रविवार, 5 फ़रवरी 2017

सती पद्मिनी और अमीर खुसरो



अपनी देसभाषाओं पर ध्यान दीजिये, उनके शब्द प्रयोग पहचानिये जिनसे इतिहास झाँकता है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में मुहम्मदियों के लिये प्रयुक्त 'तुरक' शब्द वैसा ही प्रयोग है।
साठ की वय पार करने के पश्चात खासी पौढ़ी आयु में अमीर खुसरो ने नूह सिफिर लिखा (वही खुसरो जिसके नाम हिन्दू बलि बलि जाते हैं और जिसके कट्टर अनुयायी आज सोशल मीडिया से ले कर विश्वविद्यालयों तक में गाते रहते हैं मानो वह न होता तो हिन्दी न होती!)। जुमाद-स सानी 718 ि. (24 अगस्त 1318 ई.) को 4509 पंक्तियों वाली यह कृति पूरी हुई। नौ सिफिरों में बँधी इस कृति के आधार पर इरफान हबीब से ले कर हिन्दू रायचन्दों तक ने खुसरो की बड़ाई में फेचकुर फेंक दिये हैं।
दूसरे सिफिर में खुसरो लिखता है:
'दुनिया में पूरी तरह से कायम रवायत को शुक्रिया कि हिन्दू तुर्कों के लिये (मौज मस्ती के) शिकार रहे हैं। इन दोनों के बीच के रिश्ते कि इससे बेहतर नहीं समझाया जा सकता कि तुर्क बाघ है तो हिन्दू हिरन। यह बहुत पुराना आसमानी निजाम है कि हिन्दू हैं ही तुर्कों के (शिकार के) लिये। उन पर जीत हासिल करते हुये, तुर्क जब भी उन पर कहर बरपाना चाहता है, उन्हें पकड़ता है, खरीदता है और अपनी मर्जी बेंचता है। चूँकि हिन्दू हर तरह से ग़ुलाम ही होता है, उसके ऊपर जोर आजमाइश की जरूरत नहीं पड़ती। जिस बकरी को खाने के लिये पाला जाता है उस पर इसकी क्या जरूरत? जो बस एक नजर की तरेर से ही मर जाता हो उस पर तेग की क्या जरूरत?'
हिन्दू धर्मस्थानों और हिन्दुआनियों को लेकर उसके जो भाव हैं वे एक अन्य कृति में सूफी उन्माद के रूप में व्यक्त हुये हैं। यौन कुण्ठा और हिस्टीरिया सूफी मत के आवश्यक अंग रहे हैं। कहना न होगा कि सूफियों की वामी हिमायत के पीछे जिन्दा बोटी की लिप्सा एक प्रबल कारण है।
सुदूर दक्षिण के प्रसिद्ध प्राचीन चिदम्बरम मन्दिर पर आक्रमण और ध्वंस पर अमीर खुसरो जो लिखता है उससे उसकी विकृत यौन मानसिकता पूरी तरह से नंगी हो जाती है:
'इस स्थान पर स्थापित बहुत पुराने समय के पत्थर के बुत थे जो लिंग महादेव कहलाते थे, जिन पर काफिरानियाँ काम संतुष्टि के लिये अपनी योनियाँ रगड़ती थीं। इनको अब तक इस्लामी घोड़ों के धक्कों ने तोड़ने की कोशिश नहीं की ती। मुसलमानों ने सभी लिंग नष्ट कर दिये और देव नारायण हार गया और वे सभी देवता जो वहाँ आसन जमाये बैठे थे, टाँग उठा कर इतनी ऊँची कूद ले भागे कि एक ही छलाँग में लंका के किले तक पहुँच गये! इस तरह लिंग भी भाग खड़े हुये होते यदि उनके पास खड़े होने को पाँव होते।'
दरबारी और जनकवि में अन्तर होता है। दरबारी चूँकि राजा की रोटी खाता है, इसलिये उसका रचनाकर्म सदा संदिग्ध रहेगा। जो राजा के पक्ष में होगा, वह बढ़ा चढ़ा कर बताया गया होगा, जो विपक्ष में होगा उसे उस पर चुप्पी होगी, तोड़ मरोड़ होगी या अभिव्यक्ति के लिये उपमा रूपकों का सहारा लिया जायेगा।
अमीर खुसरो एक दरबारी कवि था और एक ही नहीं, कई सुल्तानों के साथ रहा, और लम्बे समय तक जीवित रह पाया। ऐसा व्यक्तित्त्व, वह भी मध्यकाल में जब कि राजा की वाणी ही किसी का सिर काट कर चौराहे पर गिद्धों के लिये धड़ लटकता छोड़ देने के लिये पर्याप्त थी, पर्ले दर्जे का चापलूस और गोटी बिठाने वाला ही होगा। खुसरो की विभिन्न सुल्तानों के समय की लिखी गयी रचनायें प्रमाण हैं। मैं रचना सामग्री की ही बात कर रहा हूँ, 'फैन' लोग पहेलियाँ और मुकरियाँ तज उन्हें पढ़ सकते हैं ताकि सूफी विष का पता चल सके।
इतिहासकार से पहले वह एक भाँड़ था, संगीत आदि तो उसकी विशेषज्ञता थे ही। इस कारण उसके भीतर किंचित कोमलता भी थी जब कि उसका संरक्षक अलाउद्दीन खिलजी अपने समय का सबसे क्रूर और हिंसक सुल्तान था। दोनों की रुचि इस्लाम के प्रसार में थी, राहें अवश्य अलग दिखती थीं।
