शनिवार, 4 जुलाई 2009

लंठ महाचर्चा : बाउ और परबतिया के माई . . अंतिम भाग

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आप से अनुरोध है कि इस कथामाला को थोड़ा समय ले कर पढ़ें और पिछले को पढ़ने के बाद आगे के प्रसंग पढ़ें, आनन्द आएगा। यात्रा आगे बढ़ने के साथ साथ इसमें सारे रस मिलेंगे। भुलाई जा चुकी 'लंठई' को पुन: प्रकाशित और प्रतिष्ठित करने का यह एक विनम्र प्रयास है। साथ ही इस धारणा को ठेंगा भी कि ब्लॉग में साहित्य नहीं है।
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पिछले भाग से जारी...

शिवचरन, यही नाम था बाउ के बाप का। उनकी मिट्टी(मृत शरीर) जब दुवारे उतरी तो गाँव में हाहाकार मच गया। इस गाँव में ब्याह कर आने के बाद मजमें के बीच पहली बार झलकारी निकली थीं। बावरी सी दुवारे की हर चीज को पति से जोड़ याद करती, भाई के कन्धे पर विलपती, पछाड़ खाती मृत शरीर पर ढेर सी हो गईं। गाँव को जैसे काठ मार गया था। सब चुप्प! एक ऐसा आदमी जिसने अपने सामने की थाली तक जरूरतमन्द को दे दी, अनाज के एवज में ऐसे कैसे जान दे सकता था?
और बाउ! जैसे खड़ी फसल को रातो रात बतास मार गया हो। खामोश! आँख में एक कतरा आँसू तक नहीं। दाहा (दाह संस्कार) के बाद ही बाउ बोल पाए थे - माई, अब आगे सोचु (माँ, अब आगे सोचो)। जिसने भी सुना काठ हो गया।

बहनों और मामा के चले जाने के बाद बाउ बावरे से घूमते - खेत, खलिहान, पोखरा, चँवर, मेंड़, बगइचा जैसे बापू का साया ढूढ़ रहे हों। काले चेहरे पर ऐसे भाव कि गाँव का कोई आदमी इस बच्चे से कुछ कह नहीं पाता था। भैंस बिसुक कर औने पौने दाम बिक गई। खेतों की फसल कैसे कटी, कब घर आई? माँ बेटे ने नहीं जाना। कोदो, मड़ुवा और चटनी यही आहार रह गए थे - माँ बेटे के।

