पिछ्ले भाग से जारी...
पगड़ी सँभाल जट्टा पगड़ी सँभाल ओय!
पगड़ी सँभाल तेरा लुट न जाय माल ओय!
पितृसमाज में पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। जलवायु की अतियाँ यहाँ की वास्तविकता हैं; गर्मी, सर्दी या बरसात हर मौसम में ढका सिर सुविधाजनक रहा। कामकाजी स्त्रियाँ तक पगड़ी बाँधती थीं तो कुलीन घरों की स्त्रियों में भी वेश सौन्दर्य के एक रूप में पगड़ी प्रचलित रही। धीरे धीरे मनुष्य की कल्पना शक्ति ने जोर पकड़ा। पगड़ी के विन्यास, रंग और बाँधने के ढंग ने समाज के वर्गों को विशिष्ट पहचान दी और सिर पर पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक हो गई तो पगड़ी उतार कर किसी के पाँवों पर रख देना परम विनय और समर्पण का प्रतीक। खाली सिर रहना असभ्यता और असामाजिक समझा जाने लगा। अंग्रेजों के दौर में भी पगड़ी पर्याप्त प्रचलित रही। पाश्चात्य संस्कृति और बाकी संसार से जुड़ाव का प्रभाव पड़ा। धीरे धीरे हैट विलुप्त हुई और पगड़ी का प्रयोग भी बहुत सीमित हो गया लेकिन मुहावरे, बोली बाली, साहित्य, गीत आदि में पगड़ी प्रतिष्ठा प्रतीक के रूप में अब भी अक्षुण्ण है। उद्धृत गीत दासता के विरुद्ध पंजाबी विद्रोह की वाणी भी है और चेतावनी भी कि घर लुटा जा रहा है!
मैं यहाँ पगड़ी की बात कर रहा हूँ तो बहुत ही संवेदनशील मुद्दे पर बात कर रहा हूँ। मेरी बात को बहुत आसानी से खाप पंचायतों, पिछ्ड़े दकियानूसी हिंसक समाज या मजहब की मानसिकता से जोड़ा जा सकता है। आजकल तथाकथित बौद्धिक बहसों में राजनीतिक रूप से सही होने और वैचारिक सामान्यीकरण का जो बोलबाला है, उसमें ऐसा करना बहुत आसान है। हम बला के आलसी जन हैं जो न तो गहरे उतरना चाहते हैं और न सतह पर बने बनाये ट्रैंकों से अलग तैरना चाहते हैं। मुझे कुछ अलग ही बीमारी है जिसके कारण द्वैध को सहना कठिन हो जाता है और उसे कह पाना आसान जिसे मैं सह नहीं पाता। पहले ही बता दूँ कि स्त्री के अविवाहित रहने, अविवाहित या एकल मातृत्त्व और अपने यौन निर्णय स्वयं लेने आदि ऐसे मुद्दे हैं जहाँ मैं स्वयं को उसके पक्ष में पाता हूँ लेकिन प्रकृति के विधान के प्रति आँख नहीं मूँद पाता।
हम संक्रमण के दौर में हैं। संक्रमण के दोनों अर्थ लें – ‘परिवर्तन की ओर’ और ‘रोगग्रस्त’। हर गतिशील समाज सदा से ऐसा रहा है लेकिन आज के दौर की तेजी पहले नहीं रही। पितृसमाज की उन तमाम बेहूदगियों और उस हिंसा के विरुद्ध आज स्त्री खड़ी है जिन्हों ने हजारो वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी आत्मा और शरीर दोनों को कुचला और उभरने नहीं दिया। उभारों से डरा हुआ समाज एक ओर तो उन्हें ले तमाम विकृतियों के शास्त्र गढ़ता रहा तो दूसरी ओर प्रकृति के विरुद्ध ही मोर्चे पर डटा रहा। ऐसे समाज में आज अपनी पैठ बनाती स्त्री कहीं उसी की तरह प्रतिक्रियावादी तो नहीं हो रही? कहीं वह पीढ़ियों के अत्याचारों का हवाला दे निकम्मी और सुविधाजीवी तो नहीं हो रही? युगों के अपराधबोध का बोझ सँभालता पुरुषतंत्र कहीं वहाँ भी तो ढीला नहीं हो रहा जहाँ पकड़ और दृढ़ होनी चाहिये?
