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सोमवार, 15 अगस्त 2011

बहुत हुआ...मार पटक के

हर अदमी परेसान ह, हर अदमी त्रस्त ह
मार पटक के जे कहे पन्द्रह अगस्त ह।
आज स्वतंत्रता दिवस है। मुझे स्वयं को या किसी को बधाई देने का मन नहीं कर रहा। कल से ही चकाचक बनारसी की काशिका में रची उपर्युक्त पंक्तियाँ मस्तिष्क में घन मार रही हैं। इसे निराशा कहें, कुंठा कहें या चाहे जो कहें, वस्तुत: मैं निराश हूँ और जबरन दाँत चियारते किसी को शुभकामना सन्देश देना कष्टदायी लग रहा है। स्वतंत्र माने ‘अपना तंत्र’ – स्वाधीन जिसका कि पराधीन के उलट अर्थ ‘अपने अधीन’ होता है, इसके पासंग नहीं आता। 64 वर्ष हो गये हमें पराधीनता से मुक्त हुये और हम ‘स्वतंत्रता’ को लेकर कोई बहानेबाजी अब नहीं कर सकते। अर्थ यह कि जो भी स्थिति है, हम उसके लिये स्वयं उत्तरदायी हैं। सुराज तो छोड़ दें, स्वराज की स्थिति भी है?
(पाँचवी में पढ़ता था जब इस अवसर पर पहली बार स्टेज पर पिताजी द्वारा तैयार किया अंग्रेजी भाषण पढ़ा था। उसका अंत कुछ इस तरह का था – We, the children, shall be future units of the union which is India. In our strength will be strength of the nation and we shall strive for it. उस समय नहीं पता था कि संघ (union) और गणराज्य (republic) में क्या अंतर होता है? बस रटने के बाद उनकी समझावन से यह लगा था कि it स्वयं और देश दोनों की शक्ति के लिये प्रयुक्त हुआ था और 3-4 मिनट लम्बे भाषण के इसी अंतिम अंश पर मैं लड़खड़ाया था। आज लगता है कि हमारी पूरी पीढ़ी ही लड़खड़ा गई है)।
मुख पर कालिख पोते निर्लज्ज भंडों की टोलियाँ हमारे मुँह पर थूक रही हैं और हम हैं कि पोंछे कि न पोंछें, यही सोच रहे हैं। वे कह रही हैं कि उन कलमुहों के काले कारनामों पर अंकुश लगाने की बात तक करने वालों को मनुष्य नहीं निष्पाप देवदूत होना होगा। अण्णा हों या रामदेव, उनके चरित्रहनन में लगे चमचों और उनके मूक समर्थक सत्ताधीशों को न अपने किये पर लाज है और न इस चुनौती की परवाह कि ज़रा अपने दामन को भी तो देख कर बोलें। अण्णा और रामदेव तो फिर भी कुछ हैसियत रखते हैं, ज़रा सोचिये अगर कोई आम आदमी भ्रष्टाचार के प्रश्न उठाता तो ये क्या करते? तुमने हाउस टैक्स का मूल्यांकन ठीक से नहीं कराया, तुमने तीन साल पहले बिजली के मीटर में गड़बड़ी की थी ... आदि आदि जाने कितने ही घेरे घेर कर ये उसे चन्द घंटों में ही पस्त कर देते!
फिर भी हम उनके बेहूदे तर्कों को सुन रहे हैं और अब लोग कहने भी लगे हैं कि इसमें इन दोनों का स्वार्थ है – एक को एन जी ओ को बचाना है तो दूसरे को फ्रॉड से अर्जित सम्पत्ति साम्राज्य की चिंता है। जब तक इन लोगों ने मुहिम नहीं छेड़ी थी तब तक ये ठीक थे, अंगुली उठाते ही इन पर हाथ पड़ने लगे। कैसा ‘स्व-तंत्र’ है यह जो हर व्यक्ति को भ्रष्ट होने की पूरी स्वतंत्रता देता है ताकि बाद में वह बड़े घोटालों पर कुछ कहने लायक भी न रहे?
