रविवार, 28 अगस्त 2016

शमी...सूख गये, रह गये

छत के गमले का शमी सूख कर काँटा रह गया है, बाकी सभी पौधे हरे भरे फूले फुलाये बने हुये हैं। यह शमी उसी की संतान था जिसकी छाँव पिताजी प्रतिदिन बैठते थे और जहाँ मैंने भी अपने बुढ़ापे में बैठ कर ठहरे समय को सोखने की कल्पनायें की हैं।
गाँव दुआरे वाला शमी अभी भी है जिसकी निचली टहनियों को मैंने स्वयं पाँग दिया था, तेरही के दिन किसी को काँटे लग गये तो! जटिल कर्मकाण्डों को अबूझ पत्थर की तरह सम्पन्न करते मुझे बस अपना यही कार्य समझ में आया ... शमी आसानी से नहीं सूखते, उसे कुछ नहीं होगा... और यहाँ वाला सूख कर संतान के दुःख को साझा कर गया! इसके सान्निध्य में तो काफ्का का पिता के नाम पत्र भी मैंने उन्हें नहीं सुनाया था, फिर भी।    
पिताजी के देहावसान को आज 21 दिन हो गये हैं, मेरे भीतर बालकनी का वह समय वहीं का वहीं है जब साँझ को उनके बारे में बाते करते हुये ही मोबाइल पर समाचार मिला था। पीछे से माँ का रूदन और भैया का रूँधा स्वर – Guru ji is no more. चुपचाप मैंने मोबाइल ऑफ किया और चिंतित पत्नी को संकेत भर किया। वह फूट फूट कर रोने लगीं, मैंने द्वार बन्द कर दिया कि स्वर दीवारों में रूँध कर रह जाय या जाने क्यों ...
...बाहर रेलिंग के सहारे खड़े सूखी आँखों से मैंने देखा, संसार साथ साथ तपता और ठिठुरता बहुत बड़ा कैनवस हो गया है, अचानक... जिसके एक किनारे खड़ा मैं अकस्मात एक दशक बूढ़ा हो गया हूँ - घर का बड़ा सवाँगजिसे सबके दुःख को कन्धा देना है, जिसकी देह सबके आँसुओं से भीगनी है लेकिन जिसके स्वयं के भाग्य में कोई कन्धा नहीं, जिसकी आँखों की नमी को कोई धार नहीं! ...
... नहीं, उस समय ऐसा कुछ नहीं लगा था, सम्भवत: यह अनुभूति किसी अनंतर अवसादी क्षण द्वारा उस मेरु-प्रश्न के लिये प्रस्तुत एक असफल समाधान भर हो जिसका कोई आकार नहीं, जिसमें कोई शब्द नहीं, वाक्य नहीं, विन्यास नहीं... ओसारे के वे लगभग दस मिनट, कह सकता हूँ कि पुराणों के दस हजार वर्ष ...
...अब मैं किससे लड़ूँगा? कौन मुझसे सुलह करेगा और मनावन में किसकी गोद सिमट कर सोऊँगा? अंतिम वर्ष में तो मैंने वह भी छोड़ दिया था, वृद्ध देह का ढीलापन यातना से भर देता था...वह घुमा फिरा कर उपेक्षाकहते और मेरे प्रतिवाद पर हँस देते। मैं अपने भीतर का कैसे कहता? ...कह पाता भी
...चेन्नई से रात के विमान से दिल्ली, संतप्त पुत्री को सँभालना, प्रात:काल विमान से गोरखपुर, गोरखपुर से समय रहते गाँव। कई बार गला रूँधा, आँखें छलछलाईं, नम हुईं, बहीं भी लेकिन वह भीत अभी तक टूट कर नहीं बही है जिसके पीछे जाने कितने गुंजलक हैं, कुछ है जिसे कहना असम्भव है। असम्भवा पीर धँसी है, ऐसी कि निकल ही नहीं रही!...
...लोकाचार, भूखे प्यासे परिवारी जन। आकुल पुकारें कहाँ तक पहुँचे? दाहा हो जाये तो कुछ मिले, जीवित देह की आग को तो अन्न आहुति चाहिये न, जो मृत हुई उसे तो स्वयं आहुति होना है। राह में बारिश, अग्नि संस्कार कैसे होगा? ... यहाँ तो दिन खुला है, शीघ्र पहुँचो।
...रोती कलपती अम्मा तोहरे पिताजी के केहू नहीं बचावल ए बाबू! क्या कहूँ? कितने लोग रो रहे हैं उस भीत के पीछे, नहीं देख सकता। आँखें सूखी हैं.. चलु अम्मा, घर में चलु! ... अम्मा को भरपूर आलिंगन में लिये घर में खींच ले गया हूँ। श्रीमती जी जाने रो रही हैं या सांत्वना दे रही हैं। बाहर नहवावन का हल्ला, मेरे भीतर हाहाकार चुप रहो सब लोग, सूर्यास्त में अभी दो घण्टे शेष हैं।
...गंगा जल से मृत देह का स्नान। स्नान के समय प्रतिदिन पिताजी का गाता स्वर मन की भीत के पीछे चुप है:
नागेन्द्र हाराय त्रिलोचनाय, भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय, तस्मै '' काराय नमः शिवाय॥
...आड़ है, मृत देह दिगम्बर। मेरे मस्तक से स्वेद का प्रवाह है, आँखों में आँसू नहीं। धीर धरो, धीरे धीरे पोंछो, त्वचा छिल जायेगी... क्या धरा है इस धराशायी मिट्टी में? ... नहीं, देखो, कितनी शांति से सोये हैं जैसे समाधि में हों विकारहीन शांत मुख।
 गंगा जी! स्वेद मिली धार से किसे शुद्ध करेंगी? क्या कारूँ? क्या सकारूँ?? ...नागपंचमी के दिन ही उन्हें जाना था? अच्छे भले थे, छ: दिन पहले ही तो गया था। उस दिन की खीर के लिये तो स्वयं दूध बढ़ा कर देने के लिये कहने गये थे, पकवान बनवाये थे ... शिव ने उन्हें ही ग्रस लिया!
... मेरे जन्म के समय में उनके एक प्रिय शिष्य साथ थे – Guru ji! perhaps the time has come और उनके अवसान के समय दूसरे शिष्य भैया अब एकदम स्वस्थ हैं, सुनो न, हँसता हुआ स्वर। आज ही हॉस्पिटल से छुट्टी मिल जायेगी।
भावुक होंगे इसलिये उस समय बात नहीं किया और बस दो घड़ी बाद ही सुनने को मिला – Guru ji is no more...
...दो-तीन किलोमीटर के भीतरी घेरे में सूखा रहा, बाहर वर्षा होती रही। देह भस्म हुई लेकिन चिता वैसे ही दहक रही थी। वापस होते जन के सबसे पीछे अंतिम मैं। उल्टी कुल्हाड़ी से मैंने राह काटी और मूसलाधार वर्षा प्रारम्भ हो गई। गंगा स्नान, अग्नि स्नान और अंत में इन्द्रजल स्नान।
 यज्ञा यज्ञा ..अग्नये..गिरा गिरा..गच्छ... पर्जन्य बरसे किंतु अग्निदेव शांत नहीं हुये, तीसरे दिन भी अंगार यथावत रहे। लकड़ियों में हीर अधिक थी या कोई और बात थी

... पिताजी! दुआर के उदास शमी को क्या कहूँ? जो सूख गया है उसका क्या करूँ? काँटों से तो बच भी नहीं सकता। बहुत कुछ अधूरा रह गया, बहुत कुछ। अभेद्य भीत के पार कब और कैसे पहुँच पाऊँगा? अब तो आप पितर हैं, बतायेंगे न?   

