मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

दाढ़ी और विद्वान

उसने कहा है - दाढ़ी बढ़ाये लोगों से घिन आती है। ऐसे जन गन्दे होते हैं। मैं सोचता हूँ कि उसने ‘लोग’ कहा है, इसलिये यहाँ स्त्री पुरुष विमर्श की गुंजाइश नहीं लेकिन गन्दगी वाले पूर्वग्रह पर है, उसे नहीं पता कि मैं त्वचा के संक्रमण से त्रस्त हूँ। 
दाढ़ी बढ़ा होना किसी को असफल प्रेमी, दार्शनिक, साहित्यकार, लापरवाह, नशेड़ी, परेशान आदि तमाम एक दूसरे से असम्बन्धित श्रेणियों में रखे जाने का एक सशक्त कारण तो बनता ही है। सदियों की रस्सी रगड़ से घिस चुकी जगती पर छलक गया पानी!
दर्पण में चेहरे से रोगी भी लगता हूँ, एक ऐसा व्यक्ति जिसे ढंग की नींद भी न नसीब होती हो हालाँकि आँखें स्वच्छ, साफ टिमटिमा रही हैं। इन सबसे बचने का आसान उपाय है, रेज़र चला देना लेकिन उसके बाद दिनों तक जलन और खुजली सहना ठीक बात नहीं, वैसे ही जैसे इतनी सी बात के लिये डॉक्टर के यहाँ जाना!
एक विकल्प ट्रिम करने का भी है लेकिन यह निहायत ही उबाऊ और कलाहीन काम है। केश काले हैं जब कि दाढ़ी खिचड़ी। जब भी बढ़ जाती है, चुगली सी करती है – यह मानुष पेट में दाढ़ी लेकर पैदा हुआ था या बहुत अच्छा खिजाब लगाता है, जब कि दोनों ही बातें सच नहीं हैं। पहली तो अलंकारिक बात है लेकिन दूसरी से आयु का पक्ष भी दूर से जुड़ जाता है हालाँकि नये नवेलों के केश पकना कोई नई बात नहीं। मैं उम्रदराज दिखना चाहता हूँ ताकि आयु के साथ आने वाला सम्मान और यह भ्रम कि व्यक्ति अधिक समझदार, शांत और गम्भीर होगा, मेरे अपने हो जायँ। समस्या यह है कि सम्मान और भ्रम दूसरों के यहाँ घटित हों तब बात बने, अपनी सोच में रह गये तो कल्पना जगत की खुशफहमियों जैसे ही होंगे। यह जानने के लिये जिस बारीक प्रेक्षण की आवश्यकता है वह मुझमें नहीं, समझ तो खैर है ही नहीं!  
जीवन का तिहाई जहाँ बीतता है, उस ऑफिस में दाढ़ी रहे या न रहे साथियों की सोच या मेरी इमेज पर कोई अंतर नहीं पड़ता। जो निकट हैं वे बस पूछ लेते हैं लेकिन उनका क्या जो बाहरी हैं, विजिटर हैं? निश्चय ही मेरी और मेरे नियोक्ता की छवि इस बेतरतीबी से बिगड़ती होगी। ड्रेस कोड यूँ ही नहीं बनाये जाते। सामूहिक प्रभाव व्यक्ति से बनते हैं। यदि सभी ठीकठाक हैं तो मुझ एक से संस्था की छवि पर कौन सा बुरा प्रभाव पड़ जायेगा? उल्टे मेरी छवि अवश्य खराब होगी – देखो, इस आलसी को! और मैं छवि की परवाह नहीं करता।
तो अब यह सोचना है कि बैठक कक्ष से बाहर अपने कक्ष में आगंतुक के साथ जो ‘नर्व वार’ होता है उसमें दाढ़ी रहने से क्या लाभ हानि हो सकते हैं? यह आगंतुक पर निर्भर करता है, न कि मुझ पर। वह लड़ने के मूड में आया हो सकता है, दाढ़ी देख उजड्ड या खड़ूस टाइप का आदमी समझ मनोवैज्ञानिक रूप से आतंकित हो सकता है। दाढ़ी मेरे पक्ष में है।
वह समस्या समाधान के लिये आया हो सकता है; अगर फोकस्ड व्यक्ति है तो उसे मेरी दाढ़ी से क्या लेना देना? अगर फोकस्ड नहीं है तो गड्ढे में जायें वह और उसकी समस्या! वह यूँ ही टाइमपास के लिये आया हो सकता है। दाढ़ी यहाँ भी सहायक साबित होगी। मैं बहुत आसानी से घूरते हुये दाढ़ी पर हाथ फेरते उसे दफा कर सकता हूँ।

