मतदान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मतदान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

49-O : सिंडिकेट को ठेंगा

मजहब और जाति के नाम पर एकजुट होकर भेंड़ियाधसान मानसिकता
से मतदान लोकतंत्र के लिये खतरनाक है। चित्राभार: टाइम्स ऑफ इंडिया
इस बार मतदान अवश्य करें। यदि आप सभी प्रत्याशियों में नालायकियत, फिरकापरस्ती, जातिवादी जहनियत, गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, संकीर्णता आदि देख कर आज तक मतदान करने से बचते रहे तो इस बार घर से निकलिये।

चुनाव प्रक्रिया में नियम 49-O के तहत आप को मतदान न करने के अपने मंतव्य को आधिकारिक रूप से दर्ज करने का प्रावधान है:

49-O. Elector deciding not to vote.-If an elector, after his electoral roll number has been duly entered in the register of voters in Form-17A and has put his signature or thumb impression thereon as required under sub-rule (1) of rule 49L, decided not to record his vote, a remark to this effect shall be made against the said entry in Form 17A by the presiding officer and the signature or thumb impression of the elector shall be obtained against such remark. (स्रोत: विकिपीडिया)
फॉर्म 17 अ में नाम दर्ज होने और हस्ताक्षर के पश्चात आप को पीठासीन अधिकारी से बताना है कि आप अपना मत 'नहीं देना' चाहते हैं। अधिकारी महोदय यह टिप्पणी आप के नाम के आगे दर्ज करेंगे और आप से हस्ताक्षर लेंगे। ऐसा कर आप अपने संवैधानिक कर्तव्य की पूर्ति भी करेंगे और परोक्ष रूप से 'सत्ता के दलालों' के प्रति अपना विरोध भी दर्ज करा पायेंगे। सूचना के अधिकार के तहत बाद में आप ऐसे कुल मतदाताओं की संख्या भी जान सकेंगे।
आप अगर सभी प्रत्याशियों को नालायक पाते हैं तो प्रकट रूप से आप अल्पसंख्यक हैं लेकिन यदि वोट न देने वालों की संख्या एक समूह के रूप में देखी जाय तो? यदि सभी वोट न देने वाले इस तरह अपना मत व्यक्त करें तो? आप बहुसंख्यक होंगे जिनका मत मायने रखेगा। आज ऐसे मतों के आधार पर भले परिणाम प्रभावित न हों लेकिन कल को शासक वर्ग नियमों में यह संशोधन करने को बाध्य हो सकता है कि यदि किसी क्षेत्र में 'मतदान न करने' वालों की संख्या एक निश्चित प्रतिशत तक पहुँच जाती है तो वहाँ प्रक्रिया निरस्त कर दुबारा से पूरी कार्यवाही हो और प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग हो। सम्भव है कि ऐसी स्थिति में 'बहुसंख्यकों' के मध्य से ही कोई लायक प्रत्याशी सामने आ जाय!   
हल्के तौर से सोचने पर यह बहुत पिद्दी सा प्रावधान लगता है लेकिन यह दलाल उठाइगीरों के लिये एक चुनौती भी है। सोचिये कि अगर यह स्थापित हो जाय कि अमुक क्षेत्र के मतदाता परोक्ष रूप से सभी प्रत्याशियों को नकार सकते हैं तो पार्टियों और जनता दोनों की सोच में परिवर्तन होगा कि नहीं? जाति, मजहब जैसे सारहीन मुद्दों के स्थान पर वास्तविक मुद्दे निर्वाचन को प्रभावित करेंगे कि नहीं? जनकल्याण सबसे पहले आयेगा कि नहीं?
सोचिये! यह समय अंगुली पर स्याही का निशान लगाने के साथ साथ भ्रष्ट सुविधाभोगी देश के गद्दारों को ठेंगा दिखाने का भी है।
________________________________________   
लोकतंत्र के इस मॉडल से आप अगर दुखी हैं तो आप अकेले नहीं हैं। इस मॉडल में जो दोष हैं उनकी ओर इशारा करते ये तीन आलेख कभी मैंने लिखे थे। आप इन्हें देख सकते हैं:
  