'देवल रानी' में खुसरो चित्तौड़ के महाराणा को 'हिन्दु'स्तान का महानतम शासक बताता है जिसकी श्रेष्ठता सभी 'हिन्दू' राजा स्वीकार करते थे। चित्तौड़ पर आक्रमण 'हिन्दु'स्तान के प्रतिरोध की जड़ पर प्रहार था, इस्लाम का परचम लहराने का सबसे बड़ा अभियान था। आठ महीनों तक गढ़ का घेरा जारी रहा (इसकी भयानकता का अनुमान इससे लगा सकते हैं कि आज के युग में भी दो सप्ताह युद्ध जारी रहने पर राजकोष का क्या हाल होता है और महँगाई का क्या?) बीती 28 जनवरी को उस घेरे के प्रारम्भ को 714 वर्ष बीत गये।
इस घटना के उल्लेख बर्नी, इसामी, याह्या आदि जिहादी इतिहासकारों ने किये हैं। खुसरो उस क्रूरता की सूचना देता है जिसे लुच्चे अकबर ने भी लगभग ढाई सौ वर्ष पश्चात वहीं दुहराया था - आठ महीनों के कठिन प्रतिरोध के पश्चात जब गढ़ में प्रवेश मिला तो सुल्तान ने सभी निवासियों की हत्या का आदेश दिया। कुल 30000 काफिर नागरिक, बाल, वृद्ध 'सूखी घास' की तरह काट दिये गये और चित्तौड़ का नाम खिज्रबाद रख दिया गया।
पद्मिनी के ऊपर फरिश्ता, हाजीउद्दबीर जैसे जिहादी इतिहासकारों ने लिखा है। रानी की ऐतिहासिकता पर सबसे बड़ा प्रश्न लोग यह उठाते हैं कि खुसरो ने उसका नाम तक नहीं लिया। ऊपर हमने खुसरो के चरित्र और उसकी अद्भुत चापलूस चातुरी का उल्लेख किया है। सोचिये कि संरक्षक कामुक सुल्तान अगर किसी रूपसी को पाने के लिये अभियान करता है और आठ महीनों के घेरे के पश्चात भी उसके हाथ केवल राख लगती है तो खुसरो जैसा दरबारी कवि उसका वर्णन कर सुल्तान का अहम आहत करने का खतरा मोल लेगा? (मृत देह भी हाथ लग जाती तो सुल्तान लिप्सा पूरी कर लेता। शव से मैथुन की इस्लामी इतिहास में रवायतें हैं। आधुनिक शिक्षा और बोध वाले व्यक्ति सुल्तान की निराशा का अनुमान भी नहीं लगा सकते जिसने एक देह पाने को अपने हजारो सैनिकों और हजारो निरपराधों को कटवा दिया।)
तब भी कहीं न कहीं खुसरो के मन में कवि वाली टीस थी और उसे संकेत करना ही था। 1303 ई. के उस कालखण्ड में उसने सुल्तान के अभियान के सम्बन्ध में एक चापलूसी भरा निर्दोष सोलोमन और शीबा की कथा का रूपक भी अपनी कृति में डाल दिया जो कि बाइबिल में वर्णित है और मध्यपूर्व में लोकप्रिय है। जब उस रूपक की तुलना राजस्थान की चारण गाथाओं से करते हैं तो समूचे 'हिन्दुस्तान' में सर्वश्रेष्ठ माने जाने वाले राजवंश की सती रानी पद्मिनी का वह अमर इतिहास मुखरित हो उठता है जिसे समकालीन कथित इतिहासकार खुसरो ने तो नहीं लिखा लेकिन जन जन ने अपने हृदय में स्थान दिया, जिस इतिहास का आश्रय ले सुदूर पूरब के जायस में जन्मे मलिक मोहम्मद ने सैकड़ो वर्षों पश्चात सूफी विष फैलाने का असफल प्रयास किया।
‘खज़ैनुल फुतूह’ में अमीर खुसरो का बड़बोलापन और जिहादी मानसिकता
खुसरो की राजभक्ति असंदिग्ध और बहुत 'प्रगल्भ' है। ‘खज़ैनुल फुतूह’ में अपने आका अलाउद्दीन को वह दूसरा सिकन्दर बताता है। साथ में उसके द्वारा काफिरों पर कहर बरसा इस्लाम फैलाने के कर्म की स्तुति नहीं भूलता। उसका समूचा साहित्य ऐसे उद्धरणों और उक्तियों से भरा पड़ा है जो उसे एक शातिर जिहादी के रूप में स्थापित करते हैं।
इलियट के अनुसार वर्तमान भूत को परिवर्तित करता है। भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने छद्म, अनदेखी, कुतर्कों और खेमेबाजी द्वारा 'शब्दश:' वह काम किया किंतु आज जो जागृति दिख रही है वह इलियट के कथन को व्यापक अर्थ दे रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में इस देश को अपनी धरती पर ही अजनबी बनाने के जो षड़यंत्र स्वतंत्रता के पश्चात ही प्रारम्भ हो गये, उनका विषैला प्रभाव दिखने लगा है और प्रतिरोध उठने लगे हैं। यह शुभ लक्षण है। पद्मिनियों की धरती अपनी सुगन्ध पहचानने लगी है। 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