इस ‘चिंतन’ प्रक्रिया के बीच विद्वान आया है। विद्वान यानि विद्यासागर – हमारा रखरखाव ठीकेदार। चूँकि पुकार नाम ‘विद्या’ स्त्रीसूचक था और विद्वान हनुमान भक्त है, इसलिये मेरे पूर्ववर्ती आई आई टियन अधिकारी ने विद्या को ‘विद्वान’ कर दिया। नाम ‘लोकप्रचलित’ हो गया जिसे विद्या ने सहर्ष धारण भी कर लिया।

विद्वान को पिछले पाँच वर्षों से देख रहा हूँ – कभी चिंतित नहीं दिखा। हमेशा हँसता मुस्कुराता रहता है। दाढ़ी बढ़ी भी कभी नहीं देखी। पचास पचहत्तर को सँभालता है और कठिन से कठिन परिस्थिति हो या तनाव चरम पर हो, अपना ‘कूल’ कभी नहीं खोता। ऐसा केवल खोते या महाज्ञानी के साथ ही हो सकता है लेकिन विद्वान तो भक्त है! भक्ति के क्षेत्र में अपनी पैठ नहीं। 
मैं अक्सर कहता हूँ कि व्यक्ति और परिस्थिति प्रबन्धन कोई विद्या के सागर विद्वान से सीखे। हमलोगों को एक दिन भर का सेशन करना चाहिये - विद्वान को गुरू बना कर। विद्वान हँस कर बात उड़ा देता है लेकिन उसके चेहरे पर मेरे प्रति शक दिख जाता है – ऐसी वाहियात बात तुम्हीं कर सकते हो!
विद्वान ने पूछा है – साहब, आप ने दाढ़ी बढ़ा रखी है?
मैंने बिना बोले अपने चेहरे की ओर अंगुली दिखाई है जहाँ यत्र तत्र जलन खुजली वैसे ही है। वह समझ गया है।
उसने तुरंत बात बदल दी है – आप दाढ़ी में भी अच्छे लगते हैं। मेरी अंगुली थम गयी है – ‘भी अच्छे’! हम्म!! एक और प्रबन्धन पाठ।
सच में साहब, आप लेखक लगते हैं, साहित्यकार जैसे।
साहित्यकार! विद्वान, विद्वान!! यह क्या कह रहे हो?- मैं फ्लैट हो गया हूँ, जाने ‘साहित्यकार’ शब्द प्रयोग पर या वैसा लगने पर (आसमान से गिरा भी कहा जा सकता है)।
वह हँसने लगा है – सच में, मैं सच्ची कह रहा हूँ। अगल बगल छिपाई जाती हँसी मुस्कुराहटों को अपनी छ्ठी इन्द्रिय द्वारा अनुभव करते मैंने भी मुस्कुरा दिया है। विद्वान को पता है कि मैं कभी हिन्दी टेबलॉयड में छपता था, उसे पता है कि हिन्दी अधिकारी भी ‘हिन्दी सीखने’ इधर आता है और यह भी कि सामने बैठा खड़ूस एक गीत को लेकर आधा घंटा लेक्चर दे सकता है जिसे सब को गम्भीरता पूर्वक सुनना आवश्यक होता है। उसे फैज़ नहीं पता और मुहब्बत से हनुमान स्वामी का बैर अच्छी तरह से पता है लेकिन उससे क्या? अभी तो सामने वाले को खुश करना है!
‘परचित्तानुरन्जन’ भी प्रबन्धन कला का एक भाग है। दाढ़ी का आश्रय ले विद्वान द्वारा दिया पाठ मैंने मन में बिठा लिया है।
फोन पर एक ज़िद्दी ग्राहक से बात करते मैं यह नहीं भूला हूँ – आप तो समझदार हैं। जब नेट पर यह नम्बर ढूँढ़ सकते हैं तो सही वाला भी पा सकते हैं। ट्राई कीजिये, मिल जायेगा। मंत्री जी आप की कुशलता से अवश्य प्रभावित होंगे।
‘शुद्ध हिन्दी’ के साथ चलती हुई मेरी मुस्कुराहट ‘ग्राहक’ के कानों तक पहुँच गयी है। उसने तीन बार बोला है – थैंक यू, थैंक यू ... धन्यवाद।
दाढ़ी पर हाथ फेरते मैं मुस्कुराया हूँ – विद्वान।                         