ऐसे में प्रकट हुआ गोनई नट्ट- शिवचरन का इयार (यार)। बंजारा, जिसकी दोस्ती हमेशा रहस्य रही। नीम के नीचे बैठ आधे दिन रोता रहा। फिर बाउ का हाथ पकड़ा और खेतों की ओर निकल गया।. . . बाउ को छाँह मिली और भैंस खरीद दीक्षा शुरू हुई। गरमी की भरी दुपहर जब सरेह (देहाती भूदृश्य) में प्रेत घूमते, दोनों सूने बागीचे में जाने क्या क्या करते रहते? गुरु की भूमिका निभाता यह नट्ट बाउ को कुछ कुछ सिखाता और फिर गायब हो जाता। बाउ वैसे ही लगे रहते, एकाध महीने बाद फिर गुरु शिष्य साथ साथ.. समय उड़ता रहा लेकिन न तो झलकारी की खोई हँसी वापस आई और न हीं बाउ की आँखों में कभी आँसू दिखे।
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परबतिया को मारने के सुखरिया के सारे उद्योग सजग माँ ने असफल कर दिए। बढ़ती कन्या का वज़ूद पापी बाप के रुख पर अमरबेल की तरह छा सा गया। सुखरिया रोज मरता और रोज मारने के जुगाड़ लगाता। (उसकी निहायत ही अतार्किक मनोग्रंथि आज तक मैं समझ नहीं पाया)। लोगों को सताना तो जैसे सुखरिया का शौक हो गया था। परबतिया की माई रोज पति को कोसती, "अरे मोछिउखरना, केकरे खातिर एतना पाप बटोरतड़े (अरे मुए, किसके लिए इतना पाप बटोर रहे हो?)"। बदले में मिलतीं गालियाँ और चइला (चुल्हे की लकड़ी) से पिटाई। परबतिया माँ से लिपट जाती और वह नराधम उसे भी नहीं छोड़ता। मरद मेहरारू का रिश्ता अनवरत चलने वाली गालियों और मार पीट की बाढ़ में बह गया। जो बेटी गाँव में सबसे सुन्दर सबकी दुलारी हो उसका अपना बाप ही . .?
गजकरन का शोषण जाल फैलता ही गया और एक दिन ! उसकी अब तक सोई नजर बारह साल की हो चली परबतिया पर जाग उठी। धन की अति हो तो मनुष्य पशु से भी गया बीता हो जाता है। सुखरिया से फरमाइश की गजकरना ने - मतलब था परबतिया को हवेली भेज दिया करे, बहू जी को मदद हो जाएगी। गजकरना को और क्या चाहिए था लेकिन गवने को तैयार होती बेटी(परबतिया बचपने ही ब्याह दी गई थी) को उस भ्रष्ट के यहाँ भेजने को माँ तैयार नहीं हुई। उस दिन से बाप की नजर भी बेटी पर मैली हो गई। आज जब यह लिख रहा हूँ तो अंगुलियाँ जैसे काँप रही हैं.... न जाने कैसे और कितनी बार बाप की वासना दृष्टि से माँ ने बेटी को बचाया। गवना करने का नाम बाप न ले और. . उस घर का माहौल? . . एक छत के नीचे तीन जन रह रहे थे, एक बाकी दो का शत्रु। शत्रु से बेटी को हर पल बचाती चौबीस घण्टे आतंक में जीती माँ। परिवार का विध्वंस पूर्ण हो चुका था।
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करीब आठ वर्षों के बाद पूस महीने के एक दिन बाउ ननिहाल आए। साथ में था अनाज का गाड़ा(बैलगाड़ी)- उपर तक चढ़ा कर भरा हुआ।दिल की चुभन इतने वर्षों में समझ बढ़ने के साथ साथ और बढ़ती चली गई थी। बर्दाश्त के बाहर! जिस गाँव में पैर न रखने की कसम सी खा रखी थी, आज आना पड़ा- बाप के माथे का कलंक और माँ के होठों की खोई हँसी!
गाँव का भैने घर घर घूमा। आतंक राज्य। सुखरिया की मन्नी-करनी अपने पूरे शबाब पर थी। उससे मिला तो भैने ने अपने चेहरे और उसके चेहरे के अंतर को मन में बिठा लिया। सुखरिया जब तगादे पर निकला तो बाउ उसके घर परबतिया के माई से ममिऔरा (मामी का रिश्ता) जोड़ने में लग गए। यह प्रयास कितना सही था, भगवान जाने लेकिन बाउ को सही गलत से फर्क पड़े तब न! कुरूप होने के बावजूद बाउ के वजूद में कुछ ऐसा था जो नारी मन को मोह लेता था। उस दुपहर बाउ ने एक और मामी बना लिया। घृणा के कारण वर्षों से जिस आँगन कोई दूसरा झाँकने तक नहीं आया था, वह आँगन एक गैर के अपनापन की गरमी पा फुला सा गया था। मन की गाँठें, घर की बातें और दु: सब खुलते चले गए जैसे गमछे की गाँठ सरक गई हो और बँधी सरसो फुर फुर सरकती जाय।. . बाउ ने परबतिया को देखा - दो जोड़ी सूनी आँखों ने जैसे सारा कुछ कह सुन लिया हो ! उस रात नराधम सुखरिया ने बेटी का शील लूटने की कोशिश की। चीख सुन माई दौड़ी तो मिली सिर की चोट। चीखती बेहोश हो गिर पड़ी। ऐन मौके टाट फाड़ कन्हैया बन पहुँचे थे बाउ। सुखरिया का हाथ पकड़ा तो जैसे कलाई मसल देंगे- नट्ट गुरु का दाँव। लेकिन दो औरतें ! एक बेहोश और एक बदहवास। सुखरिया को पलखत मिला और वह अन्धेरे में गुम हो गया। जुट गए लोगों को भरमा कर वापस भेजने के बाद बाउ वहीं सो गए। अगले दिन शाम को जब छाँटी (जानवरों का चारा) काटने के लिए बाउ के मामा उसी दिन का खरीदा गँड़ासा ढूढ़ने लगे तो बाउ और गँड़ासा दोनों गायब थे। मामा ने सोचा बँसवारी में पैना काटने गया होगा।
