शुक्रवार, 29 जून 2018

मेघदूत अनुवाद की भूमिका से - केशव प्रसाद मिश्र

आचार्य केशवप्रसाद मिश्र ने कालिदास कृत मेघदूत का हिन्दी छन्दानुवाद किया जो सं.1992 वि. (सन् 1935)  में प्रकाशित हुआ (अभी राजकमल प्रकाशन में उपलब्ध है)। आचार्य संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। अनुवाद की भूमिका में उन्हों ने छ्न्द बन्ध की आलोचना की। देखते ही मैं चौंक गया। आचार्य की भाषा में ही वह अंश प्रस्तुत है:

...छ्न्द के पींजड़े में बन्द की गई कविता-कोकिला स्वच्छ्न्द नहीं रहती। न तो वह मौज से पर फैला कर उड़ सकती है और न स्वभावमधुर कूक ही सुना सकती है। अपनी सारी अठखेलियाँ उसे उसी घेरे के भीतर करनी पड़ती हैं। फिर वह कोकिला चाहे किसी कलावंत खिलाड़ी की हो या किसी अताई तुक्कड़ की।
कविकुलगुरु कालिदास सच्चे कवि थे। जब कभी उनकी प्रतिभा जागृत होती, उनकी सूझ रीझती; वे तुरन्त मधुरोचित पदावली की चाशनी को छन्दों के साँचों में डाल देते और सुन्दर पद्यों की मीठी मीठी मूर्तियाँ निकल आतीं। पर कभी कभी उन्हें भी छ्न्दों की परिच्छिन्नता-नाप जोख- के कारण स्वाभाविकता की सुघराई से हाथ धोना पड़ा है। बानगी देखिये –
 तां कस्यां चिद् भवनवलभौ सुप्तपारावतायां नीत्वा रात्रिं चिरविलसनात् खिन्नविद्युत्कलत्र:” पूर्वमेघ 39
यक्ष कहता है – भाई मेघ! देख, तू अपनी प्रिया सौदामिनी का ख़याल रखना। वह बड़ी ही सुकुमार है। क्षण भर में उसकी प्रभा –उसकी ओप- उतर जाती है। तू ठहरा अतिविलासी। रास्ते भर छेड़छाड़ से तू बाज आने का नहीं। और मुझे आता है उस बेचारी पर तरस। इससे सुन मैं बतलाऊँ। रात को किसी अटारी पर, जहाँ अति विलास से थके कबूतर भी निधड़क सो रहे हों, तू उसे विश्राम देना। छेड़ना मत। हाँ!
परंतु छ्न्द-रचना से यह अर्थ स्पष्टतया नहीं निकलता। छ्न्द की तंगी से कवि ने ‘खिन्नविद्युत्कलत्र:” (जिसकी विद्युत-पत्नी खिन्न हो गई हो, वह) पद को ‘त्वम्’ का विशेषण बनाया है। जिसका यह अर्थ हुआ कि –‘खिन्न विद्युत पत्नी वाला तू’ (रात बिता कर चलना)। इस अर्थ से कवि की इष्टसिद्धि नहीं होती। क्यों कि विशेषण और विधेय में बड़ा अंतर है। ‘पूर्वसिद्ध-कथन’ के लिये विशेषण का प्रयोग होता है और ‘अपूर्वबोधन’ के लिये विधेय का। यहाँ ‘विद्युत पत्नी का खेद’ अपूर्व -नई बात- है। उसे विशेषरूप से बोधन करना, उस पर ध्यान दिलाना कवि को इष्ट था; अत: उसका प्रयोग विधेय-विधया होना चाहिये था। परंतु विशेषण-कोटि में रखने से उस अपूर्व बात की अपूर्वता -विधेयता- नष्ट हो गई है और पूर्वसिद्धता –उद्देश्यता – प्रतीत होती है। “भूखे घोड़े वाला तू कुछ खा पी ले” इस वाक्य से यह स्पष्टतया नहीं सूचित होता कि ‘तेरा घोड़ा भूखा है, तुझे उसकी खबर लेनी चाहिये’। ‘भूखे घोड़े वाला’ केवल ‘तू’ के परिचय के लिये प्रयुक्त सा मालूम पड़ता है। इस प्रकार विधेय के अनुचित प्रयोग को ‘विधेयाविमर्श’ दोष कहते हैं। उक्त पद्यार्थ का अनुवाद इस प्रकार किया गया है –
