बुधवार, 11 जुलाई 2012

देवता नाराज़ नहीं पगला गये हैं ...

वाराणसी।

2012-07-11-942 

कल दिन भर जो हुआ उसके बारे में फेसबुक पर यह लिखा:

writing stories is only that easy as understanding modern Hindi poetry...gud night, it was such a long tense and futile day crawling in dark cave, when the light was visible the day was over..shit!

पिछ्ले लेख के बाद असहमतियाँ अपनी हद से आगे बढ़ interpretations और निरूपण विस्तार की अनजानी राहें पकड़ चुकी हैं, मुझे लग रहा था कि देवता नाराज़ हैं लेकिन आज सुबह ताज़ गेटवे के सूट में सुबह सुबह एक फिल्म देखने को मिली - The Gods Must be Crazy. उसके बाद यह स्टेटस मुझे परफेक्ट लगा:

Boys! अभी अभी The Gods Must be Crazy देखनी खत्म की है। देवता सचमुच में पगला गये हैं। पिछ्ले दिनों में ऐसा बहुत बार हुआ है कि मैंने जो कहा है उसे कुछ और ही समझा गया है। :) फिल्म वाकई देखने लायक है - हल्के फुल्के हास्य से भरी। कुछ नमूने :
"I married 7 times, so I know how to marry but I do not know how to live with them." :)
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"I wish to tell her..yes I will say ..see I am normally a normal person but when I'm with a lady, due to strange psychological Freudian phenomenon my brain locks and strange things happen.... Will it happen when I say so?"
"No .... but surely some big complex words will happen." :)
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ये जो दूसरा वाला है, मेरे ऊपर एकदम ठीक बैठता है। ;)
तो मेरे मित्रों! मेरी बातों में निहितार्थ न ढूँढ़ो, मैं ऐसा ही हूँ - strangely normal. By the way, yesterday I enjoyed ladies company :) वे भी हमारी तरह ही होती हैं - वैसे ही झूठ बोलती हैं, उनका भी वैसे ही ब्रेन लॉक होता है ...

वाराणसी के दो स्थान - रज़िया मस्ज़िद जो कि विश्वनाथ का मूल स्थान थी और धरहरा मस्ज़िद जो कि बिन्दु माधव का मूल स्थान थी, इन पर जाने की योजना योजना ही रह गयी। अच्छा ही हुआ वरना इस देश का सेकुलर ढाँचा खतरे में पड़ सकता था ;) देवता तो वैसे ही पगलाये हुये हैं।

कुछ चित्र होटल के कमरे से बाहर और भीतर भी। भीतर का तो आलम वही है कि बहुत सी चीजों का स्पर्श भी नहीं किया है। इतने बड़े सड़े लिविंग रूम, बेड रूम, दु द्दु गो टी वी या बड्डे टॉयलेट की क्या जरूरत ,जब रात को सोना भर है और प्रात को उठ कर फिर से वही दिन दुपहरिया साँझ रात की सुरंगों में रेंगना है?

अभिषेक ओझा या विवेक रस्तोगी शायद बता पायें। :)   

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(Disclaimer – इस पोस्ट के कोई साम्प्रदायिक, सेकुलर, स्त्रीवादी, दलित विमर्शी, वामपंथी, संघी, धार्मिक, मजहबी, ऑफिसियल, अनऑफिसियल, गँवई, भावमारू, भावखानी आदि आदि निहितार्थ नहीं है। यह एक फुल्ली फालतू बकबक है जिसे सीरियसली वही लेंगे जो  normally abnormal होते होंगे।)

 

सोमवार, 9 जुलाई 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 10 : ज़िहादी इस्लाम पर विजय का स्मारक

भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7, 8 और 9 से आगे...
... अपने जन्म के कुछ ही वर्षों के भीतर फारस सहित भारत पर ज़िहादी आक्रमण करने वाला इस्लाम 500 वर्षों से भी अधिक पुराना हो चला है किन्तु उसमें सहिष्णुता के चिह्न लेश भर नहीं हैं। भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिये एक ओर असि अत्याचार है तो दूसरी ओर आक्रान्ता ग़ोरी के साथ आये छ्द्म सहिष्णु सूफी मत का। पश्चिम से लेकर पूरब तक इस्लाम अपनी तेग की चमक दिखा चुका है। पश्चिमी तट का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मन्दिर अब तक दो बार ध्वस्त किया जा चुका है।
... एक और लौटता आक्रान्ता मुहम्मद ग़ोरी अजमेर मार्ग के भव्य मन्दिर को नहीं सह पाता। आदेश देता है कि साठ घंटों के भीतर मन्दिर को मिसमार कर मस्ज़िद तामीर की जाय जहाँ मैं नमाज़ अदा कर सकूँ। भारत के भूपटल पर अपने भीतर मन्दिर की विविध सुन्दरताओं को सहेजे एक और कुरूप मस्जिद जन्म लेती है - अढ़ाई दिन का झोपड़ा। इससे उल्लसित हो कर उसके साथ आया सूफी ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती इसी समय 1192 में अजमेर पहुँच कर हिन्दुओं को मूर्ख बना धर्मांतरित करने का अभियान प्रारम्भ करता है...
... 27 हिन्दू और जैन मन्दिरों को तोड़ कर उन्हीं पत्थरों से इस्लाम की क़ुव्वत कही जाने वाली निहायत ही बेहूदी क़ुव्वत अल-इस्लाम मस्ज़िद तामीर की जा चुकी है। प्रांगण में ज्योतिष निरीक्षण के लिये उपयोग में लाया जाने वाला विष्णु स्तम्भ क़ुतुब मिनार के नाम से जाना जाने लगा है जिसकी भित्तियों पर अरबी नक्काशियाँ उकेर दी गई हैं...
इस प्रकार जाने कितने मन्दिर ध्वस्त कर दिये गये हैं। दिल्ली सल्तनत की गद्दी पर बैठा क़ुतुबुद्दीन ऐबक  काशी के मूल भव्य विश्वनाथ मन्दिर को ध्वस्त करा चुका है और उसके ऊपर रज़िया सुल्तान अपने मात्र चार-पाँच वर्षों के शासन काल में ही मस्ज़िद तामीर कराना नहीं भूली है – काफिरों के लिये मक्का समान पवित्र काशी की धरती पर इस्लाम का परचम! अल्ला हो अकबर!! अल्लाह सर्वश्रेष्ठ है...
ऐसे में रज़िया की मृत्यु के पश्चात बिहार का प्रशासक तुगन खान अब स्वतंत्र शासक है। इस्लामी परचम लहराने की ज़िहादी ललक नया नया राज पाये शासक में उठती है और अछूते रह गये वर्तमान बंगलादेश(पूर्वी बंगाल) यानि तब के गौड़ प्रदेश की ओर इस्लामी तलवारें उठ जाती हैं। कायर शासक लक्ष्मणसेन बिना संघर्ष ही समर्पण कर देता है और उसके पश्चात राजधानी लखनावती सहित पूरे पूर्वी बंगाल में इस्लामी लूट, हत्या, बलात्कार और बलात मतपरिवर्तन का जो भयानक अभियान चलता है, उसकी परिणति आज के पूर्वी बंगाल में इस्लामी बहुसंख्या में दिखती है।
तुगन खान अति उत्साहित है। उसकी दृष्टि प्राचीन सनातन धर्म की पवित्र उत्कृष्ट कलाओं वाली भूमि उत्कल यानि उड़ीसा पर पड़ती है जहाँ पुरी के पुरुषोत्तम का प्रभाव है, एक ओर लहराते समुद्र और दूसरी ओर हिंसक वन्य पशुओं से भरे विशाल घने वन प्रांतर के कारण यह प्रदेश अभी तक ज़िहादी इस्लाम से अछूता है -  यदि मैं यहाँ अल्लाह की अजान लगवा सकूँ तो गाजी के रूप में मेरा भी वैसे ही नाम हो जाय जैसे काशी के विश्वनाथ को ध्वस्त करने और वहाँ मस्ज़िद तामीर करने पर कुतुबुद्दीन  और रज़िया रानी का हुआ है!
किन्तु न तो उसे ज्ञात है, न जनसामान्य को कि मगध बिहार भले सूर्योपासक मग ब्राह्मणों की संतान चाणक्य की कूटनीति को भूल चुका हो, उत्कल की राजधानी जाजपुर से शासन करते राजा नरसिंहदेव प्रथम के महल में जो राजमाता जीवित है उसे पुरनियों की स्मृति है।
तुगन खान को नहीं ज्ञात है कि कभी कलिंग ने दिग्विजयी अशोक के दाँत खट्टे कर दिये थे! उसे नहीं पता कि कभी यहाँ के राजा खारवेल ने यवनों को धूल चाटने को बाध्य किया था!
