से आगे...
खूँटे से बँधे पगहे को पूरी जोर से ताने घुमरी पारती भैंस दिखी - किर्र,
किर्र, चों, चों। उसने
कईन का सटहा उठाया और तीन चार भैंस के पिछवाड़े लगा दिये – जब
देखs तब गरमी चढ़ल रहेलेs! भैंस ऐसे कूदी जैसे घोड़े को एँड़ लग गई हो लेकिन बरियार खूँटे और पगहा ने
उसे थाम लिया। जुग्गुल को अपने ऊपर लाज सी आई –
केहू देखले रहित तs का सोचित?(किसी ने देखा होता तो क्या सोचता?)
वापस पलानी में आ लेटा। गाने की आवाज़ आनी
बन्द हो गई थी। आँख लगना अभी पूरा भी नहीं था कि चिहुक कर जाग उठा। उसे ध्यान आया
कि घुड़साल खाली थी। ये बेरा चितनवा के केंहर...?
घोड़े चित्तनसिंघ को वह चितनवा कहता था। जुग्गुल लेटे लेटे ही
चिल्लाया – मदिया रे! ए मन्नी बाबू! फिर खुद ही बुदबुदाया
–मदिया पर त पिनिक सवार होईs लेकिन मन्नी बाबू?
...ए मन्नी! कहीं से कोई उत्तर नहीं आया तो जुग्गुल मंडप की ओर आया।
काकी की नाक बज रही थी। वह भुसुरा उठा - जइसे जइसे बुढ़ातियाs, मरदाना होत जातिया। वह समझ गया कि मन्नी बाबू घोड़ा लेकर कहीं निकल
लिये, लेकिन
किधर?
लइका झँटुवार होताs अब, चाल चलन पर नजर रक्खे के परीs। सोचते हुये उसने बाहर जाने को लाठी उठाई लेकिन जाये तो किधर
जाये?
आजकल मन्नी का मन उचटा उचटा सा
रहता,
कहीं नहीं लगता। क्यों नहीं लगता, यह तो
कुलदेवता जानें लेकिन जब तब इधर उधर निकल लेने की आदत घर वालों को अखरने लगी थी।
खेती बाड़ी और रैयतों में रुचि दिखाने के बजाय लइका लखेरई की ओर कदम बढ़ा रहा था। इस
उमर में नकेल न लगे तो बछरू के पगलाये साँड़ में तब्दील होने में देर नहीं लगती।
उनकी महतारी माथा पीटती – ए खनदान में बीसा के पहिले बियाहे
नाहीं, नाइँ सहेलाs। पुरनियों के किस्से सुन वह और खार खातीं जब कि पूत ऐसे व्यवहार करता जैसे
अभी अँचरा का दूध पी रहा हो! कुल मिला कर उस घर में कोई अगर वाकई दुखी था तो मन्नी
के माई। सासु से इशारा इशारा में कुछ कहतीं तो सुनने को मिलता कि लँगड़े जुग्गुल के
रहते कोई गड़बड़ नहीं होनी। माई मन ही मन जुग्गुल को काली माई के खप्पर में झोंकती और
सास के कउवा मास खाने पर शक़ करती उठ जाती।
घोड़े चित्तनसिंघ पर पन्द्रह की उमर पार कर
कर चुके सवार थे कुलभूषण मान्धाता सिंह उर्फ मन्नी बाबू। कसरत, खोरिश और मस्ती से सँवारी देह अठ्ठारह से
कम की नहीं लगती थी। सिपहिया काट केश, चौड़ा माथा और ललछौहीं
गोराई वाले चेहरे पर भारी पलकों के नीचे लाल डोरे वाली आँखें - जब घोड़े पर सवार
होता लौंडा तो लगता कि बस हथियार थमाने की देर है, अगरदा उड़ा
देगा!