ऐसी छत पर, जहाँ कबूतर निधड़क करते हों आराम,
अतिविलास से थकी चंचला प्यारी को देना विश्राम।
इसी प्रकार का एक और उदाहरण उत्तर मेघ से लीजिये –
मत्संभोग: कथमुपनमेत् स्वप्नजोऽपीति निद्रा –
माकाङ्क्षंतीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्। उत्तरमेघ 28
यक्ष कहता है – मेरी विरहिणी निरुपाय होकर यह चाहती होगी कि मुझे नींद आ जाय और प्रत्यक्ष नहीं तो स्वप्न ही में मैं प्रियमिलन का आनन्द ले लूँ। पर हाय! उसकी आँखों में नींद कहाँ! उनसे तो आँसुओं की धारा उमड़ती होगी।
परंतु “नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्” (आँसुओं के उमगने से जिसे स्थान नहीं मिलता – वह) पद को ‘निद्राम्’ (नींद) का विशेषण बना कर कवि ने बात बिगाड़ दी। इससे यह प्रतीति सी होने लगी कि – वह निर्विघ्न निद्रा नहीं चाहती, वह ऐसी निद्रा चाहती है जिसे आँसुओं के मारे आँखों में स्थान न मिलता हो। देखा आपने! छ्न्द की झंझट ने कितनी हानि की। इसका अनुवाद यों है –
मिलन स्वप्न में ही हो इससे करती निद्रा का अभिलाष,
किंतु अश्रुधारा के मारे उसको वहाँ कहाँ अवकाश!
एक और –
विद्युत्वन्तं ललितवनिता: सेन्द्रचापं सचित्रा: सङ्गीताय प्रहतमुरजा: स्निग्धगम्भीरघोषम् ।
अन्तस्तोयं मणिमायभुवस्तुङ्गमभ्रंलिहाग्रा: प्रासादास्त्वां तुलयितुमलं यत्र तैस्तैर्विशेषै: ॥
 उत्तरमेघ 1
इस पद्य में बड़ी सुन्दरता से मेघ और अलका के प्रासादों की तुलना की गई है। पहले सम्बोध्यमान मेघ के तुल्य गुण बतलाये गये हैं पीछे प्रासादों के। और यही क्रम उचित भी है। क्योंकि मेघ सामने है और प्रासाद है आँखों की ओट। किंतु छ्न्द की निष्ठुरता से यह क्रम न निभा। द्वितीय चरण में प्रासादों का जिक्र पहले और मेघ का पीछे आ गया। बात बिगड़ गई। ‘भग्नप्रक्रमता’ अथवा ‘क्रमभंग’ दोष आ पड़ा।
  इस प्रकार महाकवि कालिदास को जब काव्य भर में एक छ्न्द के प्रयोग का नियम करने से कठिनता हुई तब अनुवादक बेचारे की कौन कहे! उसे तो एक नहीं अनेक संकट हैं। महाकवि के भावों की रक्षा करना; अन्यूनानतिरिक्त –नपे तुले – शब्दों से उन्हें प्रकट करना; महाकवि ने अपनी अनोखी प्रतिभा की लहर में जो बात अनायास कह डाली है उसे गढ़ गढ़ कर छ्न्द की डिब्बी में बन्द करना; न कुछ बढ़ाने की उसकी शक्ति और न कुछ घटाने का उसका अधिकार!
ऐसी अवस्था में सहृदय पाठक समझ सकते हैं कि मेरा अनुवाद कैसा होगा और मुझे अपने अनुवाद की सफलता पर कैसा विश्वास होगा। अंत्यानुप्रास का बखेड़ा अपने सिर मढ़ कर मैंने दुस्साहस किया है। पर करता क्या? यदि इस नीरस रचना को वह अलंकार भी न पहनाता तो बेचारी निरी नंगी रहती।
(आभार: राजकमल प्रकाशन)
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आचार्य ने अपने अनुवाद को ‘नीरस रचना’ उपाधि से विभूषित किया है न कि मूलकृति को किंतु उनके वाक्य से उल्टा ही प्रतीत हो रहा है। जाने इस दोष को क्या कहते हैं?  

