न भूलो कि तुम नहीं हमारी भाभी।
...जब आप किसी के सुन्दर घर में जाते हैं तो घर की प्रशंसा करते हैं लेकिन उस कालिख पुती दाँत निपोरती फुटही घूँची के बारे में कुछ भी नहीं कहते या पूछते जो घर वाला दिठौने के तौर पर द्वार पर ऊपर टाँगे रखता है कि पहली नज़र उस पर पड़े और घर को नज़र न लग जाय। दिठौने का कोई खास तर्क नहीं होता।
ऊपर की पहली दो बोल्ड पंक्तियाँ भी इस ब्लॉग लेख की दिठौना हैं, इनमें कोई तर्क नहीं, अर्थ नहीं, अतर्क्य हैं, इनके बारे में न पूछें और न बातें करें (समझ तो आप लेंगे ही लेकिन कभी कभी मौन वांछित होता है)। इस ब्लॉग को अपनी अभिव्यक्ति और अपनी सदाशयता की सुन्दरता का पूरा भान है, उसे दिठौने पर चर्चा अच्छी नहीं लगेगी ...
...मेरे व्यक्तिगत आयोजन को सफल बनाने के लिये आप सब को धन्यवाद बारम्बार।
अब पुरस्कार:
¶ चौथे से सातवें स्थान पाये ब्लॉगों को प्रथम तीन के साथ अपने चन्द्रहार में स्थान देने की बात बता ही चुका हूँ। उनके पुरस्कार बस यही हैं। (यह बस कितना कस होने वाला है, मुझे पता है J )
¶ प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थानों पर आये ब्लॉगों के लिये यही मन कर रहा है कि कोई पुरस्कार न दूँ, मुझमें पात्रता नहीं है लेकिन भाव भव्यता तो है ही ...
...भारतीय इतिहास के अनजाने से चैप्टर में हजारो वर्षों पहले कभी भारशिव हुआ करते थे जो शिव प्रतीकों को मस्तक पर जूड़े की तरह सजाये फिरते थे। वैसे ही इन ब्लॉगों के अद्यतन आलेखों के छोटे अंश सहित लिंक इस ब्लॉग के मस्तक पर 31 दिसम्बर 2012 तक रहेंगे, जिसके लिये मुझे ब्लॉग प्रारूप में परिवर्तन करने पड़ेंगे।
¶ हर महीने इन पंचदेवों के पिछ्ले माह भर के आलेखों पर यह ब्लॉग अपनी आलसी कुंजिकाओं को खटखटायेगा। प्रथम सर्वप्रिय के लिये साल भर तक कई ‘सरप्राइज’ भी होंगे!
¶ प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थानों पर आये ब्लॉगों के लिये यही मन कर रहा है कि कोई पुरस्कार न दूँ, मुझमें पात्रता नहीं है लेकिन भाव भव्यता तो है ही ...
...भारतीय इतिहास के अनजाने से चैप्टर में हजारो वर्षों पहले कभी भारशिव हुआ करते थे जो शिव प्रतीकों को मस्तक पर जूड़े की तरह सजाये फिरते थे। वैसे ही इन ब्लॉगों के अद्यतन आलेखों के छोटे अंश सहित लिंक इस ब्लॉग के मस्तक पर 31 दिसम्बर 2012 तक रहेंगे, जिसके लिये मुझे ब्लॉग प्रारूप में परिवर्तन करने पड़ेंगे।
¶ हर महीने इन पंचदेवों के पिछ्ले माह भर के आलेखों पर यह ब्लॉग अपनी आलसी कुंजिकाओं को खटखटायेगा। प्रथम सर्वप्रिय के लिये साल भर तक कई ‘सरप्राइज’ भी होंगे!