आज मालिक घोड़े की मरजी पर था। घोड़ा
चित्तनसिंघ इशारा पा दुलकी चाल से लीक पकड़ चल पड़ा। उसी समय महोधिया टोले में टाल पर
रखा परसू पंडित का पतरा गिरा धब्ब से - बिलार कूदा था। सूरज की आड़ में अदृश्य ग्रह
नछत्तर घुमरी परइया खेलने लगे। नेबुआ झाड़ के पास वाले पेंड़ पर कुछ बोलने लगा
– केऊँ, कू,
कु, कू, कु, कुर्र, कुर्र। पास के खेत में वापस भागती खेंखर ने
माँद बनाने की जगह तय कर ली थी – चमैनिया अस्थान! आखिर में
पेंड़ के कोटर में गुड़ेरवा ने करवट बदला और फिर सब सन्नाटा हो गया सिवाय दूर लीक पर
दुलकी के – टप, टप, टप ... ताल कस गया था, गीत की कमी थी।
अन्हरिया बारी में कुछ भीतर पहुँच कर
चित्तनसिंघ ठिठक गया, उसे कुछ आहट सी मिली थी। मन्नी ने कोंचा
लेकिन घोड़ा आगे ही न बढ़े। मन्नी ने नीचे कूद कर लगाम हाथ में ले ली –
कुछ तो गड़बड़
थी।
जाने कितने पुरखे पुरानी थी यह विशाल बारी! सारे बबुआनों का इसमें हिस्सा
था जिसका बँटवारा करने के फेर में दो बार लहास गिरने के बाद उसे सबके लिये छोड़ दिया
गया था। ज़मीन और वेश्या एक ही जात – मलिकाना बढ़ने से भयानक
होते जाते हैं। कुछ खास हिस्सों को छोड़ दें तो बारी नहीं, वह बन था जिसमें हर तरह की झाँखी झूरा और
जनावर थे। बघेरे तक देखे गये थे।
ऐतिहातन मन्नी ने पास ही उगे एक सीधे गाछ को
तोड़ कर लाठी बना लिया और लगाम थामे आगे बढ़ा। तभी किसी कनिया की चीख सुनाई दी और वह
दिखा जिसके कारण चित्तनसिंघ की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई थी – लामर, जो कनिया को
खींचते हुये सामने आ गया था। फटे कपड़े और खँरोच लगी देह लिये
वह उससे जूझ रही थी। लामर? इस समय!!
मन्नी के मुँह से ललकार सी निकली
–
हेsss आव,
भाग कनियाs! लग्गे आउ!! जूझती बाला को उत्साह मिला। उसने पुकार लगाई –
लग्गेs आवs!
घोड़े को थपथपा वहीं खड़ा रहने का इशारा कर
मन्नी दौड़ पड़ा। दोनों एक दूसरे को पहचान चुके थे। पीठ पर वार पड़ा तो उलट कर दो
पैरों पर खड़ा लामर मन्नी पर टूट पड़ा – पंजों के झपट्टे, कुश्ती सी होने लगी। कनिया ने गाछ वाली लाठी उठाई और रह रह लामर के सिर पर
वार करने लगी। लामर उसकी ओर मुड़ा कि मन्नी ने एक हाथ से कनिया को खींच अपने पीछे
किया और दूसरे हाथ में गाछ के नुकीले से हिस्से को अपने पूरे बल भर लामर की छाती
में ठेल दिया। जाने जोर था या किसी कोमल मर्म स्थल पर पड़ा था –
लामर की देह में गाछ की लाठी
घुस गई। दोनों मिल कर उस पर टूट पड़े। थोड़ी देर में लामर लहास में बदल
गया।
भय, विजय, जान बच जाने
का सुख या जाने क्या, हाँफते हुये दोनों एक दूसरे से लिपटे और
क्षण भर में ही चेतन हो थोड़े परे हुये। मन्नी ने देखा – लहूलुहान गोरा मुँह, दप दप नैन - परसू पंडित के
नयना, सुनयना!
सुनयना ने देखा –
मन्नी बाबू, गाले पर नोहे के तीन निशान
– छ्ल छल खून! दोनों ओर लाज उपजी, आलिंगन ढीला हो टूट गया। झेंप मिटाने को मन्नी पूछ पड़ा – अन्हरिया बारी ए बेरा का करे आइल रहलू हs? (इस अन्धेरे बगीचे में इस समय क्या करने आई
थी?)
नयना ने कमर पर बँधी चूनर की गठरी को खोल जो
कुछ हाथ लगा आगे कर दिया –
भटपटिया और बेरि, चिपुला
चिपुला(कुचले हुये)। नयना के लब खुले –
सबसे पहिले ईहें फरेलें, हमके बड़ा नीक लगेलें!
खइबs?