उसे नहीं पता है कि जिस पुरी के पुरुषोत्तम को वह पददलित करना चाहता है उसमें केवल शैव मत के ज्योतिर्लिंग की शक्ति नहीं, शाक्त और वैष्णव मतों की शक्ति भी सम्मिलित है। उसके प्रांगण में त्रिशूल है, सुदर्शन है और रक्तपिपासु भवानी का खप्पर भी है। उस पुरुषोत्तम ने बौद्ध और जैन मतों की करुणा से अपने को संस्कारित कर समूची जनता को भक्त बना रखा है।
उसे नहीं पता है कि अलग विलग से रहने के कारण उड़िया जन में प्रतिरोध की शक्ति कहीं अधिक ही है...   
... ईस्वी संवत 1248।
राजा नरसिंहदेव के पास तुगन खान के दुस्साहस भरे प्रस्ताव आये:
  • पवित्र पुरी को दीन के हाथ सौंप दो जिससे कि उसे इस्लामी केन्द्र बनाया जा सके।
  • सारे शस्त्रास्त्र इस्लामी आक्रमणकारियों को समर्पित करो।
  • पुरी के पुरुषोत्तम (वर्तमान जगन्नाथ) मन्दिर के समक्ष प्रांगण में वहाँ की समस्त जनता सामूहिक रूप से इस्लाम कुबूल करे या जजिया देना स्वीकार करे।
  • समर्पण के स्मारक रूप में मन्दिर को हमारे हवाले करो जिससे कि उसे ढहा कर वहाँ अल्लाह की शान में मस्ज़िद तामीर की जा सके।
अंत:पुर के मन्त्र और राजसभा की सम्मति के पश्चात राजा ने छलयुद्ध का निर्णय लिया। तुगन खान को सारे प्रस्ताव मान लेने का सन्देश दे दिया गया। राजा ने कहलाया कि वह इस्लाम की शक्ति से भयभीत है और गौड़ के राजा लक्ष्मणसेन की भाँति ही समर्पण करना चाहता है।
समर्पण हेतु दिन और समय नियत कर दिये गये। स्थान निश्चित हुआ, पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का प्रांगण। राजा के आदेश से पुरी को श्रद्धालुओं से खाली करा उन्हें गुप्त स्थान पर भेज दिया गया। पूरे मन्दिर में सशस्त्र योद्धा छिप कर सन्नद्ध हो गये और बाहर नगर की सँकरी वीथियों में सुदृढ़ गुप्त व्यूहजाल लगा दिया गया।
बिना युद्ध के ही विजय का हर्ष मनाती इस्लामी सेना वीथियों में बिखरती हुई मन्दिर के प्रांगण में पहुँची और सहसा ही नियत समय पर मन्दिर के घंटे घड़ियाल बज उठे। यह आक्रमण का संकेत था। उड़िया योद्धा ज़िहादियों पर टूट पड़े। ज़िहादी जैसे चूहेदानी में फँस गये। पूरे दिन और रात युद्ध होता रहा जिसमें सनातनी विजयी हुये और कुछ इस्लामी ही जीवित बचे।
पहली बार इस्लामियों को उन्हीं की भाषा में उत्तर मिला था। पहली बार उनके विरुद्ध किसी हिन्दू राजा ने धर्म आधारित युद्ध के स्थान पर कूटनीति आधारित छलयुद्ध लड़ा था। अब तक छल छ्द्म से जीतते आ रहे इस्लामियों को यह पाठ सदियों तक भयभीत रखने वाला था। 
प्राय: तीन सदियों के बाद काला पहाड़ पुन: दुस्साहस कर सका और उसे भी बहुत कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। परिणामत: आज भी उड़ीसा प्रांत में इस्लामी जनसंख्या अत्यल्प है।
एक ही समय के दो राजाओं की भिन्न नीतियों के इतने भिन्न परिणाम यह दर्शाते हैं कि यदि नेतृत्त्व ठीक हो तो जनता बहुत कुछ कर सकती है और किताबी मजहबों के विपरीत समस्त मानवीय मूल्यों और मत मतांतरों को समाहित किया हुआ सनातन धर्म अफीम नहीं, जनजीवन की प्राणशक्ति है। पुरी के पुरुषोत्तम का समन्वयी जगन्नाथ रूप उसका प्रमाण है। अंतिम किताब और अंतिम दूत में विश्वास करने वाले ज़िहादी जाहिल तो ऐसे समन्वय की कल्पना भी नहीं कर सकते!
राजा नरसिंहदेव ने विजय के स्मारक स्वरूप प्राचीन अर्कक्षेत्र और मग ब्राह्मणों की मित्रभूमि पर वहीं विराट सूर्यमन्दिर के निर्माण का निर्णय लिया जहाँ कभी पहली बार सकलदीपियों ने चमत्कार दिखाया था। ज्योतिर्विद्या के साधक राजा ने मन्दिर स्थान को नाम दिया – कोणार्क अर्थात शिल्प और ज्यामिती का निचोड़ सूर्य विरंचि नारायण। कोणार्क किसी अभिशाप से सम्बन्धित नहीं है, यह तो पुरखों के साहसी कल्याणमय आशीर्वाद का पुण्य स्मारक है।
राजा ने निर्माण की अनूठी योजना  प्रस्तावित करने के लिये सदाशिव समन्तराय महापात्र और बीसू महराना को बुलावा भेजा जो आगे क्रमश: स्थापत्यकार सूत्रधार और प्रधान शिल्पी नियुक्त हुये।
(जारी) 
(अगले अंक में कोणार्क सूर्यमन्दिर का स्थापत्य और योजना)
_______________________
सन्दर्भ:
(1) History of Orissa, Vol I, R D Banerji, Prabasi Press, Calcutta

