सोमवार, 20 जुलाई 2009

बाउ मंडली और बारात एक हजार: पहला दिन - 1 (लंठ महाचर्चा)

(1),(2) भूमिका
(3) लंठ महाचर्चा: बाउ हुए मशहूर, काहे?
(4) लंठ महाचर्चा:बाउ और परबतिया के माई- प्रथम भाग
लण्ठ महाचर्चा: बाउ और परबतिया के माई - अंतिम भाग
(5) बारात एक हजार और बाउ मंडली-भूमिका (लंठ महाचर्चा)
गतांक से आगे. .
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घरौठा जैसे बदनाम गाँव, उसमें भी एक निहायत ही दरिद्र घर में इकलौते बेटे के विवाह करने के नाहर के निर्णय ने जैसे कोहराम मचा दिया। सारे नाते रिश्ते रूठ गए। वे जमींदार जिन्हों ने अपनी बेटियों का डोला उनके यहाँ उतारने का सपना देखा था षड़यंत्र रचने में लग गए। पहला झटका लगा जब अंग्रेज बहादुर ने इस शादी में शामिल होने में अपनी असमर्थता जता दी। उसके बाद तो जैसे बहानों की झड़ी सी लग गई। नाहर खून का घूँट पी रह गए। साथ ही उनकी ज़िद भी जैसे और गहरे धँस गई। अब बेटा भले कुँवारा रहे, किसी जमींदार की बेटी तो बहू बन आने से रही।
लेकिन नाहर भी थे उसी सामंती स्वभाव के जिसे असामियों का खून चूसने में आनन्द आता था। जब सामने वाला निर्बल हो तब तो वह सुख दुगुना हो जाता था। मन ही मन ठान लिया था बारात ऐसी जाएगी कि घरौठा वालों की आने वाली पीढ़ियाँ भी याद रखेंगी। वे ससुरे खिला पायें तो और अच्छा। रसद पूरी लेकर जाएँगे। उन्हें इसका रत्ती भर खयाल नहीं था कि पड़ोही अब उनके समधी और सूरसती उनकी बहू होने वाले थे, उनके सम्मान में ग्रहण खुद नाहर के हिस्से भी आता था।
उनका मत था कि रत्न, जमीन, घोड़ा और जोरू अगर उत्तम हों तो सुयोग के यहाँ ही रहने चाहिए। सूरसती का चयन भी इसी मानसिकता का द्योतक था।लालकोगुदड़ीमें कैसे रहने दिया जा सकता था?
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उस जमाने में जिस दिन बारात आती केवल उस दिन का भोजन बेटिहा (कन्या पक्ष) के यहाँ बनतादही चिउड़ा (कूटे हुए चावल का मोटा पोहा) और पूरी सब्जी। दूसरे दिन के लिए राशन, मिट्टी के बर्तन और लकड़ी बारात में भिजवा दिया जाता, वे लोग खुद पकाते खाते, नाच नौटंकी देख समय काटते। कन्या पक्ष थोड़ा निश्चिंत रहता। ऐसा करने का एक दूसरा कारण भी था। सवर्ण व्यवहार गोत्र से संचालित होता थामतलब जाति को तो ऐसे ही लिया जाता था, प्रमुख होती थी - उपजाति। ऐसे अवसरों पर जाति पूछने पर लोग गोत्र बताते। सामूहिक भोज में ऊँचे गोत्र वाले नीची गोत्र वालों के साथ पंघित(पंक्ति) में नहीं बैठते थेभले जाति एक हो और आपस में रक्त सम्बन्ध भी हों! इसका अपवाद केवल भांजा होता जिसे ब्राह्मण की श्रेणी में रखा जाता था।
पहले दिन तो यात्रा की थकान (तब एसी कारें नहीं थीं। बैलगाड़ी, घोड़े, हाथी, पैदल और रथ से लोग चलते थे।) के ब्याज से इस पर अधिक ध्यान नहीं होता था। बेटिहा के यहाँ भोजन व्यवस्था भी इस पाखण्ड को हल्का कर देती थी। लेकिन दूसरे दिन तो जैसे छुआछूत की यह भावना एकाएक ही ताल ठोंक खड़ी हो जाती। इससे निस्तार पाने का एक ही रास्ता थाभाई अपना राशन ले लो, चाहे जैसे पकावो खावो।