गुरुवार, 14 जून 2018

संस्कृत सौन्‍दर्य - 1

बोल कर संस्कृत पढ़ने से जिह्वा, मुख एवं स्वर तंत्र का व्यायाम भी होता है। किसी एक ही मन्‍त्र के पाठ या जप का यह परोक्ष लाभ है। पुरुष सूक्त के प्रथम मन्‍त्र को देखें, अथर्वण सहस्रबाहु के स्थान पर ऋग्वैदिक सहस्रशीर्षा।
स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात् । स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वात्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम् ॥ य, र, ल, व, श, ष, स, ह, क्ष, अक्षमाला का अंतिम य वर्ग समस्त ऊष्म संघर्षी ध्वनियों के साथ उपस्थित है। पहले शब्द में ही र एवं ह के सम्पुट के साथ तीनों ध्वनियाँ - स, श, ष उपस्थित हैं, सम्पूर्ण ऊष्म परास। हममें से कितने इसका शुद्ध उच्चारण कर सकते हैं? स+ह+स्+र+श+ई+र्+ष+आ - सहस्रशीर्षा। ई कुण्डलिनी स्वरूपा मानी जाती है, आ अर्थात अन्त में स्वाहा! स्वाहा की गढ़न भी देखें - ऊष्म ध्वनियों का संयोजन है।

रविवार, 27 मई 2018

जातवेद या जावेद ?