(2) http://www.indiadivine.org/content/topic/1492252-great-hindu-heroes-who-saved-india/
(3) Konark Sun Temple - The Gigantic Chariot of the Sun God, CE&CR AUGUST 2012
(4) http://asi.nic.in/asi_monu_whs_konark_intro.asp
(5) http://research.omicsgroup.org/index.php/Tughral_Tughan_Khan
(6) 
http://research.omicsgroup.org/index.php/Narasimhadeva_I

शनिवार, 7 जुलाई 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 9 : अपरा इतिहास

भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7 और 8 से आगे...
four-sunsपरा इतिहास से अब हम अपरा इतिहास की ओर चलते हैं। नरसिंह से मिलते जुलते रूप में सूर्य का उकेरण मेक्सिको की एज़्टेक सभ्यता में भी मिलता है। अपनी तीखी ताप के कारण वहाँ भी सूर्य उग्र रूप में चित्रित है और उसका एक प्रकार सिंह जाति का प्राणी जगुआर है।
इन्द्रद्युम्न का अभिजान दसवीं-ग्यारहवीं सदी के राजा इन्द्ररथ से किया गया है। उड़ीसा में यह समय आदिम सूर्यपूजा, बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त, वैष्णव आदि के समन्वय का था। इन्द्ररथ से पहले के सैलोद्भव राजाओं ने माधव आराधना को प्रसार दिया था और नियाली माधव, कंटिलो आदि की स्थापना उनके समय में हुई थी।
सैलोद्भवों के पश्चात आये शाक्त भौम शासकों ने पुरी में नीलमाधव की आराधना बाधित कर शक्ति पूजा केन्द्रों की स्थापना की। पुरी में देवी के विमला रूप की पूजा होने लगी, ककटपुर में मंगला की और भुबनेश्वर में भुवनेश्वरी की।  उल्लेखनीय है कि पुरी का वर्तमान मन्दिर एक बहुत ही प्राचीन मन्दिर के ध्वंस पर बना हुआ है और उसके घेरे में शक्तिरूपा देवी का वह लघु मन्दिर भी है, 'महाप्रसाद' होने के लिये जहाँ जगन्नाथ का प्रसाद चढ़ाया जाना अनिवार्य है। कहते हैं कि शक्ति ने जगन्नाथ को स्थापित होने की अनुमति इसी पूर्व अभिसंधि के साथ दी थी। स्पष्ट है कि सूर्य पूजा के अतिरिक्त शक्ति पूजा भी जगन्नाथ से पहले के हैं और राजा इन्द्ररथ द्वारा दारुब्रह्म यानि लकड़ी के शाबर देव नरसिंह की पुरुषोत्तम रूप में स्थापना इसी समय के निकट हुई। 
शाक्तों के समान तंत्र की एक परम्परा में नरसिंह को पुरुषोत्तम कहा गया है जो अपनी संगिनी विमला के साथ विराजते हैं। उल्लेखनीय है कि उड़िया शैव परम्परा में नरसिंह शिव को व्यक्त करते हैं। वैष्णव नरसिंह और शैव नरसिंह का यह समन्वय राजसत्ता के संरक्षण के कारण सूर्य पूजा और ब्रह्मा की परम्परा पर भारी पड़ा। भौम शासकों के समय ही तंत्र से समानता के कारण महायानी बौद्धों के त्रिरत्नों की उपासना प्रारम्भ हुई। भौम शासकों के पश्चात आये सोमवंशियों ने आराधना पद्धति को पुनर्संस्कारित किया और पुरी के वर्तमान  मन्दिर का निर्माण प्रसार किया।
जिस समय गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम ने कोणार्क में सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया उस समय भी पुरुषोत्तम जगन्नाथ के वर्तमान रूप में नहीं आ पाये थे। इसके दो प्रमाण हैं।
सन् 1313 के आसपास के एक दान अभिलेख में पहली बार पुरी के पुरुषोत्तम के लिये 'जगन्नाथ' शब्द का प्रयोग हुआ है जो कि कोणार्क मन्दिर बनने के लगभग 60 वर्ष पश्चात की बात है।
king_worshipping_trinity1दूसरा प्रमाण स्वयं कोणार्क मन्दिर की प्रतिमायें दे देती हैं। इनमें राजा नरसिंहदेव शिवलिंग, पुरुषोत्तम (कालान्तर के जगन्नाथ) और शक्तिस्वरूपा दुर्गा की उपासना करते दर्शाये गये हैं।
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उल्लेखनीय है कि किसी भी प्राचीन स्रोत में बलभद्र और सुभद्रा की चर्चा पुरुषोत्तम के साथ नहीं मिलती है।
कोणार्क सूर्यमन्दिर बनने के समय तक शैव, वैष्णव और शाक्त मतों के समन्वय का एक महत्त्वपूर्ण चरण पूर्ण हो चुका था जिनके क्रमश: तीन प्रतीक भैरवरूप शिव, पुरुषोत्तम और शक्ति पुरी के गर्भगृह में बौद्धों के त्रिरत्न को चुनौती देते विराजमान थे।
ऐसे में छलयुद्ध द्वारा इस्लामी आक्रांता को परास्त कर विजय स्मारक के रूप में राजा नरसिंहदेव ने सूर्यमन्दिर की एक बहुत ही महत्त्वाकांक्षी संकल्पना की, एक तीर से कई आखेट - माँ के श्रद्धा भगवान सूर्य की उपासना को राजकीय प्रश्रय, इस्लाम को पराजित कर अपने सर्वश्रेष्ठ सनातनी शासक होने का प्रतिपादन, पुरी के पुरुषोत्तम के समांतर प्राचीन सूर्य और तंत्र पद्धतियों का समन्वय कर इतिहास में वैकल्पिक व्यवस्था के प्रदाता राजा के रूप में स्थान आदि।
तंत्र मार्ग के मिथुन प्रतीक मन्दिर की भित्तियों पर प्रचुरता और प्रमुखता से अंकित किये जाने थे जिनके लिये वास्तुशास्त्र के विधान की आड़ भी थी। राजा नरसिंहदेव के शिल्पियों ने पुरुषोत्तम से भिन्नता दर्शाने के लिये शिव और शक्ति को क्रमश: लिंग और दुर्गा रूप में उकेरा। तीनों जिस पीठ पर विराजमान दर्शाये गये हैं, वह पुरी मन्दिर के गर्भगृह की पीठ ही है।
