गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

चम्मच भर गद्य


दिन दिन दिन उतान होते जा रहे हैं और आस पास के जन हैरानियत की सीमा के उस पार पहुँच चुके हैं जहाँ किसी को बेहद आसान सा माना जाने लगता है - वह तो ऐसा ही है जब कि मैं चरम आज्ञाकारी हो गया हूँ - कोई प्रश्न नहीं, कोई खुरपेंच नहीं - यस बॉस! अजीब विरोधाभास है। 
 सुबह उठता हूँ तो पाता हूँ कि प्रकृति ने सारी नियामतें मेरे गले के ऊपर ठूँस दी हैं। जब शॉपिंग अधिक हो जाती है और फ्रिज में जगह नहीं बचती तो आप क्या करते हैं? मैंने न खरीदा और न माँगने गया लेकिन मेहरबानियों का झोला कुछ अधिक ही लबालब हो गया है। आठ दस तो रोज रास्ते में ही गिर जाती हैं फिर भी रोज वही हाल रहता है कि इस कोने ठूँस दूँ या उस कोने! 
ऐसे में शाम्भवी महामुद्रा भी भूल गयी है। टहल सकता नहीं और न कोई साँसों का व्यायाम कर सकता हूँ। महामुद्रायें बेवफा हो ही जाती हैं अगर आप ने रोज उनसे प्रेम नहीं जताया। उस कमबख्त के लिये दिल्ली जैसे कबाबी शराबी शहर में मैं साल भर संन्यासी रहा - मीट मछली क्या, आलू प्याज तक छोड़ दिया था! साल भर बाद धिरवन मिली कि तुम्हारा चेहरा काला पड़ गया है, टी बी के मरीज दिखते हो, छोड़ो यह सब। मैं था कि अमल आनन्द में लोट पोट रहा था। 

उसकी तैयारी हमेशा अचरज में डालती रही - दस मिनट के सुख के लिये पूरे पैतीस मिनट तक दुस्सह कलाबाजियाँ और नट नृत्य! मुझे लगता कि इतनी तैयारी तो नशीले धुँआ के लिये स्मैकिये भी नहीं करते! फिर भी करता रहा। तभी छूटी जब मैं पूरी तरह से निचुड़ गया। एक बात पक्की रही कि साल भर जुकाम तक नहीं हुआ। छुड़ाने में निचुड़ने से अधिक योगदान संगी साथियों का था जो यह समझने लगे थे कि बहुत जल्द ही मैं संन्यासी बन प्रवचन देने लगूँगा। ऐसे में एक दिन साल भर का सँजोया संयम एक घपलेबाज की मलामत पर खर्च दिया। नमो नमस्ते स्वाहा, स्वाहा! लेकिन आज लगता है कि महामुद्रा वाकई कारगर थी। ओं मणि पद्मे हुम्म!  
बस एक प्रश्न ही आजकल मुँह बाये रहता है - कहाँ जाऊँ? दिल्ली या उज्जैन या झुमरीतलैया या बैतालपुरआजकल ट्रांसफर का सीजन है। शून्य शिखर पर वाकई अनहद बज रहा है और हम जैसे पतित गलित इस प्रतीक्षा में हैं कि कब अमृत टपके और चट कर जायँ! तापस जन हैं कि टपका ही नहीं रहे! विकट स्थिति है। इतनी विकट है कि आजकल कोई मेरी कार में बैठे तो बजते गीतों के रेंज से ही पगला जाय!
 जसराज का राग सोरठ खत्म होते ही शकीरा का आइ माइट स्टील योर क्लॉद्स शुरू हो जाता है, फिर कवन नगरिया मोरे पियवा का बासा जिसकी करुणा समर ऑफ सिक्स्टी नाइन की गरमी से शांत होती है और ऑफिस आ जाता है।
कुर्सी पर बैठ आठ दस बार छींकता हूँ। अगल बगल कोई नहीं रहता सिवाय पोंछा लगाने वाली के जिससे मैं कह नहीं पाता कि फिनॉयल का प्रयोग कम किया करो, कोई जरूरी नहीं कि मुफ्त में मिले जहर को बोतल भर गटक लिया जाय! (इसलिये नहीं कह पाता कि वह समझ ही नहीं पायेगी, कह देगी साहेब दो ढक्कन तो डाला बाल्टी भर पानी में। क़्वालिटी की शिकायत की कभी मैंने? आप ही लोग तो खरिदवाते हो!)।
 पंखा चलाऊँ तो ठंड, न चलाऊँ तो पसीना! ए सी में हाल-ए-जिस्म और दुखफहम। शाम तक तमाम एक्स वाइ ज़ेड डियो के बावजूद अपनी ही देह गन्धाने लगती है (परफ्यूम का यूज कर ही नहीं सकता, मौत हो जायेगी)। मैं अकारण ही खुश हो जाता हूँ हालाँकि बैसाख का महीना अभी कम से कम महीना भर दूर है। खुशी के दौरान ही पाता हूँ कि मैं मूलत: बहुत जॉली किस्म का मनई हूँ। दिन में जिनसे चैट होती रहती है, वे जन इस बात की पुष्टि करेंगे तो फिर यह भठ्ठरई क्यों? काहे की फैल है जो ढंग का कुछ भी नहीं लिखने दे रही?  
इसका उत्तर यह है कि लेखन औषधि भी होता है। सामान्य खाने और पथ्य कुपथ्य में जैसे अंतर होता है वैसे ही उस तरह का लेखन जो कि लिखने वाले को स्वस्थ करे, उस वाले से अलग होता है जो जनरंजन करता है। आजकल वही हो रहा है - प्रतिदिन कुछ लिखो! सुबह एक चम्मच गद्य तो शाम को दस बूँदें कविता कप भर करुणा में डाल कर! दिन भर चैट वाली शीशी से मीठी गोलियाँ चुभलाते रहो, बीच बीच में गरियाते भी रहो। जिसने इलाज बताया है उसने कहा है कि ऐसा नियमित करता रहा तो बैसाख तक ठीक हो जाऊँगा। मुझे बैसाख की प्रतीक्षा है। इस सुबह का चम्मच भर गद्य समाप्त। सेत्ताराम! सेत्ताराम!!     

5 टिप्‍पणियां:

  1. आखिर इस बीमार की चैट इन दिनों चल किससे रही है ?
    बीमारी तो जो है वो है ,मगर बीमार के हालात कुछ अच्छे नहीं लगते ..
    अब तो जो दवा के नाम पर जहर दे ...कुछ ऐसा तो कोई लफड़ा नहीं ?

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    1. हमरे नदिया एक्के घाट, एक्के घटवार,
      जनि कह ए राजा हम कइ में सवार :)

      होमियो में तो विषस्यविषमौषधं सूत्र ही चलता है। वैसे डाक्साब ने यह भी कहा कि आस्था भी बहुत आवश्यक है। मेरे मन में प्लेसबो की बिजली चमकी लेकिन उस तीव्र प्रकाश में भी आस्था नहीं दिखी।

      फिर भी पिये जा रहे हैं साकी भर भर प्याला
      कहते हैं मद्यप सारे इस मधुवन अनूठी हाला

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  2. न लिखे जब कई दिन बीत जाते हैं, एक अजीब से उधेड़बुन चालू हो जाती है, बस लगता है कि कोई शब्दों का अमृत पिला दे।

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  3. बहुत संभव है ऐसा इलाज़।
    गद्य चलता रहे, और कविताई-करुणाई भी, और स्वास्थ्य लाभ शीघ्र हो, ऐसी मनोकामना है।

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  4. "प्रतिदिन कुछ लिखो! सुबह एक चम्मच गद्य तो शाम को दस बूँदें कविता कप भर करुणा में डाल कर! दिन भर चैट वाली शीशी से मीठी गोलियाँ चुभलाते रहो, बीच बीच में गरियाते भी रहो। जिसने इलाज बताया है उसने कहा है कि ऐसा नियमित करता रहा तो बैसाख तक ठीक हो जाऊँगा।"
    क्या रामबाण दवा बताई है। वैद्यराज की जय हो। अगर कुछ ऐसा ही पढ़ने का नुसका भी बताया है तो वह भी बताइएगा।
    अब बैसाख भी आ गया। शुभ कामनाएँ।

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