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

डेट

शनिवार का दिन समुद्र के किनारे डूब रहा था और मैं प्रतीक्षा में था। उसे अनजान भेंट ही कहूँगा, ब्लाइण्ड डेट में किसी ऐसे परिचित का होना अनिवार्य होता है जो दोनों को मिला दे। हमारे साथ ऐसा नहीं था, इंटरनेट को  मनुष्य तो नहीं कह सकते न!
साँझ की थकान में नीचे आ गये सूरज के साथ पश्चिम के मकान भी पियरा गये थे। मुझे थमी सी बयार साँवरी लग रही थी जिसके रुख पर हल्दी का लेप लगा था। मैं अपने में मुस्कुराया – परिवेश भी मनुष्य की नकल करता है। यहाँ की साँवली महिलायें मुख में हल्दी लगा घूमती जो हैं! पूरब में बदली सी थी या धुन्ध, पता नहीं लग रहा था लेकिन इतना अवश्य था कि किनारे घूमते सैकड़ो लोगों में कोई साँझ में यूँ डूबा न होगा जैसा मैं था। सब अपने आप में मगन थे। हहरते सागर में कोई कितने संवाद घोल सकता है! मैं चकित भी था।
मनुष्य अकेलेपन से कतराता है। जो भी उसका विस्तार है वह भीतर के निर्वात को भरने के लिये ही है जिसे उसने जाने कितने भागों में बाँट अलग अलग नाम दे रखे हैं। मैं भी उससे बचना चाहता था। यह भी कह सकता हूँ कि एक पचपन साल के किरानी के लिये वह अनिवार्य है, तब जब कि न कोई मित्र हो, न पत्नी हो और न बच्चे। उस दिन जाने क्या सूझी तो एक डेटिंग साइट पर चला गया, यह सोच कि कोई मिल ही जाय। मुझे किसी स्त्री मित्र की चाहना नहीं थी लेकिन ऐसी साइट पर किसी पुरुष का पुरुष मित्र ढूँढ़ना तो उसे समलैंगिक अधिक सिद्ध करता जो कि मैं हूँ नहीं। इस हास्यास्पद कारण से ही मैं स्त्री मित्र ढूँढ़ने निकला।
पुलिस द्वारा अपराधी की जाँच पड़ताल सरीखे प्रश्न झेल कर प्रविष्ट हुआ तो उबकायी आने लगी। कुण्ठाओं के लिजलिजे चित्र सर्वत्र बिखरे थे। साइट डिजाइन करने वाला पक्का कुलोचन होगा, यह तय था। यूँ ही पन्ने पलटते एक चित्रहीन प्रोफाइल पर ठहर गया। आयु 35 वर्ष, ऊँचाई 4'4'', रुचि 55-60 की वय-परास के पुरुष। विचित्र सी प्रोफाइल उलझाने वाली थी – ड्रॉप डाउन में वय चुनने में त्रुटि हुई होगी जिसे उसने बहुत दिनों से देखा ही नहीं होगा लेकिन प्रोफाइल तो सक्रिय थी। उत्सुकता में मैंने अपनी पसन्द जाहिर कर दी... 4'4"! हूँ।
... चैट से होते होते बातें जाने कब मोबाइल पर आ गईं और हम खुलते चले गये लेकिन हमने एक दूसरे का न पता जाँचा और न चित्रों की अदला बदली की। इस नम सीझते नगर में उमस बढ़ती जाय तो जीना मरना हो जाता है। ऐसे ही एक दिन का जब मैं रोना रो रहा था तो वह खिलखिला उठी – पता है? मैं सप्ताह में बस तीन दिन ही नहाती हूँ। मैंने उसे फूहड़ गन्धिनी कहते हुये बताया कि मैं दिन में दो बार।
तो मिल कर जान ही लें कि कौन अधिक गन्धाता है और किसकी खाल धुलते धुलते इतनी पतली हो गयी है कि बयार भी चुभने लगी है? – प्रस्ताव उधर से ही आया और शनिवार का दिन तय हुआ।
उसने पूछा – तुम्हें पहचानूँगी कैसे?
मैंने तुरंत बताया – काली टी शर्ट। इस नगर में कोई और नहीं पहनता होगा।
“क्यों भला?”
“मैंने आज तक नहीं देखा। काले पर जमे पसीने की धारियाँ भद्दी जो लगेंगी, सूरज सोख कर देह स्वयं अपने को घायल कर लेगी सो अलग!
खनक तेज हुई – अच्छा, तो कहाँ मिलेंगे?
“वहीं जहाँ मरुधर को उसकी लल्ली ने विदाई दी थी।”
वह प्रगल्भ हो चली – आना पक्का, साँझ को जब दिन डूबने लगे लेकिन आर्यश्रेष्ठ! इन दोनों का परिचय भी करायेंगे?
मैंने हँसते हुये उत्तर दिया  - अरे, एम जी आर और अम्मा, और कौन? 
दूसरी ओर अचानक ही शांति छा गयी। मोबाइल एकदम से कट गया। मैंने दुबारा मिलाया लेकिन आउट ऑफ कवरेज बताने लगा।
आने वाले दो दिन कोई बात न कोई चीत। मैं पुनरावलोकन करने लगा – मेरी हँसी में हल्कापन या असहज करने वाले संकेत तो नहीं थे? क्या कारण हो सकता है, वह ऐसी प्रूड तो नहीं है। मैंने कुछ अवांछित तो कहा नहीं!
पता नहीं, लेकिन मैं जाऊँगा अवश्य...
...बालू के ऊपर दूर तक दुकानें टिमटिम हो चलीं थीं। नीचे रेती की पियराई सलवटों पर झँवराई चढ़ने लगी थी लेकिन उसका कहीं पता नहीं था। मैं ऐसे सोच रहा था जैसे उसे पहचानता होऊँ। विरक्त हो मैंने पूरब की और दृष्टि फेरी, आश्चर्य हुआ कि बादल इतने लाल थे जैसे उनके पीछे दूसरा सूरज छिपा हो। छलना, मैं बुदबुदाया। ऊब इतनी गहन हो सकती है कि ध्यान की उच्चतम स्थिति जैसी हो जाय। उस किनारे तक पहुँच चुका था  फिर भी मैं बैठा रहा, मरुधर से जया मिलेगी ही। 