मन्दिर का कितने योजनाबद्ध ढंग से निर्माण हुआ था, इसका प्रमाण उन ताड़पत्र अभिलेखों से मिलता है जिनमें समूचा 'प्रोजेक्ट प्लान' वर्णित है। सम्भवत: कोणार्क का मन्दिर भारत का एकमात्र प्राचीन मन्दिर है जिसके सभी वास्तुकारों, शिल्पियों और प्रमुख कार्मिकों  के नाम तक पता हैं! 
सुदृढ़ रूप से स्थापित पुरी की पुरुषोत्तम परम्परा ने इसे बहुत उदारता से नहीं स्वीकार किया। कालांतर में प्राचीन सूर्य के पुरुषोत्तम रूप के स्थान पर वैष्णव परम्परा के कृष्णरूपी जगन्नाथ, भैरव के स्थान पर उड़ीसा में लोकप्रिय देवता बलभद्र और शक्ति के स्थान पर उनकी बहन सुभद्रा स्थापित कर दिये गये। कृष्ण की किसी पत्नी या राधा के स्थान पर बहन सुभद्रा की स्थापना कर अनुज वधू की जेठ से परदा की उड़िया लोक रीति का सम्मान भी किया गया। और तो और सुदर्शन चक्र के रूप में सूर्यरथ के चक्र की स्थापना और सेवामंडल में सूर्यपूजक प्राचीन शाबर जाति का स्थान सुव्यवस्थित और सुनिश्चित कर उन्हें भी अपनी ओर मिला लिया गया।
इस्लाम विजयी राजा नरसिंहदेव, पुरी की पुरातन परम्परा के समांतर उससे भी पुरानी सूर्य शाक्त परम्परा की स्थापना की लड़ाई में पराजित हुये - एक व्यक्ति तो बस अपने जीवन भर ही ध्यान रख सकता है! परवर्ती वंशजों में उतना उत्साह नहीं था।
 ऐसे में जगन्नाथ समर्थकों ने धर्मग्रंथों में ब्राह्मणपुत्री चन्द्रभागा के साथ सूर्यदेवता द्वारा किये दुर्व्यवहार और उसके कारण घटित आत्महत्या का मिथक जोड़ ब्रह्मा की तरह ही सूर्य की परिणति सुनिश्चित कर दी। इस्लामी आक्रमण के पश्चात मूलविग्रह और उपासना आचार हीन उपेक्षित कोणार्क मन्दिर के कई भागों को उखाड़ उखाड़ कर पुरी का मन्दिर समृद्ध किया जाता रहा। यह काम उन्नीसवीं सदी तक अंग्रेजों की दृष्टि पड़ने तक होता रहा। जगन्नाथ की भक्ति में लीन आम जन तो कोणार्क को भूल ही चुके थे - जिस मन्दिर में देवता ही न हों, वहाँ कैसी पूजा?
काला पहाड़ के आक्रमण के कालखण्ड में पुरी के गर्भगृह से भी विग्रह हटा कर छिपा दिये गये थे। बहुत दिनों तक वहाँ भी उपासना खण्डित रही किंतु आपदा टल जाने पर वहाँ की काष्ठ प्रतिमायें पुन: स्थापित कर दी गईं।कोणार्क में ऐसा नहीं हो पाया। अब तो वहाँ के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का अभिजान ही विवादास्पद है। कुछ कहते हैं कि बालू में तोप दी गई प्रतिमा वैसे ही विलुप्त हो गई जैसे कभी नीलमाधव हुये थे, कुछ कहते हैं कि पुरी के प्रांगण में स्थित इन्द्र के मन्दिर में वह प्रतिमा लगी है तो कुछ कहते हैं कि दिल्ली संग्रहालय में रखी गई यह प्रतिमा ही वह प्रतिमा है
(कोणार्क ध्वंस की दीवारों पर बाहर स्थापित सूर्य की तीन प्रतिमाओं से तुलना करें तो साम्यता तो दिखती है किंतु तुलनात्मक रूप से सौष्ठव बहुत ही हीन है और शारीरिक अनुपात भी ठीक नहीं हैं, अत: इस दृढ़कथन का सच होना सम्भव नहीं लगता। तुलना के लिये इस लेख में ही सबसे नीचे दी गई तीन प्रतिमाओं में से एक का चित्र देखें।):
IMG_5241_aw तेरहवीं सदी में पुरी के इस्लामी आक्रांताओं पर विजय के स्मारक स्वरूप सूर्यमन्दिर की स्थापना से लेकर सोलहवीं सदी में इस्लामी आक्रांता काला पहाड़ के उस पर आक्रमण से पूर्व गर्भगृह से विग्रह के हटाये जाने तक के बीच लगभग ढाई सौ वर्षों तक वहाँ उपासना होती रही किंतु नरसिंहदेव के पश्चात न तो राज्य संरक्षण मिला और न ही मन्दिर के रखरखाव के लिये पर्याप्त राजकीय सहायता, जब कि उसी कालखण्ड में पुरी का मन्दिर दिन दूनीरात चौगुनी की गति से समृद्ध एवं व्यवस्थित होता रहा।
यह जानना रोचक होगा कि पुरी की रथयात्रा सूर्य के उस रथयात्रा की प्रतिकृति है जिसका वर्णन वेदों से लेकर प्राचीन अभिलेखों तक में मिलता है। पाँचवी सदी के अभिलेखों में मथुरा और साम्बपुर में इस प्रथा के होने के वर्णन हैं। दक्षिण भारत में भी यह प्रथा प्रचलित थी। यह भी कि आज भी जब पुरी की मूर्तियाँ रथ पर सवार होती हैं तो उनसे पहले नरसिंह भगवान सवार होते हैं। उनके विधिवत स्तुति पूजन के पश्चात ही जगन्नाथ रथारूढ़ होते हैं। कोणार्क मन्दिर तो विशालकाय सूर्यरथ के रूप में बना ही था।
जाने कितनी ही उपासना पद्धतियों का समन्वय कर जगन्नाथ दशावतार से भी ऊपर की कोटि में गिने जाने लगे जिनसे सारे अवतार निकसते थे। अब ऐसे विराट देव के आगे 'विरंचि नारायण' के नाम से जाने जाने वाले कोणार्क के सूर्य देव कहाँ ठहर सकते थे!
विडम्बना ही है कि आस्था केन्द्र पुरी को बचाने के विजय अभियान का स्मारक उसी के अनुयायियों की उपेक्षा एवं तिरस्कार के कारण अंतत: खंडहर में बदल गया। धार के विरुद्ध नाव खेने में असफल होने की सम्भावनायें कुछ अधिक ही अधिक होती हैं। इतिहास, धर्म और राजनीति की वीथियाँ विचित्र भूलभुलइया हैं।
अगली कड़ी में यह बताऊँगा कि इस्लामी हमलावरों का दुस्साहस किस स्तर का था, उनकी दुर्गति कैसे की गई!
surya_western(क्रमश:)

