बुधवार, 14 नवंबर 2012

दूसरा कमरा

दोनों एक कमरे में एक ही समय सोने लगे हैं। पति पत्नी के लिये कोई असामान्य बात नहीं लेकिन इस वृद्ध युगल के लिये है। इसलिये कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, युवावस्था में भी नहीं। बूढ़ा कहता है कि अकेले कमरे में उसे कउवावन लगने लगा है। जाने इस शब्द का उत्स क्या है लेकिन इतना पता है कि यह एकांत के भय और ऊब से आगे की बात है। वृद्धा जन्मजात खर्राटेबाज है शायद और इस आयु में नींद वैसे ही कच्ची हो जाती है, चुनांचे बूढ़ा ठीक उस समय पलंग पर आ विराजता है जब चटकते हाड़ लिये थकी उसकी संगिनी सोने आती है ताकि जब तक नासिका गर्जन प्रारम्भ हो वह भी सो जाय। दोनों जागते हुये सोते हैं लेकिन पहली नींद बिन विघ्न बाधा सम्पन्न हो जाय तो अच्छा रहता है।

जिस दिन ऐसा होना शुरू हुआ उस दिन सूर्य और चन्द्र विशाखा में, शुक्र मूल में और बृहस्पति स्वाती नक्षत्र में थे। बाकी ग्रहों की याद नहीं। अपने पोते के जन्म समय को वृद्ध ने इसके लिये उचित समझा। उसे विश्वास था कि डाँट नहीं पड़ेगी और नमक मिर्च मसाले में पुत कर यह बात पतोहुओं तक नहीं पहुँचेगी। दिन दिनांक बूढ़े को याद नहीं। उसका बेटा एक दिन पहले पोते के जन्मदिन की याद दिलाता है कि पहला हैप्पी बड्डे सन्देश आप का होना चाहिये, वह प्रतीक्षा में रहता है!  

वृद्ध यह सोच हैरान होता है कि बगल में सोती पत्नी में एक खास छाँव भी है जिससे इतने दिन वह वंचित रहा। यह वह छाँव है किसकी पुतली बैठ स्मृतिकाक संतोषी कहानियाँ कहते हैं, जिन्हें बूढ़ा अपना इतिहास कहता है। रात बिरात जगता है तो खर्राटों के बगल में बैठ वह पाठ करता है, पूछ्ता है कि इतिहास राजा रानियों और बड़े लोगों के ही क्यों लिखे जाते रहे? ऐसी बात का कोई मोल नहीं फिर भी वह पाता है कि वे जीवित इतिहास हैं। होश सँभालने से ले कर अब तक कितनी घटनायें उनके अस्तित्त्व पर दर्ज हैं। उसे आश्चर्य होता है कि आँखों देखी और कानों सुनी बातों घटनाओं में भी सच झूठ इतनी जल्दी घुस जाते हैं गो कि इतिहास कोई निर्वात हो जिसे इन्हें भरना ही हो!

वह पानी पीता है और जग का ढक्कन बन्द करते अन्धेरे में लाल लाल चमकती टी वी स्विच की स्टैन्डबाई एल ई डी को देख सोचता है – वे दोनों भी अब उसी मोड में हैं। बाल बच्चे आते हैं तो ऑन कर देते हैं। एक ही सीरियल में जाने कितने चैनल खुल जाते हैं। बताने और बात करने की उमंग में दोनों अक्सर उलझ जाते हैं और सुनने वाली बहुयें और बेटे भी असमंजस में पड़े रहते हैं कि सुनें तो किसकी सुनें! बाद में बूढ़ा उनके घबराये और भ्रमित सी मुख भंगिमाओं की सोच मुस्कुराता रहता है – छोटकी एच आर अधिकारी है, बुढ़िया के आगे उसकी सारी पॉलिश उतर जाती है और बड़की? दोनों के लिये सुशील बहू बनने के चक्कर में गड़बड़ा जाती है। सबसे अच्छा बड़का है - स्टैंड पर टेबल फैन की तरह घूमता दोनों की बारी बारी सुनता है और जब आँखें फेरता है तो सुखद बयार बहा ले जाती है। छोटका अभी बच्चा है, मूड़ गाड़े हूँ हाँ करता रहता है।

वे लोग उनकी बातों में अपने हिस्से का सच झूठ ढूँढ़ते रहते हैं। नहीं, बूढ़ा सोचता है कि वे दोनों वाकई इतिहास के सच जैसे हैं जिसमें सब अपने अपने झूठ ढूँढ़ते हैं। यही बात उसे कचोटती है। वह जानता है कि हजारो वर्षों पहले से ऐसा होता चला आ रहा है और कचोट भी उतनी ही पुरानी है फिर भी हैरानी की बात यह है कि इस पर हैरानी हुये बिना नहीं रहती।