रानी पद्मिनी, पद्मावत और रामचरितमानस

वैचारिक और सांस्कृतिक प्रभुत्त्व योजनायें बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर काम करती हैं। केन्द्र में रहना महत्त्वपूर्ण होता है और बहुत बार पक्ष और विपक्ष दोनों एक ही होते हैं। काल की गति को नये आयाम देने वाले यह खूब समझते हैं और तदनुसार कार्य करते हैं।
 मलिक मुहम्मद जायसी अवधी सूफी कवि था जिसने 'पद्मावत' की रचना 1597 वि. में की। वह समय सूरों के राजनीतिक प्रभुत्त्व का था लेकिन मुग़ल चुप नहीं बैठे थे। राजनैतिक स्तर पर इस्लाम और इस्लाम आमने सामने थे। सांस्कृतिक स्तर पर सूफियों के माध्यम से इस्लाम का जय अभियान चरम पर था। जायसी ने अपने महाकाव्य के लिये ऐसा कथानक चुना जिसके मूल में हिन्दुत्त्व का वह सत्त्व था जिसने आक्रांताओं की लिप्सा के आगे ढाल की तरह काम किया था। 'सती' स्त्री और उसके सम्मान के लिये मर मिटने वाले 'पुरुष'। यह एक ऐसा आदर्श था जो अपने आप में अनूठा है। 
 सतीत्त्व की प्रशंसा और महिमामण्डन के साथ ही भाषा काव्य के माध्यम से आम जन के मन में इस्लाम के छद्म रूप की पैठ बनाने के अपने प्रयास में उसने वही किया जिसकी नींव अमीर खुसरो ने डाली थी। लोकछन्द दोहा और चौपाई में सांगीतिक काव्य के माध्यम से उसने पद्मावती की यश गाथा का वर्णन किया लेकिन अपने इस्लाम को नहीं भूला जिसका आभासी रूप निखार कर उसकी सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्यता सुनिश्चित करनी थी - होंगे चित्तौड़ के रणबाँकुरे वीर बहादुर, सहस्रों सुलक्षणा और सुमतिशील नारियों सहित होंगी नागमती और पद्मावती जैसी जौहर आत्मायें किंतु हिन्दुओं! यह सब होने पर भी, तुम्हारा पराभव हुआ और होना ही है। 
 हिन्दू सनातनी प्रतिरोध के रूप में चित्तौड़ की प्रतिष्ठा समूचे उत्तर में थी। सुदूर पूरब में वहाँ की भाषा में जायसी ने जब लिखा कि 'बादसाह गढ़ चूरा, चितउर भा इसलाम' तो उसने भली भाँति अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया। 