खाs न! (ये सबसे पहले इसी बागीचे में फलते
हैं, हमको बहुत अच्छे लगते हैं!
खाओगे? खाओ न!)
उसने सब मन्नी के मुँह पर पोत सा दिया। घाव
परपरा उठे। मन्नी ने झपट कर हाथ थाम लिया। नयना को पीर का अब अनुभव
हुआ,
कराह सी उठी। वह हाथ छुड़ाते हुये बोली – हमके
घोड़ा पर बइठा के ले चलs! गोड़ बेंवचि गइल बा! (मुझे घोड़े पर बैठा कर ले चलो! पैर में मोच आ गई
है।)
अवसर प्रबल था लेकिन तब भी मन्नी को प्रस्ताव कुछ ठीक नहीं लगा। आजतक
उसने किसी और को चित्तनसिंघ पर बैठने नहीं दिया था। उसकी ज़िद के कारण ही मदिया सईस
के लिये भी एक दूसरा घोड़ा लाना पड़ा था और मन्नी को सवारी गाँठना सिखाने में मदिया
को मक्का मदीना सब याद आ गये थे!
नयना की आँखों में अब पीड़ा दिख रही थी।
मन्नी ने बात बनाई –
लमरा के चितनवा पर लादि दे तनीं, आ तू हमार
सहारा ले चलि चलs। लोग देखी त कही कि केतना बली बाणें सो,
लामर मारि के ले आवतनें! (भेड़िये को घोड़े पर लाद दे रहा हूँ और तुम मेरा सहारा ले चली चलो। लोग
देखेंगे तो कहेंगे कि हमलोग कितने बली हैं, लामर मार कर ले आये
हैं!)
ऐसे हाल में भी नयना हँस पड़ी
–
बाबू, कोरा में उठा के ले चले के
परीs,
बोलs चलबs? कइसन मानुस हउव हो?
जियता के आगे मुअता के फेर में परल बालs। लोग त कइसहू जानी,
अब तोहरे उप्पर बा जइसे जनावs (बाबू, मुझे गोद में ले कर चलना पड़ेगा,
बोलो चलोगे?कैसे मनुष्य हो जी? जीते को छोड़ मरे के फेर में पड़े
हो! लोग तो कैसे भी जान जायेंगे, अब तुम्हारे ऊपर है,
जैसे जनाओ।)
वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई। मन्नी मज़बूर हो
गया। ऐसे हाल में नयना को छोड़ कर जाना ठीक नहीं था,
क्या पता और जनावर हों! भारी मन से उसने मरे लामर को वहीं छोड़ने का
निर्णय लिया और नयना से बोला – चलs चढ़ि जा ... आजु ले केहू दुसरे के ई भागि नाहिं बदा भइल बाs। (चलो, चढ़ जाओ ... आज तक किसी दूसरे को यह भाग्य नहीं मिला
है।)
सिर उठा कर नयना बोली –
माई कहेले कि भागि बदलति रहेले बाबूs,
आपन दूसर हो जाला आ दूसर आपन। हम नाहीं चढ़ि पाइबि हो! तोहके चढ़ावे के
परीs। (माँ कहती है कि भाग्य बदलता रहता है बाबू, अपने दूसरे हो जाते हैं और दूसरे अपने! मैं नहीं चढ़
पाऊँगी! तुम्हें चढ़ाना पड़ेगा।)
एक हाथ से पैरों तले और दूसरे से सिर तले
सहारा दे नयना को गोद में उठाये मन्नी घोड़े की ओर ले चला। उसे ऊपर उठा घोड़े पर
चढ़ाते समय दोनों की आँखें पुन: चार हुईं, अन्हरिया बारी रोशन हुई, मलयानिल बह उठा और दूर कहीं सितारों में भविष्य के एक दंत कथा की नींव पड़ी
– महापातक
नयनवंश।
कथा का पहला वाक्य था –
मन्नी बाबू! हम आगे बइठबि, पीछे
नाहिं। (मन्नी बाबू! हम आगे बैठेंगे, पीछे नहीं।)
और आगे बढ़ती चली गई:
“अब तूँ जौन कहs। बिना बतवले घर से अक्केले निकल तोके नाहीं घूमे के चाहीं।“ (अब तुम जो कहो। बिना बताये घर से अकेले निकल तुम्हें नहीं घूमना
चाहिये।)
ऊँचाई से धूप निहारती नयना ने बिना मुड़े
उत्तर दिया,“अकेल हमार चित्त घबड़ालाs...जब से बराति वापिस भइल,
हमके कहीं नाहीं जाये देले माईs ...मौका पा के एइ तरे चुप्पे घूम फिरि आईलें...जाने आज का होई?” (अकेले मेरा चित घबराता है... जब से मेरी बारात वापस
हुई, माँ मुझे कहीं नहीं जाने देती ... मौका पा
कर मैं ऐसे ही चुपचाप घूम फिर आती हूँ... आज जाने क्या
होगा?)