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

किसी युगल ने कर दिया आदिम टोटका :)

लगता है किसी युगल ने कर दिया आदिम टोटका!
आज प्रात: से घन घमंड नभ गरजत घोरा... और बूँदों की झड़ी लगी है।
पंडीजी बहुत प्रसन्न हैं कि उनकी भविस्सबानी सच साबित हुई।
 तो लीजिये पुन: झेलिये कुछ पुरानी सी झड़ियाँ:
(1)  
रिसता आषाढ़ आतप स्वेद ग्रंथियों से, निहारता है अनिल ठिठक भीग चिपके वस्त्रों को। समय ठहरता है आँख सलवटें उभरती हैं, बादल उतरते हैं वदन पर बन आब बेचैन बारिशें हों कैसे जब धरा पर प्रेम विराम? 
किरकिरी कुनकुनी डाह बात, कान छूती दाह सात, बहुत हो चुका सिरफिरी टिटिहरी को कोसना कि लोट धूल धाल करें आदिम टोटके उपाय। समझो कि लिपटना स्वेद भीगी देह का निज देह के अंश से, लजवाता है बादल हवा युग्म को और ठिठकन टूटती है। बह चलता है आर्द्र अनिल क्षमा माँगते मरमर सहलाते धीर तरुओं को, उमस बढ़ती है उफ्फ! हवा चलती है?
लाज भरती है चिपके वस्त्रों में करना क्या दिखावा अंतरंग जो मिला ही हुआ है रीत से? लोग राहत कहते हैं, बिसूरते हैं कि होगा पुन: विलम्ब बादर की गह गह में, बूँदों की झड़ियों में? नहीं जानते कि एक ने तोड़ा है मौसम की पटरी से सुख निषेध का मिलीमीटर!
जो उठती हैं हजारो मील लम्बी चादरें पनीली ढकती पोतती गर्वीले नीले के मुँह कालिख बदरी। आँखें मूँद लेता है वह पलकों में दूरियाँ घटती हैं। निचुड़ जाती है पहली बूँद गिरती धूल धाल पर धप्प से बरसने लगते हैं बादल पसीने पसीने खोल देती है हवा सीना धरा समोने को सृष्टि बीज के कण तत्क्षण!
करो विश्वास कि हर वर्ष वर्षा आरम्भ होता है ऐसे ही, वर्षा आती रहेगी तब तक जब तक रहेंगे किसी एक को याद वही आदिम टोटके उपाय। नहीं आई अब तक तो समझो कि इतने बड़े परिवेश में किसी ने नहीं किया नैसर्गिक वही, उपाय तोड़ने का जुड़ने का, नहीं किया अब तक।
(2) 
घन आये इस रात सुहावन,
मन रे कोई गीत रचो
रीति नहीं अनीति सही,
सावन का संगीत रचो।

क्षिति जल पावक गगन सब रूठे
पवन झँकोरे गाछ गज ठूँठे
देह थकित दाह ज्वर छ्न छ्न,
धावन पग पथ साथ गहो
थोड़े थोड़े पास रहो।

सूखा पड़ा टिटिहरी दुखिया
कोस थकी बेमतलब दुनिया
बच्चे बढ़ते अंडज चिक चिक,
उड़ने को गम्भीर सुरों!
झंझ मृदंग उठान वरो।

करुणा उगलें तिमिर लहरियाँ
आतप तप कुम्हलाई बगियाँ
प्रार्थना के फूल लोप फिर,
अँसुअन सीझी दीठ बचो
सावन का संगीत रचो।

(3) 
गोमती किनारे 
बादर कारे कारे
बरस रहे भीग रहे 
तन और सड़क कन
घहर गगन घन 
धो रहे धूल धन
महक रही माटी.

बही चउआई
सहेज रही गोरी 
केश कारे बहक लहक कपड़े 
कजरारे नयन धुन
गुन चुन छुन छहर
फहर बिखर शहर सरर
चहक उठे पनाले.

बिजली हुई गुल 
पहुँची गगन बीच 
हँसती कड़क नीच
ऊँची उड़ान छूटी जुबान 
जवान जान खुद को 
नाच उठी 
भुनते अनाज सी.
....
....
सब कुछ हो गया
खतम हुआ
खोया रहा साँस रोके
सब कुछ सोच लिया
घर घुस्सी तू आलसी!


(4) 
यौवन
तन धन
सजे
सन सन।

शोर शोख 
बरजोर बार,
बार लेकिन 
कानों में कन कन 
तन धन
बजे घन घन।

आँख डोर 
बहकन
मन पतंग
तड़पन।
उठन शहर भर 
नीक लगत 
हवा पर
विचरण 
लहकन
तन धन 
बिखर छम थम।

लुनाई -
साँवरा बदन
कपोल लाल 
अधपके जामुन 
रस टपकन 
अधर मधुर 
मधु भर भर
कान लोर
लाल 
शरम रम रम 
तन धन
सिमट 
कहर बन शबनम।  

देह 
द्वै कुम्भ काम
दृग विचरें 
सप्तधाम 
कटि कुलीन 
नितम्ब पीन 
उतरे क्षीण
जैसे  
पश्चात मिलन 
पतली पीर 
सिमटन
तन धन 
... 
...
धत्त अकिंचन !

बुधवार, 4 जुलाई 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 8 : परा इतिहास