गीत, संगीत, काव्य सुमधुर होंगे, कर्णप्रिय होंगे, अभिनय उत्कृष्ट होगा, सेट उत्तम होंगे किंतु इनके साथ छिपे विष अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। नये भारत में जब 'मुग़ल-ए-आज़म' के समांतर 'अनारकली' बनायी जाती है तो बात वही होती है - 'पक्ष विपक्ष दोनों हम होंगे, हम ही केन्द्र में होंगे। विषय हमारा होगा क्यों कि हमारा सांस्कृतिक प्रभुत्त्व है।' स्पर्धा में 'नल दमयंती' पर फिल्म नहीं बनी न? 

उस समय से वे अब यहाँ तक पहुँच चुके हैं जहाँ सांस्कृतिक पराभव पूर्ण है और कलात्मक छूट के नाम पर कुत्सा स्वीकार्य हो चली है। ये नये समय के सूफी हैं। उनका विषय चयन ही बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। 
 प्रश्न यह है कि समाधान क्या हो? समाधान भी भारत के इतिहास में ही है। पद्मावत के मात्र 36 वर्ष पश्चात ही उसी अवध क्षेत्र के एक अकिञ्चन कवि ने पुरुषार्थ प्रतीक महाबली मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और परम सती प्रात: स्मरणीया भगवती सीता की गाथा को उसी भाषा अवधी और उन्हीं दोहा चौपाई छन्दों में ऐसा उकेरा कि वह कृति जन जन की मानस हो गई। जायसी के मधु-विष का मधु-अमृत से उपचार करता रामबोला एक पग आगे बढ़ गया। जायसी गाँव गाँव अपना काव्य सुनाता था लेकिन रामबोला तुलसीदास ने तो पूरी काशी को रामलीला का क्षेत्र बना दिया! 
 नाट्य और मंचन तब के सिनेमा थे, जन जन का मनोरञ्जन करते थे। तुलसी ने उनका प्रयोग कर सूफियाने को पटकनी दे दी। आज पद्मावत केवल अकादमिक स्तर पर पढ़ी जा रही है जब कि रामचरितमानस जन जन की कण्ठहार है। 

सामान्य जनता को तो मनोरञ्जन चाहिये, वह तो दंगल या रईस देखने जायेगी ही। करना प्रबुद्ध जन को है कि केन्द्र में उसे ले आयें जो वरेण्य है जो विष का एण्टीडोट ही नहीं, उसका नाशक भी है। जनता अपनायेगी। यक्ष प्रश्न यही है कि सूफी भंसाली के समान्तर सनातन समृद्धि क्यों नहीं खड़ी हो पा रही? किसने रोका है पटकथा लिखने से? किसने रोका है प्रचुर धन लगा कर समान्तर चित्तौड़ महागाथा को सेल्युलाइड पर उतारने से? 

 प्रश्न यह है कि आज तक विराट भव्यता के साथ सनातन गौरव विषय सेल्युलाइड पर क्यों नहीं उतारे जा सके? क्या मुग़ल समय से भी स्थिति बुरी है?
 रूदन छोड़ उठिये, कुछ कीजिये। विषाणु तो सर्वदा रहेंगे, आप का आयुर्वेद ज्ञान कहाँ छिपा है? देखना चाहते हैं कि 'मलिक' 'मोहम्मद' ने सती प्रसंग को कैसे रचा है? पढ़िये और सराहिये। सराहने योग्य है लेकिन इसमें छिपे विष का कुछ कीजिये। 


रविवार, 22 जनवरी 2017

चलिये पापा!



