बुधवार, 1 जुलाई 2009

लंठ महाचर्चा : बाउ और परबतिया के माई

(1) , (2) भूमिका
(3) लंठ महाचर्चा: 'बाउ' हुए मशहूर, काहे?

(4) सम: ब्रिटिश काल, परम्परा: श्रौत

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'परबतिया के माई' एक गौरवर्णा थुलथुल महिला थी जिसकी ऊँचाई तीन हाथ से कुछ अधिक थी। उसका नाम क्या था, किसी ने नहीं बताया। सम्भवत: जो घटित हुआ उसके कारण लोगों ने उसे संतति की नाम परम्परा में ही याद रखा।

उसके मरद की लम्बी शरीर सुतवा थी और सुन्दर चेहरे से संभ्रांतता टपकती थी। पैदा हुआ तो उसकी फूआ (बुआ) ने उसका नाम इसी कारण रखा - सुखारी अर्थात राम चरित मानस की तर्ज पर 'सुखी और सुख देने वाला' शुद्ध कपड़े पहना कर बिठा दो तो बाबू घराने के जवान भी बुझ जाएँ, ऐसा !

लेकिन उसकी सुन्दरता और उसके कुकर्मों का कोई मेल नहीं था। गाँव वालों के 'सुख' का वह 'अरि' (शत्रु)' था और बाबू घराने के लिए परम सुखदाई।

गाँव
के दूसरे लोगों को बाबू घराना हमेशा नाम बिगाड़ कर पुकारता था जब कि उसी आदमी को गाँव वाले सही या आदरसूचक तरीके से। लेकिन सुखारी का नाम बाबू घराने वाले सही पुकारते थे और बाकी गाँव वाले सुखरिया। ऐसा क्यों था
?



उस जमाने में हरित क्रांति नहीं हुई थी और सामान्य किसान-मजदूर का उत्पादन उसकी खपत से एक सीजन पीछे चलता था। मतलब कि लोग साल भीतर ही खर्चे के लिए राशन बाबू टोली से उधार लेते थे और अगले फसली सीजन में ब्याज सहित वापस करते थे। इस प्रथा को 'मन्नी' कहा जाता था। मन्नी के बाँटने से लेकर वसूली के तगादे और वापसी की नपाई तक का पूरा काम सुखरिया करता था। मन्नी हर समय नहीं बाँटी जाती थी। बुध, बियफे (गुरुवार) और शुक को गजकरन सिंघ के दुवारे बखार (अनाज रखने का बाँस से बुना स्टोर) खुलती - दिन में 11 बजे। पहले पंडी जी कर बखार पर लक्ष्मी पूजा करते और तिलक लगाते और उसके बाद ही मन्नी बाँटने के ब्याज से 'रामनामी' डकैती शुरू होती।

सुखरिया अनाज नापते जोर जोर से बोलता, "रामे राम, रामे दूइ, रामे तीन, रामे पाँच, रामे छौ, रामे आठ....", मतलब कि अगर देता : रजिया (एक तरह का मापक) तो गिनता आठ। लेने वाले की क्या मजाल कि टोके या कुछ कहे। लोग जान बूझ कर भोले बने रहते। सीजन का सवैया चक्रवृद्धि ब्याज जोड़ जब वापसी का समय आता तो गिनती कुछ यों हो जाती, “ रामे राम, रामे राम, रामे दूइ, रामे दुइ, रामे तीन, रामे चार, रामे पाँच, रामे पाँच, रामे छौ...." मतलब कि नपा नौ और गिना गया : सयाने लोग लौटाने के समय जोड़ से सवैया, डेढ़ा तक अधिक लाते, कौन फँसे? गजकरना ने कलुवा जैसा जल्लाद पाल रखा था जिसकी मंडली पीटने से लेकर लाश गायब तक करने में उस्ताद थी।

देवता
'सुखारी' और लक्ष्मी माता की कृपा से गजकरन के दरवाजे पर बखारों की संख्या बढ़ती जाती और लोग नियति को मान दरवाजे और आँगन से चुपचाप खिसकता देखते रहते घरवाली की मुस्कान, उसके गहंने, बच्चों की सेहत और हँसी एवं कउड़ा (अलाव) की रौनक।

सुखरिया
तगादे के बहाने गाँव के हर घर के गोपन से वाकिफ़ रहता और मालिक लोगों को बताता। लोगों को लड़ाना उसके बाएं हाथ का खेल था।लोग उससे नफरत करते
, कोसते लेकिन सामने पड़ने पर आदर की प्रतिमूर्ति बने रहते . . . . यह पूरी व्यवस्था जारी थी पच्चीसों वर्षों से।