हाल में  चैतन्य आलोक  (संवेदना के स्वर) ने फेसबुक पर यह आलेख शेयर किया जो स्याह पक्ष को उजागर करता है। आप के लाभ के लिये उसे यहाँ दे रहा हूँ। [ उनके ब्लॉग आलेख का लिंक यह है - भारत में (अ) व्यवस्था किस तरह काम करती है? ]:
 रईसों और ताकतवर लोगों का यह “सिंडीकेट !!
by Chaitanya Alok on Saturday, February 4, 2012 at 6:15pm ·
“भारत के सभी संसाधनों" पर चन्द रईसों और ताकतवर लोगों का कब्जा है। रईसों और ताकतवर लोगों के बीच बनें इस “सशक्त गठबन्धन” को “सिंडीकेट या माफिया” कह सकते हैं। देश में फैली (अ) व्यवस्था इस “सिंडीकेट” द्वारा किस तरह से निर्देशित होती है ? रईसों और ताकतवर लोगों का यह “सिंडीकेट” कुछ “नियम-कायदे” बनाता है ताकि जो लोग रईस और ताकतवर नहीं हैं वह इस (अ) व्यवस्था से हमेशा बाहर रहें। यह “सिंडीकेट”, सभी महत्त्वपूर्ण जानकारियों और ज्ञान को अपने नियन्त्रण में रखता है। जानकारियों से यहाँ मतलब "धन बनाने", व्यापार और रोजगार की उन सम्भावनाओं से है जिनका पूर्व ज्ञान मात्र कुछ लोगों को ही रहता है। मतलब कौन सी जगह हाई-वे बनाना है, किस प्रकार की टेक्नोलोजी या उत्पाद को बढावा देना है। सरकारी और निजी व्यापार और रोजगार की बयार किस तरफ बहेगी और उससे होने वाले लाभ की गंगा किस तरह और किस किस को तरेगी, वही सब। फिर इन जानकारियों को सीमित पहुंच तक रखने के लिये रईसों और ताकतवरों का यह “सिंडीकेट” बहुत से नियम-कायदों का मकड़जाल बुनता है। नियम-कायदों के इस मकड़जाल का पहला मकसद यही होता है कि “आम आदमी”, रईसों और ताकतवरों के इस वैभवशाली साम्राज्य से दूर रहे और उसे किसी भी तरह से चैलेंज करने की स्थिति में न पहुचें। नियम-कायदों के इस मकड़जाल में बहुत सी सीढ़ियां होती हैं और हर सीढ़ी पर एक गेट कीपर तैनात होता है।
यह (अ) व्यवस्था हर गेटकीपर को कुछ ताकत देती है जिनके द्वारा वह अपनी सीमा में नियत नियम-कायदों को नियंत्रित करता है।......
यह बात महत्वपूर्ण है कि गेटकीपर का अहम काम अपने उपर वाली सीढ़ी तक पहुंच को मुश्किल बनाना है, इसके परिणाम स्वरुप प्रत्येक उपर वाले गेटकीपर की ताकत कई गुना बढ़ती जाती है। और अंत में सिंडीकेट महा-शक्तिशाली हो जाता है। रईसों और ताकतवरों का यह सशक्त गठबन्धन या “सिंडीकेट”, अन्य सहयोगी लोगों के “शातिर नेटवर्क” के द्वारा नियम-कायदों के इस मकड़जाल को नियंत्रित करता है, और यह सुनिश्चित करता है (अ) व्यवस्था की सभी संस्थायें इस “शातिर नेटवर्क” के द्वारा नियंत्रित की जायें। इन संस्थायों के मुखिया के पद पर जब शातिर नेटवर्क के व्यक्ति को बैठाया जाता है तो उसकी ताकत बेहद उंचे दर्जे की हो जाती है क्योकिं उसके कार्य अब विधि और संविधान सम्मत हो जाते हैं और उन्हें चैलेंज करना मुश्किल ही नहीं लगभग नामुमकिन को जाता है। “सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट” इस बात के पूरे इंतजाम करता है कि “शातिर नेटवर्क” के एक- एक व्यक्ति को ताउम्र पूर्ण सरंक्षण दिया जाये।
पर देश का “वाच डाग” मीडिया और इस “शातिर नेटवर्क” से बाहर हुये लोग क्या इतनी आसानी से इसे काम करने दे सकते हैं?
“मीडिया” जो जनमानस को निरंतर प्रभावित करता है उसे भी इसी “शातिर नेटवर्क” द्वारा येन केन प्रकारेण नियंत्रण में रख कर “वाच डाग” से “लैप डाग” बना दिया जाता है। “शातिर नेटवर्क” में उन लोगों को सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता जो या तो येन केन प्रकारेण, “सशक्त गठबन्धन या सिंडीकेट” को फायदा पहुंचाते हैं या फिर उनका बहुत विरोध करने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। बहुत से गेटकीपर जो अपने रसूख और धनबल को बढ़ाने में कामयाब हो जाते हैं उन्हें भी शातिर नेटवर्क में शामिल कर लिया जाता है।
पर फिर भी इसे त्वरित रूप से चलाये कैसे रखा जाता है?
(अ) व्यवस्था के पूरे तन्त्र को लालच रुपी इंजन से चलाया जाता है और इसके सभी कल पुर्जों में काले धन रुपी लुब्रीकैंट को डाला जाता है।
 
