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शुक्रवार, 18 मई 2012

प्रश्न, प्रतीक्षा और उत्तरों के मौन

 ...कन्धे पर सवार बैताल ने पूछा - बोलो विक्रम! अभिनेताओं और नेताओं में बदतमीजियाँ एक जैसी पाई जाती हैं। फिर भी अभिनेताओं की हलकटई पर कई गुना हल्ला क्यों मचता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर जानते हुये भी तुमने नहीं बताया तो तुम्हारे सिर के हजार टुकड़े हो जायेंगे। 


विक्रम ठिठका और बैताल को जमीन पर पटक कर उस पर बैठ गया। उसने उत्तर दिया - सदियों से तुम्हारी बकवास सुन रहा हूँ। नहीं ढोना मुझे तुम्हारा बोझ! 
 तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में मेरा यह प्रश्न है - इन दोनों जमातों से बड़ी हलकट जमात स्वयं जनता है। वह खुद पर हो हल्ला क्यों नहीं मचाती? अगर उत्तर जानते हुये भी तुमने नहीं बताया तो मैं इस मृत शरीर का दाह संस्कार कर दूँगा जिसमें तुम्हारा वास है। 

चूँकि उत्तर देने की कोई समय सीमा तय नहीं है, बैताल जानते हुये भी चुप है। उत्तर की प्रतीक्षा में विक्रम दुर्गन्धित शव पर सवार है। 

पॉकेट वीटो के दौर में वे कहानियाँ और गल्प भी मौन ओढ़ चुके हैं जिनमें उत्तर हुआ करते थे। 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

चलो..

घर में रहते हुए भी 
बहुत दूर है किताबों की आलमारी।
टी वी पर है पत्नी और बच्चों के कब्जे।
चलो, 
अंतर्जाल में कहीं नीचे फँसे 
किसी अच्छे ब्लॉग को ढूंढ़ा जाय, 
अपने को सँवारा जाय, 
उसे टिप्पणी दे उत्साह बढ़ाया जाय।