बूढ़ा फिर से जीने लगा है और यह सोच थोड़ा सहम भी जाता है कि मृत्यु के समय बिताया गया जीवन क्रमश: सामने दिखने लगता है। उसे हैरानी भी होती है कि बुढ़िया को ऐसा कुछ नहीं होता वोता। टिकठी बाँधते उसकी आँखें सूखी हैं। वह सोच रहा है कि क्या अब वह अकेले सो पायेगा? खर्राटे, छाँव, उस पर विराजते कउवे और इतिहास सब समाप्त नहीं हो जायेंगे अब? कफन की आखिरी गाँठ बाँधते वह बुदबुदाया है – प्रिया को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और मुस्कुराने लगा है।
उसने बड़के से कहा है –जीवन ही सत्य है। तुम्हारी माँ मरी नहीं, दूसरे कमरे में अलग सोने चली गयी है। अगले महीने जब छोटकी की संतान होगी तो मैं भी उस कमरे में चला जाऊँगा... उठाओ अब! ...रोते नहीं। राम नाम सत्य है।

रविवार, 11 नवंबर 2012

दीपावली की खिचड़ी

बीता वर्ष अच्छा रहा। अपने लिये अपने अनुसार जीवन का एक सार्थक वर्ष बीता। विघ्न बाधायें रहीं, कुछ तो बहुत पीड़ादायक लेकिन मेरी यात्रा जारी रही। जो महत्त्वपूर्ण काम करने थे, पूरे नहीं हुये लेकिन प्रक्रिया चलती रही। यदि मृत्यु के समय कोई चाहना बाकी न रह जाय तो उसे ही मुक्ति मानना चाहिये। मैं उसी दिशा में चल रहा हूँ और यात्रा दिनों दिन निज को भरपूर करती, नये को विस्तार देती आसक्ति के उन आयामों में विचरती बीत रही है जो होश सँभालने के साथ ही आ जुड़े थे किंतु बीच के बहुत बड़े कालखंड में दुर्गम कोने अतरों में लुप्त हो गये थे।
अद्भुत बात यह रही कि मैं बाहर जितना ही मुखर हुआ भीतर उतना ही मौन साक्षी होता गया। मनुष्य और उसकी सृष्टि को शिशुवत समझता रहा।
पिता का 'ज्ञानवृद्ध पुत्र' अब वस्तुत: वृद्ध हो रहा है - देवत्त्व की ओर। कहते हैं 75 की अवस्था में मनुष्य देव हो जाता है। आशा है तब तक तो जियेगा ही 
आज जब कि धनतेरस की तैयारियाँ चल रही हैं, कृतज्ञ भाव से माता पिता, बन्धु, पत्नी, संतानों और अपने नियोक्ता के लिये सोचता लिख रहा हूँ। पार्श्व में कुमार गन्धर्व गा रहे हैं – नाथ हा माझा मो.. ही खला