(मैं यह मान कर चल रहा हूँ कि मानव सभ्यता सम्पूर्ण विनाश की कथित माया भविष्यवाणी के आगे भी बनी रहेगी और मैं भी ऐसे ही आप के बीच बना रहूँगा ;))
आगामी 23 अप्रैल 2013 को हिन्दी ब्लॉगरी के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1 जनवरी 2013 से अगला ब्लॉग पुरस्कार आयोजन प्रारम्भ होगा जो उक्त तिथि को सम्पन्न होगा। आप सबसे इस बारे में राय निमंत्रित है। आप मुझे मेल कर सकते हैं/ सकती हैं। ‘क्रेज़ी से क्रेज़ी आइडिया’ को भी बताने से न चूकें। इस बार की तरह ही विश्वास रखें कि गोपनीयता बनी रहेगी। इस बार अपनी तरह के ही कुछ सनकी व्यक्तियों को भी आयोजक मंडल में जोड़ना चाहूँगा। यह भी विचारणीय होगा कि पुरस्कार क्या हों, कैसे दिये जायँ और आयोजकों के ब्लॉग भी किस तरह से आयोजन में सम्मिलित किये जायँ कि उनके रहते हुये भी वस्तुनिष्ठता और पारदर्शिता बनी रहें?
अपनी बात:
यह आयोजन नितांत व्यक्तिगत आयोजन था। दुहरा रहा हूँ – नितांत व्यक्तिगत आयोजन, उसी तरह जैसे ब्लॉग लेख होता है – व्यक्तिगत पर सब के लिये खुला।
यह स्थिति ही इस आयोजन की शक्ति थी और सीमा भी। सतही तौर पर देखें तो ऐसे आयोजनों की कोई आवश्यकता नहीं लगती और सब कुछ फिस्स से हँस देने लायक मूर्खता लगती है। अरे भाई बहिनी! लोग अपना अपना कह सुन रहे हैं, खुश हो रहे हैं, दुखी हो रहे हैं; उन्हें वैसे ही रहने दो न! लेकिन मामला क्या वाकई इतना सरल है? मनुष्य ने अपने अस्तित्त्व से जुड़े किस पक्ष को सरल रहने दिया है?
जब शब्द और विचार खुल कर, छप कर सामने आ जाते हैं तो वे मूर्तन को आकर्षित करते ही हैं। शिव या अशिव दोनों तरह के हाथ उन्हें लपक सकते हैं, उन्हें मंच पर तमाशे के लिये या यज्ञ के लिये ला सकते हैं। यह आयोजन शिवपक्ष में किया गया। भविष्य कोई नहीं जानता कब पेजर हो जाय और कब मोबाइल! और यह भी कि कब कोई आइडिया 'पैड' हो जाय!
मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ हर वर्ष ‘प्रशंसा माह’ के आयोजन होते हैं, आभार ज्ञापन आयोजन भी होते हैं। सब लोग काम करते हैं, वेतन पाते हैं, तन ले कर झुके आते हैं, तन लिये तन कर साँझ को घर जाते हैं; क्या आवश्यकता है ऐसे आयोजनों की?
महत्ता तब समझ में आती है जब मेल में आप को यह पता चलता है कि जिस बात को साधारण सी समझ आप भूल चुके थे उसने आप के साथी को कितना द्रवित किया, उसके जीवन में कितना ‘प्लस’ किया? लिखते हुये वह कितना प्रसन्न हुआ होगा!
तब और अच्छा लगता है जब वह आ कर बताता है और सरेआम कहता है। पढ़ते हुये, सुनते हुये और देखते हुये आप आँखों की नमी नहीं रोक पाते। अच्छाइयाँ ऐसे अनुष्ठान माँगती हैं, बुराइयों के अभिचार तो चलते ही रहते हैं। उन्हें न रोक पायें तो क्यों न कुछ छोटा सा ,सच्चा सा कर दें!