रविवार, 9 दिसंबर 2012

हो गई बोहनी!

मझली का परिवार: 
बाप पेंटर, बड़का डरइवर 
[पियक्कड़]
   
महतारी धोवे चुक्कड़।

छोटका बउका

बड़की छुट्टा

छोटकी खेले गुट्टा।

मझली: 
चौदह की उमर। गाढ़ा साँवला रंग।
ऊँच दाँत। नीच माथ। लम्बे केश।
[
कामवालीबनने की टरेनिंग में थी।]
थी इसलिये कि अब है नहीं। 
झुकने वाला काम पसन्द नहीं।

कथा: 
बाप से ज़िद
गुमटी दो आन,
कमायेंगे हम
, खोलेंगे दुकान।  
बाप इहाँ कौन आयेगा
गुटका बीड़ी कीनने

बइठ घर में!
 

दाल जल गई। बटुली लुढ़क गई।
 
आटे में किरासन। तरकारी पर भासन।
 
महतारी पिट गई
, आधे उघारे भग गई।
घर में उपास करुआसन।

एक दिन छोड़
 बड़के ने किया दंगा। 
बउका घुसा नाली में नंगा।
 
आधी रोटी बह गई।
 
बड़की उतान
, छोटकी मरखान। 
बाप की लग गई!
समर्पण। 

गुमटी आ गई।
 
लग गई बीड़ी
,
गुटके की सीढ़ी
,
माचिस का मचान

फोंफी का सामान
,
सिगरेट का लत्ता

लेकिन ... गाहक नपत्ता।

एक दिन बीता
दूजे की दुपहरिया 
मझली और करिया!
न बोहनी न बट्टा

छोटकी खेले गुट्टा।

तो जब सूरज मुस्कान था
दूर रँगा डुबान था
,
पेंटर को सूझी माया

दिमाग दौड़ाया -
 
चल मझली तुम्हें पेंट करा लाऊँ।
 

विश्वास करो मन से।
 
एक दिन की मजूरी,

निकली दन्न से। 
मझली गई पार्लर।
 
केश हुये झालर।
 
उठान की पहचान।
 
नैनों की मुस्कान।
 
जुबान का रस।
 
देह का रामरस।
मझली ने जाना – 
करिया हो कनिया
 
तो भी है धनिया!
 
दुकान सज गई।
मझली बझ गई।
 

स्पीड जाती बाइक,

रुक गई। 
वापस मुड़ गई।
 
सिगरेट एक बिक गई

मझली थोड़ा झुक गई।
 
लहरी मुस्कान,
 
जली तीली दुकान।
 
नजर छिहिल गई।
 

बाप मारे कोहनी
हो गई बोहनी!     

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

हिन्दी ब्लॉगरी का दशकोत्सव : बर्ग वार्ता

हिन्दी ब्लॉगरी का दशकोत्सव : सुमेरु उर्फ मानसिक हलचल के बाद एक लम्बा विराम आ गया। चन्द्रहार आयोजन  के वादे वादे ही रहे और दिसम्बर आ गया जो कि अपनी छठी के लिये जग विख्यात है। 
अपने को आलसी क्यों कहता हूँ, इसे आप समझ ही गये होंगे। कोढ़ में खाज जैसा उछ्ल कूद का रोग - इत्तके भये न उत्तके चाले मूल गँवाय  वाला हिसाब है अपना! 
 बहुत पहले कुछ मित्रों से कहा था कि अपनी पसन्द के रत्नों पर कुछ लिख भेजें।
अभिषेक ओझा ने तत्परता दिखाते हुये स्मार्ट इंडियन अनुराग शर्मा के ब्लॉग बर्ग वार्ता पर लिख भेजा जिसे मैं ऐज यूजुअल और अच्छा करने के चक्कर में दबाये रखा - फालतू का दम्भ। 
  