इतने खल जनों से घिरा हूँ कि लगता है खल से ही ‘ख’ माने अंतरिक्ष और ‘खलु’ माने समस्त बने होंगे! लेकिन उन सब के होते हुये भी यदि आज इस तरह लिख पा रहा हूँ तो कोई नाथ भी होंगे ही। इस अनुमान को आप एक नास्तिक की आस्तिकता कह सकते हैं।
***** 
कल देर रात प्राची में बृहस्पति को निहारता रहा। देवगुरु बृहस्पति मुझ गुरुविहीन को चिढ़ाते से लगे। वे क्षण थे जब मैं किसी के साथ होते हुये भी नहीं होता। अक्सर ऐसा होता है क्यों कि जो साथ होते हैं उनसे कुछ कहना व्यर्थ ही होता है। ऐसे में एक साथ चेतना के दो स्तरों पर जीना होता है। 
आकाशीय प्रदूषण के कारण देवगुरु के अतिरिक्त चन्द तारे ही दिख रहे थे लेकिन मुझे पता था कि आज की रात देहाती नभ में इस समय सुरसरि के मनुसरि गंगा होने का दृश्य दिख रहा होगा। मृग राशिरूप रुद्र के मस्तक पर एक ओर से ब्रह्महृदय और बृहस्पति के मध्य होती हुई देवसरि आकाशगंगा  उतर रही होगी और दूसरी ओर से स्रोतस्विनी (Eridanus) गंगा बन भू की ओर बढ़ रही होगी।
gangaavataran
मूर्ख हैं हम जो इन गाथाओं को बस कपोल कल्पना मिथक कह नकारते रहे हैं। ये मिथ और धरा के इतिहास एवं वास्तविकताओं को नभ में सर्वदा के लिये अंकित कर देने के उपक्रम उन विलक्षण प्रतिभाओं का आभास कराते हैं जिनके उर्वर मस्तिष्क में एक अद्भुत  शक्ति जागृत थी – कल्पना। उनकी कल्पनायें ऋत से सम्वाद करती उन मूल्यों को गढ़ती और जीती रहीं जो आज भी प्रासंगिक हैं। आज की शब्दावली है नवोन्मेष यानि Innovation जो बिना कल्पना के असम्भव है। नहीं लगता क्या कि तमाम प्रगति के होते हुये भी कहीं हम भारतीय अपनी कल्पना शक्ति को खोते रहे हैं? प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल के ये शब्द भी पढ़ने को मिले:
‘...इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा संकट कल्पना का संकट है। इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी विफलता स्मृति और कल्पना की विफलता है। हम अपनी स्मृतियों से सीखना नहीं चाहते। हम अपने भविष्य की प्रदत्त कल्पनाओं से आगे जाकर कल्पनाएँ नहीं करना चाहते। ये सबसे बड़ा संकट है। और ये संकट ही हमारा स्थान है। हम ऐन इस संकट के बीचोंबीच खड़े हैं। मैं नहीं जानता कि ये कामना करने का पर्याप्त आधार हमारे पास है या नहीं लेकिन फिर भी यह कामना करना चाहता हूँ कि हम इस स्थान पर खड़े हो करके कल्पना के पुनर्वास का, विवेक के पुनर्वास का साहस कर सकें। तब संभवतः हम सचमुच अपने आप से कह सकेंगे कि हम दीप हुए, दीप भव होने की कामना हमने सचमुच पूरी करने की कम-से-कम कोशिश की।
*****
वरेण्य प्रकाशरूप सविता को चित्त में धारण करने का आह्वान करने वाले ऋषि विश्वामित्र बृहस्पति के लिये ऋक् संहिता में कहते हैं:
वृषभं चर्षणीनां विश्वरूपमदाभ्यम्। बृहस्पतिंवरेण्यम्॥
बृहस्पति विश्वरूप है। वह वरेण्य कहीं हमारी कल्पना शक्ति ही तो नहीं? विश्वामित्र जैसा कल्पनाशील और क्या कह सकता है?
ऋषि वामदेव तो सम्भवत: सूर्य में ही बृहस्पति का दर्शन कर लेते हैं:    
बृहस्पति: प्रथमं जायमानो महो ज्योतिष: परमो व्योमेन् 
सप्तास्यस् तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिर् अधमत् तमांशि। 
 वह प्रकाशपुंज के भीतर से सर्वोच्च नभ में प्रथम जन्मा है। सप्तरश्मियों के आलोक और अपने उद्घोष द्वारा हमें घेरे अन्धकार को दूर भगा देता है।  
टी वी पर, समाचारों में, हमारी चर्चाओं में और हमारे कर्मों में हर ओर खल तम का हाहाकार है। आज के दिन मेरी कामना है कि आगे आने वाले समय में हम ऐसे उद्घोष करें और उनके साक्षी भी हों जो तमस अन्ध हाहाकार को शमित कर दें। शब्दों और उद्घोष की दुर्दशा, उनके क्षुद्र व्यक्तिगत हित में उपयोग शमित हों।   
दीपावली राम की वापसी का पर्व है – ज्योतिपर्व। खल रूपी तम के पराभव का पर्व। कहते हैं कि हजारो वर्षों तक लोककंठ में रहने के पश्चात यह गाथा वाल्मीकि द्वारा पहली बार स्वरबद्ध हुई – क्रौंचवध के दृश्य की कारुणिकता और शोक से उपजा श्लोक छ्न्दगान। यह श्लोक दैवी उद्घोष है और वाल्मीकि से पहले इसी अर्थ में प्रयुक्त था। वशिष्ठ कहते हैं:
तम् उ ज्येष्ठं नमसा हविर्भि: सुशेवम् ब्रह्मणस् पतिं गृणीषे।
इन्द्रं श्लोको महि दैव्य: सिषु यो ब्रह्मणो देवकृतस्य राजा।
 (ऋक् 7-097-03)
विद्वान इस ऋचा में श्लोक का अर्थ वृहद दैवी लय और सर्वोच्च भाव से प्रेरित शब्दों से लगाते हैं जो कि आत्मा पर शासन करने वाले इन्द्र को व्यक्त करते हैं। वाल्मीकि की वीणा के लय पर बद्ध रामकथा इस अर्थ में एक प्रकाशकथा है।

हमारे दूसरे महाकाव्य महाभारत में जो भगवद्गीता है उसे तमसअन्ध-राष्ट्र को दिव्यदृष्टि प्राप्त संजय सुनाता है और अंत में अपना मत ‘मतिर्मम’ व्यक्त करते हुये जीवन के सार प्रस्तुत करता है: श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीति:।
ये सार हम सबको प्राप्त हों:
श्री – अंत: और बाह्य सौन्दर्य
विजय – आंतरिक और बाहरी शत्रुओं पर विजय
भूति – दैवी और भौतिक सम्पदा
ध्रुव नीति – दृढ़ नीति

और
किसी सुलझे व्यास को यह कहने की नौबत न आये:
मैं बाँह उठा उठा कर कहता हूँ लेकिन कोई नहीं सुनता, मेरी कोई नहीं सुनता!
... हमें व्यर्थ के शोर से मुक्ति मिले, दिन प्रतिदिन बजते दगते पटाखों के बजाय हम अपने भीतर की लय पर नये ‘श्लोक’ रचें। ganga_descent_high
शुभमस्तु ॥

शनिवार, 10 नवंबर 2012

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 21

पिछले भाग से आगे ...


किसी से चिन्हार दो बार होती है। बहुत बार पूरा जीवन एक बार की पहचान में ही निपट जाता है। दइ के मारे और दैव की अदृश्य डोर से जुड़े जन दूसरी दफा पहचान के लिये जनम जनम भटकते रहते हैं। विधना पलक झपकाना भूल जाती है।    घटाटोप अन्धेरे में जब राह नहीं सूझ रही हो तो सहारा भर किसी की एक बाँह उससे दूसरी बार पहचान कराती है। जब सारे जग ने रुख मोड़ लिया हो, जब सगुन के स्वर किंवाड़ों से टकरा टकरा टूटने लग रहे हों तब संगत करने को जुड़ने वाले स्वर से पहली पहचान वालों में से हीतू चीन्हा जाता है। यह उसकी दूसरी चिन्हार होती है।
उमड़ते आँसुओं से आँखें धुँधली हो रही हों, कंठ गलदश्रु हो रहा हो, तब पहली टपक को मान देने के लिये जो दर्शन देता है, साफ आँखों से उसकी दूसरी पहचान होती है और जीभ से सरस्वती लुप्त हो जाती हैं...