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खलिहान पर बाउ ने देखादसियों हाथी, कितने ही घोड़े और साथ लगती छोटकी और बड़की दोनो बारियों (छोटे और बड़े दोनों बागीचों) में छोलदारियाँ (छोटे टेंट) खुल रही थीं। आदमी अफरात। रंडी और लौण्डा दोनों तरह की नौटंकी वाले भी थे।
नरसिंघवा (जाने किस तरह की सन्धि कर नाहर सिंह का यह नाम बाउ ने जोड़ लिया था) संवकेरे (बहुत समय रहते) ही बारात लेकर गया था। बाउ ने अनुमान लगाया करीब हजार आदमी होंगे। ऐसी वादाखिलाफी और हिंसक आनन्द उठाने की नाहर की मनोवृत्ति पर घृणा, चिंता और क्रोध तीनों के आगोश में बाउ कुछ क्षण ऊभते चूभते रहे। फिर संज्ञा लौटीभोजन तो केवल साढ़े तीन सौ बराती के हिसाब से बनना था! और कल का राशन, लौना, लकड़ी वह भी सूखी - चूल्हे में जलने लायक?
मैनवा की ओर मुखातिब हो गरजे-
,”इहे देखावे ले आइल रहले ! भाग बहानचोद कैरटोली से बिरछा के बोला ले आउ। कहि दीहे बाउ पोखरा पर बोलवलें हँ टाँगी अउरी बाकी अदमी के साथे अब्बे। देरी भइल चीर देब। ओकरे बाद पँडोही काका के इहाँ बतावे चलि जइहे (यही दिखाने लाए थे! बहनचो भाग के कैरटोली से बिरछा को बुला ला। कह देना पोखरे पर टाँगी (कुल्हाड़ी) वगैरह और बाकी लोगों के साथ बाउ ने अभी पहुँचने को कहा है। देरी हुई तो चीर डालूँगा। उसके बाद तुम पँड़ोही काका के यहाँ बताने चले जाना)
मैनवा को दौड़ा बाउ भैंस पर सवार हुए और भैंस दौड़ा दिए पोखरे की तरफ।
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बिरछा। सही नाम रामवृक्ष। इस मनुष्य का दाहिना हाथ केवल सोते समय खाली होताबाकी समय उसमें या तो छोटी कुल्हाड़ी रहती या बड़ी कुल्हाड़ी के साथ रस्सा। कहते हैं कि राह चलते हुए वह पेड़ों को अनुशासित करते चलता। किसी की डाल रास्ते पर लटक गई हो तो हाथ घूमता छटाक !डाल जमींदोज। कोई छोटा पौधा लटक गया हो तो नजदीक के पेंड़ से डाल काट उसे सहारा दे सीधा करता। वह और उसकी गोलमुनेसर, ढेला, सक्कल और माधो के बारे में मशहूर था कि कैसा भी एँड़ा टेंढ़ा पेंड़ हो, कितना भी पुराना हो और कितनी भी मुश्किल जगह हो; उनके कुल्हाड़ी रस्से उसे सुरक्षित निकाल ही देते। कभी कोई दुर्घटना नहीं हुई। अजीब संयोगनाम मेंवृक्षऔर काम वृक्ष काटना!
आज बिरछा और उसके गोल की कठिन परीक्षा थी। समय बहुत कम था।
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जिनकी पानी में डूबने से मौत होती है वेबुड़वाहोते हैंमतलब जलप्रेत। पोखरे में जाने कितने बुड़वा थे जो भरी दुपहरी निकल कर नंगे चारो ओर नाचते थेतिजहरिया(तीसरे प्रहर) तक। गरमियों में जब दिन बड़े होते तो इस तरह के कई नजारे देखने के दावे किए गए थे। बच्चों और औरतों को तो वहाँ जाने की मनाही थी हीमरद भी दुपहर से पहले वहाँ से निकल आते और फिर दिन डूबने के समय ही जाते।
पोखरे के किनारे एक विशाल शीशम का पेंड़ हुआ करता थाएकदम ऊँचा सीधा जैसे आसमान को सहारा दे रहा हो। मोटा इतना कि दो आदमी भी घेरे में ले पाएँ। शिवचरन जब जीवित थे तो बाउ और वे दोनों बाप बेटे भैंस चराने यहाँ आते और देर तक उसके नीचे बैठ सूर्योदय और सूर्यास्त देखते रहतेचुपचाप। दोनों के वजूद से यह पेंड़ जैसे जुड़ सा गया था। इस पेंड़ को मिथकीय गरिमा मिली शिवचरन की मौत के बादजब भरी दुपहरी गोनई नट्ट और बाउ इसके नीचे साधना शुरू किए। कुछ ही महीनों में यह पेंड़ सूखने लगा और एक दिन ठूँठ रह गया। लोग कहते थे कि दोनों ने इस पेंड़ पर अगिया बैताल (अग्निराक्षस) साधा था - जलप्रेतों से लोहा लेने को। उसकी गरमी से ही पेंड़ सूख गया था। उसका नाम पड़ा – ‘पोखरा पर के बाबा
पीपल, बरगद, पाकड़ और यहाँ तक कि नीम को भी मैंने ऐसे मिथकों से जुड़े पाया है लेकिन शीशम ? वह भी बाबा कहलाए??
मिथकों को हवा देने में बाउ का एक अहम रोल था। जिस पेंड़ से उनके बापू की स्मृतियाँ जुड़ी थीं, उसका एकाएक ऐसे सूखना बहुत ही हृदय विदारक रहा। उस सूखे रुख को भी वे हर हाल में बचाना चाहते थे, इसलिए मिथकों को इतनी हवा दी कि वह मृत पेंड़बाबाहो गया। रोज सुबह शाम अभी भी आते और पुर्नवासी(पूर्णिमा) की रात भी। चहचहाई अँजोरिया मेंबाबाके नीचे बैठ सरेह(ग्रामीण भूदृश्य) को निहारते रहते, बापू को याद कर आँखें गीली करते और घर जाते। लोग कहते कि अगिया बैताल को ठंढा करने जाते हैं।
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पोखरा पर पहुँच बाउ ने फरमान जारी किया,”बिरछा, शीशो (शीशम) काटि द। चूल्हा में लगावे लायक चइला बना जा (शीशम काट दो। चूल्हे में लगाने लायक टुकड़े बना दो)
जब बिरछा को यहाँ आने का फरमान मिला था तो जिन्दे आदमी का डर जलप्रेतों के डर पर भारी पड़ा था सो पूरे लाव लस्कर के साथ हलुमान(हनुमान) गोंसाई को गोहराते गया। लेकिन अब यह आदेश, बाबा को काट दो ? बिरछा रिरियाने लगा अरे मालिक हमरो बाल बच्चे हउवें (अरे मालिक हमारे बाल बच्चे हैं) बाउ उस समय अपने अन्दर उमड़ रहे भावना के उफान से जूझ रहे थे। बिरछा की बात सुन कुल्हाड़ी उसके हाथ से लिया और आँसुओं को रोकते हुए पहला वारबाबाके सूखे तने पर किया।
अब डर खतम्म। बिरछा इज्जत के बाति बा। सुरसतिया के बियहे एक हज्जार बरात ले के नरसिंघवा आइल बा। बिहाने लौना बराति में देवे के बा। जेतना जल्दी हो सके कार पूरा कर। बैताल हम बान्हि देहले बानी। हई जंतर जा। कुच्छू नाहिं होई। (अब तो डर खत्म हुआ। बिरछा, आज इज्जत की बात है। सुरसतिया को ब्याहने उसका ससुर एक हजार बारात ले धमका है। कल लकड़ी बारात में राशन के साथ देनी है। जितना जल्दी हो सके, यह काम पूरा करो। मैंने बैताल को बांध दिया है। ये जंतर रख लो। कुछ नहीं होगा)भीतर बाहर दोनों रुख सेभरपूर जीवितमनुष्य का सम्मोहन !
बिरछा पगड़ी बाँध रस्सा सुलझाने लगा। ढेला और सक्कल लुकारे(मशाल) की व्यवस्था को चल दिए, रात हो सकती थी क्यों कि जब लगे ही थे तो बाकी पेंड़ पालो भी साफ कर देंगे। मुनेसर और माधो ने कुल्हाड़े सँभाल लिए थे। गाँव की इज्जत की बात थी। दोहाई हलुमान गोसाईं।
बाउ भैंस को गाँव की ओर दौड़ा लिए . . जारी