___________________________________________
समस्या यह है कि लोकतंत्र का कोई बेहतर विकल्प नहीं सूझता। ऐसे में जो उपलब्ध है उसी में सुधार की लड़ाई लड़ी जाय।
क्या पता 49-O ही वह चिनगारी हो जो रावणों की लंका भस्म करने का सामान बन जाय?
राष्ट्रों के भाग्य बदलने में सदियाँ लगती हैं। जो पीढ़ी लड़ती है वह फल नहीं चखती। क्या पता हमारे लिये यही तय हो?
भोली है यह आशा लेकिन बिना इसके जिया भी तो नहीं जाता!

रविवार, 3 मई 2009

उल्टी बानी (अंतिम भाग) – चुनाव, एक पर्व एक उत्सव

(अ)
बात उस समय की है जब ए टी एम नए नए लगने प्रारम्भ हुए थे. एक समाचारपत्र में किसी आम व्यक्ति की प्रतिक्रिया थी कि ए टी एम की सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि यह मुँहदेखी नहीं करता. बैंक में पैसे निकालने जाओ तो क्लर्क पहचान और रसूख वालों के साथ ढंग से बात भी करता है और पैसे भी ज़ल्दी दे देता है. जब कि मुझे घण्टों लगाता है और उपर से सीधे मुँह बात भी नहीं करता. पिछ्ले पोस्ट में मैंने टेक्नॉलॉजी के “समता और सुलभता” वाले पक्ष की जो बात की थी उसका यह एक उदाहरण है. अपने देश में मेधा की कमी नहीं है. आवश्यकता है दृढ़ निश्चय और समर्पण की. सुझाए गए तमाम तकनीकी युक्तियों को लागू कर समूची निर्वाचन प्रक्रिया को आमूल चूल बदला जा सकता है.
तकनीक के प्रयोग का एक सबल पक्ष यह भी है कि दो तिहाई से अधिक मतदाता युवा वर्ग से हैं और स्वभावत: यह वर्ग तकनीकी परिवर्तनों की ओर आकृष्ट हो कर मतदान का प्रतिशत बढ़ाएगा. मेरे पास कोई ठोस तर्क तो नहीं है लेकिन न जाने क्यों लगता है कि यदि मतदान का प्रतिशत 95 या उससे अधिक सुनिश्चित कर दिया जाय तो हमें अल्पमत की सरकारों से छुटकारा मिल जाएगा. अस्थाई, अनैतिक, तिकड़मी और अवसरवादी गठबन्धनों से, जो कि हमारी शासन व्यवस्था की एक दु:खद वास्तविकता बन चुके हैं, भी छुटकारा मिल जाएगा.
अब समय आ गया है कि प्रत्याशियों के मामले में सबको समान अवसर देने की सर्वविनाशी और मूर्खतापूर्ण मानसिकता से मुक्त हो कर हम सीमित पार्टी संख्या वाले लोकतंत्र के मॉडल को अपना लें. निर्दल प्रत्याशियों पर प्रतिबन्ध लगे और भारत की विविधता को देखते हुए कम से कम चार पार्टियों को मान्यता दी जाए. यह पार्टियाँ दक्षिणपंथ, वामपंथ और मध्यमार्ग की राहों वाली हो सकती हैं और चौथा विकल्प किसी भी अन्य मॉडल के लिए रखा जा सकता है. पिछ्ले चुनावों में पाए गए मत प्रतिशत के आधार पर इनकी पहचान हो सकती है. इसके साथ ही क्षेत्रीय पार्टियों को कोई एक विकल्प चुन कर विलय का विकल्प दे दिया जाय. इन चार पार्टियों के संविधान दुबारा लिखे जाँय, नाम और चुनाव चिह्न भी आंतरिक प्रक्रिया द्वारा दुबारा रखे जाँय.
चार पार्टियों की सीमा से यह लाभ होगा कि टेलीफोन, मोबाइल, इंटर्नेट, ए टी एम, पोस्ट ऑफिस, बैंकों आदि सब स्थानों पर तकनीकी प्रयोगों द्वारा मत देने की स्थाई और एक समान तंत्र के विकास और उसे लागू करने में बड़ी सहूलियत हो जाएगी. मतदान की प्रक्रिया भी लचीली, अल्पव्ययसाध्य और साथ ही तीन चार दिनों तक लगातार जारी रह सकेगी जिससे मतदान का प्रतिशत 95 को भी पार कर सकेगा. राज्यसत्ता द्वारा चुनावों की सम्पूर्ण फाइनेंसिंग आसान और अल्पव्यय साध्य हो सकेगी. धन और बाहुबल का जो ज़ोर आज दिख रहा है वह समाप्त हो जाएगा और सही मायने में लोक प्रतिनिधि चुनने में योग्यता और कर्मठता ही कसौटी होंगें न कि यह क्षमता कि प्रत्याशी कितना धन चुनावों में इनवेस्ट कर सकता है.