बैडमिण्टन कोर्ट पर भीतर सुपुत्र अभ्यासरत हैं और मैं बाहर डूब उतरा रहा हूँ।
 
...प्रशांत गौरी हैं, यही कोई छ: सात में पढ़ती होंगी। एक बार दीठ मिली तो बस समय ठहर गया,”किसने तुम्हारे नयनों में काजल लगाया माँ? तुमने स्वयं? महामाया हो क्या?”
इतने वर्षों के पश्चात जब कि आस तक ओस सी उड़ चुकी थी, इस अचीन्हे से क्षेत्र में ऐसे अवसर तुम मिल जाओगी, कभी नहीं सोचा था। इतने दिन कहाँ थी?
सम्मोहन टूटा है, कहीं कुछ भी नहीं। मन चीत्कार कर उठा है। सूनी आँखों में प्रवेश करते औपचारिक चेहरे सहमा देते हैं, पगलेट हो क्या? माँ क्रीड़ा को गईं! मैं देखता हूँ सभी पर मणिकर्णिका की भस्म पुती है। मङ्गला गौरी सब को लूट गयीं?
न रे, इन्हें तो उनके होने का पता ही नहीं। जिन्हें पता नहीं होता, वे जीते हैं। जिन्हें पता चल जाता है, वे मर जाते हैं। जाने कितने आँसू सूख गये हैं, मैं रहा ही नहीं। शरीर समाप्त हो चला है।
स्वयं को धन्य मान पगले! तब शरीर बचा हुआ था। आज पता चला कि नहीं रहा... 

यह कौन है शिखा और धोती बाँधे? कोई युवा है जो मुझे घूर रहा है। माँ बाहर आ गयीं क्या? मैंने मुँह फेर लिया है, नहीं जानना मुझे जगत बन्धन, तुम्हें क्या पता कि तुम्हारे घर कौन पल रही है? तुम्हारी आँखों पर माया का पट्टर पड़ा है।
“चलिये पापा!” 
मैंने च को छ सुना है।       

रविवार, 1 जनवरी 2017

सबरीमाला, शीत अयनांत, मकर संक्रांति और वाम-इस्लाम-ख्रिस्तान आक्रमण

[सोशल मीडिया पर वर्ष भर पुराने अपने एक लेख की पुनर्प्रस्तुति] 
सबरीमाला (अक्षांश 9.44 उ., देशांतर 77.08 पू., ऊँ.468 मी.), केरल में बचा रह गया हिन्दू आस्था का अंतिम सशक्त केन्द्र, वामी-इस्लामी-इसाई दुरभिसन्धि द्वारा ध्वंस हेतु चिह्नित है। कुछ दिनों पहले एक मित्र केरल गये थे तो उनके एक लेख पर मैंने पूछा था - वहाँ के 54% हिन्दू कहाँ हैं? उत्तर यह है कि apartheid अर्थात जातिभेद के केरलीय संस्करण के शिकार हो दोयम श्रेणी के नागरिक बन चुके हैं। 
हिन्दुओं की जनसंख्या में 20% पिछड़े समुदाय से आने वाले एझावा हैं जिनसे कसाई-इसाई युति के सत्ताधारी इसलिये नाराज हैं कि 'पिछड़े' मोदी के उदय के साथ ही यह वर्ग राजनीतिक निष्ठा बदलने लगा। अस्तु।
 