पश्चिम को निहारते आँखें थक गयीं - उस कद की कोई न दिखी कि पीछे से किसी ने कन्धे पर थपकी दी - सॉरी देव, विलम्ब हो गया। वही थी, कुछ लोगों का स्वर मोबाइल से इतर कितना मधुर लगता है न! 
मैंने आँखें घुमाईं और ठगा सा रह गया - अवस्था उतनी ही थी लेकिन देह तो सामान्य ऊँचाई की थी। अंग्रेजी औपचारिक वेशभूषा में वह आकर्षक लग रही थी, पाँव में साधारण चप्पल ही थे, हाई हील नहीं। मुझे मुँह बाये देख वह खिलखिला उठी - अरे, जया को आसन ग्रहण करने के लिये नहीं कहेंगे आर्यश्रेष्ठ! 
वह सुन सके ऐसे मैं बुदबुदाया - उपविश द्रविड़े! और हम दोनों खिलखिला उठे। 
उसने कहा - यू डॉण्ट लुक दैट ओल्ड।
मैंने पलट कर कहा - तुम भी उतनी नाटी नहीं हो नॉटी! 
मैंने एक नारियल पानी उसे थमाया और दूसरा स्वयं ले लिया - सही सही बताओ, क्या करती हो? 
उसने उत्तर दिया - एक प्राइवेट फर्म में फाइनेंस देखती हूँ। गुड्डी और मेरे लिये पर्याप्त है। 
“गुड्डी? 
हाँ, मेरी बहन है। बंगलोर में एम सी ए कर रही है।
मैं चुप हो गया। मौन कुछ खिंचा तो उसने ढीला किया - चुप क्यों हो गये?
मैंने प्रतिप्रश्न किया - अम्मा और एम जी आर कहने पर तुम एकदम से क्यों चुप हो गयी थी?
उसने ठंढे स्वर में उत्तर दिया - उस बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं होगा। पहली भेंट का स्वाद न बिगाड़ो, नारियल पानी पियो।
मैंने मनुहार सी की - बताओ न? 
उसने बात घुमा दी - जानते हो, एक तमिळ कवि हुये हैं जिन्हों ने नारियल की तुलना पयोधर से की है। तुम्हारे हाथ में जो है उसे देखो तो! 
वह कौतुक के साथ मुस्कुराने लगी। मैं लजा सा गया। 
“ए, , ए ... द ओल्ड मैन इज ब्लशिंग!”
उन खिलखिलाहटों से समुद्र की गरज भरती गयी ठीक वैसे जैसे साँझ को बाबा की धीर गम्भीर समझावन के बीच यकायक माँ किसी बच्चे को दुलराने लगती थी। साँवरी के दाँत चमक उठे और मैंने कहा - बस, बस ... मेघ बरसने लगेंगे। बाढ़ से मुक्त हुये अभी अधिक दिन नहीं हुये।
वह सहसा चुप हो गयी और मैंने मन में उपमा गढ़ी - जैसे बादलों के बीच प्लेन का इंजन यकायक बन्द हो जाय और वह नीचे धँसने लगे - सूँ sssss...

प्रकृतिस्थ हो उसने कहा - कुछ अपने बारे में कहो जेंटिल ओल्ड मैन।
मैंने प्रतिवाद किया - ओल्ड कहना आवश्यक था? 
उसने मुस्कुरा कर उत्तर दिया - हाँ, नहीं होते तो मैं तुमसे बातें कर रही होती?
 बताओ, कहाँ से कहूँ?
अपने ब्याह से। 
हैं? 
हैं नहीं हाँ। चलो, बढ़ो।
कुछ खास नहीं। कॉलेज में था तभी हो गया था।
हैं, हैं, हैं ... लभ्भ मैरिज? द ग्रेट ओल्ड मैन - उसने अपने वक्ष आगे कर होठों पर हाथों से मूँछों की भंगिमा बनाई।
न्न रे, मैं मनहूसियत की सीमा तक मासूम था। सभी यौवनाओं का छोटा भाई। सोच कर ही हँसना आता है। 
इसमें हँसने की क्या बात हुई?
हाँ, रोने की बात है। 
रोने की भी नहीं है। आगे, आगे क्या, कैसे हुआ? 
कुछ नहीं। हमलोग बचपन में ही ब्याह दिये गये थे। सयाना हुआ तो उसे ले आया, गवना कहते हैं हमारे यहाँ। 
उत्सुकता में उसकी आँखें और काली हुईं थीं या नहीं लेकिन मुझे तो लगीं। वह उठ खड़ी हुई - वाह भइ वाह ... सुनो सुनो, सुनो इक प्रेमकहानी। लब्भ लेटरी। खूब चिट्ठीबाजी होती होगी?
नहीं रे, उस आयु में यह सब कहाँ हो पाता? जब तक समझ आती, तब तक घर का बूढ़ा अपनी पगड़ी बेटे के सिर पर रख हुक्का गुड़गुड़ाने चल दिया होता।
ऐसा क्या? ...तुम्हारे बाबा कब...?

उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया और मैं बमक उठा - मरे तुम्हारा बाप। मेरा अभी भी जीवित है और तुम जैसियों को आज भी अपनी मूँछों में बाँध कर नचा सकता है!
“सॉरी बाबा, सॉरी। उनको मेरी आयु के भी दसेक बरस लग जायें। बताओगे भी कि क्या करते हो?”  
“तुम्हारी ही तरह नौकर हूँ। ऊब कर यहाँ भाग आया।
“मैं ऊब के लिये नहीं, खूब के लिये आयी हूँ।
मैंने पूछा – खूब?
यस, टू अचीव स्टेट ऑफ फुलफिलमेंट। तुम भी यहाँ इसीलिये हो। हम सभी अपने खालीपन को भरने को व्याकुल कोटर भर हैं – उसका गम्भीर उत्तर था जो मुझे आतंकित कर गया।
जैसे किसी खंडहर के वृहद रखरखाव कार्यक्रम के दौरान हुई पुताई ने पुराना भले छिपा दिया हो लेकिन वह जहाँ तहाँ से झाँक रहा हो।  उसकी हिन्दी वैसा ही प्रभाव दे रही थी। मैं आतंकित सा हो रहा था – कोई छलना तो नहीं?
पूछ बैठा – तुम्हारी हिन्दी ...? उसकी आँखों की हँसी ने आगे पूछने नहीं दिया।

प्रस्तावना तो लम्बी दे सकती हूँ लेकिन समय नहीं है, कहते हुये वह पास खिसक आयी। मैंने भी पार्श्व में खिसक उसके कन्धे पर अपना सिर रख दिया, झुरझुरी का अनुभव मुझे हुआ लेकिन देह कौन सी, अलग नहीं कर पाया। हम दोनों क्षितिज देखने लगे, अचकचापन छिपाने को इससे अच्छा क्या हो सकता था?  
तनिक विराम के पश्चात उसने जारी रखा – हमलोग मूलत: गोवा से थे। पापा की पोस्टिंग बनारस में थी। सागर किनारे से गंगातीरे का यह संयोग ऐसा था कि मुझे आज भी लगता है दुबारा नहीं हुआ होगा। मेरा बचपन गंगा के रामनगर तट की बालुका में खेलते बीता, नाव तो नाव, कई बार तैर कर भी उस पार पहुँच जाती। पापा अजातशत्रु थे लेकिन एक दिन पता नहीं क्यों, किसने, पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई, उन्हें काशी स्टेशन पर गोली मार दी। टिकट मैं ही ले आई थी, कैंट स्टेशन पर मैंने ही विदा किया था...