वह रात बाउ के लिए निशापूजा की रात थी! सुत्ता पड़ते ही बाउ गजकरना के दुवारे जा अँधेरे में कुछ करने लगे। एक बखार, दूसरी बखार,तीसरी बखार.....रात गहराती गई। बाउ ने उपर आसमान देखा। कुछ नहीं सूझा लेकिन सन्नाटे और बागीचे से आती निशाचर धुन ने बता दिया करीब तीन बजे होंगे। कलुवा की रखवार मण्डली ठिठुरते जाड़े में दुबक नासिका गर्जन द्वारा निशाचर धुन का साथ दे रही थी।...अचानक सारी बखारों और गजकरन के बंगले (मेहमानों के लिए मुख्य घर से अलग बना बैठका) में एक साथ आग भड़क उठी। धू धू कर जल उठी थी रामनामी लंका! ... रखवारों ने सुना अमानुषी किलकारी और अट्टाहस। देखा हवेली की छ्त से भी ऊँचा खड़ा ब्रह्मराक्षस अब लम्बी कुलाँचे मारता दूर जा रहा था।. . कलुवा के हाथ पिटने के बाद मरते हुए पंडित का शाप ..गजकरन एक दिन यहाँ बरम(ब्रह्मराक्षस) नाचेगा, तुम्हारी लंका जलेगी पापी। जलेगी। . . .रखवारे बेसुध हो गिर पड़े। गजकरन के देखते देखते लंका राख हो गई। तमाशा देखते लोग चुपचाप अपने घरों को चल दिए।
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लोग रात की घटना से उनींदे देर तक सोते रहे थे कि कोलाहल उठने लगा! जिसे देखो वही सुखरिया के घर की ओर भागता जा रहा था। वहाँ. . .दरवाजे पर सुखरिया की सिर कटी लाश पड़ी थी। एक ओर खून से भीगी परबतिया की माँ, उससे लिपटी परबतिया और किनारे खड़े बाउ-लाल लाल आँखें, जैसे बनमानुष। दूसरी तरफ मामा चुपचाप जमीन पर पड़ा गँड़ासा देखते, पूरा टोला और गजकरना हतप्रभ . . .बाउ की आवाज गूँजी, "गाँव के भैने हँई। हाथ जोड़ माँगतनी, कौनो पंचाइत नाहीं होई। सभे जानता कि सुखरिया कइसन रहल। केहू केतना सहित। चौकी पर खबर जा। अंग्रेज बहादुर के न्याव होई। (मैं गाँव का भांजा हाथ जोड़ प्रार्थना करता हूँ कोई पंचायत नहीं होगी। सभी जानते हैं सुखारी कैसा था। कोई कितना सहता? चौकी पर खबर कर दी जाय। अंग्रेज न्याय करेंगे)" सभी स्तब्ध।गजकरन कुछ कह पाया। अपने मामा की ओर मुखातिब हो बाउ बोले, " मामा, परबतिया के गवना तू करा दीह। तोहसे होखे हमके बताव। (मामा, परबतिया का गौना आप करा दीजिएगा। आप से हो सकता हो तो मुझे बताएँ)" मामा ने सिर हिलाया-मौन स्वीकृति में।
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पूरे घटनाक्रम से उदासीन बन बाउ उछल कर गाड़ा पर चढ़ गजकरन से बोले,"गज्जा मामा, आठ साल के सूद अउरी मूल सहित्ते अन्जा लौटावे आइल बानी। बड़ी तकलीफ बा कि कुल हो गइल। बिधि के लिखनी, का करब? चल नपवा ल। अबकी कम होई। भीतरे रखवा लीह (गज्जा मामा, आठ साल का मूल सूद जोड़ अनाज लौटाने आया हूँ। बड़ी तकलीफ है कि यह सब हो गया। विधि की लेखनी, क्या करेंगे? चल कर नपवा लीजिए। इस बार कम नहीं होगा। घर के भीतर ही रखवा लीजिएगा)" कटाक्ष समझ कर भी गजकरन को खून का घूँट पी कर रह जाना पड़ा। पूरा गाँव उत्साह में था और पुलिस कभी भी आने वाली थी। बाउ ने गाड़ा को उल्लड़ (आगे से उठा) कर सारा अनाज उलट दिया और घर की ओर बैलों को हाँक चले। . . . पुलिस आई और परबतिया के माई को ले गई।
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झलकारी ने बैलों के गले की घण्टी सुनी तो बाहर आईं। गाड़ा खाली दिखा। भागी घर के भीतर गईं। . . . माँ दही मिश्री ले खड़ी थी और बेटा सुना रहा था। सब सुनने के बाद झलकारी ने इतना ही बोला, " बेटा, हारि गइल होखब दही मिश्री खा (बेटा, थक गए होगे। दही मिश्री खा लो)" और मुस्कुराने लगीं। . . .
आठ सालों के बाद माँ मुस्काई थी! बाउ के भीतर सातों समुन्दर के तूफान उमड़ से पड़े, अन्दर की आग बड़वाग्नि बन हहरा उठी और हिचकिओं के साथ आँखों से गंगा जमुना बह निकलीं। . . . ब्रह्मराक्षस रो रहा था।
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लंठ महानिष्क़र्ष- लंठ जन के उपर छोड़ता हूँ। इस समय अपने पात्रों से हारा मैं कुछ सोचने समझने लायक नहीं हूँ।
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उत्तर कथा: परबतिया के माई को काला पानी की सजा हुई थी। वह सजा काट लौट कर वापस भी आई और बाउ उससे मिले भी थे। इस बार मामला हास्यप्रद रहा। कभी सुनाऊँगा।
अगली कथा: बारात एक हजार और बाउ मंडली