या॑वन्तो देवास्त्व॑यि जातवेदः .... आत्मन्नग्निं गृह्णीते चेष्यन्नात्मनो ... 
समस्त जीव जगत उस अनुशासन में बँधा है जिसे ऋत कहा गया। कर्मकाण्ड सृष्टि रूपी यज्ञ की अनुकृति होते हैं, अग्नि से समझ सकते हैं। अग्नि जातवेद हैं, समस्त जीवन को जानने वाले या जिन्हें समस्त जीवधारी जानते हैं, समोये हुये हैं। जीवन के लिये ऊष्मा आवश्यक है, हिमक्षेत्रों में भी। मानव द्वारा प्रयुक्त अग्नि पहले द्विज हैं – जिसका दो बार जन्म हुआ हो। पहली बार अरणि मन्थन से, दूसरी बार जब गार्हपत्य अग्नि के रूप में स्थापना हुई या किसी अन्य याज्ञिक रूप में। प्रकृति की विराट लीला तो पूर्णत: गम्य नहीं है किन्‍तु देखें तो जीवन में यादृच्छ विनाशी दावानल का अनुकरण नहीं किया गया है, सायास उपजाई हुई नियन्‍त्रित अग्नि का किया गया है जो जन्म से ले कर मृत्यु तक समस्त जीवधारियों को चलायमान रखती है। मैथुन द्वारा गर्भ स्थापन पश्चात माँ के उदर से बाहर आना प्रथम जन्म है। संस्कार होने पर दूसरा जन्म है, द्विज, अनुशासन बद्ध, ऋत से स्वयं को जोड़े हुये। पात्रता सुनिश्चित करने के लिये प्रथम जन्म से पूर्व भी गर्भाधान संस्कार की व्यवस्था है, पुंसवन है।
 द्विज से अपेक्षा है, अद्विज से नहीं। संस्कारी से अपेक्षा है, असंस्कारी से नहीं। समाज के मेधावियों से अपेक्षा है, जन सामान्य से नहीं।
अग्नि का गुण है – दोष भस्म करना। अग्नि का गुण है जोड़ना। कृषि पहला यज्ञ है। भास्वित, प्रकाशित 'भ' के साथ शक्तिमान पहली 'र' अग्नि को ले कर भ+र+तों ने अभियान किये। वन प्रान्‍तर जले, कृषि आश्रम व्यवस्था स्थापित हुई, पूर्णत: प्रकृति पर आश्रित वनवासी समाज ने आहार उगाना स्वयं सीखा – आर्य हुये। 
इन्‍द्रम् वर्धन्तो अप्तुर: कृण्वन्तो विश्वमार्यम् । 
अपघ्नन्तो अराव्ण: ॥ 
इस ऋचा के पीछे मानव सभ्यता का इतिहास बोलता है। 
द्विज भ्रष्ट हुआ, जीवन भ्रष्ट हुआ, समाज भ्रष्ट हुआ। आधुनिक वैश्विक चेतना प्रचार के नेपथ्य में देखें तो आप को यही सनातन प्रज्ञा परिवर्तित प्रस्तुति के साथ मिलेगी। नदी को प्रदूषित करना अद्विज कर्म है, सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करना, प्रदूषण प्रसारित करना, अनियन्‍त्रित भोग, भ्रष्ट धन संग्रह, अ-दान इत्यादि इत्यादि समस्त के पीछे द्विजत्व का क्षीण होना ही है। 
इस क्षीणता से ही भ्रम की स्थिति है जोकि जातवेद की तुलना में जावेद को प्रतिष्ठित करती है, त लुप्त है। भास्वित या प्रकाशित 'भ' को ऊष्म वह्नि 'र' के साथ धारण कर सकने वाला ‘त’ न हो तो न भरत होने, न भारत, अन्य देशों की नियति मैं नहीं जानता।
भ्रम इतना व्यापक है कि हमें पता ही नहीं चलता ! मैट्रिक्स फिल्म की भाँति, अत्यल्प को वास्तविकता का आभास या ज्ञान होता है। हम अंधे हुये भागे जा रहे हैं। भग देवता की एक आँख फूटी थी, हमारी दोनों हैं। 
द्विजत्व के क्षीण होने के कुछ उदाहरण देखें। मुस्लिम राजपूत। वीडियो चलते हैं, साक्षात्कार होते हैं कि हम मुस्लिम राजपूत हैं जी, भगवान राम हमारे पुरखे हैं। कई पीढ़ियों पहले हमारे पूर्वज मियाँ बन गये थे किन्‍तु हैं हम राजपूत ही ! लोग चरमानंद की प्राप्ति के साथ प्रसारित करने लगते हैं। भाई! जब ज्ञान हो ही गया है तो मरुस्थल के लुटेरे को तज लौट क्यों नहीं आते? 
न जी, हमें तो हुजूर प्यारे हैं उनकी शान में उल्टा सीधा न बोलो, तुम्हारे गले पर सल्ला फेर देंगे। आयेंगे तो तुम्हारी बिरादरी में ही, बोलो बेटी दोगे? 
भारी समस्या। पतित हुये, मल पीढ़ियों तक ढोते रहे, लौटना है तो उनकी बेटियों के लिये ही, जिनके पुरखों ने, जिन्होंने सब कुछ सह कर भी अपना सत्व न छोड़ा, धर्म नहीं छोड़ा ! 
जावेद खान राजपूत भाई! आर्यसमाज है, नित्यानन्‍द हैं, अनेक विकल्प उपलब्ध हैं। लौट आओ। 
न जी, रहेंगे तो मुसलमान ही, लौटे तो हमें वही चाहिये। 
... इन्हें आप सिर पर उठाये हुये हैं ! इनकी शान में नातिया कलाम रचे गाये जा रहे हैं। 
यही पतित होना है, भ्रष्ट होना है। 
पढ़ना लिखना कुछ नहीं, शस्त्र के साथ शास्त्र नहीं, समाज को क्षत से बचाने वाले ये क्षत्रिय हैं। जो मार देंगे, काट देंगे का दिन रात जप करते हैं, आवश्यकता पड़े तो लाठी भी न उठे! जीन्स सरकने लगेगी !!  