...मौन कितना लम्बा खिंच सकता है? कितना भी लेकिन मृत्यु इतना नहीं। आँसू मृत्यु के तनाव को बहा देते हैं और हम व्यर्थ ही समय को श्रेय देते हैं।...मुझे ‘उसकी हिन्दी’ समझ में आ गई थी।

उसने एक बार मुझे भरपूर निहारा जैसे कुछ पढ़ सी रही हो और पुन: उस क्षितिज की ओर हो गई जो अब था ही नहीं – सबके पास संघर्ष की कोई न कोई कहानी होती ही है। तुम्हें सुना कर बोर नहीं करूँगी। ‘जया और मरुधर’ पर मेरी प्रतिक्रिया तुम्हें सता रही होगी, सुनाती हूँ कि ऐसा क्यों है?
इस बार उसने मेरा सिर खींच कर अपने कन्धे पर टिका लिया – रखे रहो, भरोसा होता है... पुरुष समाज में स्त्री अवचेतन में तीन पुरुषों की कामना रखती है, पिता, भाई और संगी। पुरुष कितनों की रखते हैं, मुझे नहीं पता। क्यों रखती है, बताना मेरे वश का नहीं। तीनों अलग अलग हों, कोई आवश्यक नहीं। कभी कभी वह निरे रक्त सम्बन्ध और बॉयोलॉजी से बहुत आगे बढ़ जाती है। किसी एक में तीनों मिल जायँ तो उससे अच्छी बात कोई हो ही नहीं सकती।
न, न, सिर न हटाना, उसी के सहारे तो कह रही हूँ। इस समय तुम तुम नहीं, मेरा आरोपण हो।
जया के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे, यह कहें कि वह इतनी छोटी थी कि उसे स्मृति ही नहीं तो अतिशयोक्ति न होगी। मरुधर में उसकी खोज पूरी हुई। संसार किसे अवैध सम्बन्ध कहता है, वह संसारातीत होता है, सम नहीं विषम किंतु सम को समोये। संसार रखैल और कुलटा कहता है तो वह उसके मानक होते हैं लेकिन उनका क्या जो उन मानकों से अपने को परे रखते हैं? एकाध बजर ढींठ हो जाते हैं, परवाह नहीं करते। जया और मरुधर भी, उन्हीं में से एक ...

... घिरती साँझ और पीली हो चुकी थी। दूर कहीं गेरुवा काला हो रहा था और मैं अपनी पूरी देंह को भिगोते स्वेद का अनुभव कर रहा था। सिर उठा कर देखा और पुन: रख दिया। तट पर दीप्त होते एकाध लट्टुओं की पृष्ठभूमि में किलोल करते घूमते लोग आँखों में स्थिर हो गये। सिर ही नहीं सब कुछ स्थिर था। कैसी चलती फिरती स्थिरता थी! जाने कब उसके कन्धे भीगे होंगे। मुझे नहीं पता कि मेरे आँसू थे या दो देहों के स्वेद, इतना याद है कि उसने अपने कन्धे और मेरे सिर के बीच अपनी हथेली लगा दी थी। उसके कहे  नारियल पयोधर और हाथ की सोच मैं सिहर उठा, मेरा सिर!...

मैं लेट गया और वह मुझे थपकी सी देने लगी – आगे और सुनोगे?
“हूँ”, मैंने बच्चे सी हुँकारी भरी।
“संगी ढूँढ़ ली हूँ, भाई और पिता की खोज ने मुझे डेटिंग पर विवश किया। कन्यादान के लिये ये दोनों चाहिये न। तुम किसलिये यहाँ हो, जानती हूँ। सोचो कि महानगर में एक आधुनिक कुमारी बाप और बीर कैसे ढूँढ़ पाती? नियति के तार में कोई कोई अपने आप से नहीं जुड़े होते, जोड़ने पड़ते हैं। सोचो कि वैसा विचित्र प्रोफाइल नहीं देती तो तुम कैसे मिलते? ... हो सकता है कि तुम अभी तक उबर न पाये हो लेकिन मेरा मन कहता है कि तुम्हारा मन समझ गया होगा। तुम यहाँ नर मादा सम्बन्ध के लिये तो नहीं आये थे न?”
मैं ने हुँकारी भर दी।
“तुम साइट पर परिपाटी से परे एक नितांत अपने वाले की खोज में रैण्डम आजमाने गये थे और मैं मिल गई। लकी हो या नहीं?”
मैंने पुन: हुँकारी भर दी।
“मैं भी लकी हूँ। ... अपने को कहाँ फिट पाते हो? बताओ?”

साँझ अब साँझ नहीं रह गयी थी। लट्टुओं ने गतर गतर उदास उजाला छिड़क दिया था और मैं गढ़ुवाये आकाश में आकार ढूँढ़ रहा था। लेटे ही लेटे मैंने उसे अपनी ओर खींचा और वह मुझ पर उतर आई। उसका सिर हाथ में ले और निकट किया तो निकटता में परफ्यूम की धीमी गन्ध घुल गई। उसकी साँसें दुधमुँहे बच्चे सी महक रही थीं। होठों से हट मैं मस्तक चूमने चला, लगा कि कुछ अवांछित मन में है इसलिये हिचक है। जाने कहाँ से किसी मेक्सिकन फिल्म का दृश्य ध्यान में आ गया जिसमें एक युवा पुत्र ने अपने पिता की मित्र से लजाते हुये कहा था – डैड अभी भी मुझे होठों पर चूमते हैं!
मैंने खींच कर सीने से लगा उसके होठ चूम लिये। दुधमुँही को जैसे जीवन मिल गया था।

...वापस आते हुये उसने अपनी बाँह मेरी बाँह में फँसा दी, फेल्ट कैप को मेरे सिर से उतार अपने पर रख लिया और यूँ सट कर सहारा लेते चलने लगी जैसे प्रेमी प्रेमिका चलते हैं। उसने चुहुल की – योर फ्रेम फिट्स बेटर दैन योर फ्यूचर सन इन लॉ। इस अन्धेरे में जो देखेंगे कहेंगे क्या जोड़ी है!   
“बापू, कल ठीक ठाक हुलिया बना पाँच बजे शाम को कन्नगी की प्रतिमा के पास आ जाना, भावी जामाता से मिलना होगा। आना अवश्य नहीं तो देवी कन्नगी का शाप तुम्हारे पुहार की ऐसी तैसी कर देगा।
चेन्नई कडक्करइ का लोकल रेल स्टेशन पास आ गया था। उसने कहा, यहीं ठहरो टिकट ले कर आती हूँ।
मैंने रोका -  रहने दो, मेरे पास मासिक टिकट है।
“तुम्हें विदा भी तो करना है बापू! टिकट तो लूँगी ही। अगले स्टेशन पर फिर से मर मरा मत जाना। बीर को भी तो ढूँढ़ना है।... हे, हे, हे। मजाक कर रही थी, अब टाइम नहीं ढूँढ़ ढाँढ़ की। तुम्हीं सब हो। फेमिली बनाने में और लेट नहीं करनी!