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अपनी बात: यह प्रसंग खुद गोनई नट्ट ने मुझे सुनाया था। शायद उस समय उनकी उमर 90 के उपर रही होगी। गरमी की उस रात छत पर इसे खत्म करते करते वे फूट फूट कर रो पड़े थे। मैं भी खूब रोया। उसके बाद वे फिर नहीं लौटे।
आज इतने सालों के बाद भी इसे लिखते मैं रीता हो गया हूँ। आँखों में आँसू हैं और दिमाग बन्द है। कौन कहता है कि लंठ ऐसे वैसे होते हैं। वे होते हैं बस प्यार करने लायक। उन्हें समझ सको तो।

22 टिप्‍पणियां:

  1. टिप्पणी कैसे करूँ । किंकर्तव्यविमूढ़ उपस्थिति मात्र दे रहा हूँ । डिग पर सबमिट कर दी है स्टोरी । शेष पूरे ब्लॉगजगत के हिस्से । आभार ।

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  2. मैं भी इस लेखनी पर स्तब्ध और अवाक् हूँ -लंठ हुआ जाता हूँ !

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  3. ". . . ब्रह्मराक्षस रो रहा था।"
    टिप्पणी नहीं लिखी, इसका मतलब यह नहीं कि पढा नहीं या सराहा नहीं. गाँव देस पिशाचों से बचा रहा है तो इन बाउओं और उनके गुरु गोनई नट्टों की वजह से.

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  4. टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। केवल धन्यवाद देता हूं इसे पढ़ने का अवसर देने के लिए।

    प्रेमचंद की आत्मा खुश हो रही होगी!

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  5. ये तो एक आलसी का चिठा नहीं है इस अद्भुत कहानी ने निशब्द कर दिया आभ्aर्

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  6. अत्यंत ही बेहतरीन ! आप से उम्मीद है कि आप बाऊ से जुड़े सारे प्रसंगों के बारे मै लिखेंगे. यदि उनकी मंडली के और चरित्रों के बारे में लिखें तो और बेहतर होगा. लंठई जारी रखेंगे . उम्मीद है..........