ऊँचास छत वाले खपड़ा घर में भीतर अन्धेरा सा था। खुले आँगन की ओर मुँह कर देवर के फटे नरखे(अंगरखा) की तुरपाई करती लछमिनिया भउजी हर सीवन में अपने घर के लिये मंगल पिरो रही थी। कुलदीप उसकी कोख में पल रहा था और बाहर दुनिया भर भड़भुजवे भर भर आँवा बालू दहकाये हुये थे। उनकी दहकायी आग में अन्हार था, अन्हार।
देवर सोहित का हाल ठीक नहीं था। मरद मानुस जब धीरज छोड़ दें, कुसंग प्रबल हो जाय तो घर कुघर होते देर नहीं लगती। सब कुछ के बावजूद भउजी अब निश्चिंत थी। उसे भरोसा था कि सब ठीक होगा। उसे अपने ऊपर भरोसा था, अपनी मंगल कामना पर भरोसा था – जिनिगी होम क देहलीं, का अब्बो राम नाहिं पसीजिहें?
(मैंने जीवन का होम कर दिया, क्या राम अब भी दया नहीं करेंगे?)
   
उंगली में सूई चुभी तो छुद्दुर घाव (क्षुद्र चोट)  का आसरा ले पीर रिस उठी, मृत पति को सम्बोधित सी भउजी गाने लगी:
सइयाँ तोहार नगरी सुन्नर सुन्नर, जहाँ केहू आवे न जावे हे राम!
चाँद सुरज जहाँ, पवन न पानी, के हमार सनेसा पहुँचावे हे राम ...

सम पर रुकते ही आहट मिली – ई त बबुना नाहीं हउवें, के ह? (ये तो देवर जी नहीं हैं, कौन है?) भउजी ने खड़े हो मुँह फेरा - घरदुआरी से बाहर मतवा खड़ी दिखाई दीं- भीतर अन्हार बाहर अँजोर। पूरी बीती जिनिगी ज्यों निचुड़ कर सामने देवी मूरत बन खड़ी हो गई हो! लगा कि देह एकदम से हल्की हो गई।

बरसों के उपेक्षा बहिष्कार सब टूट गये! सच्चो, नगिनिया!!
देवता एतना जल्दी दुआर! का देबू ए मतवा? का देवे अइलू ए दुपहरिया?
(देवता इतनी जल्दी आ पधारे!  क्या दोगी ऐ मतवा? इस दुपहर क्या देने आई हो?) हाथ से नरखा छूट गया, टूटी पात लहर हिचकोले, भउजी बह चली। आँखों ने भरपूर चीन्हा और बन्द होती गईं।

मूर्च्छित  देह को सँभालते हुये  भीतर ले आती मतवा के कानों में बस बड़बड़ाहटें थीं, उनकी आँखें झर परीं – हमके असीस देईँ, असीस मतवा, असीस (मुझे आशीर्वाद दीजिये, आशीर्वाद  मतवा, आशीर्वाद)...

मतवा घरदुआरी लाँघ ठिठक गईं, जमीन पर कोई कपड़ा पड़ा था।
पाँव तले पड़े नरखे को पाँव की अंगुलियों से ही उठा अपने कन्धे पर रख लिया, सूई धागा नीचे छूट गये। (जारी)           


शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 20

पिछले भाग से आगे…

उस दिन सोहित की भउजी के स्वर में डूब गये थे खदेरन। दिसा मैदान से लौटते हुये भी, गीत में देवताओं का आह्वान आग्रह वह भी अनजाने सइयाँ के माध्यम से, उन्हें भीतर भिगोता रहा - सोहिता सुपात्र नहीं।
पवित्रता और करुणा भाव तो थे ही, उस गीत में जो अजीब सा संतुष्ट बैराग था वह उनके चित्त में चुभ गया – ऐसा स्वर जिसकी सभी कामनायें पूरी हो गई हों लेकिन वह टीस बची हो जो मृत्यु में साथ समा जाती है।...
... अग्निशाला में प्रात:सन्ध्या को बैठे खदेरन आगे न सोच सके। आज उनके स्वर में भी दैनिक कर्मकांड नहीं, देवताओं का आह्वान था और स्वर लहरी सहज मंगल कामना से पगी थी। चित्त की पावनी गंगा बुलावे की धाराओं में उमगती चली गयी। पति के इन अनचीन्हे स्वरों पर मतवा ठिठक जड़ हो गईं जैसे कोई मुग्धा वेणु वादन सुन रही हो!
ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभि स्रवन्तु नः॥
आओ ईष, पूरब में पधारो, सबका कल्याण करो।
ॐ प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥
पितरों, दक्षिण दिशा के देवताओं, अपने आशीर्वाद से सब मंगल करो।
ॐ दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः।  
हे पश्चिम के वरुण! जीवन अनुशासन लयी करो!
ॐ प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः
हे उत्तर के सोम! हमें जीवन रस राग से तृप्त करो
ॐ उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताऽशनिरिषवः...
प्राची में प्रत्यक्ष गैरिक देव ने दर्शन दिये और गाते गाते खदेरन का कंठ रुद्ध हो गया।
ॐ सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुष सेंद्रवात्या. जुशान सूर्यो वेतु स्वः...
...प्रकृतिस्थ हुये तो मतवा को सामने बिठा कर सारा प्रकरण कह सुनाये – सोहितसिंघ विवाह कराने का प्रस्ताव ले मेरे पास आया था लेकिन मैंने मना कर दिया ...विधवा गर्भिणी है। मातृत्त्व का गीत गाती है, देवों को बुलाती है। आज मुझे लगा कि यम की प्रतीक्षा में है। क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा... अब मैं पुराना खदेरन नहीं रहा। संतान के मोह में कायर भीरु हो गया हूँ। साहस नहीं रह गया। बालक वेदमुनि के कारण ...
मतवा के कान ‘विधवा गर्भिणी’ सुनने के बाद ही बन्द हो गये। मन में उठते बवंडरों से घिरी उन्हों ने आगे कुछ नहीं सुना। लछमिनिया रे! तें ई का क दिहले? ...कूल, खनदान सब डुबा दिहले! (तुमने ये क्या कर दिया?..कुल, खानदान सब डुबा दिया!)
चेतना ने दूसरी करवट ली। हमल केतना पुरान? गिरा दे त (गर्भ कितना पुराना होगा। गिरा दे तो...)
सामने खेलते वेदमुनि को देख मतवा ने खुद को धिक्कारा - पापी मन। अरे, जिसने किया कराया वह गीत गाती है और तुम्हें... !
उस दिन खदेरन के घर चुप्पी आ घिरी जिसे बस वेदमुनि की किलकारियाँ तोड़ रही थीं। दिन चढ़ गया, दुपहर हो गई और आखिरकार घुटन से मुक्त हो सन्नाटे को तोड़ती हुई मतवा ने खदेरन से कहा – लइका के सम्हारीं, हम सोहित घरे जातनीं।(बच्चे को सँभालिये, मैं सोहित के घर जा रही हूँ।)  
लोक वर्जना की बाड़ को तोड़ती, रमइनी काकी के बहिष्कार को थूकती मतवा आज वर्षों से खिंची अगिनरेख लाँघने चली थी। चमइन के कोख जने को गले लगाने वाली मतवा उस नागिन से मिलने जा रही थी जिसने कभी अपने भतार का ही भक्षण कर लिया था और जो अब गर्भिणी थी - विधवा काजर रेख!  
लोक लाज, परम्परा, कुल मर्यादा सबको तज चुकी परित्यक्ता को उस सन्नाटे में भी गाते हुये मतवा ने सुना और देहरी पर ठिठक गईं – प्रात: पति जिस स्थिति में थे, उसका कारण समझ में आ गया।    
आगे चलु नइहर पाँथ नहिं सूझे, पिछउड़ दोष लगवलें हे राम!
केहि बिधि ससुरा जाइँ हम सजनी, बिरहा जोर जरवलें हे राम!  (अगले भाग का लिंक)         

बुधवार, 7 नवंबर 2012

लंठ महाचर्चा : बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 19

पिछले भाग से आगे...
...एक भटकता औघड़ है जिसके आधे चेहरे चाँदनी बरसती है और आधा काजल पुता  है। दुनिया जो भी कहे, उसे सब स्वीकार है। वह तो रहता ही अँधेरी गुफा में है जिसकी भीतों पर भी कालिख पुती है ... वह जाने क्या क्या बकता रहता है। 




