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गुरुवार, 14 जून 2018

संस्कृत सौन्‍दर्य - 1

बोल कर संस्कृत पढ़ने से जिह्वा, मुख एवं स्वर तंत्र का व्यायाम भी होता है। किसी एक ही मन्‍त्र के पाठ या जप का यह परोक्ष लाभ है। पुरुष सूक्त के प्रथम मन्‍त्र को देखें, अथर्वण सहस्रबाहु के स्थान पर ऋग्वैदिक सहस्रशीर्षा।
स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् । स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वात्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम् ॥ य, र, ल, व, श, ष, स, ह, क्ष, अक्षमाला का अंतिम य वर्ग समस्त ऊष्म संघर्षी ध्वनियों के साथ उपस्थित है। पहले शब्द में ही र एवं ह के सम्पुट के साथ तीनों ध्वनियाँ - स, श, ष उपस्थित हैं, सम्पूर्ण ऊष्म परास। हममें से कितने इसका शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं? स+ह+स्+र+श+ई+र्+ष+आ - सहस्रशीर्षा। ई कुण्डलिनी स्वरूपा मानी जाती है, आ अर्थात अन्त में स्वाहा! स्वाहा की गढ़न भी देखें - ऊष्म ध्वनियों का संयोजन है।

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

विजिटिंग कार्ड, संस्कृत शिक्षा एवं ईर, बीर, फत्ते और हम

vजकल एक नया ट्रेंड देख रहा हूँ। बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रतिनिधि अपने विजिटिंग कार्ड ऐसे प्रस्तुत करने लगे हैं जैसे कोई राजदूत किसी महामहिम को अपना परिचयपत्र सौंप रहा हो।
वे बहुत आदर के साथ दोनों हाथों में विजिटिंग कार्ड को पकड़ते हैं जैसे गुरु महराज के सामने किसी शुभ कार्य का प्रथम निमंत्रण हो। थोड़ा झुकते हैं - कोई तीनेक अंश। चेहरे पर संतुलित, संयत मधु मुस्कान ले आते हैं, कोई कोई उस तरह थोड़ा हँस भी देते हैं जैसा आप टीटीई के सामने बर्थ के लिये अनुरोध करते हुये करते हैं लेकिन वे ध्यान रखते हैं कि केनाइन दाँत न दिखें! वैसी ही स्थिति में वे आप के हाथ में विजिटिंग कार्ड पकड़ाते हैं। उन्हें लगे न लगे, आप को लगता है कि पुरी धाम का प्रसाद मिल रहा है!

ऐसा करते हुये वे विनम्रता की प्रतिमूर्ति होते हैं और उनकी खाल तक मुलायम हो जाती है। ऐसे अवसरों पर मुझे प्रभामंडल (aura) का ध्यान आने लगता है। बहुत बार व्यक्ति कितना भी सुगढ़ ढंग से क्यों न पेश आ रहा हो, मुझे भीतर कहीं लग जाता है कि आदमी ठीक नहीं है। आज तक मेरा ऐसा लगना ग़लत साबित नहीं हुआ है। समस्या यह है कि ऐसा हर बार नहीं होता। सम्भवत: जो जन उस प्रकार के दुष्ट हैं, जिस प्रकार का मैं स्वयं हूँ; उनका प्रभामंडल मुझे विकर्षित नहीं करता। विज्ञान के 'समान आवेशों या चुम्बकीय ध्रुवों में विकर्षण' वाले नियम के अनुसार ऐसा नहीं होना चाहिये, लेकिन ऐसा होता है। वो कहते हैं  न - स वर्गे परमाप्रीति:।

मैं जाते समय उनके व्यक्तित्त्व की तुलना आये हुये व्यक्तित्त्व से करता हूँ तो चकित हो जाता हूँ - मनुष्यता कृत्रिमता की जननी है। हम लगभग हर पल नकली व्यवहार कर रहे होते हैं। सभ्य होने के लिये यह आवश्यक है और मार्केटिंग का मोल (सॉरी, मूल) मंत्र भी।
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न्दन और सरे में एक विद्यालय की शाखायें हैं जिनमें संस्कृत पढ़ाई जाती है। पिताजी के दिये संस्कार ही हैं कि संस्कृत के प्रति मैं आकृष्ट रहा जब कि हमलोग ब्राह्मण नहीं हैं। सुयोग से कार्यालय में मेरे एक वरिष्ठ हैं जो मित्रवत रहते हैं - *** जी। सप्ताह में दो तीन बार तो हो ही जाता है कि वे किसी सन्दर्भ में कोई संस्कृत सुभाषित बोल जाते हैं और हम दोनों प्रसन्न मन चर्चा कर लेते हैं। ***जी भी ब्राह्मण नहीं हैं। किसी विपणन संस्था में ऐसे संयोग हो सकते हैं, वे भी आज के युग में! मुझे विचित्र लगता है।

तो लन्दन के उस विद्यालय का वेब साइट है - www.stjamesschools.co.uk । आध्यात्मिकता को आवश्यक मानने वाला यह विद्यालय संस्कृत को नर्सरी से लेकर +2 स्तर तक पढ़ाता है। विद्यालय के प्रतिनिधि सूत्र ये हैं:

“I believe that the influence of Sanskrit literature will penetrate not less deeply than did the revival of Greek literature in the 15th century.”  - Schopenhauer



“Let there be spiritual courses right from primary school.”  - H P Kanoria


 स्कूल और भी बहुत कुछ बताता है:
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पढ़ो बच्चों! यह है देवनागरी लिपि।
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खेल खेल में ऐसे पढ़ाई जाती है संस्कृत!
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प्रश्नपत्र का एक नमूना:
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कुछ नमूने बच्चों की कॉपियों से:
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संस्कृतलीन छात्र
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 देखा! तनिक कठिन नहीं है।  
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र अब अंत में ईर, बीर, फत्ते और हम!
इस गाने के 'हम' जैसे हैं हम- हमें ईर, बीर और फत्ते जैसे मित्र मिल ही जाते हैं। संसार ऐसा विविध और समायोजी है कि मिसफिट ही सही हम जैसे भी कहीं न कहीं फिट हो ही जाते हैं! :)    

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(आशा है कि इस पोस्ट में विवाद लायक कुछ नहीं निकल पायेगा और मुझे यह नहीं दुहराना होगा:
 The gods must be crazy Winking smile)