उसने फेल्ट कैप वापस मेरे सिर पर रख दिया और मैं टिकट की प्रतीक्षा में वहीं कर्ब पर बैठ गया। नीचे समय की दबी हुई रेत थी – काशी की मीठी बालू, चेन्नई की नमकीन।  
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- गिरिजेश राव      

सोमवार, 20 जून 2016

नक्षत्र परिचय - 2 (ग्रीष्म अयनांत के आस पास)

पहले भाग में हम बता चुके हैं कि लगभग फरवरी से लेकर जुलाई तक का समय नक्षत्र पर्यवेक्षण के लिये उपयुक्त होता है क्यों कि आकाश में बादल नहीं होते, ऋतु भी उपयुक्त होती है, धुन्ध और शीत अनुपस्थित होते हैं। वास्तव में जुलाई का महीना फरवरी की तरह लगभग ही उपयुक्त होता है, कारण यह कि जून के अन्तिम सप्ताह से ही वर्षा ऋतु साँकल बजाने लगती है।

अब तक हम इन नक्षत्रों को कुछ प्रमुख तारकसमूहों के साथ पहचान चुके हैं:     
स्वाति
चित्रा
हस्त
उत्तराफाल्गुनी
मघा
पूर्वाफाल्गुनी
अभिजित
 अब आगे बढ़ते हैं। 
जून ग्रीष्म अयनांत का महीना है। 20/21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य अपने उत्तरी झुकाव के चरम पर होते हैं और सबसे बड़ा दिन होता है। इस वर्ष संयोग अच्छा है। 20 जून को पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र पर होंगे अर्थात जेठ महीने(पूर्णिमांत) का अंत हो जायेगा। 21 जून को ग्रीष्म अयनांत के दिन आषाढ़ का महीना प्रारम्भ होगा। जेठ के महीने में सूर्य की तपन अधिकतम होती है। गाँव गिराम में कहते हैं मिरगा दहकता! मिरगा क्यों? क्यों कि इस समय सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में होते हैं।
21 जून को ही सूर्य मृगशिरा से आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और ईंख की खेती करने वाले किसान ‘अदरा की गुड़ाई’ की तैयारी प्रारम्भ कर देंगे। इस नक्षत्र का नाम संकेतक है कि वातावरण में वर्षा की प्रस्तावना में आर्द्रता अर्थात नमी बढ़ जाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि रामायण काल में कुछ क्षेत्रों में नया वर्ष वृष्टि प्रारम्भ से लगता था और इसीलिये संवत्सर ‘वर्ष’ कहलाता था। वे बताते हैं कि महाविषुव के स्थान पर नववर्ष का प्रारम्भ वर्षा के संकेतक ग्रीष्म अयनांत के दिन अर्थात 21 जून से माना जाता था।
21 जून के दिन उठिये, चार बजे भोर में।  पूरब और उत्तरपूर्व दिशाओं के बीच खड़े हो जाइये। उत्तरपूर्व में सबसे अधिक चमकते दिखेंगे ब्रह्महृदय (Capella), ब्रह्मबेला नाम ध्यान में आया?

मध्य दिशा में मन्द लपलप करता सा मन्द तारकपुंज दिखेगा। यही है देहाती ‘झुलनिया’ या ‘कचपचिया’ या वैदिक कृत्तिका नक्षत्र (pleiades) । जहाँ इसकी टिमटिम और द्युति के कारण सामान्य जन ने नाक में पहना जाने वाला गहना समझा वहीं वैदिक ऋषियों ने अग्नि की लपलप जिह्वा से साम्य पाया – अग्निर्न: पातु कृत्तिका।
 इसके कोरी आँख से दिखने वाले छ: तारों के काटने वाले पुराने शस्त्र कटार से आकृति साम्य के कारण कृत्तिका कहा गया। यही षडानन कार्तिकेय को दूध पिलाने वाली  मातायें हैं जिनकी महिमा अपरम्पार है। 
एक ब्राह्मण ग्रंथ में संवत्सर प्रारम्भ के समय इनके प्राची में अटल रहने के उल्लेख ने ही भारतीय परम्परा के इसाई कालनिर्धारण की धज्जियाँ उड़ा दीं। तैत्तिरीय संहिता का नक्षत्रमंडल इन्हीं ने प्रारम्भ होता है, आज कल की तरह अश्विनी से नहीं। इनके बारे में विस्तार से यहाँ भी बताया गया है।
इनके बाद सबसे आसान पहचान है अश्विनी या अश्वायुज के दो तारों (Sharatan) की जो कि लगभग पूरब में 30 से 40 अंश के बीच दिखेंगे। कुछ लोग नीचे वाले तारे की अपेक्षा ऊपर के मन्द समांतर तारे को युग्म का भाग बताते हैं। वैदिक जन इनकी प्रशंसा में बहुत छन्द रचे हैं। ये भूलों को मार्ग दिखाने वाले हैं और देवताओं के वैद्य भी – यौ देवानां भिषजौ हव्यवाहौ, विश्वस्य दूतवमृतस्य गोपौ।
अश्विनियों से ऊपर प्राची में ही मीन राशि के दो तारे दिखते हैं जिनका स्थान नक्षत्र मण्डल की अंतिम रेवती का है। कृत्तिका और अश्विनियों के बीच दिखती हैं भरणी (Torcularis)। यदि आप साढ़े चार बजे तक रुक गये और भूदृश्य स्पष्ट हो तो क्षितिज के पास दिख जायेंगे बुध ग्रह और रोहिणी(Aldebaran) नक्षत्र - साथ साथ। महाभारत काल में महाविषुव मृगशिरा नक्षत्र से खिसक कर रोहिणी नक्षत्र पर आ चुका था। रोहिणी के बारे में कुछ और इस लिंक पर।

रात पौने दस बजे के आसपास दक्षिण से दक्षिण-पूर्वी आकाश में चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, अनुराधा के साथ मूल नक्षत्र। साथ में वृक और वृत्र तारामण्डल। पूरब में गरुड़ (Aquila, Altair)।
 पहले दक्षिण में देखिये, वृक और वृत्र तारासमूह अपने आकार और तारों की बहुलता से स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं।
 नीचे क्षितिज के पास दो बहुत तेज चमकते ताराओं से ऊपर जाइये, चित्रा (Spica) मिलेंगी। पूरब की ओर बढ़िये। दक्षिण-पूर्व से थोड़ा पहले ही वृश्चिक या रामायण में वर्णित ‘ऐरावत की सूँड़’(Scorpio) स्पष्ट दिखती है। इसी में अनुराधा और ज्येष्ठा हैं। बिच्छू का डंक ही मूल नक्षत्र है। चित्रा और मूल को मिलाने वाली रेखा पर तुला राशि में हैं विशाखा (Brachium)। 
ठीक पूरब दिशा में हैं गरुड़ जी जिन्हें एक तेज चमकते तारे के परिवेश में देखा जा सकता है। पूर्ण चन्द्र के प्रकाश के कारण थोड़ी कठिनाई हो सकती है। मई उत्तरार्द्ध से जून पूर्वार्द्ध तक रात साढ़े ग्यारह बजे से नौ बजे के बीच कृष्ण पक्ष में इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

( क्रमश: ) 