अन्हार पाख की शुरुवात, दिन दुपहरिया, न काम न धाम। खेतों में धान लहालह। पेड़ पालो सन्नाटा - जो जहाँ था वहीं पटाया हुआ था। लीक किनारे धूल लपटाई धूप भी सुस्ता रही थी। जाड़ देवता के चहुँपने में अभी देर थी। जुग्गुल बंगले में लेटा बड़े ध्यान से बाहर की आवाज़ों को अकन रहा (अनुमान लगा) था। उसे रह रह लग रहा था कि कहीं दूर कोई गा रहा था। पलानी से बाहर निकल उसने एक चक्कर लगाया। गाँव मुर्दार था। इस समय कौन गा रहा है?
खूँटे से बँधे पगहे को पूरी जोर से ताने घुमरी पारती भैंस दिखी - किर्र, किर्र, चों, चों। उसने कईन का सटहा उठाया और तीन चार भैंस के पिछवाड़े लगा दिये जब देखs तब गरमी चढ़ल रहेलेs! भैंस ऐसे कूदी जैसे घोड़े को एँड़ लग गई हो लेकिन बरियार खूँटे और पगहा ने उसे थाम लिया। जुग्गुल को अपने ऊपर लाज सी आई केहू देखले रहित तs का सोचित?(किसी ने देखा होता तो क्या सोचता?)
वापस पलानी में आ लेटा। गाने की आवाज़ आनी बन्द हो गई थी। आँख लगना अभी पूरा भी नहीं था कि चिहुक कर जाग उठा। उसे ध्यान आया कि घुड़साल खाली थी। ये बेरा चितनवा के केंहर...? घोड़े चित्तनसिंघ को वह चितनवा कहता था। जुग्गुल लेटे लेटे ही चिल्लाया मदिया रे! ए मन्नी बाबू! फिर खुद ही बुदबुदाया मदिया पर त पिनिक सवार होईs लेकिन मन्नी बाबू? ...ए मन्नी! कहीं से कोई उत्तर नहीं आया तो जुग्गुल मंडप की ओर आया। काकी की नाक बज रही थी। वह भुसुरा उठा - जइसे जइसे बुढ़ातियाs, मरदाना होत जातिया। वह समझ गया कि मन्नी बाबू घोड़ा लेकर कहीं निकल लिये, लेकिन किधर?
लइका झँटुवार होताs अब, चाल चलन पर नजर रक्खे के परीs। सोचते हुये उसने बाहर जाने को लाठी उठाई लेकिन जाये तो किधर जाये?
...
आजकल मन्नी का मन उचटा उचटा सा रहता, कहीं नहीं लगता। क्यों नहीं लगता, यह तो कुलदेवता जानें लेकिन जब तब इधर उधर निकल लेने की आदत घर वालों को अखरने लगी थी। खेती बाड़ी और रैयतों में रुचि दिखाने के बजाय लइका लखेरई की ओर कदम बढ़ा रहा था। इस उमर में नकेल न लगे तो बछरू के पगलाये साँड़ में तब्दील होने में देर नहीं लगती। उनकी महतारी माथा पीटती ए खनदान में बीसा के पहिले बियाहे नाहीं, नाइँ सहेलाs। पुरनियों के किस्से सुन वह और खार खातीं जब कि पूत ऐसे व्यवहार करता जैसे अभी अँचरा का दूध पी रहा हो! कुल मिला कर उस घर में कोई अगर वाकई दुखी था तो मन्नी के माई। सासु से इशारा इशारा में कुछ कहतीं तो सुनने को मिलता कि लँगड़े जुग्गुल के रहते कोई गड़बड़ नहीं होनी। माई मन ही मन जुग्गुल को काली माई के खप्पर में झोंकती और सास के कउवा मास खाने पर शक़ करती उठ जाती।
घोड़े चित्तनसिंघ पर पन्द्रह की उमर पार कर कर चुके सवार थे कुलभूषण मान्धाता सिंह उर्फ मन्नी बाबू। कसरत, खोरिश और मस्ती से सँवारी देह अठ्ठारह से कम की नहीं लगती थी। सिपहिया काट केश, चौड़ा माथा और ललछौहीं गोराई वाले चेहरे पर भारी पलकों के नीचे लाल डोरे वाली आँखें - जब घोड़े पर सवार होता लौंडा तो लगता कि बस हथियार थमाने की देर है, अगरदा उड़ा देगा!
आज मालिक घोड़े की मरजी पर था। घोड़ा चित्तनसिंघ इशारा पा दुलकी चाल से लीक पकड़ चल पड़ा। उसी समय महोधिया टोले में टाल पर रखा परसू पंडित का पतरा गिरा धब्ब से - बिलार कूदा था। सूरज की आड़ में अदृश्य ग्रह नछत्तर घुमरी परइया खेलने लगे। नेबुआ झाड़ के पास वाले पेंड़ पर कुछ बोलने लगा केऊँ, कू, कु, कू, कु, कुर्र, कुर्र। पास के खेत में वापस भागती खेंखर ने माँद बनाने की जगह तय कर ली थी चमैनिया अस्थान! आखिर में पेंड़ के कोटर में गुड़ेरवा ने करवट बदला और फिर सब सन्नाटा हो गया सिवाय दूर लीक पर दुलकी के टप, टप, टप ... ताल कस गया था, गीत की कमी थी।
अन्हरिया बारी में कुछ भीतर पहुँच कर चित्तनसिंघ ठिठक गया, उसे कुछ आहट सी मिली थी। मन्नी ने कोंचा लेकिन घोड़ा आगे ही न बढ़े। मन्नी ने नीचे कूद कर लगाम हाथ में ले ली कुछ तो गड़बड़ थी।