अब क्यों कि बहुत काम नागा है और वर्षांत निकट है और मुझे स्वयं नहीं पता कि किस ओर बह जाऊँगा; ओझा जी की वार्ता प्रस्तुत है (अपनी वाली फिर कभी!): 
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पता नहीं जो मैं लिखने वाला हूँ उसे समीक्षा कहा जा सकता है या नहीं। क्योंकि शायद ये मेरी अपनी सोच भी नहीं है। हो सकता है बर्ग वार्ता (http://pittpat.blogspot.com) की सबसे अच्छी बातें मैं लिख ही न पाऊँ ! या फिर अगर बर्ग वार्ता की सारी पोस्ट एक बार फिर पढ़ आऊँ तो मैं कुछ और ही लिख दूँ।

 पर मेरी नजर में किसी चीज की खूबसूरती भी इसी बात में होती है कि आप जितनी बार पढ़ें हर बार एक नया नजरिया बने उसके बारे में। मेरी पसंदीदा पुस्तकें वही रही हैं जिन्हें हर बार पढ़ने पर कुछ नया सीखने को मिलता है। साधारण तरीके से कही गयी सीधी सरल बात पर उसे ही दुबारा पढ़ने पर एक नयी परत दिखाई दे जाय ! कुछ ऐसा ही है - बर्ग वार्ता !
इस ब्लॉग पर सब कुछ मिलता है। कविता, हास्य, कहानी, स्वतन्त्रता संग्राम की गाथा, नायकों का चरित्र-चित्रण, संस्मरण, फोटो फीचर, समसामयिक मुद्दे, जानकारी और शोध से भरी पोस्ट्स - सबकुछ । पर ऐसा नहीं कि इस ब्लॉग की कोई थीम नहीं। कोई एजेंडा नहीं। है ! मुझे अनुरागजी के ब्लॉग की थीम लगती है – तथ्यों को सबके सामने रखना। दोमुंहेपन का विरोध।

बर्ग वार्ता को लिखने वाले स्मार्ट भारतीय - अनुराग जी  पिट्सबर्ग  में रहते हैं। एक पोस्ट में उनके बारे में जानने वालों के लिए वो खुद ही जवाब देते हैं - मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला, "मैं एक भारतीय।" । अपने दिल में भारत को बसाये अनुराग जी की अमेरिका-भारत वाली बात पर मुझे उनकी एक और पुरानी पोस्ट भी याद आ रही है जिसमें उनकी मुलाक़ात होनहार ऐन-किट ***। से हुई थी।

 पिट्सबर्ग पर उनकी शृंखला इस्पात नगरी से उनके ब्लॉग की सबसे लंबी शृंखला है। जिसमें वो अपने आस पास की बातों को लिखते रहते हैं। आस पास की छोटी बातों में भी कुछ न कुछ जानकारी और रोचकता होती ही है। अब चाहे वो परशु का आधुनिक अवतार हो, क्वेकर विवाह हो या बॉस्टन के पण्डे हों।

मैं उनकी पोस्ट्स देख कर एक बात का अंदाजा लगा सकता हूँ - जब भी उन्हें किसी ब्लॉग पर कोई ऐसी बात दिखती है जिसके बारे में उन्हें लगता है कि लोगों को इसकी सही जानकारी होनी चाहिए। या कोई भी दुष्प्रचार हो - उस पर वो शोधपरक आलेख लिखते हैं। “मैं एक भारतीय” कहने वाले अनुरागजी के ब्लॉग पर भारतीय पर्वों के साथ अमेरिकी पर्व त्योहारों, खबरों और परम्पराओं की भी भरपूर जानकारी होती है। उनके बात रखने का तरीका मुझे पसंद है। उनकी बातें कभी बिन तर्क और तथ्य के नहीं होती। वैसी ही बात को लेकर ब्लॉगजगत में खींच तान चल रही होती है और यहाँ वही बात शोध, तथ्यों और इस गंभीर तरीके से कुछ इस तरह रखी जाती है कि 400 फोलोवरस होते हुए भी कभी विवाद होते नहीं दिखते। किसी भी मुद्दे पर अनर्गल प्रलाप करने वालों को इस ब्लॉग पर आना चाहिए ये देखने कि अपनी बात कहने का एक तरीका होता है।