रविवार, 12 जून 2016

बढ़ते बदलते

मँगतों और देवतों के देश में
अकाल से मरते थे लोग,
खाते पीतों के बीच भूख से नहीं।
उकताए बुद्ध तक ने
भूख को न माना दुख।
हम उन्नति कर गए
किन्तु आज भी
पचा नहीं पाते
भूख से मरना।
पोस्ट मार्टम और तराजू लगाते हैं
पेट से ककोर ककोर निकालते हैं
पचास ग्राम भात।
वर्ल्ड के सामने,
बैंक के सामने
चिघ्घाड़ते हैं -
नहीं मरा कोई भूख से।
इतिहास में -
वृकोदर सहमता है
पृथा भूल जाती है आधा कौर।
द्रौपदी के अक्षय पात्र
नहीं बचता साग तक
यादव की भूख
अल्सर में तड़पती है।
दुर्वासाओं के शाप फलते हैं
और हम यूं
... इतिहास को झुठलाते
आगे बढ़ते हैं।


शिक्षक हड़ताल प्रवचन हैं
सरकार मंच यात्रा भषण हैं
जनता चरमानन्द चुप पलायन है
विद्यार्थी हताशा मरोड़ धड़कन हैं।
भूले शब्द अर्थ भूलभुलइया में
बदल रहा है भारत
ज्यों कि त्यों रहते हुये।

रविवार, 8 मई 2016

नक्षत्र परिचय - 1

नक्षत्रों के अभिज्ञान से पूर्व दिशा-ज्ञान आवश्यक है। आधुनिक युग की आपाधापी में हममें से बहुतों को दिशायें नहीं ज्ञात क्यों कि कृत्रिम जीवन और विहार के कारण सूर्योदय और सूर्यास्त के दर्शन और महीनों के बीतने के साथ उन बिन्दुओं की सापेक्ष गति के प्रेक्षण से हमारा सम्बन्ध समाप्त हो चुका है। अस्तु। 

सुविधा के लिये चार दिशाओं के अतिरिक्त उनके बीच के चार मध्य बिन्दु दक्षिण पूर्व, उत्तर पूर्व, उत्तर पश्चिम और दक्षिण पश्चिम भी समझ लेते हैं। दिशायें 90 अंश के अन्तर पर क्षैतिज वृत्त को विभाजित करती हैं। किसी भी दिशा से होकर घूमते हुये पुन: उस दिशा तक पहुँचने में कुल 360 अंश होते हैं। उत्तर दिशा को 0 अंश मानें तो दक्षिणावर्त घूमते 45 अंश पर उत्तर-पूर्व दिशा, 90 अंश पर पूर्व, 135 अंश पर दक्षिण-पूर्व, 180 अंश पर दक्षिण, 225 अंश पर दक्षिण-पश्चिम, 270 अंश पर पश्चिम और 315 अंश पर उत्तर-पश्चिम दिशा होती है।