जाने कितने पुरखे पुरानी थी यह विशाल बारी! सारे बबुआनों का इसमें हिस्सा था जिसका बँटवारा करने के फेर में दो बार लहास गिरने के बाद उसे सबके लिये छोड़ दिया गया था। ज़मीन और वेश्या एक ही जात मलिकाना बढ़ने से भयानक होते जाते हैं। कुछ खास हिस्सों को छोड़ दें तो बारी नहीं, वह बन था जिसमें हर तरह की झाँखी झूरा और जनावर थे। बघेरे तक देखे गये थे।
ऐतिहातन मन्नी ने पास ही उगे एक सीधे गाछ को तोड़ कर लाठी बना लिया और लगाम थामे आगे बढ़ा। तभी किसी कनिया की चीख सुनाई दी और वह दिखा जिसके कारण चित्तनसिंघ की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई थी लामर, जो कनिया को खींचते हुये सामने आ गया था। फटे कपड़े और खँरोच लगी देह लिये वह उससे जूझ रही थी। लामर? इस समय!!
मन्नी के मुँह से ललकार सी निकली हेsss आव, भाग कनियाs! लग्गे आउ!! जूझती बाला को उत्साह मिला। उसने पुकार लगाई लग्गेs आवs!
घोड़े को थपथपा वहीं खड़ा रहने का इशारा कर मन्नी दौड़ पड़ा। दोनों एक दूसरे को पहचान चुके थे। पीठ पर वार पड़ा तो उलट कर दो पैरों पर खड़ा लामर मन्नी पर टूट पड़ा पंजों के झपट्टे, कुश्ती सी होने लगी। कनिया ने गाछ वाली लाठी उठाई और रह रह लामर के सिर पर वार करने लगी। लामर उसकी ओर मुड़ा कि मन्नी ने एक हाथ से कनिया को खींच अपने पीछे किया और दूसरे हाथ में गाछ के नुकीले से हिस्से को अपने पूरे बल भर लामर की छाती में ठेल दिया। जाने जोर था या किसी कोमल मर्म स्थल पर पड़ा थालामर की देह में गाछ की लाठी घुस गई। दोनों मिल कर उस पर टूट पड़े। थोड़ी देर में लामर लहास में बदल गया।
भय, विजय, जान बच जाने का सुख या जाने क्या, हाँफते हुये दोनों एक दूसरे से लिपटे और क्षण भर में ही चेतन हो थोड़े परे हुये। मन्नी ने देखा लहूलुहान गोरा मुँह, दप दप नैन - परसू पंडित के नयना, सुनयना!
सुनयना ने देखा मन्नी बाबू, गाले पर नोहे के तीन निशान छ्ल छल खून! दोनों ओर लाज उपजी, आलिंगन ढीला हो टूट गया। झेंप मिटाने को मन्नी पूछ पड़ा अन्हरिया बारी ए बेरा का करे आइल रहलू हs? (इस अन्धेरे बगीचे में इस समय क्या करने आई थी?)
नयना ने कमर पर बँधी चूनर की गठरी को खोल जो कुछ हाथ लगा आगे कर दिया भटपटिया और बेरि, चिपुला चिपुला(कुचले हुये)। नयना के लब खुले सबसे पहिले ईहें फरेलें, हमके बड़ा नीक लगेलें! खइबs? खाs न! (ये सबसे पहले इसी बागीचे में फलते हैं, हमको बहुत अच्छे लगते हैं! खाओगे? खाओ न!)
उसने सब मन्नी के मुँह पर पोत सा दिया। घाव परपरा उठे। मन्नी ने झपट कर हाथ थाम लिया। नयना को पीर का अब अनुभव हुआ, कराह सी उठी। वह हाथ छुड़ाते हुये बोली हमके घोड़ा पर बइठा के ले चलs! गोड़ बेंवचि गइल बा! (मुझे घोड़े पर बैठा कर ले चलो! पैर में मोच आ गई है।)
अवसर प्रबल था लेकिन तब भी मन्नी को प्रस्ताव कुछ ठीक नहीं लगा। आजतक उसने किसी और को चित्तनसिंघ पर बैठने नहीं दिया था। उसकी ज़िद के कारण ही मदिया सईस के लिये भी एक दूसरा घोड़ा लाना पड़ा था और मन्नी को सवारी गाँठना सिखाने में मदिया को मक्का मदीना सब याद आ गये थे!
नयना की आँखों में अब पीड़ा दिख रही थी। मन्नी ने बात बनाई लमरा के चितनवा पर लादि दे तनीं, आ तू हमार सहारा ले चलि चलs। लोग देखी त कही कि केतना बली बाणें सो, लामर मारि के ले आवतनें! (भेड़िये को घोड़े पर लाद दे रहा हूँ और तुम मेरा सहारा ले चली चलो। लोग देखेंगे तो कहेंगे कि हमलोग कितने बली हैं, लामर मार कर ले आये हैं!)
ऐसे हाल में भी नयना हँस पड़ी बाबू, कोरा में उठा के ले चले के परीs, बोलs चलबs? कइसन मानुस हउव हो? जियता के आगे मुअता के फेर में परल बालs। लोग त कइसहू जानी, अब तोहरे उप्पर बा जइसे जनावs (बाबू, मुझे गोद में ले कर चलना पड़ेगा, बोलो चलोगे?कैसे मनुष्य हो जी? जीते को छोड़ मरे के फेर में पड़े हो! लोग तो कैसे भी जान जायेंगे, अब तुम्हारे ऊपर है, जैसे जनाओ।)
वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई। मन्नी मज़बूर हो गया। ऐसे हाल में नयना को छोड़ कर जाना ठीक नहीं था, क्या पता और जनावर हों! भारी मन से उसने मरे लामर को वहीं छोड़ने का निर्णय लिया और नयना से बोला चलs चढ़ि जा ... आजु ले केहू दुसरे के ई भागि नाहिं बदा भइल बाs (चलो, चढ़ जाओ ... आज तक किसी दूसरे को यह भाग्य नहीं मिला है।)