इन प्रश्नों में ही खतरे हैं – तुम स्त्री उत्थान से भयभीत हो! तुम होते कौन हो उनके बारे में निर्णय लेने वाले? बढ़ती पुरुष उच्छृंखलता तुम्हें असहज क्यों नहीं करती?
ये खतरे और ये प्रतिप्रश्न सामान्यीकरण के ज्वलंत उदाहरण हैं। पूछने वाले प्राकृतिक व्यवस्था को भूल जाते हैं। स्त्री को मातृत्त्व विशिष्ट बनाता है। वह विवाहित हो पुरुष के घर आती है। वह आगे की पीढ़ी का वहन करती है। मातृत्त्व के वरदान ने ही यौन शुचिता को उसके लिये विशिष्ट बना बेड़ियों में जकड़ने की राह दिखाई। कतिपय प्रतिक्रियावादी आन्दोलनों ने इस वास्तविकता को पहचाना और झुँझलाहट में गर्भाशय निकलवा देने तक की वकालत कर डाली। मुझे लगता है कि मातृत्त्व की वास्तविकता और उसे अतिरिक्त मान एवं सुरक्षा देने में ही उस समस्या का हल छिपा है जो आज सबको विचलित करती है लेकिन सब मुँह बन्द किये रहते हैं।
जेनेटिक रूप से पुरुष अपने वंश के अधिकाधिक प्रसार के लिये निगमित है तो स्त्री चयन के लिये कि वह उसे चुने जो स्वस्थ संतति दे सके और उसे सुरक्षा दे सके। परिणामत: पुरुष उच्छृंखल और आक्रामक होता है जब कि स्त्री संकोची और सेलेक्टिव। हर महीने सृजन को तैयार होना नौ महीने के गर्भधारण से जुड़ कर सबसे विकसित जीव मानव की समस्याओं को जटिल बनाता है। विकास के साथ ही समाज अस्तित्त्व में आया और जटिलता और उलझाऊ हो गई।
स्त्री की आक्रामक पुरुष से सुरक्षा की और एक सुव्यवस्था की आवश्यकता ने तमाम अच्छाइयों के साथ तमाम विकृतियों को भी जन्म दिया। मैं उन पर न जाकर आज पर केन्द्रित होऊँगा। परिवार संस्था आज भी सचाई है और साथ ही बहुसंख्य की यह सचाई भी कि स्त्री को घर से बाहर संस्कारी पुरुष ही सुरक्षा प्रदान करते हैं। क्या पुरुष पुरुष हैं? मैं उच्छृंखल आक्रामकों की बात नहीं कर रहा, मैं संस्कारी प्रतिरोधी पुरुषों की बात कर रहा हूँ। उत्तर है – बहुत बहुत कम।
क्या स्त्री स्त्री है? मैं सिमटी संकोची की बात नहीं कर रहा, मैं कदम से कदम मिलाती स्त्री की बात कर रहा हूँ जो अपने को बचाना जानती है और जिसे अपनी मातृत्त्व की विशिष्टता का भान है। उत्तर है – बहुत बहुत कम।
हमने सब कुछ रामभरोसे छोड़ दिया है। हम चुप रहते हैं। हमारी जुबान बाहर तो सटक ही जाती है, घर के भीतर भी उन पर चर्चा नहीं करती जिन पर होनी चाहिये। हमसे संस्कारिता को आगे बढ़ाने की आशा करना व्यर्थ है। बाहर के अतिबली आक्रमणों से संतानों को बचा पाना हमारे वश में नहीं। हम उस समय तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक कि रोना न पड़े...