हिन्दी ब्लॉगरी की यह वास्तविकता है कि अधिकांश को ब्लॉग लेखक ही पढ़ते हैं। इतने छोटे से संसार में भी उन्मुक्त शिवनृत्य नहीं है तो कुछ भारी गड़बड़ है। पिछले आलेखों में बिखरे कारणों के अतिरिक्त यह आयोजन गड़बड़ ठंड को ऊष्मा दे द्रवित करने के लिये भी था और इसके लिये भी कि आत्मालोचन किया जा सके – कम से कम मैं तो यही चाहता हूँ।
एक बहुत ही सुन्दर सी अंग्रेजी फिल्म है – A Beautiful Mind. विलक्षण प्रतिभा के धनी लेकिन सीजोफ्रेनिया रोग से ग्रसित एक गणितज्ञ के जीवन पर यह फिल्म आधारित है।
जिस विश्वविद्यालय में गणितज्ञ प्रोफेसर है, वहाँ peer recognition यानि साथियों द्वारा प्रशंसा की एक परिपाटी है। वहाँ के कॉफी हाउस या कैंटीन में जब लोग जुटे खा पी रहे होते हैं तो कोई एक खड़ा होता है और जिसे प्रशंसित करना होता है उसके आगे अपनी पेन रख देता है।... प्रोफेसर जिसे रोग के कारण ऐसे जन दिखते हैं जो वास्तव में होते ही नहीं, एक तरह से स्वीकारा जा चुका है और वह उन आभासी जनों को देखते हुये भी उन पर ध्यान देना बन्द कर चुका होता है।
वह साहस कर उस दिन कैंटीन में आता है जब नोबेल पुरस्कार समिति से एक व्यक्ति यह जाँचने के लिये आया होता है कि जिसे पुरस्कार देना है वह प्रोफेसर कहीं पागल तो नहीं? आखिर नोबेल के लेबल की बात है। कैंटीन में बैठा प्रोफेसर स्वीकारता है कि वह क्रेज़ी है, उसे रोग है, वह दवाइयों के बल चल रहा है और उसे अब भी वे लोग दिखते हैं जो हैं ही नहीं!
ठीक उसी समय किसी टेबल से कोई एक उठ खड़ा होता है और अपनी पेन प्रोफेसर के सामने रखता है – Professor Nash!... Its good to have you here John! और फिर तो एक एक कर जैसे पेन सामने रखने की झड़ी लग जाती है।
आगंतुक अचम्भित है और प्रोफेसर! आप स्वयं देख लें -
...एक बहुत बड़ा हाल है ब्लॉगजगत। सब अपने अपने में रमे। ब्लॉग और ब्लॉगर या पाठक के विभेद को रखते हुये भी उसे भुला कर (और कोई राह नहीं थी), मैंने केवल आवाज़ दी कि जिसे पसन्द करते हो उसे कहो तो, उसके आगे अपनी पेन तो रखो! और लोग अलग अलग मेजों पर पहुँचते गये, प्रशंसितों के नाम अपने आप जुड़ते गये, मैंने कुछ नहीं किया, नाम तक नहीं सुझाया।
...अनेक अनदेखे रह गये। कुमाउँनी चेली, बेचैन आत्मा, सत्यार्थ मित्र, संजय व्यास, मन का पाखी, सुदर्शन, वाणी गीत, अवधी कै अरघान, शिल्पकार के मुख से, महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर, दशमलव, रेत के महल, सिंहावलोकन, छम्मकछल्लो कहिस, शब्दों का सफर, मैं घुमंतू, पुरातत्त्ववेत्ता, मल्हार, जय हिन्दी ... जाने कितने। अनेक। इनमें वे भी हैं जिन्हें टिप्पणी करना छोड़ देने के बाद भी, आज भी मैं ई मेल से अपनी प्रतिक्रियायें भेजता रहता हूँ।
...यह उनकी नहीं, मेरी सीमा थी, मेरी पहुँच की सीमा थी लेकिन अब मुझे उन तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता!