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  7. गिरिजेश जी इस पोस्ट के बारे में ..टिप्प्न्नी करने की अभी हमारी हैसियत नहीं है..आपकी अद्भुत शैली को स्तब्ध होकर पढ़ और गुण रहे हैं ..हिंदी ब्लॉग्गिंग में आपकी ये विशिष्टता अनुपम और अद्वितीय है...

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  8. सही बात है, कुछ लंठ होते हैं बस प्‍यार करने लायक। उन्‍हें कोई समझ सके तो।
    ठेठ पूरबिया शब्‍दों की ठाट-बाट से अभिभूत होनेवालों में मैं भी हूं।

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  9. कुछ दिनों से व्यस्तता के कारण नहीं पढ़ पाया था। आज का पढ़ा पर माकूल टिप्पणी के पहले आरंभ से पढ़ना पड़ेगा। पहले आरंभ से पढ़ता हूँ।

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  10. और कई हिन्दी से जुडे लोग कहते हैँ कि, हिन्दी ब्लोग जगत मेम साहित्य के नाम पर कुछ लिखा ही नहीँ जाता - कितना गलत सोच रहे हैँ वो लोग ये आपकी इस ठेठ देसी महक लिये, लिखी गई इस शृँखला से स्पष्ट है
    - लावण्या

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  11. राव साहब आपके आदेशानुसार पूरी लंठ महाचर्चा एक बैठक में पढ गया हूँ. बहुत ही रोचक फॉर्म में पूरी कथा है अर्थात भाषा पर मुझे कुछ नहीं कहना है लेकिन मुझे लगता है कि ब्लॉग की अपनी सीमायें हैं और आप उनका निर्वाह कर रहे हैं इसलिये यह सब प्रिंट फॉर्म में आना आवश्यक है एक बार छप जाने के बाद पाठकों की आपत्तियाँ चलती रहती है लेकिन जिन्हे उसका आनन्द लेना होता है वे ले लेते हैं यदि ब्लॉग में पाठकों की त्वरित टिप्पणियों से आप भयाक्रांत ना हों तो कृपया खुलकर लिखें उसी तरह जिस तरह कथा के मार्मिक पक्ष को आप नि:संकोच लिख रहे हैं आशा है आप मेरा संकेत समझ गये होंगे ,ना समझे हों तो कहिये मैं भी खुलकर लिखूँ?

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  12. शरद जी, खरी टिप्पणी के लिए धन्यवाद। टिप्पणी से भय जैसी कोई बात नहीं। मुझे तो बस उसकी गलत वर्तनी से भय लगता है। देखिए न मैंने यह संकेत भी cbox में लगा रखा है कि इसे कैसे लिखना है। :)


    खुल कर बताइए। हम भी खोले दिमाग हुए हैं। गोनई नट्ट से डर नहीं लगा तो अब इस जमाने के मनुष्यों से क्या डरें।

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  13. भ‍इया, आपने तो आज सबको निःशब्द कर दिया। साठ-सत्तर साल पुरानी घटना का इतना जीवन्त और लोमहर्षक वर्णन करने के लिए आपने स्मृति का सहारा लिया है या रचनात्मकता का, यह भेद करना कठिन है। गोनई नट्ट भी शायद इसे पढ़ कर आवाक्‌ रह जाता।

    एक बात कहना चाहूंगा कि मुझे यह आख्यान कहीं से भी ‘लंठचर्चा’ के शीर्षक में रखने लायक नहीं लगता।

    हाँ, आपकी यह बात गौर करने लायक है,

    “कौन कहता है कि लंठ ऐसे वैसे होते हैं। वे होते हैं बस प्यार करने लायक। उन्हें समझ सको तो।”

    इसका तात्पर्य यह मानता हूँ कि बड़ा से बड़ा लंठ भी केवल लंठई ही नहीं करता। उसके भीतर एक गम्भीर और उदात्त चरित्र भी निवास कर सकता है। ...ब्रह्मराक्षस का `रोना' यही तो बताता है।

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  14. सिद्धार्थ, तुम्हारी यह टिप्पणी 200 वीं है। कैसे धन्यवाद करूँ?