...बात उस दिन से एकाध दिन पहले की है जब मैंने इसका पहला भाग लिखा था। उस दिन कार्यालय से समय पर मुक्त हो गया था और सामान्य समय से पहले ही घर आ गया। बच्चे घर के आगे खेल रहे थे। श्रीमती जी और उनकी सहेली की कुर्सियाँ खाली थीं जिसका अर्थ यह था कि वे पास के पण में गई थीं। माली आया तो मैंने उसे उस पार्क के किनारे के रास्ते पर सफाई पर लगा दिया (पार्क का क्षेत्रफल लगभग 10000 वर्ग मीटर है और जिसमें तैनात माली कभी नहीं आये। यकीनन वे किन्हीं साहबान के यहाँ भृत्य कर्म का निर्वाह कर रहे होंगे। इस पार्क की देखभाल हमें ही करनी होती है)।
नौंवी से लेकर दसवीं तक की कक्षाओं में पढ़ने वाली कॉलोनी की चार लड़कियाँ पार्क के चक्कर लगा रही थीं। खेलने वाले बच्चों में भी इसी आयु वर्ग की तीन और लड़कियाँ थीं। बाइकों की उच्छृंखल सी आवाजें सुनाई दे रही थीं। एलर्जी के पुन: आक्रमण का पूरा अन्देशा था लेकिन कुछ भाँप कर मैं वहीं टहलने लगा और वे दिखे। दो बाइकों पर सवार चार लड़के - आयु वर्ग इंटर में पढ़ने वाले बच्चों जितना। लम्बे गलियारे के बीच में मैं खड़ा था कि कोने पर टहलती लड़कियाँ दिखीं। बाइक पर पीछे बैठे दो लड़कों ने वह हरकतें कीं जिन्हें मॉलेस्टेशन कहा जायेगा। माली को पुकार मैं दौड़ने को हुआ कि लड़कियों की प्रतिक्रिया देख थम गया। उन्हों ने न पुकार लगाई और न भागने की कोशिश की। उत्सुकता वश इनकार सनकार के जो आकर्षित करने वाले भाव होते हैं, उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी। दबी जुबान ऐसी शिकायतें पहले भी मिली थीं। एक बार पहले हुये ट्रीटमेंट के बाद सब कुछ सुधर गया था लेकिन यह तो नया और अलग ही मामला था!...
अब की लड़कियाँ स्वयं...
मैं दुविधा में पड़ कर रुक गया। लड़कियों और लड़कों ने मुझे देख लिया। लड़कियाँ संयमित हो गईं और लड़के और उच्छृंखल। बाइकों पर तमाम कलाबाजियाँ दिखाते मेरी बगल से गुजरे। एक बाइक को मैंने पहचान लिया – वही थे जिन्हें कॉलोनी में घुसते ही मैंने कार से रोका था। उनकी सड़क पर हरकतें ही ऐसी थीं। लड़कियाँ पास आईं तो उन्हों ने नमस्ते की। उनसे सीधे कुछ न पूछ दो से मैंने उनके पिताओं के बारे में पूछा। यह बताते हुये कि वे घर पर नहीं हैं, उनके चेहरे उड़ गये। स्पष्ट था कि उन सबने मेरा देखना जान लिया था। बाइक वालों ने भिन्न भिन्न रूट ले पार्क और स्कूल के पाँच छ: और चक्कर लगाये। उच्छृंखलता वैसी ही थी। मैं अभी भी स्तब्ध जैसी स्थिति में था लेकिन एक बाइक का नम्बर पढ़ लिया – 7876। दूसरे सात की बनावट थोड़ी अलग सी थी और मेरे मन में चमक हुई – 786। साथ ही सब कुछ स्पष्ट होता चला गया। तो यह है लव ज़िहाद की प्राइमरी!
दो लड़कियाँ कुछ अधिक ही स्मार्ट निकली। थोड़ी ही देर में अपनी माँ के साथ मेरी ओर आईं। मैंने उन्हें बस नमस्ते किया, कुछ नहीं कहा। वे ऐसे ही चलती चली गईं और मैं हैरान कि आई किस लिये थीं?
