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शनिवार, 13 अप्रैल 2019

रामनवमी, नववर्ष सतुआन, बैसाखी एवं नव लोकसभा चुनाव - नियति की इङ्गिति समझें


जन जन में रमने वाले पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म चैत्र माह की शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था अर्थात धरती से देखने पर क्रान्तिवृत्त के २७ भागों में से जो भाग पुनर्वसु कहलाता है अर्थात जिसमें पुनर्वसु तारकमण्डल पड़ता है, उनके जन्म के समय चन्द्रमा वहाँ स्थित थे।
पुनर्वसु नक्षत्र में चंद्रमा आज ०८.५९ तक हैं, अर्थात सूर्योदय के समय भी चंद्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में हैं किंतु सूर्योदय की तिथि अष्टमी ही है अत: आज उदया तिथि अष्टमी मानी जायेगी। कल का सूर्योदय पुष्य नक्षत्र में है जब कि सूर्योदय की तिथि नवमी है। कल पुष्य नक्षत्र में चंद्रमा केवल ०७.४१ तक हैं तब भी उदया तिथि अनुसार नवमी कल ही मनाई जायेगी, जब कि नवमी कल केवल ०९.३६ तक ही है।

सूर्योदय से निरपेक्ष चंद्रमा की तिथि नवमी एवं मध्याह्न के सङ्गम पर श्रीराम का जन्मोत्सव होना चाहिये, ऐसा मानने वाले आज ही रामनवमी मनायेंगे।

संयोग देखिये कि कल सौर नववर्ष भी है - सौर संक्रांति पर्व सतुआन- नये अन्न के सत्त्व का पर्व जब सूर्य मीन से मेष राशि में संक्रमित होंगे अर्थात क्रांतिवृत्त के १२ राशि विभाजनों में से आज मीन नामक अंतिम क्षेत्र में हैं, कल ०२.२५ अपराह्न में मेष राशि में प्रवेश करेंगे। राशि चक्र के इस प्रथम क्षेत्र में सूर्य के प्रवेश से सौर नववर्ष होता है। कल भारत के अन्नक्षेत्र में पञ्जाबी बैसाखी होगी।
घट घट जीव पोषक विष्णु अवतारी श्रीराम के जन्म पर जगज्जननी सिद्धिदात्री के सान्निध्य में अन्नपूर्णा बनी महिलायें नये अन्न से 'नवमी के नौ रोटी' बना पूजन करती हैं।

मेरी माता जी स्वास्थ्य लाभ करने आई हुई हैं, उनके विवाहित जीवन की यह पहली रामनवमी है जब वह उस घर में नवमी पूजन नहीं कर पायेंगी जिसमें डोली से उतरी थीं। वह विशेष पूजन कहीं और नहीं किया जाता। उनकी व्यग्रता देख समझ रहा हूँ, साथ ही सहस्राब्दियों पुरातन सनातन समाधान को भी कि चैत में न पूज पायें तो बैसाख की शुक्ल नवमी भी पूजी जा सकती है, ऐसा विधान है। गँवई महिलाओं के इस विधान में मैं उस प्रवाहित ज्ञानसरि को देख पा रहा हूँ जिसने पञ्चनद नववर्ष को बैसाखी नाम दिया होगा, मैं देख पा रहा हूँ कि पश्चिम के बैसाखी से पूरब के सतुआन तक भारत एक है - पश्चिमी समुद्र से पूर्वी समुद्र तक पसरी धरा - पुराण ऐसा ही कहते हैं। मनु भी आर्यावर्त का प्रसार ऐसा ही बताते हैं :
रामनवमी एवं नववर्ष सदा एक साथ नहीं पड़ते, इस वर्ष संयोग ही है कि दोनों साथ पड़े हैं। क्या आप जानते हैं कि जन्मदिन के ही दिन श्रीराम को युवराज पद पर अभिषिक्त करने की अपनी इच्छा उनके पिता ने बताई थी तथा अगले दिन पुष्य नक्षत्र में उनका अभिषेक होना था? पुनर्वसु एवं पुष्य के संधि काल एवं रजनी को श्रीराम एवं देवी सीता ने विशेष व्रत एवं उपवास के साथ बिताया था। होनी कुछ और ही होनी थी, अभिषेक के स्थान पर श्रीराम का वनवास हो गया!