मालिकों ने जनता को पालतू कुत्तों जैसा बना दिया है। मतदान के रूप में लोकतंत्र का जो व्यवहार पक्ष सामने है वह अपने आप में इतना अधूरा और दोषयुक्त है कि उससे किसी ‘लगातार सार्थक परिवर्तन’ की प्रक्रिया के प्रारम्भ होने और उसके सतत जारी रहने की कोई आशा नहीं की जा सकती। सत्ता का नहीं, भ्रष्टाचार का विकेन्द्रीकरण हुआ है। सुनियोजित भ्रष्ट तंत्र की पैठ गाँवों तक हो चुकी है और आम आदमी की हालत वही है जो एक भद्दी कहावत में बयाँ होती है – मुँह में पान और _ड़ में बाँस माने मुँह भी लाल और _ड़ भी। लाली लाली के फर्क की और दर्द की मीमांसा आप करते रहिये और उधर लूट तंत्र चलता रहे।
कुछ लोग कहते हैं कि यह तो जनता का ही शासन है और जनता भ्रष्ट है। यह एक आदर्शवादी कथन है जो नमक में दाल पर आँख मूँदता है और दाल में नमक पर नाक भौं सिकोड़ता है – अरे कम है, अरे अधिक है। ये ठीक नहीं है। यह कथन सुनने में बड़ा लुभावना लगता है जिसकी तार्किक परिणति वही होती है कि हमारे ऊपर अंगुली भी उठाने के लिये तुम्हें आदर्शों का आदर्श सुपरमैन होना होगा (होने के बाद की तो तब देखेंगे, अभी तो तुम्हारा दामन ही दागदार है!)
एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे मध्यवर्ग का सुरक्षात्मक आक्रमण मानता है ताकि उसके सुविधाजीवी स्वभाव और जीवनशैली पर कोई आँच न आये। एक वर्ग ऐसा भी है जिसे यह सब नाटक जंगलों में फल फूल रही ‘क्रांतिकारिता(?)’ के विरुद्ध सेफ्टी वाल्व जैसा लगता है माने कि अण्णा या रामदेव जैसे लोग सफल हो गये तो हो गई क्रांति की ऐसी तैसी! जितने दिमाग उतने तर्क, करने धरने को कुछ नहीं और सबकी _ड़ लाल (मुँह में क्रांति और पान की लाली तो है ही)।
इन सब बुद्धिभोजियों के पास कोई विकल्प नहीं लेकिन कोई कुछ करेगा तो दंड अवश्य पेलेंगे। पिछ्ले 64 वर्षों में इन सब ने बस व्यर्थ की बहसें की हैं और जब भी कोई अलग सी बयार बही हैं, पहली उबासी भी इन्हीं लोगों ने ली है।
ऐसे जन जाने अनजाने सत्ताधीशों के पैदल बन जाते हैं और उनकी चालों के आगे आगे ये चलते हैं। परिवर्तन की किसी भी चाल को ये लोग पाखंड या निहित स्वार्थ का खेल बताते हैं। यह सब कहते वे अपने ही उन तर्कों को भूल जाते हैं जिनके अनुसार पाखंड और स्वार्थ के खेल अधिक दिन नहीं चल पाते। भैया! अब तक आप खेलते खाते रहे (और खेलते खाते जा रहे हो), ज़रा उन्हें भी तो अवसर दो। लोकतंत्र है, इतना तो समझो।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलनों का विरोध करने वालों या उसके घटकों पर प्रहार करने वाले निठल्ले बुद्धिभोजियों के लिये रोटी, कपड़ा और मकान की पूर्ति की चिंता में व्यस्त मैं, एक मध्यवर्गी, यही कहूँगा।
हाँ, हम एक साफ सुथरा वातावरण और समाज चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हम जो टैक्स जमा करते हैं, उसका यहीं सदुपयोग हो न कि वह घूम घाम कर विदेशी बैंक खातों में पहुँचे। हो सकता है कि हमने छोटी टैक्स चोरियाँ की हों, उनका हिसाब तुम जब चाहे कर सकते हो लेकिन हमें तुम्हारी वे मोटी चोरियाँ एकदम बर्दाश्त नहीं हैं जिनका कि न कोई हिसाब था और न है, जो बस बेहिसाब हैं। हम पाखंडी हैं लेकिन हमसे अब बर्दाश्त नहीं होता। हम ऐसे ही हैं और वह शक्ति हैं जिसकी तुम उपेक्षा नहीं कर सकते। तुम्हें लफ्फाजी और खुरपेंची चालों को छोड़ कर कुछ न कुछ ठोस और सार्थक करना ही होगा। सँभल जाओ, बहुत हुआ (अब आपातकाल की न सोचने लग जाना!)