दूसरा पक्ष है इसाइयत का, पढ़े लिखे हिंदुओं को बहुत सहानुभूति है उनसे जिनमें द्विज श्रेष्ठ ब्राह्मण सबसे आगे हैं। ब्राह्मण? चौंक गये न?? 
अरे! ब्राह्मणों का मतान्‍तरण तो सबसे अल्प है, क्या बक बक कर रहे हो? 
भैया जी‍ ! मैं बपतिस्मा पढ़ कर क्रॉस लटकाये की बात नहीं कर रहा, तिलक लगाये मानसिक इसाई की बात कर रहा हूँ। शिक्षा दीक्षा में परम्परा से ब्राह्मण को आगे रहना है। आजकल भी हैं। आजकल की शिक्षा पद्धति की वास्तविकता क्या है? इसाइयत का प्रसार। पढ़ाई जाने वाली करुणा भी इसाई करुणा है, बचपन से मस्तिष्क प्रक्षालन। प्रक्षालितों में सबसे आगे ब्राह्मण। भारत का वर्तमान तन्‍त्र नीचे से शीर्ष तक बैठे इन मानसिक इसाइयों से लड़ रहा है। इनके कारण ही वह हाजी अली, हाजी अली जपना तज नहीं पा रहा क्योंकि उसे पता है कि चाँद मियाँ उर्फ साईं बाबा को प्रतिष्ठित भी इन्हीं मानसिक इसाइयों ने किया। अब्राहमी भाईचारा ‘त’ विहीन, अग्नि च्युत, संस्कार मुक्त, sterile भारत की समस्त विश्व को देन है। उसके साथ कम्युनिज्म को भी जोड़ दें तो परशु परशु जपते, साथ में मुसलमान पिता की संतान कैथोलिक इसाई को जनेऊ पहना ‘पण्डित’ घोषित करने वाले कौन हैं? कम्युनिज्म के शीर्ष पर सबसे अधिक कौन मिलेंगे? हाँ, ठीक समझे। 
द्विजों, द्विजबंधुओं ! क्षमा करना, इस देश को संस्कारहीन अद्विजों ने नहीं, संस्कार’च्युत’ विप्रों ने, मूँछ मरोड़ते राजन्य वर्ग ने, स्वार्थी तोंदुल वैश्य ने गर्त में पहुँचाया। सोशल मीडिया पर इनके सबसे अधिक जातिवादी 'गोपनीय' समूह हैं, राम जाने वहाँ क्या करते रहते हैं!  
विचित्र विभ्रम की स्थिति है। अनेक युवा तेजस्वी ब्राह्मण भी मूर्खता नहीं तज पा रहे। वे सम्मिलन की बातें करते हैं किन्‍तु यह स्थूल सच देख ही नहीं पाते कि अब्राहमियों ने तुम्हारा कितना अपनाया? कई पूजा घरों में साँई बाबा के साथ इसा मसीह भी मिलेगा, किसी अब्राहमी के घर में राम, कृष्ण, शङ्कर मिलेंगे? सब कचरा करने का ठीका तुमने ही क्यों ले रखा है भाई?
पाश्चात्य फैशन प्रचार जैसे फेमिनिज्म से ये बहुत प्रभावित हैं। मेधावी हैं ही, भारत के संदर्भ में परिवर्तित कर प्रस्तुत करते हैं – आह, उह, वाह तीनों एक साथ पाने के लिये। दर्शायेंगे कि कैसे तंत्र साधना पद्धति स्त्रियों के नेतृत्व में एक अनजान से गाँव में आज भी प्रचलित है, स्थापित है। श्रेय किसे? विदेशों में बसे वहाँ के भारतीयों को। 
लगे हाथ यह भी बताते चलेंगे कि वे स्त्रियाँ इसाई हैं, बपतिस्मा भी लिया हुआ है, चर्च जाती हैं किन्‍तु अपना तंत्र मार्ग नहीं छोड़ा। 
अरे भोंदू! 
इसी प्रवृत्ति का लाभ तो इसाई मतांतरण करने वाले उठा रहे हैं! तुम्हारी अनुकृतियाँ लगा कर मूर्ख बनाते हैं किन्तु अपना मूल कभी नहीं छोड़ते। चर्च में योनिपीठम् की स्थापना करा कर देखो तो ! इसा को तज रुद्र की प्रतिमा लगाने की बात करो तो !! 
वे लोग तंत्रमार्गी नहीं, तुम्हारे ही समान भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के जने हैं जिन्हें मूल सच ही नहीं दिखता कि जड़ों में दीमक लगे हैं। जिन्हें गले लगाये हैं, वे कर्कोटक नाग से भी अधिक घातक हैं।   
ऐसे विप्रों के साथ सबसे बड़ी समस्या धूर्तता है जोकि कभी कभी बहुत ही भोलेपन के साथ ‘भी’ दिख जाती है। धूर्तता भोलेपन के साथ? इस कारण कि वह अब सहज स्वभाव बन चुकी है, पता ही नहीं चलता रे कि क्या कर रहे हैं! हजार शब्दों का लेख लिखेंगे, एक वाक्य, केवल एक वाक्य दस से बीस शब्दों का, प्रवाह के साथ ही डाल देंगे। 
वह वाक्य ही जामन का, नींबू के रस का काम करता है – अवचेतन के स्तर पर। सारा दूध जम कर, फट कर व्यर्थ ! भ्रष्ट विप्र सबसे घातक होता है क्यों कि वह आप के अवचेतन से खेलता है। कहते हैं न, मन्‍त्र की शक्ति शस्त्र से कई गुनी? आधुनिक समय का मन्‍त्र है – अवचेतन के स्तर पर प्रदूषण एवं प्रहार। ऐसे विप्रों से सावधान रहें, जातिवाद की माला जपते शूरवीरों से सावधान रहें, भ्रष्ट द्विजों से सावधान रहें, सतर्क रहें। 
.... 
बतकूचन बहुत हो गई, वास्तविक काम का समय आ गया है। नीचे लिखे संदेश को ट्विटर पर लगायें ताकि सोई हुई भारत सरकार के जगने की प्रायिकता में वृद्धि हो।