मन्नी ने पीछे से उसके सिर को मोड़ा तो आँसू
बह रहे थे। वह भ्रमित हो उठा – किसके आँसू? चोट
के? बारात वापस होने के या यूँ घूमते पकड़े जाने
के?
उसे आँसू पोंछ देने की हिम्मत नहीं हुई। उसे
तो यह बाद में पता चला कि उन आँसुओं का भ्रम और ही था जो उसके हिया भी उतना ही पसर
गया था।
...घोड़े की चाल को दूर से देख कर नापते
जुग्गुल ने मौन अट्टहास किया। झुरमुट से निकल कर लाठी की टेग ले मरे लामर के पास
खड़ा हो गया। उसे परसू पंडित का कहा याद आया - जातक
प्रेमी जीव होगा... दो विवाह होंगे...
पंडित हो! तनि अउर गहिरे देखले रहतs, टप टप ताल को गीत की टेक मिल गई। हमेशा गाली बकने वाला जुग्गुल गा
रहा था:
नयना, नयना
तोहार नयना लागल बाण नयना नयना
लागल बाण गड़ल मनवा में कटार नाहीं
चैना, नयना नयना!...
... परसू पंडित ने सहारा दे बेटी को घोड़े से
उतारा और मन्नी के आगे हाथ जोड़ लिये, माने – जाओ
अब, फिर कभी बात करेंगे! दुवारे जुटी
बकवास करती भीड़ का सामना करने का उनमें साहस नहीं था। उनको राहत मिली जब जुग्गुल की
किलकारी भरी पुकार सुनाई दी – लामर!
लामर!! लोग उधर को दौड़
पड़े थे।
भीतर परसू ब छाती पीट रही थीं
–
कवन संजोग भइल ई कलिंकिनी हे राम! (किस संयोग इस कलंकिनी का जन्म हुआ हे राम!) खदेरन तड़क उठे –
चुप्प! ...चुपातलू कि आईं? (चुप हो रही हो या आऊँ?) पत्नी की तुरंत चुप्पी ने परसू पंडित को पहले तो अचरज में
डाला लेकिन फिर भसुर की डाँट पर भयउ की चुप्पी समझ भुला दिये। उन्हें वर्षों पहले
के जोग टोग का कुछ पता नहीं था।
पसीने से लथपथ जुग्गुल के पैरों तले पड़े
लामर को देख लोग शंकित थे –
लंगड़ा , एतना दूर कइसे घिरिया ले
आइल?(लँगड़ा आदमी इतनी दूर कैसे घसीट ले आया?) अपने मन्नी बाबू की वीरता को अतिशयोक्ति में बताने के
बाद जन को डाँट डपट कर जुग्गुल ने विदा कर दिया। नहा खा पलानी में लेट कर पुरानी
बातें सोचने लगा – का भइल ऊ बिधवा के औलाद के? सोहिता...नयना के बराति कइसे वापिस भइलि? (क्या हुआ था उस विधवा की संतान
का? सोहित ... नयना की बारात
कैसे वापस हुई थी?)
ठीक वही काम अग्निशाला में खदेरन पंडित कर रहे थे। पगला कर दर दर
भटकते सोहिता के भउजी का वर्षों पहले सुना गीत उनके मन को मथ रहा था। उनकी उपेक्षा
की आग में भस्म हो चुकी एक स्त्री का गीत:
...हे सइयाँ फुलवा महादेव
देवता, पाँखुर गउरा सराहि
हे!
दुसमन फुलवा खाँच भर
दुनिया, आनहु देवता दुआर
हे!
सुनयना का क्या होगा? देवता उसकी पुकार सुनेंगे या ... उन्हों
ने आह भरी – सुभगा! जीवन ऐसा क्यों
है?