कितना सांकेतिक है इस बार का पुनर्वसु-पुष्य काल कि लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं अर्थात जिसका अभिषेक होना है, उसके चयन की प्रक्रिया है। इस नववर्ष पगे चुनाव अभियान में इस प्रकार मतदान करें कि कोई अनर्थ न हो।

मतदान अवश्य करें। आलस्य एवं प्रमाद वश उससे विरक्त हो छुट्टी या पिकनिक न मनायें। धूप से न घबरायें, नववर्ष माह के सूर्य का आतप अच्छा ही होता है।
(1) राष्ट्रहित शतप्रतिशत मतदान करें।
(2) उसके पक्ष में करें जिससे राष्ट्र का गौरव बढ़ता हो, जनसामान्य आयुष्मान होता हो।

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

मीन मेख निकालना


बहुत ही सूक्ष्म विश्लेषण आदि के लिये एक मुहावरा प्रचलित है - मीन मेख निकालना। उसका सम्बन्ध सौर-चंद्र समन्वित पंचांग के नववर्ष के आज के पहले दिन से ले कर 14 अप्रैल को सौर पंचांग अनुसार नववर्ष के पहले दिन (सतुआन/ बैसाखी पर्व) से है।
राशि चक्र मेषादि है अर्थात मेष से गणना आरम्भ कर मीन पर अंत होता है तथा आगे पुन: मेष से आरम्भ होता है। ऐसे ही चक्र चलता रहता है।
आज सौर-चंद्र समन्वित नववर्ष है चंद्र मीन राशि में हैं तथा सूर्य भी। ऋतुओं की कारक सूर्य गति है। अत: जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करें तब राशि चक्र आरम्भ से सम्पात होने के कारण सौर नववर्ष होना चाहिये। 14 अप्रैल के दिन यही होता है, जब सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करेंगे - मेष संक्रांति, सौर नववर्ष का आरम्भ।
राशि संक्रांति को नाक्षत्रिक परिशुद्धता के साथ मिला कर देखें तो नववर्ष आरम्भ का निर्धारण सूक्ष्म विश्लेषण की माँग करता है। वही है मीन मेख निकालना। 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