लोकतंत्र में जन दबाव काम करता है। सोती हुई सरकार को जगायें एवं स्वयं भी जागृत हों। समाज एवं परिवेश पर सजग दृष्टि रखें। जो हिंदू भाई वास्तव में संकट में हैं, उनकी सहायता करें। इसाई भेंड़िये ऐसों की ही सहायता कर मतांतरण कराते हैं। 

twitter.com एक माइक्रोब्लॉगिंग साइट है जो विविध सरकारी संगठनों के ध्यानाकर्षण हेतु बहुत प्रभावी है। 
अनुरोध है कि यदि वहाँ खाता न हो तो बनायें एवं नीचे लिखे संदेश को कॉपी कर के पोस्ट करें ताकि प्रधानमंत्री, उनके कार्यालय एवं गृहमंत्री तक संदेश पहुँचे। इसे अधिकाधिक साझा करें तथा अपने मित्रों एवं परिचितों को भी करने के लिये प्रेरित करें। हिंदू धर्म एवं भारत वास्तव में संकट में हैं। 
मैं दक्षिण में देख रहा हूँ, जिसकी पुनरावृत्ति उत्तर में होने वाली है। 

विश्वास करें कि न तो इससे आप की पवित्रता पर आँच आयेगी, न उदारता पर, न आप पर धर्मांधता की चिप्पी लगेगी। आप के आराध्य भी रुष्ट भी नहीं होंगे। मोहनदास वास्तव में प्रसन्न होंगे क्यों कि ‘सामान्य हिंदू कायर होते हैं’, उनकी यह सत्य की खोज असत्य सिद्ध हो जायेगी। आप को कोई घातक रोग भी नहीं पकड़ेगा। भारत सरकार आप के विरुद्ध कोई कार्रवाई भी नहीं करेगी। 

... कहने का अर्थ यह है कि आप को कोई हानि नहीं पहुँचनी, हाँ एक बहुत बड़ी आसन्न आपदा को बाधित करने में आप का यह एक अति लघु योगदान अवश्य होगा। 
Choice is yours! 
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@narendramodi @PMOIndia @rajnathsingh इसाई संगठन जोशुआ प्रोजेक्ट भारत में मतान्‍तरण में लिप्त है।इसके विशाल तन्‍त्र,डाटाबेस से स्पष्ट है कि इसे अकूत अमेरिकी फंडिंग है।राष्ट्रहित में कृपया इसे एवं इसके ये वेबसाइट भी प्रतिबंधित करें https://joshuaproject.net/countries/IN , https://godlovesyadav.org
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गुरुवार, 24 मई 2018

नारद पुराण में राम उपासना

नारद पुराण में विविध आराध्यों की उपासना विधियाँ बीज मन्‍त्रों, न्यासादि के साथ दी हुई हैं। फेसबुक पर श्री विशाल वर्मा ने 'र' अक्षर की महत्ता पर लिखा तो सहज ही ध्यान में आया कि तन्‍त्र में शारदा लिपि की अक्षर-मात्रायें देवी विग्रह के रूप में भी जानी जाती हैं।

वैदिक शब्द 'भरत' अग्नि अर्थ में भी प्रयुक्त है, 'र' वर्ण को अग्नि से सम्बद्ध बताने के संदर्भ उपलब्ध हैं। मैंने सोचा कि पुराण अध्ययन क्रम में नारद पुराण में ढूढ़ूँ तो सम्भवत: कुछ मिल जाये। क्या संयोग है! मिल ही गया। 
रामोपासना का मन्‍त्र 'रामाय नम:' वैष्णव मन्‍त्रों में सर्वाधिक फलदाता है, गाणपत्यादि मंत्रों से कोटि कोटि गुना प्रभावी।... 
वैष्णवेष्वपि मन्त्रेषु राममन्त्राः फलाधिकाः । गाणपत्यादिमन्त्रेभ्यः कोटिकोटिगुणाधिकाः ॥ १,७३.३ ॥