420 पोस्ट [J] हो चुके इस ब्लॉग के सारे पोस्ट अभी मैंने स्कैन नहीं किया पर कुछ पोस्ट और उसकी कुछ बातें याद रह जाती हैं। उन्हीं याद रह गयी लाइनों को गूगल कर ये नमूने मैं यहाँ लिख रहा हूँ। इसे ब्लॉग का सम्पूर्ण चित्रण तो नहीं ही कहा जा सकता।
शुरू के दिनों में एक पोस्ट में उनकी लिखी ये लाइन मुझे अब भी याद है  “अलबत्ता शराब व कबाब काफ़ी था। कहने को शबाब भी था मगर मेकअप के नीचे छटपटा सा रहा था ।“

वैसे ही ब्राह्मण की रूह वाली पोस्ट – “उन्होंने बताया कि उनके पाकिस्तान में जब कोई बच्चा मांस खाने से बचता है तो उसे मजाक में बाम्भन की रूह का सताया हुआ कहते हैं।“ http://pittpat.blogspot.com/2008/07/blog-post_7350.html

और ये पंक्तियाँ:
 मुझे सताया मेरी लाश को तो सोने दो ,
गुज़र गया हूँ खुराफात का अब क्या मतलब। 

फरिश्ता-जालिम के गड़बड़झाले को वो कुछ यूं कहते हैं -
कोई हर रोज़ मरता है, शहादत कोई पाता है।
मैं ऐसा हूँ या वैसा हूँ, समझ मुझको न आता है।
फरिश्ता कोई कहता था, कोई जालिम बताता है।

और लोगों के दोमुहेंपन की छोटी-छोटी बातों पर वो कहते हैं-  झूठी हमदर्दी के बहाने, आए दिल को जलाने लोग

बीच-बीच में प्रेम की कविता भी होती है। और वो पूछ लेते हैं -  कभी कहो भी इतना क्यों सताती हो? http://pittpat.blogspot.com/2008/08/blog-post_21.html

जब मेरी एक पोस्ट पर टिप्पणी आई – “ऐसा लगा जैसे अनुराग शर्मा की कोई कहानी पढ़ रहे हैं”  तो मुझे एहसास हुआ कि अनुराग शर्मा की कहानी और उनका कहानी लिखने का तरीका ब्लॉग जगत में कितना प्रसिद्ध है। उनकी एक कहानी पर ज्ञानदत्त पांडेयजी की टिप्पणी : 
अच्छा प्लॉट है मित्र। आपमें इण्डियन "गॉडफादर" लिख पाने की प्रबल सम्भावनायें हैं। उन सम्भावनाओं का दोहन करें! 

उनकी कहानीयों को पढ़ते अक्सर संस्मरण है या कहानीका भ्रम बना रहता है। लंबी कहानियों में सस्पेंस और सारी कहानियों के ऐसे अंत जो कई बार पाठक पर ही निर्णय छोड़ देते हैं।

एक छोटी कहानी का अंत देख कर आइये:
 कह के या कर के? http://pittpat.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html

मुझे सबसे अधिक पसंद हैं उनकी कहानियों के पात्रों के नाम जो याद रह जाते हैं। जैसे कुछ उदाहरण- सैय्यद चाभीरमानी, डंबर प्रसाद, मिल्की सिंह (यानी दूधनाथ सिंह), लित्तू भाई और बी. एल. नास्तिक !