भाग 12, 3, 4, 5, 6 और 7 से आगे...
यायावर को मिहिर के साथ मन्दिर के पूर्वी द्वार पर छोड़ हम इतिहास की स्वर्णिम वीथियों में प्रवेश करेंगे। यह नहीं पता कि मन्दिर में प्रवेश के पश्चात उनकी बातें कब किस ओर बह चलेंगी इसलिये यह इतिहास गवेषणा अभी करनी आवश्यक है ...  
... पहले की कड़ियों में पर्याप्त संकेत दिये जा चुके हैं कि मिथकों से इतिहास झाँकता है। झाँकते इतिहास से मैंने अब तक इन सम्भावनाओं की बातें की हैं:
(1)  लुप्तप्राय सरस्वती नदी के किनारे कभी फलती फूलती संस्कृति को विश्वामित्र की गायत्री और सूर्यपूजक गुर्जरों के सहयोग से ब्रह्मा ने एक नयी दिशा दी। सूर्य उपासना की यह धारा धीरे धीरे पूर्व दिशा की ओर बढ़ी। साथ ही पहले से स्थापित विष्णु और शिव उपासना पद्धतियों से उसका संघर्ष भी प्रारम्भ हुआ। उल्लेखनीय है कि विष्णु का विकास वेदों के जिस विष्णु देव से हुआ था वह वास्तव में सूर्य ही थे। ब्रह्मा की ध्वजवाहक यह वैकल्पिक उपासना पद्धति वैदिक मूल का ही पुनर्निरूपण थी। पूर्वी तट पर पहुँच कर इन उपासकों ने वहाँ प्राकृतिक रूप से उत्पन्न केवड़े के फूल को अपना प्रिय बनाया। अन्तत: संघर्ष और समन्वय के परिणामस्वरूप ब्रह्मा की उपासना पद्धति शमित हो गई किंतु सूर्य उपासक बचे रह गये।
(2)  पश्चिमी तट पर कृष्ण ने द्वारका पुरी बसाई। साथ ही दूर समुद्र पार देशों से व्यापार हेतु पत्तन का विकास भी किया। किसी व्यापारिक जलपोत में चढ़ कर यमपुरी यानि कि वर्तमान मालागासी (मेडागास्कर) पहुँच गये गुरु के पुत्र को वापस लाने कृष्ण स्वयं वहाँ गये जहाँ उनकी मित्रता पंचजनों और मगदेशी (साकल या शाकलदेश या शकद्वीप - वर्तमान ईरान) ब्राह्मणों से हुई जो सूर्योपासक थे।
जब कृष्ण के पुत्र साम्ब को त्वचा का कोढ़ हो गया तब उसे निरोग करने के लिये कृष्ण ने उन्हीं ब्राह्मणों को बुलावा भेजा। वे अपने साथ मालागासी की वनस्पति वनसरू ले कर आये। उपचार के लिये उन्हें प्राकृतिक रूप में जिस सूर्यकिरण अवशोषी वनस्पति की आवश्यता थी उसकी पहचान मदार या अर्क के रूप में हुई। उन्हें मीठे और खारे पानी का संगम और अपरिचय के एकांत की भी आवश्यकता थी लिहाजा कृष्ण ने उन्हें पूर्वी तट पर अर्कक्षेत्र भेजा जहाँ चन्द्रभागा नदी बहती हुई समुद्र से मिलती थी।
उपचार से साम्ब स्वस्थ हुये। मग ब्राह्मणों का यश और उनकी सूर्य उपासना पद्धति फैलते चले गये। पहले से ही सूर्योपासना की स्मृति जनमानस में होने के कारण उन्हें लाभ भी मिला। वे इस दृढ़ता के साथ स्थापित हुये और फैले कि वर्तमान बिहार का नाम ही उनके प्रभुत्त्व के कारण मगध पड़ गया और पूरे भारत में अनेक सूर्यमन्दिर स्थापित हुये। उल्लेखनीय है कि मौर्यवंश का संस्थापक चाणक्य, उस वंश का उच्छेदक पुष्यमित्र शुंग, कामसूत्र का रचयिता वात्स्यायन, आधुनिक आयुर्वेद का जनक चरक और प्रख्यात ज्योतिर्विद वाराहमिहिर, सभी मग ब्राह्मण थे जिन्हें मूल परम्परा के ब्राह्मणों ने या तो बहुत हेय दृष्टि से देखा या ब्राह्मण माना ही नहीं।
सूर्यपूजक मग ब्राह्मणों और पहले से ही विद्यमान देशी सूर्यपूजकों के सम्मिलन से एक अनूठी सूर्य उपासना पद्धति विकसित हुई जिसके अवशेष आज भी बिहार के पुरोहित विहीन छ्ठ पर्व में दिखते हैं।
साम्ब के कारण ही कोणार्क भी एक स्थापित पत्तन बना और बहुत बाद तक बना रहा। इसका एक  प्रमाण पेरिप्लस द्वारा उसका उल्लेख है।
अब प्रश्न यह उठता है कि जब विष्णु और शिव की उपासना पद्धतियाँ प्रबल थीं, जब कि पुरी में कृष्ण स्वरूप जगन्नाथ स्वयं विद्यमान थे, भुबनेश्वर में लिंगराज शिव विराज रहे थे तो राजा नरसिंह देव को पुन: सूर्यपूजा स्थापित करने के लिये सूर्यमन्दिर बनाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी?
इसका उत्तर यह है कि सूर्यपूजा लुप्त नहीं हुई थी, प्रचलित थी। चन्द्रभागा तट पर साम्ब का लघु सूर्यमन्दिर श्रद्धा का केन्द्र था और राजा पर कुछ नया करने की धुन सवार थी। उनके ऊपर अपनी सूर्यपूजक माँ का भी प्रभाव था। एक और सशक्त कारण था जिसके सूत्र मग ब्राह्मण चाणक्य की कूट युद्धनीति से जुड़ते हैं और जिसे पारम्परिक धर्मबुद्धि ने सर्वथा  हेय माना।
लेकिन उसके पहले एक और मिथकधारा जो कि इतिहास के बहुत निकट है - हमें पुरी के भगवान जगन्नाथ के इतिहास को भी जानना होगा।
भारत में मिलती जुलती उपासना पद्धतियों के हजारो वर्षों तक चलने वाले सम्मिलन से नयी उपासना पद्धतियों के विकसित होने का यह सबसे बड़ा प्रमाण है। 
प्राचीन स्रोतों में जगन्नाथ नाम नहीं है। पुरी को पुरुषोत्तमक्षेत्र कहा गया है। कौन थे यह पुरुषोत्तम?