विष्णुशय्यास्थितो वह्निरिन्दुभूषितमस्तकः । रामाय हृदयान्तोऽयं महाघौधविनाशनः ॥ १,७३.४ ॥

...
दूसरे श्लोक में 'र' वर्ण की विवेचना स्पष्ट होती है।वह्नि अर्थात अग्नि रूपी अक्षर 'र' विष्णु शय्या पर अवस्थित है। 'म' रूपी सोम (चन्द्र) इसके मस्तक पर विराजमान है तथा यह 'आय' से अंत होता है -
रामाय नम:।

बीज रूप में राम को वर्णन अनुसार 'राँ' लिखा जाना चाहिये। एकाक्षर रघुपति मन्त्र, मानों दूजा कल्पवृक्ष। 
...
वह्निः शेषान्वितश्चैव चन्द्रभूषितमस्तकः । एकाक्षरो रघुपतेर्मन्त्रः कल्पद्रुमोऽपरः ॥

...
वह्नि: - अग्नि स्वरूप 'र'
शेषान्‍वित - शेष अर्थात 'आ' की मात्रा [लक्ष्मण को शेष का अवतार भी कहा जाता है]
चन्द्रभूषित मस्तक: - सिर पर चन्द्रबिन्दु
(ँ चिह्न तन्‍त्र में विविध अर्थ रखता है, शक्ति से भी सम्बंधित, जाने क्यों चंद्रवदनी सीता देवी ध्यान में आने लगती हैं, 'राँ' अरण्य में रमते राम, सीता एवं लक्ष्मण का प्रतीक तो नहीं?)

मुझसे बहुत पहले किसी ने पूछा था कि सूर्यवंशी राम 'रामचंद्र' क्यों कहे जाते हैं। प्रतीत होता है कि आज उत्तर मिल गया।
यह मंत्र महापापों का विनाश करने वाला है। राम बीज है, नम: शक्ति। इसकी महत्ता ऐसे लिखी गयी है:
सर्वेषु राममन्त्रषु ह्यतिश्रेष्ठः षडक्षरः ।
ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञाताज्ञातकृतानि च ॥ १,७३.५ ॥

स्वर्णस्तेय सुरापानगुरुतल्पायुतानि च ।

कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यानि वै ॥ १,७३.६ ॥

मन्त्रस्योञ्चारणात्सद्यो लयं यान्ति न संशयः ।
ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छन्दो रामश्च देवता ॥ १,७३.७ ॥
आद्यं बीजं च हृच्छक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये ।
षड्दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥ १,७३.८ ॥


श्रीराम राजसभा में हनुमान जी का ध्यान प्रभु के आगे पुस्तक बाँचते हुये करना चाहिये - वाचयन्तं हनूमन्तग्रतो धृतपुस्तकम्। 

लोक में र एवं म के इन स्वरूपों की स्मृति भी है। पं. छन्नूलाल मिश्र के गायन में सुनिये : 


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गुरुवार, 17 मई 2018

राम से बड़ा राम का नाम : भीम को बुद्ध से कुछ नहीं लेना देना !