रविवार, 15 अगस्त 2010

गंगा सलाम तुझ पर जमना सलाम तुझ पर

प्रेमपत्र जारी है। 
प्रात:काल है और इस महान पुरातन देश के जीवन में आए एक महत्त्वपूर्ण दिन की वर्षगाँठ का उत्सव चल रहा है। दिन भर चलेगा। उठा हूँ और पाया हूँ कि घाव हरे हो गए हैं। उदासी के साथ अपनी पुरानी डायरी पलटते हुए इस रचना से दीदार हुआ। पाकिस्तानी कवि रईस अमरोहवी कितनी सान्द्रता से भारत भू को याद करते हैं! सम्भवत: अमरोहा से माइग्रेट किए होंगे।
तब से गंगा यमुना में बहुत पानी बह चुका है। लेकिन कुछ ऐसा है इन पंक्तियों में, जो थम कर सोचने को बाध्य करता है। आस की लीक दिखाता है। आज कल तो मैं भूत में ही जी रहा हूँ, आज के दिन यही सही। (उर्दू दाँ लोग त्रुटियों को बताने की कृपा करेंगे। यह कविता 'कादम्बिनी' से बहुत पहले उतारी गई थी।)

अये खित्तये जमीलो रऊना, सलाम तुझ पर
गम गुश्ता रौनकों की दुनिया, सलाम तुझ पर।
अये वादिये हिमालय, सदहा सलाम तुझ पर
गंगा सलाम तुझ पर, जमना सलाम तुझ पर।
जज्बाते खास ले जा, अहसासे आम ले जा
ओ हिन्द जाने वाले, मेरा सलाम ले जा।
हिन्द की बहारों, तुमको सलाम पहुँचे 
बिछड़े हुए नजारों, तुमको सलाम पहुँचे 
भारत के चाँद तारों, तुमको सलाम पहुँचे।
ये नामचे मोहब्बत यारों के नाम ले जा
ओ हिन्द जाने वाले मेरा सलाम ले जा। 

इन पंक्तियों को उतारते किसी की एक पंक्ति याद आई है - अंत में बच जाएगा प्रेम ही।
उगते हुए सूरज को मैंने हाथ जोड़ नमन किया है।
बहती हुई हवा से कहा है - आज के दिन सिन्धु तक सन्देश पहुँचा आओ।
"किसी ने तुम्हें सलाम भेजा है।"
तुम्हारी सरजमीं की पाक क़ामयाबी और तरक्की के लिए जाने किससे दुआ माँगी है।
फलो फूलो। तुम्हारी तरक्की में गंगा यमुना की भी तरक्की है।
गंगा यमुना की तरक्की में  तुम्हारी भी तरक्की है।
जाने मज़हबी उन्माद में भूले तुम्हारे बाशिन्दे इसे कब समझेंगे?