पुराण कहते हैं कि एक राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में यह संकेत मिला कि पुरी तट पर स्वयं भगवान विष्णु स्थापित हैं जिनके दर्शनमात्र से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। विष्णु नीलमाधव यानि नीलम पत्थर के प्रतिमा रूप में ऐसे गुप्त स्थान पर थे जिसे केवल शाबर कबीला जानता था। शाबर टोने टोटके जानने वाली और वृक्ष पूजक एक प्राचीन वनवासी जाति है जिसे इतिहास में ‘सौर’, ‘सावर’, ‘सबर’ आदि नामों से भी जाना जाता है। माधव शब्द चौंकाता है, साथ ही सौर भी। आज का यह सच भी चौंकाता है कि सकलदीपी ब्राह्मणों को टोने टोटके में सिद्धहस्त माना जाता है।
 मधु कैटभ नाम के दो दैत्यों का वध करने के कारण विष्णु को माधव कहा जाता है। कथा है कि विष्णु की नाभि से कमलासीन ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हुआ जिन्हें सृष्टि रचना का कार्य सौंप विष्णु योगनिद्रा में लीन हो गये। सोते समय उनके कानों की खोट से मधु और कैटभ का जन्म हुआ जिन्हों ने सृष्टि निर्माण की राह ढूँढ़ते तपलीन ब्रह्मा को खूब सताया। बाद में विष्णु ने उनका वध कर ब्रह्मा की राह प्रशस्त की।
पृथ्वी पर का जीवन सूर्य की देन है। दहकती पृथ्वी पहले जलप्लावित हुई फिर धीरे धीरे सृष्टि से युक्त हुई। विष्णुरूपी सूर्य का क्षीरसागर शयन इसी को इंगित करता है। नाभि, कमल, ब्रह्मा और मधु कैटभ द्वय भी किसी अनजान खगोलीय तथ्य के अबूझ संकेत भर हैं।
खगोलीय घटनायें मिथक बनीं। मिथकों से अनेक कथायें जन्मीं। छाया सूर्य की पत्नी हो गयी। उसके साँवलेपन और अद्भुत तेज राशि के साथ भ्रमण करते सूर्य के साम्राज्य नभ की नील रंगत का आभास कराती सूर्य प्रतिमायें धरती पर नीलकृष्ण पत्थरों से बनने लगीं। प्रात:काल गर्भगृह में इन प्रतिमाओं को सूर्यरश्मियाँ प्रकाशित करती थीं।
उल्लेखनीय है कि कुशीनगर जिले की सूर्यप्रतिमा नीलम पत्थर की बनी है तो कोणार्क की तीनों सूर्यप्रतिमायें भी नीलहरिताभ क्लोराइट पत्थर की। अन्य स्थानों पर भी सूर्य की नील प्रतिमायें पाई गई हैं। इन सबके मूल में वही सूर्य उपासक वृक्षपूजक ‘सौर’ यानि शबर जाति के आराध्यश्रेष्ठ नीलमाधव हैं। वैष्णवों का पवित्र श्यामल शालिग्राम भी इसी से जुड़ता है।
राजा इन्द्रद्युम्न के दूत को कबीले के सरदार ने बताया था कि राजा आयेंगे भी तो दर्शन नहीं होंगे क्यों कि ‘यम’ से किये वादे के अनुसार तब तक ‘नीलमाधव’ रेत में विलीन हो जायेंगे। इस बात में कृष्णयुग के यमक्षेत्र की धमक है। राजा जब पहुँचे तो नीलमाधव वस्तुत: रेत में विलीन हो चुके थे।
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राजा को उनके स्थान पर वृक्षस्तम्भ पर उकेरे भयानक देवता से सामना हुआ। शाबरों में यमक्षेत्र से लाये गये वनसरू की स्मृति था वह स्तंभ और साथ ही स्थानीय वृक्षपूजा की परम्परा का पूज्य प्रतीक भी! बड़ी विकराल आँखों वाले भयानक देवता की पहचान राजा ने अपने सनातनी संस्कार से की – नृसिंह या नरसिंह!
पशु और मनुष्य के बीच की, नागर और वानर के बीच की, स्थापित परम्परा और विकल्प के बीच की कड़ी यानि नरसिंह। यही नरसिंह पहला पुरुषोत्तम हुआ।
नरसिंह जो कि विष्णु का अवतार है, विष्णु जो कि सूर्य का विकास है; आश्चर्य नहीं कि कोणार्क में सिंह और सिंहसवार नर की विजयी मूर्तियों की बहुलता है। कोणार्क में सूर्यपूजा की परिपाटी को पुन: गौरवमंच दिलाने की राह में भुबनेश्वर के लिंगराज शिव रोड़े नहीं थे बल्कि आड़े थे एक और सूर्यरूप यानि पुरी के विष्णु जगन्नाथ!
आश्चर्य नहीं कि इन्द्रद्युम्न को वृक्षरूप ईश्वर यानि दारुब्रह्म तक पहुँचाने वाले कोई और नहीं बल्कि ब्रह्मा के पुत्र यानि उनके उत्तराधिकारी नारद थे। क्या चाहते थे नारद? पिता का प्रतिशोध – विष्णु के समांतर एक सर्वथा नये देव की स्थापना? नीलाम्बुज श्यामल विष्णु की नील प्रस्तर प्रतिमा का स्थान लकड़ी के बने काले नरसिंह ने ले लिया।
बड़े का अहम भी बड़ा। कालान्तर में प्रथम पुरुषोत्तम नामधारी राजा नरसिंहदेव के मन में कहीं समय गंगा को उल्टा बहा पुन: नीलप्रस्तर को स्थापित करने की महत्त्वाकांक्षा तो नहीं थी? नीलमाधव नहीं नीलार्क! जिसके लिये उन्हों ने दारु यानि वृक्षतनों पर सवार पत्थरों के अवरोध और बहाव से छेड़छाड़ द्वारा मृतप्राय चन्द्रभागा नदी की बलि ही दे डाली!   
मिथकों की आड़ से इतिहास निकल कर सामने आ गया है। राजा इन्द्रद्युम्न के ऐतिहासिक रूप की पहचान हो चुकी है और नरसिंहदेव तो इतिहासपुरुष हैं ही...
...यायावर मिहिर के साथ व्यस्त है, उन दोनों को व्यस्त रहने दीजिये क्यों कि इतिहास तो खुल कर अब आया है सामने! पुरुषोत्तम के विकास की कहानी का एक पड़ाव तो सूर्यमन्दिर की भित्ति पर भी चित्रित है।
साथ बने रहिये। (जारी)