~ बिहने सतुवानि ह ‍~ बैसाखी, सौर नववर्ष

भारत में पञ्चाङ्गों की बड़ी समृद्ध परम्परा रही। एक साथ सौर एवं सौर-चंद्र तथा शीत अयनान्त एवं बसन्‍त विषुव के साथ आरम्भ होने वाले पञ्चाङ्ग प्रचलित रहे। जन सामान्य में चंद्र आधारित महीने यथा चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ इत्यादि ही प्रचलित रहे जोकि पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की नक्षत्र विशेष के साथ संगति पर आधारित थे, यथा चैत्र में चित्रा पर, वैशाख में विशाखा पर। चंद्र की घटती बढ़ती कलाओं से बीतते दिनों की गिनती में सुविधा रहती थी। सौर आधारित महीने मधु, माधव इत्यादि मुख्यत: श्रौत सत्र आधारित गतिविधियों में प्रचलित रहे जिनकी चंद्र आधारित महीनों से संगति जन सामान्य में भी प्रचलित थी यथा चैत्र का महीना मधु है। तुलसीदास ने लिखा - नवमी तिथि मधुमास। ग्रेगरी का प्रचलित कैलेण्डर सौर गति आधारित है जिसका चंद्र कलाओं से कोई सम्बंध नहीं। आप के यहाँ जो अब संक्रांतियाँ मनाई जाती हैं, वे भी सूर्य गति से सम्बंधित हैं जिनका चंद्र कलाओं से कोई सम्बंध नहीं। इस कारण ही मकर संक्रांति प्रति वर्ष 14/15 जनवरी को ही पड़ती है तथा मेष संक्रांति 13/14 अप्रैल को। मेषादि राशिमाला का प्रथम बिंदु होने से यह सौर नव वर्ष होता है जिसे सतुवानि के रूप में भोजपुरी क्षेत्र में मनाया जाता है तो तमिलनाडु में नववर्ष के रूप में। पञ्जाब में बैसाखी के रूप में मनाया जाता है। रबी की सस्य के अन्न से जुड़े इस पर्व में जौ, चना इत्यादि का सत्तू ग्रहण करने का पूरब में प्रचलन है। अब आप पूछेंगे कि तब युगादि वर्ष प्रतिपदा क्या थी? नाम से ही स्पष्ट है - चंद्र मास का पहला दिन अर्थात वह नववर्ष चंद्र-सौर पञ्चांग से है। दोनों में क्या समानता है या दोनों कैसे सम्बंधित हैं? उत्तर है कि दोनों वसंत विषुव के दिन के निकट हैं जब कि सूर्य ठीक पूरब में उग कर ठीक पश्चिम में अस्त होते हैं। यह 20 मार्च को पड़ता है, उसके निकट की पूर्णिमा को चंद्र चित्रा पर होते हैं तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा चंद्र-पञ्जाङ्ग से नववर्ष होती है। 20/21 मार्च से 13/14 अप्रैल के बीच ~ 24 दिनों का अंतर है तो शीत अयनांत 21/22 दिसम्बर से 14/15 जनवरी के बीच भी इतने ही दिनों का। ऐसा क्यों है? वास्तव में हमलोग उत्तरायण मनाते थे, उसे सूर्य के अधिकतम दक्षिणी झुकाव से उत्तर के दिन से मानने का प्रचलन था तो वासंती विषुव के सम दिन से उत्तर की ओर बढ़ने का दिनांक भी महत्त्वपूर्ण था। जब 27 नक्षत्र आधारित गणना पद्धति में 12 राशि आधारित गणना पद्धति का प्रवेश हुआ तो उस समय मकर संक्रांति एवं मेष संक्रांतियाँ क्रमश: शीत अयनांत 21/22 दिसम्बर एवं वसंत विषुव 20/21 मार्च की सम्पाती थीं अर्थात सम्बंधित संक्रांति, अयन, विषुव एक ही दिन पड़ते थे। 12 राशियों में सूर्य की आभासी गति का प्रेक्षण 27 की अपेक्षा सरल था जिसे तत्कालीन ज्योतिषियों ने बढ़ावा भी दिया। सदियों में लोकस्मृति में संक्रांतियाँ ही रह गयीं, उत्तरायण को लोग उनसे ही जानते लगे किंतु धरती की धुरी की एक विशिष्ट गति के कारण सम्पात क्रमश: हटता जा रहा है। अब अंतर ~24 दिनों का हो गया है जो आगे बढ़ता ही जायेगा। ... गणित हो गया, अब प्रेक्षण।
कल सतुवान के दिन प्रात: साढ़े चार बजे उठ कर पूर्व उत्तर दिशा में देखें। तीन चमकते तारे दिखेंगे - सबसे ऊपर अभिजित, नीचे हंस एवं गरुड़ नक्षत्र मण्डल के सबसे चमकीले तारे। इन तीनों को मिला कर जो त्रिभुज बनता है उसे 'ग्रीष्म त्रिभुज' कहते हैं। अप्रैल आधा बीत गया। मई जून की झुलसाती धूप तो आने वाली है न, बैसाख जेठ की तपन के पश्चात आषाढ़ सावन भादो की झड़ी भी आयेगी।
वर्ष को वर्षा से ही नाम मिला। किसी विश्वामित्र के पत्रे में 21 जून से नववर्ष मिल जाय तो आश्चर्य चकित न हों, उस दिन ग्रीष्म अयनांत होता है, सूर्य देव अधिकतम उत्तरी झुकाव से दक्षिण की यात्रा आरम्भ करते हैं अर्थात घनघोर बरसते पर्जन्य की भूमिका। मानसून कब प्रबल होता है? वर्षा न हो तो धरा कैसे तृप्त हो? स्थावर जङ्गम को जीवन कैसे मिले? हरियाली कैसे हो? 21 जून से नववर्ष मनाने की तुक तो है ही, देखें तो उसके निकट कौन सी संक्रांति है? कहीं मनायी जाती है क्या?

मंगलवार, 20 मार्च 2018

Spring Equinox and Festivals कल के वसंत विषुव के व्याज से पर्व चर्चा

Spring Equinox and Festivals
आप ने कुछ लोगों को सुना होगा कि विक्रम संवत तो वैशाख में लगता है, यह तो शक संवत है! वास्तव में वे सौर कैलेण्डर एवं सौर-चंद्र पञ्चाङ्ग की बातें कर रहे होते हैं, किञ्चित भ्रम में भी रहते हैं। 

पहले चार बिंदुओं को जानिये। धरा से सूर्य को देखें तो सूर्य उत्तर-दक्षिण-उत्तर वर्ष भर दोलन करते प्रतीत होते हैं। इस गति के कारण ही जाड़ा, गरमी, बरसात ऋतुयें होती हैं जिन्हें दो दो में बाँटने पर छ: हो जाती हैं।

कल प्रात:काल 21 मार्च को महाविषुव या वसंत विषुव का सूर्योदय होगा। इस दिन पृथ्वी के बीचोबीच की कल्पित रेखा विषुवत वृत्त वाला तल सूर्य के गोले के बीचोबीच से जाता है, सूर्योदय ठीक पूरब में, सूर्यास्त ठीक पश्चिम में। सम ऋतु – वसंत। निकट का पर्व – वासंती नवरात्र। शस्य देखें तो गेहूँ, रबी। रामनवमी के नौ रोटी। 

यहाँ से क्रमश: उत्तर की ओर झुकते सूर्य के कारण दिन के घण्टे बढ़ते जाते हैं, ताप भी बढ़ता जाता है। 21/22 जून को अधिकतम उत्तरी झुकाव होता है, भीषण उमस, वर्षा ऋतु का उद्घाटन। ग्रीष्म अयनांत, चलना रोक कर लौटना। 