सिर उठा कर नयना बोली माई कहेले कि भागि बदलति रहेले बाबूs, आपन दूसर हो जाला आ दूसर आपन। हम नाहीं चढ़ि पाइबि हो! तोहके चढ़ावे के परीs (माँ कहती है कि भाग्य बदलता रहता है बाबू, अपने दूसरे हो जाते हैं और दूसरे अपने! मैं नहीं चढ़ पाऊँगी! तुम्हें चढ़ाना पड़ेगा।)
एक हाथ से पैरों तले और दूसरे से सिर तले सहारा दे नयना को गोद में उठाये मन्नी घोड़े की ओर ले चला। उसे ऊपर उठा घोड़े पर चढ़ाते समय दोनों की आँखें पुन: चार हुईं, अन्हरिया बारी रोशन हुई, मलयानिल बह उठा और दूर कहीं सितारों में भविष्य के एक दंत कथा की नींव पड़ी महापातक नयनवंश।
कथा का पहला वाक्य था मन्नी बाबू! हम आगे बइठबि, पीछे नाहिं। (मन्नी बाबू! हम आगे बैठेंगे, पीछे नहीं।)
और आगे बढ़ती चली गई:
अब तूँ जौन कहs। बिना बतवले घर से अक्केले निकल तोके नाहीं घूमे के चाहीं।(अब तुम जो कहो। बिना बताये घर से अकेले निकल तुम्हें नहीं घूमना चाहिये।)
ऊँचाई से धूप निहारती नयना ने बिना मुड़े उत्तर दिया,“अकेल हमार चित्त घबड़ालाs...जब से बराति वापिस भइल, हमके कहीं नाहीं जाये देले माईs ...मौका पा के एइ तरे चुप्पे घूम फिरि आईलें...जाने आज का होई?” (अकेले मेरा चित घबराता है... जब से मेरी बारात वापस हुई, माँ मुझे कहीं नहीं जाने देती ... मौका पा कर मैं ऐसे ही चुपचाप घूम फिर आती हूँ... आज जाने क्या होगा?)
मन्नी ने पीछे से उसके सिर को मोड़ा तो आँसू बह रहे थे। वह भ्रमित हो उठा किसके आँसू? चोट के? बारात वापस होने के या यूँ घूमते पकड़े जाने के?
उसे आँसू पोंछ देने की हिम्मत नहीं हुई। उसे तो यह बाद में पता चला कि उन आँसुओं का भ्रम और ही था जो उसके हिया भी उतना ही पसर गया था।
...घोड़े की चाल को दूर से देख कर नापते जुग्गुल ने मौन अट्टहास किया। झुरमुट से निकल कर लाठी की टेग ले मरे लामर के पास खड़ा हो गया। उसे परसू पंडित का कहा याद आया - जातक प्रेमी जीव होगा... दो विवाह होंगे...
पंडित हो! तनि अउर गहिरे देखले रहतs, टप टप ताल को गीत की टेक मिल गई। हमेशा गाली बकने वाला जुग्गुल गा रहा था:
नयना, नयना
तोहार नयना लागल बाण नयना नयना
लागल बाण गड़ल मनवा में कटार नाहीं चैना, नयना नयना!...
... परसू पंडित ने सहारा दे बेटी को घोड़े से उतारा और मन्नी के आगे हाथ जोड़ लिये, माने जाओ अब, फिर कभी बात करेंगे! दुवारे जुटी बकवास करती भीड़ का सामना करने का उनमें साहस नहीं था। उनको राहत मिली जब जुग्गुल की किलकारी भरी पुकार सुनाई दी लामर! लामर!! लोग उधर को दौड़ पड़े थे।
भीतर परसू ब छाती पीट रही थीं कवन संजोग भइल ई कलिंकिनी हे राम! (किस संयोग इस कलंकिनी का जन्म हुआ हे राम!) खदेरन तड़क उठे चुप्प! ...चुपातलू कि आईं? (चुप हो रही हो या आऊँ?) पत्नी की तुरंत चुप्पी ने परसू पंडित को पहले तो अचरज में डाला लेकिन फिर भसुर की डाँट पर भयउ की चुप्पी समझ भुला दिये। उन्हें वर्षों पहले के जोग टोग का कुछ पता नहीं था।
पसीने से लथपथ जुग्गुल के पैरों तले पड़े लामर को देख लोग शंकित थे लंगड़ा , एतना दूर कइसे घिरिया ले आइल?(लँगड़ा आदमी इतनी दूर कैसे घसीट ले आया?) अपने मन्नी बाबू की वीरता को अतिशयोक्ति में बताने के बाद जन को डाँट डपट कर जुग्गुल ने विदा कर दिया। नहा खा पलानी में लेट कर पुरानी बातें सोचने लगा का भइल ऊ बिधवा के औलाद के? सोहिता...नयना के बराति कइसे वापिस भइलि? (क्या हुआ था उस विधवा की संतान का? सोहित ... नयना की बारात कैसे वापस हुई थी?)
ठीक वही काम अग्निशाला में खदेरन पंडित कर रहे थे। पगला कर दर दर भटकते सोहिता के भउजी का वर्षों पहले सुना गीत उनके मन को मथ रहा था। उनकी उपेक्षा की आग में भस्म हो चुकी एक स्त्री का गीत:
...हे सइयाँ फुलवा महादेव देवता, पाँखुर गउरा सराहि हे!
दुसमन फुलवा खाँच भर दुनिया, आनहु देवता दुआर हे!
सुनयना का क्या होगा? देवता उसकी पुकार सुनेंगे या ... उन्हों ने आह भरी सुभगा! जीवन ऐसा क्यों है?
खदेरन बीते समय की कथा स्वयं को सुनाने लगे। (अगले भाग का लिंक)