    मेरे प्रथम और दूसरे लेख के बीच 5 महीने का विराम ही प्रमाण है कि तुमसे 'परिचय' के बाद मेरे भीतर क्या घटा।

    तुमने और बालसुब्रमण्यम ने जो किया, उसके लिए मेरे पास 'घनीभूत' कृतज्ञता के अलावा कुछ भी नहीं है।

    बँगला का आश्रय लूँ तो यही कहूँगा कि 'गलदश्रु' हो रहा हूँ।

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  15. गिरिजेश जी,

    बहुत शानदार कथा है और देशज शब्दों ने तो एकदम निखार ला दिया है।
    आपने लंठ शब्दों का इस्तेमाल किया है तो थोडी जानकारी दे दूँ कि अमरकांत जी की रचना 'सूखा पत्ता' में भी लंठों के गुण दोष बताये गये हैं। कभी मौका मिले तो पढियेगा जरूर। फिलहाल मेरे पास वह किताब नहीं है वरना एक पोस्ट लंठों पर जरूर लिखता :)

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  16. भैये का गजब लिखे हैं आप ! मान गए लोहा आपकी लेखनी का और ये भी कि ब्लॉग में भी साहित्य है. अभी तक नहीं मानता था क्योंकि ऐसी पोस्ट (श्रृंखला) इससे पहले मिली नहीं किसी ब्लॉग पर.

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  17. ". . . ब्रह्मराक्षस रो रहा था।"

    फिल्हाल मेरी आंखों का भी वही हाल है ।
    मन शांत होगा तब टिप्पणी करूंगा ।

    आपका लंठ पुराण पहली बार में पूरा पढा है ।
    बहुत दिनों के बाद एक बहुत अच्छी मन को छूने वाली रचना पढी है ।
    वाकई मुशी प्रेमचंद की आत्मा खुश हुयी होगी ।

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  18. बिखरे होते हैं ये चरित्र हर गाँव-गिरांव की जिन्दगानी में.. खलिहानों में, सरेहों में, चकरोड से जोड़ने वाली पुलिया में, पोखरे से जुड़े हुए मसान में, ग्राम्य-जीवन के हर पहलू में रचे-बसे.. सावन में रोपनी के पहले ताजा-ताजा हेंगाये हुए खेत की खुशबू के मानिंद.. लेकिन कहाँ देख पाते हैं सब लोग उनकी ळंठई.. कितने कानों से निस्पृह गुजरी होगी गोनई नट्ट की सुनाई यह गाथा.... किसी गिरिजेश राव तक पहुँचने से पहले..!

    एक शब्द-नि:शब्द!

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  19. गिरिजेश जी,
    अद्भुत किस्सागोई! मुहँ बाये कथा सुनते(पढ़ते) रहे बाउ की। रेणु जी की परम्परा के सशक्त ध्वजवाहक हैं आप। अब अपनी क्षमता का उपयोग किसी बड़े कैनवस के लिये करिये। बधाई और शुभकामनाओं सहित।
    सादर

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  20. अद्भुत कहानी, और बेहतरीन किस्सागोई| मेरे ख्याल से 'रियलिस्टिक' कहानी लिखने वाले लोगों को जरूर इसे पढ़कर सीखना चाहिए कि रियलिस्टिक रहते हुए भी कहानी संवेदनशील, श्लील, और सकारात्मक रह सकती है|

    जहाँ तक कहानी के पात्रों का सवाल है , तो बाउ को प्रणाम, शायद अवतारवाद यही होता है|

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  21. क्या क्या टीपना चाहते थे.... पर नीरज की टीप देख कर चुप हो गए......

    मुझ में अपने जज्बात लिखने की शक्ति नहीं.

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  22. magic - thats all i can say - how did you write all this? cant believe it is imagination - sad at the truth - which - though we know it beforehand - has the strength to wake us up every time it stares us in the face ..... i have just started reading this series - from part one i mean - because did not want to start in the middle (13th part (i think) is on creative girijesh ?) - wonderful sir - i salute you .... thanks

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