वर्ष में केवल दो बार सूर्य ठीक पूरब में उगता और पश्चिम में अस्त होता है। वे दिन विषुव कहलाते हैं। 20 मार्च के आसपास जो होता है उसे महाविषुव या बसंत विषुव कहते हैं। बसंत ऋतु सबसे सुखद और नवरस संचार से जुड़ी है, इस कारण संवत्सर इसी ऋतु से प्रारम्भ होते हैं। 20 मार्च से सूर्य का उदय बिन्दु क्रमश: उत्तरी झुकाव लेता जाता है। यह गति या खिसकन अयनगति कहलाती है। 20 जून के आसपास यह अपने चरम बिन्दु, पूर्व और उत्तर-पूर्व दिशा के लगभग मध्य अर्थात लगभग 63 अंश, पर पहुँच जाता है। इसे ग्रीष्म अयनान्त कहते हैं। यह वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है। इस दिन सूर्योदय महाविषुव के दिन से लगभग आधे घंटे पहले हो जाता है और भारत की राजधानी में सूर्यास्त उससे लगभग 80 मिनट पश्चात होता है।
इस दिन से सूर्योदय बिन्दु  पुनरावर्तन प्रारम्भ करता है और 22 सितम्बर के आसपास पुन: ठीक पूर्व में सूर्योदय हो ठीक पश्चिम में अस्त होता है, दिन रात समान घण्टों के होते हैं। इसे शरद विषुव कहते हैं क्यों कि उस समय शरद ऋतु होती है।
इसके पश्चात सूर्योदय बिन्दु दक्षिण की ओर खिसकता जाता है और दिन छोटे होने लगते हैं। 21 दिसम्बर के आसपास सूर्य पूरब और दक्षिण-पूर्व के लगभग बीच में 117 अंश पर उगता है। सूर्योदय का समय लगभग सवा घंटे बिलम्ब से और सूर्यास्त लगभग आधे घण्टे पहले – वर्ष का सबसे छोटा दिन। यह शीत अयनांत कहलाता है।
इस दिन के पश्चात सूर्योदय बिन्दु पुन: उत्तर की ओर खिसकना प्रारम्भ होता है और दिन की अवधि में क्रमश: वृद्धि होने से शीत ऋतु की तीव्रता क्रमश: अल्प होने लगती है और 20 मार्च को बसंत के मधुमय समय में पहुँच कर चक्र के पूरे होने के साथ नववर्ष आगमन की घोषणा कर देता है।  
विषुव बिन्दुओं के बीच छ: महीनों का अंतराल होता है और अयनांत बिन्दुओं के बीच भी। उत्तरी और दक्षिणी अयन गतियों के आधार पर ही सूर्य उत्तरायण या दक्षिणायन कहलाते हैं।
एक बात ध्यान में रखनी होगी कि अक्षांश स्थिति के कारण उत्तर भारत में वर्ष भर सूर्य के आभासी गतिपथ का झुकाव अधिकतर दक्षिण की ओर ही होता है।
 इसी कारण भवनों के दक्षिणी रुख अधिक ऊष्मा विकिरण ग्रहण करते हैं। इस तथ्य का उपयोग वास्तुविदों द्वारा भवन के भीतर सुविधा और स्वास्थ्य की दृष्टि से शयनकक्ष, रसोई आदि के स्थान निर्धारण में किया जाता है। छत के ऊपर लगे सौर ऊर्जा पैनल दक्षिण की ओर मुख किये रहते हैं और चमक से बचते हुये दिन का अधिकतम प्रकाश प्राप्त करने के लिये औद्योगिक भवनों की ढलवा छतों में उत्तर की ओर खिड़कियाँ दी जाती हैं जिन्हें North Light कहते हैं। 
वर्ष भर सूर्य अपने समस्त ग्रह उपग्रह परिवार के साथ जिस आभासी पट्टी पर गति करता प्रतीत होता है उसे क्रांतिवृत्त ecliptic कहते हैं। 
सूर्य गति, ऋतु परिवर्तन और उससे जुड़े शस्य चक्र को मनुष्य ने बहुत पहले जान लिया था। उसे अयनांत और विषुव बिन्दुओं की निश्चित बारम्बारता का भी पता था। समस्या यह थी कि उस पर दृष्टि कैसे रखी जाय, लेखा जोखा कैसे किया जाय? दिन में केवल सूर्य ही सूर्य दिखते थे किन्तु रात में उनके अतिरिक्त अगणित तारे, नक्षत्र पिण्ड चमकते दिखते थे। चन्द्रमा तो था ही! प्रेक्षण से उन लोगों ने जान लिया कि नक्षत्र सूर्य चन्द्र की तुलना में स्थिर थे।
उन लोगों ने सूर्य गति पर दृष्टि रखने के लिये रात के आकाश को आधार पट्टिका बनाया। चन्द्रमा की कलाओं में 27 से 28 दिनों की आवृत्ति थी। उन्हों ने क्रांतिवृत्त को उतने ही भागों में बाँट दिया। प्रत्येक भाग के कुछ अति प्रकाशमान तारे, तारकसमूह या उनसे बनी आकृतियों को उसके नाम कर दिया गया। चन्द्रमा जिस भाग पर होता उसे उस भाग के नक्षत्र का नाम दे कहते कि आज चन्द्रमा अमुक नक्षत्र पर है। सूर्य के लिये समाधान यह निकाला गया कि सूर्योदय से पहले रात रहते ब्रह्मबेला में जाग कर आकाश निहारा जाय। सूर्य के उदय का स्थान पिछले दिन से पता होता ही। उस स्थान पर जो नक्षत्र होता, सूर्य उस नक्षत्र में होता। आगे प्रेक्षण परिशुद्धता एवं सूक्ष्मता द्वारा एक से दूसरे नक्षत्र पर संक्रमण के समय की भी गणना होने लगी। गणित एवं प्रेक्षण को और पक्का करने के लिये नक्षत्रों को आगे चार पदों में बाँट दिया गया। इस प्रकार क्रांतिवृत्त के 27x4 = 108 भाग हो गये जो कि सटीक गणितीय भविष्यवाणी के लिये पर्याप्त थे।
वर्ष की आवृत्ति 365 दिनों के आसपास थी जब कि चन्द्रकलाओं की 27/28 दिनों की। गणनात्मक सुविधा के लिये चन्द्रकलाओं पर आधारित महीनों और वर्ष का समाधान कुछ इन विधियों द्वारा किया गया। 
महीने को तीस दिन का मान दे वर्ष को 12 महीनों में बाँट दिया गया। घट बढ़ के लिये महीनों में दिनों की संख्या में समायोजन किया गया। दूसरी विधि में महीने चन्द्र आधारित ही रखे गये। पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर होता, महीने का नाम उस नक्षत्र पर रखा गया जैसे चैत्र महीने में पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र पर होगी, माघ महीने में मघा पर आदि। वर्ष के अंत में दिनों की घटोत्तरी का समायोजन या तो 11/12 दिन जोड़ कर किया गया या वर्तमान में प्रचलित उस विधि में जिसमें हर तीसरे वर्ष इसके संचित हो लगभग एक महीने का हो जाने पर एक मलमास या पुरुषोत्तम मास लगा दिया जाता है। 
नक्षत्र प्रेक्षण के लिये धुन्ध और प्रकाश प्रदूषण से रहित खुला आकाश चाहिये जो कि ग्रामीण सरेह और नगर सीमाओं से कुछ दूर मिल ही जाता है। निरभ्र अर्थात बादलों से रहित आकाश हो, वर्षा और शीत की ठिठुरन न हों इसलिये उत्तर भारत में प्रेक्षण के महीने माघ उत्तरार्द्ध से प्रारम्भ हो आषाढ़ पूर्वार्द्ध (लगभग फरवरी से जुलाई) सर्वोत्तम हैं। दूसरे दिनों महीनों में भी सुविधा और दैनिक परिस्थिति के अनुसार प्रेक्षण किया जा सकता है।
नक्षत्रों को जानने के लिये पहले सरलता से दिख जाने वाले नक्षत्रसमूहों को जानना आवश्यक है। सभी नक्षत्र सब समय नहीं दिखते किन्तु वार्षिक चक्र के अनुसार क्रमबद्धता तो रखते ही हैं। नक्षत्रसमूह राशि भी कहलाते हैं जिनमें 12 का फलित ज्योतिष में प्रयोग होता है जो कि हमारा विषय नहीं।
ल अभिज्ञान वाले नक्षत्र समूह ये हैं:
1.  मृगशिरा
2.  सप्तर्षि
3.  शर्मिष्ठा या पंचपाण्डवमण्डल
4.  कृत्तिका
5.  वृश्चिक
6.  हस्त
7.  पुनर्वसु
ता से पहचान में आने वाले तारे और एकलतारा नक्षत्र ये हैं:
1.  श्वान या लुब्धक या मृगव्याध
2.  अगस्त्य
3.  स्वाति
4.  अभिजित
थोड़े प्रयास से अपना परिचय देने वाले तारे या एकलतारा नक्षत्र ये हैं:
1. ध्रुवतारा
2. मघा
3. श्रावण
4. रोहिणी
5. आर्द्रा
6. चित्रा
थोड़े प्रयास से अभिजनित नक्षत्रसमूह ये हैं:
1. पुनर्वसु
2.  स्रोतस्विनी वैतरणी
3. महासर्प
4. शिंशुमार
5. ब्रह्महृदय
6. ययाति
7. त्रिशंकु