6 टिप्‍पणियां:

  1. इंगित दिक्काल मानो साक्षात है इस अप्रतिम लेखनी से ! और औत्सुक्य तो पगहा तोडाने को उद्यत है !

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  2. भाई साहब, आप तो गजब ढा रहे हैं। बाऊ की कथा ने मेरे शब्द ज्ञान को ही बदल डाला है, बल्कि सम्मृद्ध कर दिया है। बहुत से शब्द स्मृतिलोप का शिकार होने वाले थे। अब दुबारा ताजा हो लिए हैं।

    कोई ‘लंठ’ ऐसा भी हो सकता है? ताज्जुब है। आप से ऐसे ही चमत्कार की उम्मीद थी।

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  3. एक सांस में पढ़ गए हैं पिछली और ये पोस्ट... एकदम अपना परिवेश... पोखरा किनारे पेड़ और बाबा सब तो अपने गाँव वाला ही लग रहा है...

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  4. बहुत पास से साथ साथ चल रही कथा. जारी रखें प्रवाह!!

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  5. लाजवाब! परनाना की प्रेत-भेंटों के किस्सों सहित और भी बहुत कुछ पढा-सुना है, मगर बाऊ-गाथा जैसा कुछ याद नहीं पड़ता। अभी पढ़ ही रहा हूँ। देखते हैं नरसिंघवा रासी को कितना खींचता है और क्या-क्या करवाता है। रामवृक्ष और 'पोखरा पर के बाबा’ के बारे में जानकार अच्छा लगा।
    आपकी लेखनी का तेज बना रहे!

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