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परबतिया माँ बाप की तीसरी संतान थी। कृषि और मजदूरी प्रधान व्यवस्था में नारी संतान का जन्म आज की तरह विपदाकारी नहीं माना जाता था। लड़कियाँ 'भवानी' कहलाती थीं। खेतों में बुआई, निराई, कटाई करतीं और हाथ बँटाती तो बाबा के घर ढेंका (अनाज कूटने का जुगाड़) चलातीं, जाँते पर जौ, केराय पीसतीं, चूल्हा पोततीं, आग जलातीं, झाड़ू बुहारू करतीं, गाय खिलातीं, गोबर काढ़्तीं तो खाली समय गोटी, गुड़िया खेलतीं और सावन में बगइचा में झूला झूलतीं। उन्हें कभी भी नाम लेकर नहीं बुलाया जाता जब कि लौण्डों को लोग गरियाते रहते। दहेज का चलन था तो लेकिन वह प्राथमिकता में नहीं था। लड़की की चाल चलन, गुन सहूर और खानदान ही शादी के लिए निर्णायक होते। बुजुर्गों का मान था और उनका कहा ब्रह्मरेख होता।
उस समाज और दौर में भी सुखरिया को बला की घृणा थी लड़कियों से। पहली लड़की जब एक साल की हुई तो अचानक पिता का प्रेम जागा। रोज साँझे उसे घुमाने ले जाता और शंखिया मिला कर कुछ कुछ खिला देता। डेढ़ महीने के अन्दर लड़की बीमार पड़ी तो वैद्य जी की दवा शुरू हुई। कहना नहीं होगा कि दवा में भी शंखिया मिला होता। दो महीने होते होते 'भवानी' चल बसी। यह कैसे हुआ किसी को कानो कान खबर नहीं हुई। उस नराधम ने दो सप्ताह तक शोक मनाया। दो हफ्ते गजकरन के दुआरे 'लक्ष्मी पूजा' नहीं हुई। दूसरी के साथ भी यही हुआ। लेकिन इस बार माँ की ममता ने सहज बुद्धि और निरीक्षण से गड़बड़ भाँप लिया। पति और पत्नी के बीच के सम्बन्ध का ध्वंश इस घटना के बाद ही शुरू हुआ - पत्नी सीधा आरोप लगाती और पति सीधा इनकार कर देता।
नियति का खेल! तीसरी संतान भी लड़की हुई-दशहरे के दिन और माँ ने नाम रखा 'पार्वती' बिगड़ कर हुआ 'परबतिया' परबतिया का सौन्दर्य बला का था। माँ और पिता दोनों के सारे उत्तम शारीरिक लक्षण उस 'भवानी' ने समेट लिए थे। साल बीतते बीतते माँ की दुलारी ने आंगन को गुलजार कर दिया। माँ को नया नाम मिला - 'परबतिया के माई'
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यह गाँव बाउ का ननिहाल था। जाने किस दुर्भाग्य की बेल में बाउ के बापू सुखरिया के झाँसे में गए और अकर्म कर बैठे- ससुराल गाँव से मन्नी उधार लेने का। लौटाने गए तो जाने क्या सोच आठ साल के बाउ को भी साथ ले गए।दरबार लगा हुआ था और सुखरिया नाप रहा था। बापू अभ्यस्त गाँव वालों की तरह जोड़ से अधिक अनाज ले कर नहीं आए थे। जैसा कि होना ही था लौटान घट गया। गर्मी की सुबह - बाउ ने देखा, बापू पसीने पसीने हो गए। गजकरन का अट्टाहस गूँजा, " का हो पहुना, ठगे के सोचि के आइल रहल कि भाठ के रजियवे छोट होले? आव पीठ ठोंक देईं। सब चुकता मना जाई। गाँव के दमाद हउअ। एके हमरे ओर से दहेज मानि (क्या पाहुन, ठगने आए थे कि भाठ की रजिया ही छोटी होती है? आओ तुम्हारी पीठ ठोंक दें। सब कुछ चुकता मान लिया जाएगा। गाँव के दामाद हो। इसे हमारी तरफ से दहेज मान लो)"
हँसता हुआ गजकरन और दूसरे कास्तकार का नपनी करता मुस्कुराता सुखरिया। ठगे से खड़े बापू - एक शब्द नहीं। नीचे की जमीन भीग गई थी - पसीने से। नान्हें उमर के बाउ। वह क्षण? समय जैसे ठहर गया था।
दूसरा प्रहार," अरे तू हूँ आइल बाड़ भैने? जा मामी से मिठाई ले ल। अब का तोहके खिअइहें? (अरे भांजे! तुम भी आए हो? जाओ मामी से मिठाई माँग लो। अब तुम्हारे बाप तो खिलाने से रहे।)" यह गजकरन की बहुत बड़ी भूल थी। भांजा और ब्राह्मण एक ही तरह के आदरणीय माने जाते थे। परम्परा से होते हुए यह मान्यता रक्त में इतनी घुल चुकी थी कि आठ वर्ष के बाउ को भी जैसे काठ मार गया, बाकी बचे लोगों का तो कहना ही क्या ! इतना अहंकार और इतना अपमान !!
अब स्तब्ध सभा से बापू का हाथ लगभग खींचते हुए बाउ उन्हें मामा के घर ले आए। भयानक तूफान आने के पहले के आसमान की तरह चुप बापू के हाथ में इतना पसीना था कि अंगरखे के उपर से पकड़ना पड़ा !
उसी शाम बापू को तेज बुखार हुआ और वे चल बसे। नान्हें बाउ उस शाम एकदम से वयस्क हो गए।
मृत्यु बेला में बाप की मौन तड़प के कारक दो कलंक बाउ के दिल में हमेशा के लिए चुभ गए - 'कर्जे में मरना' और 'मउगा मुअल ससुरारी में (स्त्रैण की मृत्यु ससुराल में होती है)'|. . . . प्रसंग अं अगले भाग में