लोकतंत्र की कसौटी निर्बल और सबल दोनों को योग्यता के आधार पर समान अवसर और प्लेट्फॉर्म उपलब्ध करा सकने में सक्षम होने में है न कि सींकिया पहलवानों को रिंग में केवल समान अवसर के पाखण्ड प्रदर्शन के लिए मुहम्म्द अली सरीखे धन पशुओं के सामने उतारने में. ऐसे मामले में परिणाम की प्रतीक्षा तो बस एक खानापूरी ही होती है. सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जनता ऐसे आडम्बर पूर्ण आयोजनों से उदासीन हो जाती है. बहुसंख्यक (चुनावी गणित के अर्थों में न लें) जनता या तो मसखरी का आनन्द लेती है या अपने दैनिक समस्याओं से जूझती इसका मौन बहिष्कार कर देती है. मसखरों के लिए दैनिक मोनोटोनी से मुक्त होने का यह एक बहाना बन जाता है. यही कारण हैं कि हमारे प्रभु वर्ग का हमेशा सत्ता में बने रहने का और धन दोहन का षड़यंत्र स्वतंत्रता के समय से ही फल फूल और सफलीभूत हो रहा है.
(आ)
एक ऐसा आयोजन जिससे हमारा भाग्य सीधा जुड़ा हुआ है, जो 5 वर्षों में केवल एक बार ही होता है, जिससे हमारे दैनिक और आजीवन प्रकल्प सीधे प्रभावित होते हैं और जो हमारी, हमारी आगामी पीढ़ियों और हमारे पूरे देश की नियति को निर्धारित करता हो; उससे हम इतने उदासीन क्यों हैं?
होली, दिवाली, ईद, बैसाखी को मनाने के लिए तो किसी आह्वान की आवश्यकता नहीं पड़ती! फिर इसमें सम्मिलित होने और सक्रिय योगदान देने के लिए प्रचार, आह्वान, नुक्क्ड़ नाटक आदि की आवश्यकता क्यों पड़ती है? हमारी नींद का आलम तो यह है कि ये सब भी हमें जगा नहीं पा रहे हैं.
हम उल्लसित क्यों नहीं हैं? बात लू लगने की नहीं है. बात यह है कि हमारे उर में हिलोरों की इतनी कमी है कि सूरज की गर्मी जैसी दैनिक घटना भी हमें इस महापर्व को मनाने से रोक दे रही है. क्यों?
यह आयोजन तो पर्व और उत्सव की तरह मनाया जाना चाहिए, बल्कि यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा पर्व होना चाहिए. हम इसका शांत और क्लांत भाव से बहिष्कार क्यों कर रहे हैं? हम इतने निष्क्रिय हो कर क्यों इसे चन्द उठाईगीरों के आमोद प्रमोद और उनकी समृद्धि का माध्यम बनाए दे रहे हैं? हम क्यों नहीं एक साथ उठ खड़े हो रहे हैं, एक आमूल चूल परिवर्तन के लिए? आखिर हमें सक्रिय होने से नुकसान ही क्या होने वाला है? सामूहिक प्रमाद की यह महामुद्रा जो हम धारण किए हुए हैं, उसकी सिद्धि क्या है? यही न कि दिन ब दिन हम रसातल में धँसते चले जा रहे हैं !
इन सबका कारण यह है कि हम एक बनी बनाई व्यवस्था को ही सब कुछ मान बैठे हैं. हम यह मान बैठे हैं कि इसमें और कुछ परिवर्तन नहीं हो सकता. हम यह मान बैठे हैं कि धन और बाहुबल का यह अनिष्टकारी मायाजाल ही वास्तविकता है. याद करिए कि सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष ने क्या कर दिखाया. उसे लागू करने के मॉडल पर बहस हो सकती है लेकिन इससे तो इनकार नहीं हो सकता कि बहुत बड़ी शक्ति हमें इस एक अधिकार से मिली है. इसका बहुत ही सार्थक उपयोग भी हो रहा है.
ब्लॉग पर ही सही, परिवर्तन के लिए एक आन्दोलन खड़ा हो सकता है हमारी निर्वाचन प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन के लिए. हमें एक पर्व और उत्सव के नैसर्गिक अधिकार से बंचित कर दिया गया है. क्या यही एक कारण पर्याप्त नहीं है कि हम समूचे तंत्र को झँकझोर दें ! ज़रा सोचिए ! कलम उठाइए और लिखिए. समय की कमी कुछ नहीं है, बस घड़ी के दो हाथों का सम्मोहन है. उससे छूटिए. समय बहुतायत में मिलेगा. लिखिए कि उत्सव आयोजन का निमंत्रण पत्र आने को है.. ....पाँच वर्षों के बाद ! या उससे पहले ही?