वहाँ सबरीमाला एकमात्र स्थान है जो वर्ष में एक करोड़ श्रद्धालु आकृष्ट करता है। अन्य कई तीर्थों की तरह यह तीर्थ भी हिन्दू एकता को पुष्ट करने वाला केन्द्र है और इसीलिये अयोध्या-काशी-मथुरा-प्रयाग की तरह ही अब्राहमियों की आँखों में खटकता रहा है। आधुनिक समय में धावा बोल मन्दिर तोड़ा तो नहीं जा सकता (तभी तक जब तक भारत में वे 1:2 अनुपाती अर्थात 33% नहीं हो जाते!) इसलिये पहले से जाँची परखी वामी रीति से कथित कुरीति गढ़ कर आक्रमण की नीति अपनायी गयी।
सबरीमाला ऐरण, उज्जयिनी आदि प्राचीन हिन्दू स्थानों की तरह ही नाक्षत्रिक प्रेक्षण का भी केन्द्र था। कारण थे इसकी स्थिति, अक्षांश और ऊँचाई। हिन्दू धर्म में नाक्षत्रिक घटनाओं को धार्मिक रूपक के साथ सुरक्षित कर दिया जाता है, यहाँ भी वही हुआ।
शीत अयनांत अर्थात 22 दिसम्बर के आसपास प्राची में उष:काल के समय अभिजित (Vega) नक्षत्र उदित होना प्रारम्भ करता जिसका कि उस ऊँचाई से प्रेक्षण आसान होता। मकर संक्रांति तक आते आते एक घटना और होती, हमारे रुद्र देवता (मृगव्याध) अर्थात लुब्धक नक्षत्र (Sirius) ब्रह्ममुहुर्त में पश्चिम में अस्त होते और विष्णु स्वरूप अभिजित नक्षत्र प्राची में उसी समय उदित होते। इन दो का दर्शन 'मकरज्योति' का दर्शन कहा जाता और इस तरह सबरीमाला वैष्णव और शैव दोनों का समन्वय स्थान हो हिन्दू आस्था के विराट केन्द्र के रूप में उभरा।
केरल बहुत पहले से गणित ज्योतिष का केन्द्र रहा है, यहाँ तक कि कुछ विद्वान आर्यभट को भी केरल से जोड़ते हैं क्यों कि ऐसे प्रमाण हैं। जैसा कि शेष भारत में हुआ, सैद्धांतिक ज्योतिष के प्रभाव में हमलोग आकाश निहारना भूलते गये और सबरीमाला में भी मकरज्योति मनुष्यों द्वारा दूर ऊँचे स्थान पर जला कर दिखाई जाने लगी। 2011 में इस पर विवाद भी हुआ था।

अब आते हैं रजस्वला स्त्रियों के इस मन्दिर में प्रवेश प्रतिबन्ध पर। विग्रह स्पर्श की भी बात है। विग्रह स्पर्श के बारे में बता दूँ कि उत्तरभारत पूर्णत: भ्रष्ट हो चुका है। गर्भगृह में प्रवेश और विग्रहस्पर्श केवल सेवक पुजारियों के लिये ही अनुमन्य है क्यों कि विग्रह में देव देवी की 'प्राणप्रतिष्ठा' होती है। विशिष्ट जन के साथ भी व्यवहार और स्पर्श के विधि निषेध हैं तो वे तो देवी देवता हैं! तमिळनाडु के लगभग समस्त मन्दिरों में आप न तो गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं और न ही प्रतिमा का स्पर्श। उत्तर में इस्लामी अत्याचार और भक्तिधारा के प्रभाव में सख्य भाव ने अपना स्थान बनाया, बड़े मन्दिर नष्ट कर दिये गये, नयों में वह धाक नहीं रही, परम्परा तनु हुई - अनेक कारण हैं। शास्त्र यही कहते हैं कि गर्भगृह में जाना नहीं, प्रतिमा छूना नहीं! 'गर्भ' गोपन होता है, है कि नहीं?

रजस्वला निषेध पर एक बात घूम रही है जिसका सम्बन्ध शाक्त-तांत्रिक मत से है। दूर असम के कामाख्या मन्दिर में वर्ष में एक बार देवी भी पाँच दिनों के लिये रजस्वला होती हैं जो कि साधना और विधि निषेधों का चरम होता है। रज:स्राव जननी की उस शक्ति का प्रत्यक्ष संकेत है जिससे वह नवसृजन करती है। उस समय स्त्री साक्षात देवी होती है। सबरीमाला पर शाक्त मत का भी प्रभाव है। सबसे बड़ी बात यह कि आज भी यदि आप उन दिनों में किसी स्त्री से किसी सामान्य से मन्दिर में भी जाने की बात कहेंगे तो वह भरसक नहीं जाना चाहेगी जिसके कई कारण हैं। प्रश्न यह है कि जो न्यायी और जो कथित प्रगतिशील इसे संवैधानिक अधिकार से जोड़ देख रहे हैं उन्हें अब्राहमी पंथों का ढपोरपना क्यों नहीं दिखता? गिनाऊँ क्या?