16 टिप्‍पणियां:

  1. गजब , काव्य रच रहे हैं आप ! चरैवेति ....

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  2. एक और श्रेष्ठ रचना, बधाई। कथांत की प्रतीक्षा है, ज्याद इंतजार न करवाएं!

    कोई कहकर दिखाए, कि यह दो कौड़ी की रचना है!

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  3. श्रेष्ठ और अद्भुत रचना अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा आभार्

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  4. बहुत जबरदस्त लिखा है. आगे का इंतजार करते हैं.

    रामराम.

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  5. इतना सशक्त पूर्वार्ध है तो यह कथा अन्तत: त्रासदिक न निकले!
    इन्तजार करते हैं।

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  6. गज़ब लिख र्हे आप।कोई तुलना नही।

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  7. का महाराज ! अगले में ख़तम ? त जल्दी अगला पोस्ट ठेल दीजिये... हमें तो लगा की अभी चलेगा. गजबे लिखे हैं !

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  8. @अभिषेक ओझा

    अरे नहीं, कथा माला तो गुँथती रहेगी। केवल इस प्रसंग का अंत होगा अगले भाग में। लीजिए ठीक कर दिया।

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  9. पहले बाऊ की जवानी का किस्सा और अब फ्लैश-बैक। दोनो पढ़कर आनन्द आ गया। इसे लंठचर्चा कैसे कहें? यह तो राग दरबारी हो चली है।

    अच्छा ऐसा करते हैं कि एक सच्चाई की बात (लंठई की नहीं) सबको बता देते हैं। गाँव में दीपावली के बाद गोबर्द्धन पूजा होती है। उसमें महिलाएं मूसल लेकर गोबर से बने गोधन महराज को कूटकर नींद से जगाती हैं। उस दिन के बाद से विवाह आदि के मांगलिक कार्य शुरू होते हैं और खुशगवार मौसम भी छा जाता है।

    हमारे ये आलसी महाराज ऐसे ही गोधन बने सोए हुए थे। अपने ब्लॉग को आलसी का चिठ्ठा घोषित तो कर ही चुके थे। संयोग से इनको मेरा सपना आया और सपने में ही महसूस हुआ कि कुटाई होने वाली है। हड़बड़ाकर उठे और आलस्य छोड़कर चल पड़े। मुझे खोजकर मेल किया और फिर जो परिवर्तन हुआ वह इनको आलसी से ‘बाऊ’ बना चुका है।

    अतः निष्कर्ष निकलता है कि ब्लॉगजगत की इस उपलब्धि के लिए आप मुझे भी शुक्रिया कह सकते हैं :D

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  10. गज़ब की कहानी है, देखते हैं आठ बरस के बाऊ क्या-क्या करते हैं अब.

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  11. बेमिसाल, गजब लिखते हैं आप, मान गए आपको

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  12. गिरिजेश भाई,
    वाकई में बहुत बढि़या कथा कह रहे हैं आप।

    कथा के बहाने काफ़ी कुछ और भी अनकहा कह रहे हैं आप।

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  13. अद्भुत.. एक मिस्टिरियस लैंडस्केप की तरह..

    प्रारम्भ रामे राम...२..४..५..७ से करके ‘मउगा मुअल ससुरारी में’ तक आप लिख तो गये, लेकिन कभी सोचा कि इतनी तेज फ्रीक्वेंसी में पोस्ट की अंतर्निहित भावनाएं बदलने का हमारे जैसे कमजोर दिल पाठकों का क्या हश्र होगा..??

    अभी तक स्तब्ध हूँ..

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  14. प्रेमचंद और रेनू का ग्रामीण परवेश फिल्म की भांति चल पड़ा है.

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