भीम को गौतम बुद्ध से कुछ नहीं लेना देना था। बुद्ध का अनुयायी होता तो मनुस्मृति जलाने का आयोजन ही नहीं करता ! तो उसने बौद्ध धम्म क्यों अपनाया? रहस्य उसके पिता के नाम में है तथा गंगा-यमुना क्षेत्र के समतल भाग से सह्याद्रि तक पसरे विराट भू भाग में चतुर्थ वर्ण द्वारा सबसे अधिक प्रयुक्त नाम/उपनाम 'राम' में है। वह राम से उनके जुड़ाव को समझता था। एक भगवान की काट दूसरे भिन्न वैचारिक भगवान में ही थी, न तो मूर्ति भञ्जक इस्लाम में, न सलीबधारी ख्रिस्तान में। प्रतीक वास्तविकता से कई गुना शक्तिशाली होते हैं। बुद्ध एक आकर्षक प्रतीक हैं - सङ्कीर्ण मानसिकता वालों की घृणा के कारण भी एवं अपने चमत्कृत कर देने वाले व्यक्तित्व के कारण भी। कर्मकाण्डों के विरुद्ध तो हैं ही, यह बात दूजी है कि स्वयं अनुष्ठान भी करवाते थे! अहिंसा के आवरण में चरम द्वेषी हिंसक प्रचार एवं पीढ़ियों तक चलने वाले मस्तिष्क प्रक्षालन को छिपाना बहुत सरल था। भावी सत्ता तंत्र भी बुद्ध के प्रति सहानुभूति का भाव रखता था। ऐसे में नवजात पंथ को पालना, पोसना एवं भविष्य हेतु तत्पर संघर्षियों को बौद्ध धर्म से इतर किसी आड़ में ढालना असम्भव था। मोहनदास एवं भीम, दोनों प्रतीकों की शक्ति जानते थे एवं दुर्लभ यशलिप्सा की मानसिकता के कारण एक दूसरे को प्रतिद्वंद्वी पाते थे। इसी कारण उनकी टकराहटें भी हुईं। कभी विचार करें कि उसने जलाने को मनुस्मृति ही क्यों चुनी जब कि उसके अनुसार तो न कोई शासन तंत्र चलता था, न ही कोई समाज तंत्र? मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति की टीका थी एवं दायभाग विविध स्मृतियों से चुन कर संग्रहीत संकलन की भाँति। इन दो से ही हिंदू विधि का बहुत महत्वपूर्ण अंश चालित था। भीम ने दहन के लिये इन्हें नहीं चुना। इस चयन में भी उसकी धूर्त मेधा के दर्शन होते हैं। मनु को सबने प्रमाण माना है, वे सबसे प्राचीन धर्मशास्त्री हैं। मनु सनातनी जीवन शक्ति के शीर्ष पितर हैं। तत्कालीन हिंदू जीवन पद्धति पर स्मृतियों का गहरा प्रभाव था, मुख्य केंद्रीय क्षेत्र के अधिकांश हिंदू स्मार्त कहलाते थे, विशुद्ध एवं कट्टर शैव, वैष्णवादि उनकी तुलना में अल्प थे। उसने मनु एवं उनकी स्मृति पर प्रहार को एक बहुत ही सशक्त प्रतीक के रूप में चुना। आज जो कतिपय गाँवों के घरों से हिन्‍दू देवी देवताओं के चित्र एकत्र कर जलाये जाते हैं, उनके मूल में बुद्ध का आश्रय एवं मनु का विरोध, ये दो संरक्षक पोषक तत्व हैं। इन हिंसकों को न तो बौद्ध धर्म से कोई लेना देना है, न बुद्ध से। बुद्ध प्रतीक अस्त्र के रूप में प्रयुक्त हो रहे हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार परशुवादियों को न तो जमदग्नि से कुछ लेना देना, न पुत्र राम के साथ उनके द्वारा शोधित संवर्धित आर्ष विद्याओं से। राम जामदग्नेय का विकृत परशुधारी रूप बहुत ही प्रभावी एवं आकर्षक प्रतीक है जिसकी ओट ले कल्मष छिपा कर उसका संवर्धन किया जा सकता है। प्रतीकों से सावधान रहें। उनके स्थान पर उन व्यक्तित्वों का अवगाहन करें जिनके आधार पर प्रतीक गढ़े गये हैं। ढेर सारे मिथ ध्वस्त होंगे, प्रकाश मिलेगा। वैसे आज कल प्रतीकों का सबसे सफलता पूर्वक नवोन्मेषी प्रयोग इसाई कर रहे हैं। ... आ च॒ वह॑ मित्रमहश्चिकि॒त्वान्त्वं दू॒तः क॒विर॑सि॒ प्रचे॑ताः ॥ - पिता जमदग्नि के साथ राम द्वारा दर्शित ऋचा। हे मित्रों का सत्कार करने वाले! ज्ञानवान हो कर तू देवों को हमारे इस यज्ञ में ले आ। क्रांतदर्शी एवं उत्तम चित्त वाला तू उनका हितकर्ता दूत है। ... अन्‍धभूतो अयं लोको तनुकेत्थ विपस्सति। - बुद्ध यह लोक अन्‍धे के सदृश है, यहाँ देखने वालों की संख्या अल्प है।