नेपथ्य में स्त्री अधिकार नहीं, धर्मपरिवर्तन करा केरल को दारुल इस्लाम या मसीही प्रांत बनाने की राह में जो आखिरी पहाड़ खड़ा है उसे कैसे ध्वस्त किया जाय, यह षड़यंत्र काम कर रहा है। सबरीमाला में यदि शाक्त प्रभाव के कारण निषेध हैं तो क्या और मन्दिर नहीं हैं? उनके द्वार तो सबके लिये खुले हैं, हैं कि नहीं? कथित प्रगतिशीलों के आक्रमण को समझने की आवश्यकता है, अनावश्यक रूप से सुरक्षात्मक हो अल्ल बल्ल बकने की नहीं!

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

बलि

'बल्' धातु का पाणिनीय अर्थ है प्राणने। 'प्राण' श्वास है। श्वास जीवन है। जीवन अर्थात शक्ति। बल का अर्थ शक्ति इस कारण हुआ। श्वास को नियमन द्वारा उच्च आयाम प्रदान करना प्राणायाम है। बैल बलीवर्द है, क्यों? क्यों कि वह महत कार्य करने हेतु प्राणवान है, समर्थ है। 
बल् धातु से ही बलि बनती है - बलिः [बल्-इन्]। बलि क्या है? अर्पण है, दान है। किसका? प्राण का। माध्यम ऐसी वस्तु हो जो प्राप्तकर्ता को प्राणवान बनाये, पुष्ट करे। दान की अवधारणा ही भावना से जुड़ी है। देने वाले के भीतर  प्राण समर्पित करने का भाव होना चाहिये। समर्पण भाव कृतज्ञता से जुड़ कर पवित्रता और ऐश्वर्य का वाहक बनता है। यहीं बलि यज्ञ का रूप ले लेती है। यजन् जोड़ने से सम्बन्धित है। समर्पित करने वाला और प्राप्त करने वाला दोनों एक उदात्त भाव से जुड़ें तो यज्ञ है। पञ्चमहायज्ञों में दैनिक भूतयज्ञ भी सम्मिलित है। वह क्या है? अन्न ग्रहण करने के पहले सभी भूतों अर्थात जीवधारियों के लिये उनका अंश निकाल देना भूतयज्ञ है। गइया का कौरा, चींटी का दाना, कौवे की रोटी, अतिथि का भोजन, ये सब स्वयं के प्राण को पुष्ट करने वाले अन्न का ग्रहण करने से पहले करना होता है। यह समूचे विश्व का ध्यान रखने वाला बलिवैश्व है। घरनी की रसोई भी बलि का स्थान है। राजा को दिया जाने वाला कर भी बलि है क्यों कि वह राजा प्रजा दोनों को प्राणवान करता है किंतु वही कराधान विकृत लिप्सा भाव से चलित होने पर हंता बन जाता है। 
यदि आप यज्ञ और बलि के आङ्ग्ल अनुवाद देखेंगे तो sacrifice भी मिलेगा। चौंकिये नहीं, यह sacra धातु से बना है जिसका सम्बन्ध देवता के आगे पवित्र समर्पण से है।
यह तो स्पष्ट हो गया होगा कि बलि क्या है? किंतु अब बलि का अर्थ पशु वध ही लिया जाने लगा है। ऐसा क्यों है? जब आप किसी व्यवहार का बारम्बार निषेध करने लगते हैं तो वह निषिद्ध आचरण रूढ़ अर्थ ले शब्द के साथ जुड़ जाता है। यदि साथ में अन्य आचारों का विलोप हो तो रूढ़ि और पक्की हो जाती है। बलि के साथ यही हुआ। कितने जन प्रतिदिन बलिवैश्व कर्म करते हैं? वह भी बस करने के लिये नहीं, यज्ञ और पुष्टिदायी समर्पण भाव के साथ? उत्तर स्पष्ट है।
देव को अर्पण के लिये आहार योग्य पशुओं का वध बहुत पुराना है जिसका सम्बन्ध आखेटचारी जन से है। जो आहार करते, वही देव को अर्पण करते, पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ। उससे भी बहुत पहले आदिम भय का भाव रहा लेकिन तब भी बलि देते समय जीभ की स्वादेच्छा पूर्ति गौण रही। ध्यान देंगे तो पायेंगे कि इन पशुओं की पूजा भी की जाती रही और सामान्यतया भी उनके साथ व्यवहार बहुत स्नेहिल रहा। देव अर्पण हेतु वध करते समय जिह्वा का स्वाद नहीं, श्रद्धा निर्देशित करती रही। ऐसा अर्पण आराधक और आराध्य दोनों को पुष्ट करता है। इसे ही कहते हैं कि देवता मनुष्य की हवि पा तुष्ट और पुष्ट होते हैं।
वैदिक पद्धति के समांतर समकालीन ऐसी पद्धतियाँ रहीं किंतु दूध दही, मधु, कन्द, मूल, फल, उन्नत कृषि से उत्पन्न अन्न का आहार करने वाले वैदिक जन के लिये बलि हेतु पशु का वध त्याज्य ही रहा। पूरा वैदिक वाङ्मय पशु वध के निषेध से भरा पड़ा है। कुछ लोग पुराने शब्दों के पशु वध सम्बन्धित अर्थ निकालते हुये तर्क देते हैं। वे भूल जाते हैं कि उत्कृष्ट सांगीतिक छन्दों के सम्पूर्ण दीर्घजीवी तंत्र हेतु जो उन्नत सभ्यता चाहिये होगी, वह कृषि व्यापार में भी बहुत आगे होगी। ऐसा भारत के नदी जल पूरित समतल क्षेत्र में ही सम्भव है। ऐसे रचनाकर्म हेतु ठहराव आवश्यक है जो पशुचारी समाज या बीहड़ क्षेत्रचारी जन के लिये सम्भव नहीं है। ऋषि आश्रमों के अनगिनत उल्लेख और उनके प्रमुख केन्द्र होने के तथ्य सब कुछ स्थापित और स्पष्ट कर देते हैं।

समतल, उपजाऊ और जलसमृद्ध क्षेत्र में विकसित सभ्यता शाकाहार की ओर ही प्रवृत्त होती है। यहाँ जो मांसाहारी हैं, वे प्रतिदिन दोनों समय मांसाहार नहीं करते। पशु वध त्याज्य होने के पीछे उसका क्रन्दन है, रक्त की वह धार है जो अपनी धमनियों में भी दिखती है। एक सुस्थापित व्यवस्था के पुरोहित और यजमान के लिये पशुबलि के समय समर्पण और प्राणपोषण का भाव रखना सम्भव ही नहीं। बलिदान का 'दान' ही उस निषेध के नेपथ्य में है।
तो क्या पशुबलि न दें? ऊपर जो भी कहा वह निगम का पथ है। सहस्रो वर्ष की अपनी यात्रा में सनातन ने आगम अर्थात इतर मार्ग भी स्वीकारे हैं। शाक्त और तंत्र भी उनमें हैं जो प्रभावी रहे और आज भी हैं। मास के साथ मांस भी उनके अनुयायियों के लिये अन्न है। उसका अर्पण यदि वे देवी को करते हैं तो उसके पीछे जो भाव रहते हैं वही महत्त्वपूर्ण हैं। उच्च भाव रखने वाले प्रतिदिन पशुबलि नहीं देते, कतिपय अनुष्ठानों में देते हैं। वे मांसाहारी भी प्रतिदिन मांसाहार करने वाले नहीं हैं। उनके प्रति या उनकी उपासना पद्धति के प्रति तिरस्कार का भाव विनाशक होगा क्यों कि वह जोड़ने वाला यजन् नहीं तोड़ने वाला भंजन होगा।
पशुबलि का निषेध और शाकाहार ये दो समतल भूमि पर संतुलन के साथ रहते जन के लिये आदर्श हैं। आदर्श का प्रसार होना ही चाहिये, उसकी प्राप्ति के लिये तप भी होने चाहिये किंतु अतिरेकी हो अपने ही समाज के पैर पर कुल्हाड़ा चलाया जाना भी रोका जाना चाहिये। जन रहेंगे, संगठित और बली रहेंगे तो देव और देवता भी रहेंगे, आस्था और जीवनमूल्य भी बचे रहेंगे अन्यथा रक्त देखते ही वमन करने वाले कोमल जन के लिये बर्बर रक्तपिपासु शत्रुओं के आगे घुटने टेक आत्महत्या ही परिणति होगी।