रविवार, 26 अप्रैल 2009

उल्टी बानी (भाग दो) - अर्थ, अनर्थ, सब व्यर्थ

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ।। (भर्तृहरि विरचित नीतिशतकम्, 41)
“जिसके पास धन है वही कुलीन, वही विद्वान, वही वेदज्ञ, वही गुणी है. वही वक्ता है और वही सुदर्शन भी. सारे गुण कंचन (सोना, यहाँ धन के लिए व्यवहृत) में आश्रय पाते हैं.”



हम भारतीय बड़े पाखण्डी हैं. त्याग, संतोष वगैरह पर हर भारतीय ज्ञान की ऐसी गंगा बहाने में सक्षम है कि दूसरे उसमें पानी भरने को मज़बूर हो जाएँ या पानी माँगने लगें. हमारी अर्थलिप्सा कितनी ऐतिहासिक और शाश्वत है, यह भर्तृहरि के उद्धृत श्लोक से स्पष्ट है. अपने नीति शतक में वह एक नग्न यथार्थ का वर्णन कर रहे थे, व्यंग्य कर रहे थे, उस युग की मान्यता को लिख रहे थे या अपनी झुँझलाहट को व्यक्त कर रहे थे? इतना स्पष्ट है कि अर्थ उस समय भी हमारी मनीषा के केन्द्र में था. अर्थ को केन्द्र में होना ही चाहिए क्यों कि धर्म, काम और मोक्ष तीनों के लिए यह आवश्यक है. साथ ही सभ्यता के विस्तार और विकास के लिए अर्थ केन्द्रित व्यवस्था का होना पहली शर्त है. किंतु कैसा ध्वंश होता है जब साधन ही साध्य बन जाए, यह देखना है तो भारत से बेहतर कोई स्थान हो ही नहीं सकता. आँकड़ेबाजी में मैं नहीं घुसना चाहता लेकिन आँकड़ों का सार देना यहाँ अपेक्षित है.

