्बर तक वर्ष के बचे सात महीनों में हर माह स्थानक्रम से ‘अर्गलाओं के चन्द्रहार’ शृंखला में प्रथम स्थान पाये तीन ब्लॉगों के अतिरिक्त प्रस्तुति के लिये चुना गया है।
सातवाँ स्थान: अज़दक
 15

छ्ठा स्थान: छीटें और बौछारें  
16.7 

पाँचवा स्थान: फुरसतिया
 18.3

चौथा स्थान: संयुक्त रूप से



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(जारी)