श्रीमती जी लौट आई थीं। मैंने उनसे पूछा तो वह और उनकी सहेली दोनों फूट पड़ीं, उन लोगों ने मेरे देखे से अधिक ही देखा था – आज हमलोग भी सोच रहे थे कि लड़कियों की माताओं से शिकायत करें लेकिन पता नहीं किस अर्थ में लें, लड़कियों का मामला। छोड़िये, आप को क्या?
मैंने प्रश्न दाग दिया – आप लोगों की भी लड़कियाँ हैं। कल उनके साथ ...
मामला संवेदनशील था। मेरी तमाम कोशिशों और समझावन के बाद भी लोग खाली समय बाहर निकलने के बजाय घरों में घुसे रहना ही पसन्द करते हैं। स्त्रियों को किटी पार्टी के लिये समय है लेकिन पार्क में बैठने या बाहर घूमने के लिये नहीं। पुरुषों का यह हाल है कि कुछ तो महीनों नहीं दिखते। डायबिटीज के मरीज टहलने स्टेडियम जायेंगे लेकिन पार्क में नहीं क्यों कि ‘कम्पनी नहीं मिलती’।
आधे घंटे मैं दुविधा में रहा लेकिन लड़कियों की आयु की सोच श्रीमती जी की तमाम बरजनों के बाद भी लड़कियों के पिता को फोन करना ही उचित समझा। वह उस समय ऑफिस में थे। मैंने कुछ नहीं बताया, बस यही कहा कि मिलते हुये जाइयेगा। उनके आने तक का समय एक यातना से गुजरने जैसा बीता – कैसे बताऊँगा? जाने कैसे प्रतिक्रिया करेंगे? भड़क सकते हैं। अभद्रता कर सकते हैं। मैं परले दर्जे का मूर्ख हूँ, कौन पड़ता है आजकल ऐसे चक्करों में? दूसरों के फट्टे में तो अब गाँव में भी लोग पैर नहीं लगाते, यहाँ कौन सगे बैठे हैं? ... आदि आदि। अंतत: मैं यह सोच कर निश्चिंत हो गया कि बहुत ही धीरे धीरे सलीके से उन्हें बताऊँगा और वह चाहे जो करें, मैं प्रतिक्रिया न कर चुप रह जाऊँगा।
वह आये, मेरी बात सुन चौंके, स्तब्ध हुये और फिर खुले – आभास तो था लेकिन मामला इतना आगे बढ़ चुका है, पता नहीं था। श्रीमती जी कॉलेज से देर से आती हैं और मैं ऑफिस से देर से। हमलोग समय नहीं दे पाते।
प्रकट में मैंने हाथ जोड़ा कि घर पर कुछ न कहियेगा। मामले को जेंट्स तक ही सीमित रखिये। एकाध दिन पहले आ कर बिना घर बताये स्वयं भी देख सुन लीजिये, हो सकता है कि मुझे भ्रम हुआ हो। अगर गड़बड़ है तो शनिवार या रविवार को हमलोग ऐक्शन लेंगे। सब ठीक हो जायेगा। लौंडे लफाड़ी हैं। जहाँ एकाध हाथ पड़ा और पुलिस की धमकी दी गई, सब लापता हो जायेंगे लेकिन आप दोनों जन बच्चियों से बात कीजिये। यही सही आयु है।
उन्हों ने चाय पी। कई बार आभार व्यक्त किया। यह भी कहा कि कभी भी मेरे बच्चों के बारे में कुछ भी गड़बड़ देखें या सुनें तो बेझिझक बताइये, मैं बुरा नहीं मानूँगा।
उनकी कार को जाते देख मेरे मन में आह सी उभरी – बेटियों का बाप!
घंटे भर बाद तक इस आशंका में रहा कि उनके घर टंटा होगा और वे लोग मेरे घर झगड़ा करने आयेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह सोचते हुये कि आगे कैसे निपटना है, मैंने एक पुस्तक उठा लिया। (जारी)