भले और सुसंस्कृत लोगों के बारे में एक पोस्ट में ये मिला - हमारे एक सहकर्मी थे। निहायत ही भले और सुसंस्कृत। कभी किसी ने ऊंची आवाज़ में बोलते नहीं सुना। प्रबंधक थे, कार्यालय की सारी खरीद-फरोख्त उनके द्वारा ही होती थी। कभी भी बेईमानी नहीं की। न ही किसी विक्रेता से भेदभाव किया। सबसे बराबर का कमीशन ही लेते थे। कम-ज़्यादा का सवाल ही नहीं। 

पर्व त्योहारों और परम्पराओं की पोस्ट में भी कुछ न कुछ जानकारी होती है। जैसे दीपावली की एक पोस्ट पर उनका सवाल था - अगर लक्ष्मी का वाहन उल्लू है और दीवाली लक्ष्मी के आह्वान की रात है तो हम इतनी रोशनी की चकाचौंध से क्या उल्लू की आँखें चौंधिया कर लक्ष्मी जी को वापस तो नहीं भेज देते हैं? http://pittpat.blogspot.com/2008/10/blog-post_27.html

ब्लॉग पोस्ट्स की विविधता के कुछ उदाहरण -  चीनी दमन, तिब्बत में हिंसा, आर्थिक मंदी, आतंकवादी घटनाएँ, तानाशाहों की बात, ऐतिहासिक घटनाएँ - तियानंमेन स्कवेर हो या बर्लिन की दीवार ! प्रति टिप्पणी के रूप में किए गए शोध-आधारित लेख हों या हिटलर की आत्मकथा का लोकप्रिय होना या ब्राज़ील में भारत पर आधारित टीवी सीरियल।  बोन्साई हो या पुष्पहार ! 
भगवान परशुराम पर वो लिखते हैं – बुद्ध हैं क्योंकि भगवान परशुराम हैं! http://pittpat.blogspot.com/2010/05/blog-post_15.html

उनकी कुछ यादगार शृंखलाओं/लेखों में  मुझे याद आ रहे हैं - शाकाहार, सपनों पर आधारित शृंखला, देवासुर संग्राम, नायकत्व, मोड़ी लिपि, शहीदों पर लिखी शृंखला, ब्राह्मण कौन और सिंदूर क्यों।
नायकों कि पोस्ट की शुरुआत जहां वो – “कुछ लोगों की महानता छप जाती है, कुछ की छिप जाती है।“ से करते हैं वहीं खलनायकों के नाम लेते समय उनकी सूची देखिये - सहस्रबाहु, हिरण्यकशिपुहिटलर, माओ, लेनिन, स्टालिनसद्दाम हुसैन, मुअम्मर ग़द्दाफ़ी !

ओलंपिक पर हो रहे तमाम बातों के बीच वो अपना मत कुछ इस तरह रखते हैं - एक ऑटो रिक्शा चालक शिव नारायण महतो की बेटी पेड़ों से आम तोड़ने के लिये घर पर बनाये तीर कमान से अपनी यात्रा आरम्भ करके प्रथम सीड तक पहुँच पाती है लेकिन उसका खेल "देखने" के लिये मंत्री जी की विदेश यात्रा से देश की खेल प्राथमिकतायें तो ज़ाहिर होती ही हैं।

ब्लॉगिंग पर हो हल्ले के बीच उनकी दो पोस्ट के टाइटल ही बहुत कुछ कह जाते हैं – “NRI अंतर्राष्ट्रीय निर्गुट अद्रोही सर्व-ब्लोगर संस्था” और अब कुपोस्ट से आगे क्या होगा” !

चलते चलते उनकी एक लाइन –
सुरीला तेरे जैसा या कंटीला मेरे जैसा है,
जाने यह जीवन कैसा है?





और उन्हीं के ब्लॉग से कॉपी-पेस्ट:
  यदि मेरी कोई बात ग़लत हो तो एक अज्ञानी मित्र समझकर क्षमा करें मगर गलती के बारे में मुझे बताएं ज़रूर. !



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यदि आप चन्द्रहार के अन्य रत्नों के बारे में कुछ लिख भेजना चाहते हैं तो अवश्य भेजें। आप इन लिंकों से भूली बिसरी याद कर सकते हैं: