गुरुवार, 17 मई 2012

साधु स्त्रियों! - 2

पिछ्ले भाग से जारी... 
पगड़ी सँभाल जट्टा पगड़ी सँभाल ओय!
पगड़ी सँभाल तेरा लुट न जाय माल ओय! 

पितृसमाज में पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक रही है। जलवायु की अतियाँ यहाँ की वास्तविकता हैं; गर्मी, सर्दी या बरसात हर मौसम में ढका सिर सुविधाजनक रहा। कामकाजी स्त्रियाँ तक पगड़ी बाँधती थीं तो कुलीन घरों की स्त्रियों में भी वेश सौन्दर्य के एक रूप में पगड़ी प्रचलित रही। धीरे धीरे मनुष्य की कल्पना शक्ति ने जोर पकड़ा। पगड़ी के विन्यास, रंग और बाँधने के ढंग ने समाज के वर्गों को विशिष्ट पहचान दी और सिर पर पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक हो गई तो पगड़ी उतार कर किसी के पाँवों पर रख देना परम विनय और समर्पण का प्रतीक। खाली सिर रहना असभ्यता और असामाजिक समझा जाने लगा। अंग्रेजों के दौर में भी पगड़ी पर्याप्त प्रचलित रही। पाश्चात्य संस्कृति और बाकी संसार से जुड़ाव का प्रभाव पड़ा। धीरे धीरे हैट विलुप्त हुई और पगड़ी का प्रयोग भी बहुत सीमित हो गया लेकिन मुहावरे, बोली बाली, साहित्य, गीत आदि में पगड़ी प्रतिष्ठा प्रतीक के रूप में अब भी अक्षुण्ण है। उद्धृत गीत दासता के विरुद्ध पंजाबी विद्रोह की वाणी भी है और चेतावनी भी कि घर लुटा जा रहा है!  
 मैं यहाँ पगड़ी की बात कर रहा हूँ तो बहुत ही संवेदनशील मुद्दे पर बात कर रहा हूँ। मेरी बात को बहुत आसानी से खाप पंचायतों, पिछ्ड़े दकियानूसी हिंसक समाज या मजहब की मानसिकता से जोड़ा जा सकता है। आजकल तथाकथित बौद्धिक बहसों में राजनीतिक रूप से सही होने और वैचारिक सामान्यीकरण का जो बोलबाला है, उसमें ऐसा करना बहुत आसान है। हम बला के आलसी जन हैं जो न तो गहरे उतरना चाहते हैं और न सतह पर बने बनाये ट्रैंकों से अलग तैरना चाहते हैं। मुझे कुछ अलग ही बीमारी है जिसके कारण द्वैध को सहना कठिन हो जाता है और उसे कह पाना आसान जिसे मैं सह नहीं पाता। पहले ही बता दूँ कि स्त्री के अविवाहित रहने, अविवाहित या एकल मातृत्त्व और अपने यौन निर्णय स्वयं लेने आदि ऐसे मुद्दे हैं जहाँ मैं स्वयं को उसके पक्ष में पाता हूँ लेकिन प्रकृति के विधान के प्रति आँख नहीं मूँद पाता।   
हम संक्रमण के दौर में हैं। संक्रमण के दोनों अर्थ लें – ‘परिवर्तन की ओर’ और ‘रोगग्रस्त’। हर गतिशील समाज सदा से ऐसा रहा है लेकिन आज के दौर की तेजी पहले नहीं रही। पितृसमाज की उन तमाम बेहूदगियों और उस हिंसा के विरुद्ध आज स्त्री खड़ी है जिन्हों ने हजारो वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी उसकी आत्मा और शरीर दोनों को कुचला और उभरने नहीं दिया। उभारों से डरा हुआ समाज एक ओर तो उन्हें ले तमाम विकृतियों के शास्त्र गढ़ता रहा तो दूसरी ओर प्रकृति के विरुद्ध ही मोर्चे पर डटा रहा। ऐसे समाज में आज अपनी पैठ बनाती स्त्री कहीं उसी की तरह प्रतिक्रियावादी तो नहीं हो रही? कहीं वह पीढ़ियों के अत्याचारों का हवाला दे निकम्मी और सुविधाजीवी तो नहीं हो रही? युगों के अपराधबोध का बोझ सँभालता पुरुषतंत्र कहीं वहाँ भी तो ढीला नहीं हो रहा जहाँ पकड़ और दृढ़ होनी चाहिये?
 इन प्रश्नों में ही खतरे हैं – तुम स्त्री उत्थान से भयभीत हो! तुम होते कौन हो उनके बारे में निर्णय लेने वाले? बढ़ती पुरुष उच्छृंखलता तुम्हें असहज क्यों नहीं करती?
 ये खतरे और ये प्रतिप्रश्न सामान्यीकरण के ज्वलंत उदाहरण हैं। पूछने वाले प्राकृतिक व्यवस्था को भूल जाते हैं। स्त्री को मातृत्त्व विशिष्ट बनाता है। वह विवाहित हो पुरुष के घर आती है। वह आगे की पीढ़ी का वहन करती है। मातृत्त्व के वरदान ने ही यौन शुचिता को उसके लिये विशिष्ट बना बेड़ियों में जकड़ने की राह दिखाई। कतिपय प्रतिक्रियावादी आन्दोलनों ने इस वास्तविकता को पहचाना और झुँझलाहट में गर्भाशय निकलवा देने तक की वकालत कर डाली। मुझे लगता है कि मातृत्त्व की वास्तविकता और उसे अतिरिक्त मान एवं सुरक्षा देने में ही उस समस्या का हल छिपा है जो आज सबको विचलित करती है लेकिन सब मुँह बन्द किये रहते हैं।
 जेनेटिक रूप से पुरुष अपने वंश के अधिकाधिक प्रसार के लिये निगमित है तो स्त्री चयन के लिये कि वह उसे चुने जो स्वस्थ संतति दे सके और उसे सुरक्षा दे सके।  परिणामत: पुरुष उच्छृंखल और आक्रामक होता है जब कि स्त्री संकोची और सेलेक्टिव। हर महीने सृजन को तैयार होना नौ महीने के गर्भधारण से जुड़ कर सबसे विकसित जीव मानव की समस्याओं को जटिल बनाता है। विकास के साथ ही समाज अस्तित्त्व में आया और जटिलता और उलझाऊ हो गई।
  स्त्री की आक्रामक पुरुष से सुरक्षा की और एक सुव्यवस्था की आवश्यकता ने तमाम अच्छाइयों के साथ तमाम विकृतियों को भी जन्म दिया। मैं उन पर न जाकर आज पर केन्द्रित होऊँगा। परिवार संस्था आज भी सचाई है और साथ ही बहुसंख्य की यह सचाई भी कि स्त्री को घर से बाहर संस्कारी पुरुष ही सुरक्षा प्रदान करते हैं। क्या पुरुष पुरुष हैं? मैं उच्छृंखल आक्रामकों की बात नहीं कर रहा, मैं संस्कारी प्रतिरोधी पुरुषों की बात कर रहा हूँ। उत्तर है – बहुत बहुत कम।
 क्या स्त्री स्त्री है? मैं सिमटी संकोची की बात नहीं कर रहा, मैं कदम से कदम मिलाती स्त्री की बात कर रहा हूँ जो अपने को बचाना जानती है और जिसे अपनी मातृत्त्व की विशिष्टता का भान है। उत्तर है – बहुत बहुत कम।
हमने सब कुछ रामभरोसे छोड़ दिया है। हम चुप रहते हैं। हमारी जुबान बाहर तो सटक ही जाती है, घर के भीतर भी उन पर चर्चा नहीं करती जिन पर होनी चाहिये। हमसे संस्कारिता को आगे बढ़ाने की आशा करना व्यर्थ है। बाहर के अतिबली आक्रमणों से संतानों को बचा पाना हमारे वश में नहीं। हम उस समय तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक कि रोना न पड़े...
...बात उस दिन से एकाध दिन पहले की है जब मैंने इसका पहला भाग लिखा था। उस दिन कार्यालय से समय पर मुक्त हो गया था और सामान्य समय से पहले ही घर आ गया। बच्चे घर के आगे खेल रहे थे। श्रीमती जी और उनकी सहेली की कुर्सियाँ खाली थीं जिसका अर्थ यह था कि वे पास के पण में गई थीं। माली आया तो मैंने उसे उस पार्क के किनारे के रास्ते पर सफाई पर लगा दिया (पार्क का क्षेत्रफल लगभग 10000 वर्ग मीटर है और जिसमें तैनात माली कभी नहीं आये। यकीनन वे किन्हीं साहबान के यहाँ भृत्य कर्म का निर्वाह कर रहे होंगे। इस पार्क की देखभाल हमें ही करनी होती है)।
नौंवी से लेकर दसवीं तक की कक्षाओं में पढ़ने वाली कॉलोनी की चार लड़कियाँ पार्क के चक्कर लगा रही थीं। खेलने वाले बच्चों में भी इसी आयु वर्ग की तीन और लड़कियाँ थीं। बाइकों की उच्छृंखल सी आवाजें सुनाई दे रही थीं। एलर्जी के पुन: आक्रमण का पूरा अन्देशा था लेकिन कुछ भाँप कर मैं वहीं टहलने लगा और वे दिखे। दो बाइकों पर सवार चार लड़के - आयु वर्ग इंटर में पढ़ने वाले बच्चों जितना। लम्बे गलियारे के बीच में मैं खड़ा था कि कोने पर टहलती लड़कियाँ दिखीं। बाइक पर पीछे बैठे दो लड़कों ने वह हरकतें कीं जिन्हें मॉलेस्टेशन कहा जायेगा। माली को पुकार मैं दौड़ने को हुआ कि लड़कियों की प्रतिक्रिया देख थम गया। उन्हों ने न पुकार लगाई और न भागने की कोशिश की। उत्सुकता वश इनकार सनकार के जो आकर्षित करने वाले भाव होते हैं, उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी। दबी जुबान ऐसी शिकायतें पहले भी मिली थीं। एक बार पहले हुये ट्रीटमेंट के बाद सब कुछ सुधर गया था लेकिन यह तो नया और अलग ही मामला था!...
अब की लड़कियाँ स्वयं...
मैं दुविधा में पड़ कर रुक गया। लड़कियों और लड़कों ने मुझे देख लिया। लड़कियाँ संयमित हो गईं और लड़के और उच्छृंखल। बाइकों पर तमाम कलाबाजियाँ दिखाते मेरी बगल से गुजरे। एक बाइक को मैंने पहचान लिया – वही थे जिन्हें कॉलोनी में घुसते ही मैंने कार से रोका था। उनकी सड़क पर हरकतें ही ऐसी थीं। लड़कियाँ पास आईं तो उन्हों ने नमस्ते की। उनसे सीधे कुछ न पूछ दो से मैंने उनके पिताओं के बारे में पूछा। यह बताते हुये कि वे घर पर नहीं हैं, उनके चेहरे उड़ गये। स्पष्ट था कि उन सबने मेरा देखना जान लिया था। बाइक वालों ने भिन्न भिन्न रूट ले पार्क और स्कूल के पाँच छ: और चक्कर लगाये। उच्छृंखलता वैसी ही थी। मैं अभी भी स्तब्ध जैसी स्थिति में था लेकिन एक बाइक का नम्बर पढ़ लिया – 7876। दूसरे सात की बनावट थोड़ी अलग सी थी और मेरे मन में चमक हुई – 786। साथ ही सब कुछ स्पष्ट होता चला गया। तो यह है लव ज़िहाद की प्राइमरी!
दो लड़कियाँ कुछ अधिक ही स्मार्ट निकली। थोड़ी ही देर में अपनी माँ के साथ मेरी ओर आईं। मैंने उन्हें बस नमस्ते किया, कुछ नहीं कहा। वे ऐसे ही चलती चली गईं और मैं हैरान कि आई किस लिये थीं?   
श्रीमती जी लौट आई थीं। मैंने उनसे पूछा तो वह और उनकी सहेली दोनों फूट पड़ीं, उन लोगों ने मेरे देखे से अधिक ही देखा था – आज हमलोग भी सोच रहे थे कि लड़कियों की माताओं से शिकायत करें लेकिन पता नहीं किस अर्थ में लें, लड़कियों का मामला। छोड़िये, आप को क्या?
मैंने प्रश्न दाग दिया – आप लोगों की भी लड़कियाँ हैं। कल उनके साथ ...
मामला संवेदनशील था। मेरी तमाम कोशिशों और समझावन के बाद भी लोग खाली समय बाहर निकलने के बजाय घरों में घुसे रहना ही पसन्द करते हैं। स्त्रियों को किटी पार्टी के लिये समय है लेकिन पार्क में बैठने या बाहर घूमने के लिये नहीं। पुरुषों का यह हाल है कि कुछ तो महीनों नहीं दिखते। डायबिटीज के मरीज  टहलने स्टेडियम जायेंगे लेकिन पार्क में नहीं क्यों कि ‘कम्पनी नहीं मिलती’।
 आधे घंटे मैं दुविधा में रहा लेकिन लड़कियों की आयु की सोच श्रीमती जी की तमाम बरजनों के बाद भी लड़कियों के पिता को फोन करना ही उचित समझा। वह उस समय ऑफिस में थे। मैंने कुछ नहीं बताया, बस यही कहा कि मिलते हुये जाइयेगा। उनके आने तक का समय एक यातना से गुजरने जैसा बीता – कैसे बताऊँगा? जाने कैसे प्रतिक्रिया करेंगे? भड़क सकते हैं। अभद्रता कर सकते हैं। मैं परले दर्जे का मूर्ख हूँ, कौन पड़ता है आजकल ऐसे चक्करों में? दूसरों के फट्टे में तो अब गाँव में भी लोग पैर नहीं लगाते, यहाँ कौन सगे बैठे हैं? ... आदि आदि। अंतत: मैं यह सोच कर निश्चिंत हो गया कि बहुत ही धीरे धीरे सलीके से उन्हें बताऊँगा और वह चाहे जो करें, मैं प्रतिक्रिया न कर चुप रह जाऊँगा।
वह आये, मेरी बात सुन चौंके, स्तब्ध हुये और फिर खुले – आभास तो था लेकिन मामला इतना आगे बढ़ चुका है, पता नहीं था। श्रीमती जी कॉलेज से देर से आती हैं और मैं ऑफिस से देर से। हमलोग समय नहीं दे पाते।
प्रकट में मैंने हाथ जोड़ा कि घर पर कुछ न कहियेगा। मामले को जेंट्स तक ही सीमित रखिये। एकाध दिन पहले आ कर बिना घर बताये स्वयं भी देख सुन लीजिये, हो सकता है कि मुझे भ्रम हुआ हो। अगर गड़बड़ है तो शनिवार या रविवार को हमलोग ऐक्शन लेंगे। सब ठीक हो जायेगा। लौंडे लफाड़ी हैं। जहाँ एकाध हाथ पड़ा और पुलिस की धमकी दी गई, सब लापता हो जायेंगे लेकिन आप दोनों जन बच्चियों से बात कीजिये। यही सही आयु है।
उन्हों ने चाय पी। कई बार आभार व्यक्त किया। यह भी कहा कि कभी भी मेरे बच्चों के बारे में कुछ भी गड़बड़ देखें या सुनें तो बेझिझक बताइये, मैं बुरा नहीं मानूँगा।
उनकी कार को जाते देख मेरे मन में आह सी उभरी – बेटियों का बाप!
घंटे भर बाद तक इस आशंका में रहा कि उनके घर टंटा होगा और वे लोग मेरे घर झगड़ा करने आयेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह सोचते हुये कि आगे कैसे निपटना है, मैंने एक पुस्तक उठा लिया। (जारी)    

20 टिप्‍पणियां:

  1. hats off girijesh ji ...excellent ..

    now - some may say that you were interfering in "ladies rights to decide for themselves" but i feel you did the right thing . firstly - kids of that age group are not old enough - nor matured enough to take correct decisions. curiosity and a suppressed fear creates an excitement which makes kids make mistakes which they repent later. when an older person who is seeing this from outside steps in - many a mistakes may be very easily avoided. i teach in a college - and have seen good talented youngsters spoil their career - because of this same thing. they do repent later - but by then it is too late. i do step in if i feel they are harming themselves - both the boy and the girl. there is no q of gender .... we have to take care of our younger generation, till they are mentally strong enough to do it themselves.

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  2. "मातृत्त्व के वरदान ने ही यौन शुचिता को उसके लिये विशिष्ट बना बेड़ियों में जकड़ने की राह दिखाई।...............................
    जेनेटिक रूप से पुरुष अपने वंश के अधिकाधिक प्रसार के लिये निगमित है तो स्त्री चयन के लिये कि वह उसे चुने जो स्वस्थ संतति दे सके और उसे सुरक्षा दे सके। परिणामत: पुरुष उच्छृंखल और आक्रामक होता है जब कि स्त्री संकोची और सेलेक्टिव। हर महीने सृजन को तैयार होना नौ महीने के गर्भधारण से जुड़ कर सबसे विकसित जीव मानव की समस्याओं को जटिल बनाता है।"
    साधु ...साधु....

    शिल्पा जी -क्या अंगरेजी इन विषयों पर चर्चा के लिए सुविधा कवच का काम करती है ?
    ब्लॉग जगत के कई लोग इतनी भी अंगरेजी नहीं जानते ...गिरिजेश जी या आप
    ट्रांसलेट कर दें या आपके पास समय न हो तो मैं निकालूँ ?
    विमर्श बेमजा हो रहा है !

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    1. @ अरविन्द मिश्र जी - मुझे किसी भी विषय पर बात करने के लिए सुरक्षा कवच नहीं चाहिए होते - बस - जीमेल नहीं खुला था - तो रोमन में टाइप करने की अपेक्षा इंग्लिश ज्यादा comfortable लगी | मैंने कई बार कहा है कई जगह कि मैं कोई "हिंदीवादी" नहीं - मेरे लिए भाषा सिर्फ मन की बात सामने लाने का माध्यम है | last post i commented in kannada :)

      दूसरी बात यह - कि मैं अंग्रेजी माध्यम की student रही हूँ - तो इंग्लिश में अधिक comfortable हूँ | अपने ब्लॉग पर लेख लिखते हुए भी गूगल जी के translator जी को खुला रखना पड़ता है :) | हाँ - मैं हर विषय पर बात नहीं करती - हर किसी से भी नहीं - हर ब्लॉग पर भी नहीं | यहाँ यह कहना उचित लगा - तो कह दिया | इसमें "कवच" जैसी किसी वस्तु की आवश्यकता मुझे महसूस नहीं हुई |

      ब्लॉग जगत के कई लोग इतनी भी अंगरेजी नहीं जानते ... - no problem - everyone need not read whatever i have to say - my thoughts are not that important anyway - i am not a king/ queen that everyone needs to know what i am thinking / saying .....

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  3. यथार्थपरक चिंतन!!
    सटीक निष्कर्षों का नवनीत!!
    यह आलेख रचना नहीं जिसे लेखक प्रायः मात्र लेखन की दृष्टि से लिखा करते है। यह है सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित गहन अध्यन से निसृत वास्तविकता।
    साधुवाद!!

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  4. स्वयं के बारे में निश्चय करने का अधिकार सदा ही रहे पर सब कुछ लुटा देने की राह पर नहीं। जब समझ ही नहीं कि सामने वाले के मंसूबे कितने खतरनाक हैं तो उन्हें पास तक न छिटकने दिया जाये। चिन्तनीय विषय, सबके लिये।

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    1. प्रवीण जी, मंसूबे भांपने की किसे फुर्सत है? कौन जहमत उठाये? जो बात उठाएगा वही अन्दर बाहर से लताड़ा जाएगा|

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  5. भाई हम तो पिट चुके हैं - आज सरे बाजार बता रहे हैं, इन लोगो को उपदेश देने गए थे, देर शाम का वक़्त था, पार्क लगभग सुनसान, लड़के के दोस्त न जाने कहाँ से आ धमके,

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    1. अगली बार मौक़ा लगे तो अपनी भाषा की जगह जो भाषा सामने वाले को समझ आती हो उसमें उपदेश देना, अवश्य कामयाबी मिलेगी|

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    2. बाबा! चारो ओर आग लगी हो तो अकेले नहीं गाँव गिराम को जुटा कर बुझाया जाता है, समझिये।

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  6. यह उस पिता की बात है जो सिर्फ अपनी बेटियों की ही चिंता नहीं करता .
    वे सज्जन काफी सुलझे हुए लगे . आजादी कितनी और क्यों, यह अभिभावकों और उन जैसे लोगों को समझाना ही होगा .
    सबमें इतना साहस नहीं होता ,दिल दुखते हुए भी बहुत कुछ देख कर अनदेखा करना पड़ता है!

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  7. शिल्पा जी,
    कोई बहस ही क्यों? -मैंने कर दिया अनुवाद ...स्व -औचित्य सिद्ध करने में हम भारतीयों की सानी नहीं है :) शायद मुझमें एक डिक्टेटर है जो कभी कभी जागृत हो जाता है ..अब न तो मेरी आपको नाराज़ करने की मंशा थी और न अब ही इम्प्रेस करने की ..हाँ मैंने वह अब खुद कर दिया है जिसकी अपेक्षा आप से या इस पोस्ट के लेखक -ब्लॉगर से थी -यह अहैतुक इसलिए नहीं है कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर संवाद बाधित न हो !
    वाह गिरिजेश जी ,उत्कृष्ट
    अब कुछ लोग कह सकते हैं आप "महिलाओं के निजी निर्णयों के अधिकार " में हस्तक्षेप कर रहे हैं ..मगर मैं समझती हूँ कि आपने बिल्कुल ठीक किया ...पहले तो जिस उम्र सीमा के वे बच्चे हैं वे ज्यादा बड़े नहीं हैं .इतने परिपक्व नहीं कि सही निर्णय ले सकें ..जिज्ञासा और दबाया हुआ भय कुछ ऐसी उत्तेजना उत्पन्न करता है जिसके चलते ये बच्चे वैसी गलतियां कर जाते हैं जिसे लेकर वे बाद में पछताते हैं . मैं एक कालेज में पढ़ाती हूँ ...और यहाँ प्रतिभाशाली बच्चों को देखा है जो अपना कैरियर तक इन्ही बातों के चलते बर्बाद कर जाते हैं . वे भी बाद में पछताते हैं . जबकि काफी देर हो चुकी रहती थी ...मैं जरुर बीच में तब आती हूँ जब समझ लेती हूँ कि वे अपना नुकसान कर रहे हैं . लडकी या लड़कों दोनों के मामलों में ही ...यहाँ तो जेंडर का सवाल ही नहीं है . हमें अपने बच्चों की इस पीढी का ध्यान रखना होगा जबतक कि वे मानसिक तौर पर खुद इसके काबिल नहीं होते ...
    (हाँ लेखक स्वयं करता तो बेहतर अनुवाद होता ..मगर यह काम चलाऊँ बन गया है )

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    1. :) अनुवाद अच्छा है। बकिया के बारे में इतना ही कहना है कि इतना नमक मिर्च तो सामान्य है।

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    2. धन्यवाद, इंजीनियर शिल्पा जी :)

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  8. आलसी जी,
    केवल बौद्धिक ऊहापोह के बजाय आपने ख़तरा मोल लेकर भी सक्रिय रूप से जो कदम उठाये बहुत अच्छा किया.इस उम्र में(उन लड़कियों-लड़कोंवाली) अकल कम होती है और ऊपर से टी.वी.कल्चर की चौंध.'हमें क्या करना' की मानसिकता छोड़ आपनेलोगों को सावधान किया,आपकी भावना समझी उन ने ,साथ भी देंगे .समस्यायें सबकी एक सी हैं .एक दूसरे को समझ कर और पारस्परिक सद्भावना-सहयोग से अपने चारों और कुछ अधिक स्वस्थ वातावरण तो लाया ही जा सकता है !
    आपकी हिताकांक्षा को नमन !

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  9. कुछ हद तक तो मैं शिल्पा जी की बात से सहमत हूँ. जैसा कि पहले भी इसी पोस्ट की पहली कड़ी में बात उठ चुकी है कि हमारे पिताओं की पीढ़ी हमसे अधिक उदार थी, हम उनसे कम और हमारे बाद की पीढ़ी और संकुचित हो गई है. वो अपनी छोड़, समाज के बारे में नहीं सोचती. मैं बहुत करीब से देख रही हूँ कि छोटे कस्बों से आयी लड़कियाँ किस तरह से 'बोल्डनेस' के नाम पर इस तरह के चक्करों में फँस जाती हैं, जबकि हमारी पीढ़ी ये हिम्मत नहीं करती थी. लेकिन अंततः सब सुधर जाते हैं और माँ-बाप की इच्छा से विवाह करके सुखी वैवाहिक जीवन बिताते हैं. पितृसत्ता क्या है, उन्हें यही नहीं मालूम, उसे चुनौती देने की तो बात ही कहाँ उठती है? इसलिए इस सन्दर्भ में चिंता की कोई बात ही नहीं है.
    अब आपकी मातृत्व को गरिमा प्रदान करने वाली बात पर आती हूँ. कोई भी जागरूक महिला इस बात से इनकार नहीं कर सकती और ना परिवार के महत्त्व से. क्योंकि संतति को जन्म देने और पालन-पोषण का कार्य जितने अच्छे से परिवार में हो सकता है और कहीं नहीं. जब कभी 'गर्भाशय निकाल देने' जैसी बात उठी थी तो वह प्रतिक्रिया थी, उस युग में जब स्त्री को बच्चे पैदा करने की मशीन बना दिया जाता था, उससे पूछे बिना कि वो और बच्चे पैदा करने की स्थिति में है या नहीं. आज ऐसा नहीं है. स्त्री को मालूम है कि मातृत्व उसकी शक्ति है, कमजोरी नहीं. अच्छे से अच्छे पदों पर प्रतिष्ठत स्त्रियाँ भी बच्चे ज़रूर पैदा करती हैं और खुद उनकी देखभाल करना चाहती हैं.
    हाँ, युवा पीढ़ी की तरफ अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है आज के माँ-बाप को क्योंकि उनको बिगाड़ने वाले कारक बहुतायत में माजूद हैं, जो कि आज के अभिभावक नहीं कर रहे हैं. उन्हें ये गलतफहमी है कि वे अपने बच्चों को आज़ादी दे रहे हैं, जबकि इसका मतलब उन्हें भी नहीं मालूम. 'एब्सोल्यूट फ्रीडम' से बड़े-बड़े बर्बाद हो गए हैं, किशोर बच्चे क्या चीज़ हैं?

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    1. "एब्सोल्यूट फ्रीडम' से बड़े-बड़े बर्बाद हो गए हैं"
      अब जैसे मैं ही :) हा हा .. इतनी लम्बी लम्बी टिप्पणियाँ इधर उधर कर रही हैं पढ़ लिख नहीं रही हैनं क्या इन दिनों ?

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    2. आपको कहाँ मिली है 'एब्सोल्यूट फ्रीडम'. गले में शादी का फंदा पड़ा है, नहीं तो भगवान जाने क्या होता :) रही बात हमारी पढ़ाई की, तो दोस्तों की मेहरबानी से इस समय 'बहुत अच्छी' चल रही है.

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    3. Lekh ke baad ki tippaniyan-Masha Allah. Lekh mein chaar chand lag gaye. Aabhar aap sab ki choti moti nonk jonkh ka.

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  10. दोनों पोस्टें पढ़ने के बाद आगे की किस्तों के इंतजार में हैं अब तो!

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