वर्तमान चुनावों में ऐसे प्रत्याशियों की संख्या तीन अंकों में पहुँचती है जिनकी घोषित संपत्ति एक से नौ करोड़ है. ऐसे प्रत्याशी भी संख्या में दो अंकों के चरम पर पहुँचते हैं जिन्हों ने दस से निन्यानबे करोड़ की संपत्ति घोषित की है. सौ करोड़ या उससे अधिक की संपत्ति घोषित करने वाले भी इकाई के अंक तक सीमित नहीं रहे.
क्या आप को इसमें किसी बहुत बड़े घपले की बू नहीं आती? दिमाग मेँ घण्टी नहीं बजती ? हो सकता है कि उनकी सारी संपत्ति खून पसीने की और वैध कमाई ही हो. यदि ऐसा है तो क्या आप के मस्तिष्क में और ज़ोर से घंटा नहीं बजता? क्या आप को साँप नहीं सूँघता कि पिछ्ले 62 वर्ष किस तरह की व्यवस्था को बनाने और सँवारने में हमने गँवाए? यह कैसा अनर्थ हो गया हमसे?
बरजोरी यह कि यह व्यवस्था अब हम को ललकार रही है वोट करो !घर से बाहर निकलो !! मतदान करें, यह आप का पवित्र अधिकार है!!! अधिकार भी पवित्र और अपवित्र हो सकता है! बड़ी विडम्बना है.
यह कैसी पवित्रता है प्रभु? कितना महँगा अधिकार है यह ! मुद्रास्फीति और महँगाई, लोगों के बढ़ते जीवन स्तर (?), अर्थ व्यवस्था का खुलना और हमारा अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से जुड़ना, वगैरह, वगैरह.... आप के दिमाग में कीड़े कुलबुलाने लगे होंगें. आप का दोष नहीं है यह. अर्थ के अनर्थ तंत्र ने सुनियोजित माया का जो आवरण आप के चारो ओर फैला रखा है, उसमें आप यही सब सोच सकते हैं. उन्हें यह पूरा पता है कि हमारे पास और कोई विकल्प ही नहीं है. बरबस ही ध्यान ‘मैट्रिक्स’ फिल्म में दिखाए गए माया जाल की तरफ खिँच जाता है.
एक करोड़ क्या होता है मैं आप को सरल ढंग से समझाने की कोशिश करता हूँ. अर्थशास्त्रियों के मत भिन्न हो सकते हैं, आखिर वे स्पेस्लिस्ट ठहरे और वर्तमान व्यवस्था के ध्वजवाहक भी ! यदि आप आज से 5000 रुपए प्रति माह बचाना शुरू करें और आप को मिलने वाला ब्याज दर 8% वार्षिक हो तो एक करोड़ ज़मा करने में आप को लगेंगें 34 वर्ष !!
चौंतिस वर्षों की साधना और संयम !! अधिक प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है. इसमें यदि मुद्रास्फीति की औसत दर केवल 3% ही जोड़ दें तो आप का यह भविष्य का एक करोड़ वर्तमान के केवल 3660450/- इतना ही ठहरता है. क्या होगा यदि 8% का ब्याज 34 वर्षों तक स्थाई न रह कर घटता जाए. वर्तमान में तो यही लगता है. तब संभवत: अपने जीवन काल में आप करोड़पति नहीं बन पाएँगे. सन्न रह गए न !
यह अर्थ की अनर्थकारी माया है, मृगतृष्णा है. माया महाठगिनि हम जानी.