वहाँ से पुन: दक्षिण की ओर माध्य स्थान की ओर लौटते सूर्य 22/23 सितम्बर को पुन: विषुव वाली माध्य स्थिति प्राप्त करते हैं। सम ऋतु – शरद। निकट का पर्व – शारदीय नवरात्र। कृषि उपज देखें तो धान, खरीफ शस्य। 
वहाँ से दक्षिण की ओर झुकते जाते हैं, दिन छोटे होने लगते हैं, शिशिर आ जाता है, पूस जाड़ तन थर थर काँपा। 21/22 दिसम्बर को अधिकतम दक्षिणी झुकाव होता है। शीत अयनान्त। 
यहाँ से उत्तरायण होते सूर्य पुन: 21 मार्च की स्थिति तक आते हैं। ऋतु चक्र चलता रहता है। 3 – 3 महीनों के अंतर से चार बिंदु। 
इतना समझ लेने पर अब जानिये कि अंतर्राष्ट्रीय कैलेण्डर सौर है अर्थात चंद्र गति से इसका कोई सम्बंध नहीं। विक्रम संवत सौर-चंद्र है अर्थात दोनों को मिला कर, समायोजित करते चलता है किंतु तिथियों एवं मास के लिये चंद्र गति पर ही निर्भर होता है, पूर्णिमा के दिन चंद्र नक्षत्र से मास का नाम होता है।
इस कारण आप पायेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय कैलेण्डर के अनुसार अधिकतर पर्वों का दिनांक निश्चित नहीं होता किंतु चंद्र मास, पक्ष एवं तिथि निश्चित होते हैं। 
वस्तुत: चंद्र तिथि मास के अनुसार हम मूलत: सौर गति से उत्पन्न ऋतु आधारित पर्व ही मनाते हैं। पर्व को पोर, सरकण्डे की गाँठ से समझिये, एक निश्चित बिंदु। 
अब ऊपर लिखा पढ़िये तो! दो महत्त्वपूर्ण सौर बिंदुओं विषुव के निकट सम ऋतु में दोनों नवरात्र पड़ते हैं। 
ऐसा नहीं है कि पूर्णत: सौर पर्व उत्तर में नहीं मनाये जाते। संक्रांतियाँ वही तो हैं! एक समय ऐसा था शीत अयनांत एवं वसंत विषुव के बिंदु परवर्ती काल में अपनाये गयी राशि पद्धति की क्रमश: मकर एवं मेष से सम्पाती थे। सापेक्ष सूर्य की लगभग 26000 वर्ष की एक अन्य गति के कारण यह सम्पात खिसकता रहा एवं अब 23/24 दिनों का अंतर आ गया है। जो जन पहले अयनांत एवं विषुव मनाया करते थे, अब सौर संक्रांति मनाते हैं जिसकी तिथि, मास स्थिर नहीं होते, सौर कैलेण्डर का दिनाङ्क स्थिर होता है – 14/15 जनवरी (मकर संक्रांति) एवं 13/14 अप्रैल। 
14 अप्रैल को उत्तर में वैशाखी होती है – मेष संक्रांति, कतिपय पूरबी भागों में नया संवत्सर आरम्भ होता है तो दक्षिण में तमिळ नववर्ष –पूर्णत: सौर। वैशाखी नाम से स्पष्ट है कि पर्व का नाम चंद्र मास पर ही है। उस मास पूर्णिमा को चंद्र विशाखा नक्षत्र पर होता है। 

ऐसे समझिये कि सूर्य तो वर्ष भर एक समान गोला ही दिखता है, जबकि चंद्रमा कलायें दर्शाता है, वह भी दो पक्षों में। इस कारण चंद्रमा ने आकाश में उस कैलेण्डर की भाँति दिन बताने का काम किया जो भीत पर टँगा कैलेण्डर आज कल करता है। 


14 अप्रैल को ही भोजपुरी क्षेत्र में हर वर्ष पड़ता है – सतुआन (सतुवान, सतुवानि) पर्व, पूर्णत: सौर। सतुवा अर्थात रबी के उबले, सुखाये, भुने, पिसे विविध अन्न। आप के यहाँ कौन सा पर्व पड़ता है?


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कल सूर्योदय अवश्य देखें तथा उनकी स्थिति किसी दूरवर्ती स्थायी वस्तु, संरचना इत्यादि के सापेक्ष मन में बिठा लें। वह आप को वर्ष भर वास्तविक पूरब की दिशा बताती रहेगी। उसके सापेक्ष वर्ष भर सूरज की उत्तरी दक्षिणी यात्रा का पञ्चाङ्ग तथा कैलेण्डर देखते हुये प्रेक्षण कर सकते हैं।



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