कुछ और नाम हैं जिनको आगे प्रसंगवश बतायेंगे। यह ध्यान देना है कि सूर्यगति के प्रेक्षण से सम्बन्धित 27 नक्षत्रों से इतर भी ढेरों नक्षत्रमण्डल और राशियाँ हैं, यह भी कि नक्षत्र स्थितियाँ भी गतिमान हैं किंतु हमारे सन्दर्भ के लिये उनकी गति इतनी इतनी धीमी है कि उन्हें स्थिर ही समझा जा सकता है। समय क्रम में अब अनेक नक्षत्र क्रांतिवृत्त के पास भी नहीं रहे। नक्षत्रमण्डलों के तारे एक दूसरे के सापेक्ष भी गतिमान हैं जिसके कारण किसी नक्षत्रमण्डल का आकार आज से लाखों वर्ष पश्चात भिन्न भी हो सकता है। 
मनुष्य की आँख ऊर्ध्व में (ऊपर) सरलता से लगभग 70 अंश तक देख सकती है। खमध्य (सर्वोच्च बिन्दु zenith) 90 अंश पर होता है जिसे गले के पृष्ठभाग पर किञ्चित बल दे सिर ऊपर कर देखा जा सकता है।
बँधी हुयी मुट्ठी का अंशमान लगभग 10 होता है। आँखों की सीध में नक्षत्र की ओर मुट्ठी कर उसके अंश प्रसार का अनुमान लगाया जा सकता है। क्षैतिज से ऊपर की ओर स्थिति जानने के लिये मुट्ठी को सीधा रख एक के ऊपर दूसरी को रख बढ़ते हुये प्रयोग में लाया जा सकता है। इसी प्रकार दिशाओं से सम्बन्धित अंशमान का अनुमान करने के लिये मुट्ठी को क्षैतिज रख प्रयोग में लाया जा सकता है। ऐसा केवल प्रारम्भिक दिनों में ही करना होगा, आगे आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
प्रेक्षण की सुविधा के लिये हम पहले रात के साढ़े सात बजे से ले कर ग्यारह बजे तक का समय चुनेंगे। ऊर्ध्व में 10 अंश से नीचे के तारे सामान्यत: क्षितिज पर वृक्षों और ढूह आदि के छायाभास के कारण नहीं दिखते। यह काम धैर्य का है, बार बार दुहराने का है और साथ ही अकेलेपन का भी। बाहर जाते समय सुरक्षा और अपने स्वास्थ्य पर भी एक दृष्टि डाल यथोचित उपाय कर लें।
मई महीने से प्रारम्भ करते हैं। पहले पूरब से दक्षिण तक का क्षेत्र। सॉफ्टवेयर में मैंने क्रांतिवृत्त और ग्रहों को रखा है जिससे कि सुविधा रहे। साथ ही क्षैतिज और ऊर्ध्व अंशमापक भी हैं। भूदृश्य में वनस्पतियाँ, वृक्ष, गाड़ी, मनुष्य और दूरदर्शी भी हैं जिससे कि परिवेश से तादात्म्य स्थापित हो सके।
लगभग साढ़े सात बजे। पूरब दिशा में 40 अंश की ऊँचाई पर सबसे चमकता नारंगी तारा स्वाति(Arcturus) है। क्रांतिवृत्त से लगी हुई दक्षिण-पूर्व दिशा में 25 अंश की ऊँचाई पर है चित्रा जो कि कन्या राशि में पड़ती है। 25 से 32 अंश की ऊँचाई पर दक्षिण-पूर्व दिशा से बस थोड़ी दाहिनी ओर है चार तारों का एक समूह, लगभग पतंग के आकार का चतुर्भुज। यह है हस्त नक्षत्र (Crow)
दृष्टिपथ में जो तारा ~ 61 अंश की ऊँचाई पर दक्षिण-पूर्व दिशा से थोड़ा बाँई ओर है वह है उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र (Denebola)। स्वाति, चित्रा और उत्तराफाल्गुनी लगभग समबाहु त्रिभुज का निर्माण करती हैं।
वराहमिहिर के जन्म के समय चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पर था। दायीं ओर कुछ ऊपर चमकते गुरु दर्शनीय हैं। वर्ष में जिस अवधि तक ये दृश्यमान रहते हैं, अन्य नियमों से सम्पृक्त होने पर विवाह संस्कार सम्पन्न कराते रहते हैं।
उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाफाल्गुनी और मघा (Regulus); ये तीन नक्षत्र सिंह राशि समूह के अंग हैं। पूर्वाफाल्गुनी (Zosma) मन्द तारा है जो उत्तरा से लगभग 10 अंश ऊपर दक्षिण-पूर्व दिशा से बायीं ओर ही है। मघा को देखने के लिये ग्रीवा को थोड़ा ऊपर तानिये तो! गुरु बृहस्पति के ऊपर जो चमकता तारा दिखायी दे रहा है वह है गर्वी मघा नक्षत्र।
यदि बिलम्ब हो जाये तो प्रति आधे घंटे 10 अंश की गति से ऊपर देखें। आठ बजे के आसपास का चित्र यह है: 
सामान्यत: नक्षत्र परिचय उत्तर दिशा में सप्तर्षि (Great Bear) से प्रारम्भ किया जाता है किन्तु मैं यह दर्शाना चाहता हूँ कि अन्य नक्षत्र भी हैं जो बहुत सरलता से पहचान में आ जाते हैं जैसे इस समय प्राची दिशा में स्वाति। एक दूसरा कारण भी था – कुछ प्रतीक्षा करनी थी कि वह महारथी उदित हो जायें जो कभी सबकी आँखों के तारे थे, अभिजित (Vega), सम्भवत: महाभारत काल में इन्हें हटा कर अथर्वण 28 से 27 नक्षत्र कर दिये गये। कुछ के अनुसार अभिजित तब Vega नहीं था। कारण अनेक थे जिन पर पुन: कभी।
रात लगभग सवा नौ बजे। उत्तर-पूर्व दिशा से थोड़ा दाहिनी ओर एक मुष्टि अर्थात 10 अंश से थोड़े ही ऊपर दिखेंगे कांतिमयता में पाँचवे अभिजित। स्वाति से आप मिल ही चुके हैं। 50 से 60 अंश की ऊँचाई पर स्थित अर्यमन् या अर्यमा के संरक्षण में स्वाति रहती हैं। अर्यमन को मित्रता से सम्बन्धित नक्षत्र कहा जाता है।  
सप्तर्षि का विस्तार उत्तर-पूर्व दिशा से उत्तर की ओर 45 अंश के परास में है। यह मण्डल मनुष्य द्वारा सबसे अधिक पहचाने जाने वाले आकाशीय मित्रों में से एक है। सदियों तक इन ऋषियों ने भूले भटकों को दिशा बताई। डेढ़ मुष्टि या 15 अंश की ऊँचाई पर स्थित इस तारा मण्डल को कोई पतंग के साथ पूँछ, कोई उलटी कलछी/चम्मच तो कोई घोड़ागाड़ी के रूप में जानता है। पाश्चात्य सभ्यतायें इसे विशाल भालू के रूप में पहचानती रहीं जिसके लिये इसे Great Bear कहा जाता है।
जिन सात ऋषियों के नाम से इस मंडल को हम लोग जानते हैं, वे हैं – क्रतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वसिष्ठ-अरुन्धति और भृगु।
पुलह और क्रतु नाम के तारों को मिलाने वाली रेखा सात गुनी दूरी पर ठीक उत्तर में स्थित ध्रुव(Polaris) पर जा कर समाप्त होती है। यह तारा लगभग पृथ्वी के परिभ्रमण(घूर्णन) अक्ष पर स्थित है जो कि अति लघु व्यास के वृत्त की परिधि पर परिक्रमा करता प्रतीत होता है। अन्य सभी नक्षत्र इसकी उत्तरावर्त परिक्रमा करते दिखते हैं।
पृथ्वी के घूर्णन अक्ष का उत्तरी सिरा लगभग 25700 वर्ष की आवृत्ति से लट्टू के ऊपरी बिन्दु की तरह घूम रहा है इस कारण दीर्घावधि में उसकी सीध में आने वाले तारे परिवर्तित होते रहते हैं।
इस चित्र में दो भूतपूर्व ‘धुवतारे’ हैं – अभिजित और शिशुमार (Draco) नक्षत्रमण्डल का अभय (Thuban)। अभिजित आज से चौदह हजार वर्ष पहले ध्रुव के स्थान पर था तो कृष्णयजुर्वेदी तैत्तिरीय आरण्यक का अभय आज से लगभग 4800 वर्ष पहले। कालक्रम में ये दो पुन: ध्रुव होंगे। सम्भवत: अभिजित का पतन महाभारत काल से बहुत पुरानी घटना है।
विवाह के समय अभय तारे को दिखाया जाता था जो कि तब का ध्रुव था। वह परम्परा आज तक चली आ रही है।
लगभग 45 अंश के प्रसार में स्थित शिशुमार नक्षत्रमण्डल का नाम किसी और नहीं गंगा-गण्डक-सरयू के पानी में आज भी पायी जाने वाली डॉल्फिन के पूर्वज के नाम पर है जिसे स्थानीय लोग शोंश या सोंस कहते हैं। तैत्तिरीय आरण्यक इस नक्षत्र मण्डल के चौदह तारों का स्पष्ट उल्लेख करता है।
शिशुमार की पूँछ के चार तारे कभी अस्त नहीं होते जिनमें एक अभय भी है।
(क्रमश:)