मैं अपनी पेन उन सबके सामने रखता हूँ – आप का यहाँ होना शुभ है।
सीमायें:
लिखते हुये अपने दो आचार्यों की स्मृति हो आई है।
डा. प्रसाद के सामने जब मैं अपनी थीसिस का ड्राफ्ट ले कर गया तो मेरे निष्कर्षों को देख उन्हों ने सबसे पहले कहा – Bold, too bold for a theorist. ग्रिड फ्लोर सिस्टम पर मैंने काम किया था जो कि कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग और गणितीय मॉडलिंग पर आधारित था। उस युग में मेन फ्रेम का यूनिक्स आधारित वह टाटा एलेक्सी कम्प्यूटर किसी भारतीय संस्थान में लगा दूसरा सबसे तेज कम्प्यूटर था। मुझे किलो के किलो कागजी प्रिंटों के परिणामों पर पूरा भरोसा था। लैब में तो मैं झाँकने तक नहीं गया था कि अनुप्रयोगात्मक अड़चनें आयें।
इसलिये अपने निष्कर्षों में मैं बोल्ड था, बहुत बोल्ड। डा. प्रसाद ने मुझे अपने संकलन से जो दिखाया उससे मेरी सारी बोल्डनेस हवा हो गई! मैं ऊँचा इसलिये देख पा रहा था कि ऊँचे कदों के कन्धों पर खड़ा था जब कि चश्मा न लगने के बावजूद मेरी प्राकृतिक सी नज़र असल में धुँधली थी...
...फेसबुक, गुगल प्लस, ब्लॉग, ई मेल, चैट आदि तक ही मेरी पहुँच है और उनमें भी स्त्रियों तक तो बहुत ही कम है। तो मैं अपने निष्कर्षों में बोल्ड नहीं हो सकता। विनम्रता मेरे गुरुओं की सीख है। उनसे मुझे पूरी सहमति है।...
... अपने में मस्त रहने वाले एक थे डा. स्वामी ठीक कोमल कवि सुमित्रानन्दन पंत की तरह दिखते। अपनी दोनों बेटियों को अंगुली पकड़ाये झूमते जब आइसक्रीम खिलाने ले जाते तो साँझ पर ममत्त्व की ठंडी सी लेप लग जाती। हम लोग अपने माँ बाप को याद करने लगते। वह सिस्टम एनलिसिस पढ़ाते। सबको कंफ्यूज कर देते और मुझे बहुत समझ में आते।
एक बार उन्हों ने डाटाबेस के महत्त्व के बारे में बताया। उन्हों ने ऐसा कुछ कहा - सच जैसा कुछ होता ही नहीं! आप असल में जो देखते हो, मस्तिष्क उसका विश्लेषण कर चोर रास्ते ढूँढ़ लेता है, दौडा देता है रस्ते पर कि अंत में सच है जब कि वहाँ वैसा कुछ नहीं होता। अजीब है कि संसार ऐसे ही चलता है।
(ऐसी बातों के दौरान वे पूरे संसार को सिस्टम मान कुछेक सौ वैरिएबल्स की मदद से हुये एक कागजी अध्ययन की बात भी बताते जिसके अनुसार पर्यावरण पर तत्काल सुधारू कदम न उठाने पर संसार 2020 तक तहस नहस होना था और कदम उठाने पर 2020 तो बचने वाला था लेकिन 2040 में सम्पूर्ण विनाश होना था। मैं सुनता और मन ही मन कहता – सेत्ताराम! सेत्ताराम!!)
डाटाबेस की महिमा यहाँ भी लागू है और सर्वत्र भी।
(टाइम पत्रिका के सर्वे में जाने कितनों ने कम्प्यूटर बदल बदल, ब्राउजर बदल बदल, कनेक्शन बदल बदल एक वोट को हजार वोट किये। मेरे यहाँ तो ऐसा नहीं हुआ, जाने उनका सच है या मेरा? डाटाबेस तो वाकई उनका बहुत बड़ा है।)
(मत प्रक्रिया के दौरान पाठकों ने जो कारण बताये वे अपने आप में एक बहुत ही गहन विश्लेषण की माँग करते हैं। उनके बारे में विस्तार से फिर कभी लिखूँगा। अभी तो यही लिखूँगा कि जारी, आलसी जारी है।)
जनप्रियता की चोटियों पर पहुँचे सभी के लिये ढेरों शुभकामनायें।
उन्हीं की जुबानी कहूँ तो शुभकामनाओं में दायित्त्वों को और भारी करने का भाव अंतर्निहित है।