कितनी बड़ी ठगी चल रही है. मैं उद्योगपतियों की बात नहीं कर रहा. वहाँ अर्थ जनरेसन के अलग कारक और नियम होते हैं. वहाँ करोड़ बनाना इतना दुस्तर नहीं. मैं आम आदमी की बात कर रहा हूँ.
मैं यह मन कर चला था कि आप के पास 60000 रु. सलाना बचाने की क्षमता है. इस 60000 के बचत की तुलना उदाहरण के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय से करें जो करीब 10000 के पास बैठती है. एक घर में चार व्यक्ति गिनें जाँय तो प्रति गृह आय 40000 रु. होती है. सकल हिन्दुस्तान की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है. नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या?
और आज के चुनावों में कितने एक एक करोड़ प्रतिदिन व्यय किए जा रहे हैं, बाँटे जा रहे हैं इन प्रत्याशियों द्वारा ! यह पैसा आ कहाँ से रहा है? कभी सोचा है आपने ? ये अलग ढंग के उद्योगपति हैं. यह उनका इंवेस्टमेंट है. रिटर्न पांच वर्षों में हम से आप से दूहा जाएगा.
हमारे बच्चों के दूध से आएगा यह पैसा, हमारे खलिहान से उठाया जाएगा यह पैसा, बज्र गर्मी में जब हम आप बिजली विभाग को कोस रहे होंगे तो ए सी चैम्बर में ठुमके लगा रहा होगा यह पैसा, टैक्स ज़मा करवाने के लिए जब आप लाइन में लगे होंगे तो चुपके से आप की ज़ेब काट रहा होगा यह पैसा. जब बच्चे की ऊँची शिक्षा के डोनेशन के लिए आप यहाँ वहाँ नाच रहे होंगें तब तबला और हार्मोनियम बजा रहा होगा यह पैसा....
यह है हमारा समता मूलक समाज ! यह विराट सुनियोजित षड़यन्त्र, यह अर्थ की हमारे आप के लिए अनर्थकारी व्यर्थता. दोष किसका है? हमारी आप की पाख़ण्डी मानसिकता का है जो गालियाँ तो खूब देती है लेकिन खिसियानी बिल्ली और अंगूर खट्टे हैं की तर्ज़ पर. मौका मिले तो इन धनपशुओं के आगे समर्पण क्या उनका चरण चुम्बन तक करने में हमें शर्म नहीं.
क्या पाएँगे आप वोट दे कर? ज़रा नज़र डालिएगा चुने हुए अपने नुमाइन्दगों की लिस्ट पर. कितने ही करोड़पति होंगें उसमें. ज़रा उनके इतिहास का पता लगाइएगा , करोड़पति बनने में उन्हें चार साल भी नहीं लगे होंगें, 34 साल तो बहुत लम्बा काल होता है.
जो नहीं होंगें वे पहले ही सेकण्ड से उस क्लब में शामिल होने की होड़ में लग जाएँगें. जिस देश में आज भी भूख से लोग मरते हों, उस देश में ऐसे सैकड़ो करोड़पति हर साल पैदा हो रहे हैं. कौन है इनकी जननी और कौन है इन हरा_यों का जनक?
हम आप !

बदलाव कैसे हो? लोकतंत्र से बेहतर कोई विकल्प आज हमारे पास नहीं है. बस तंत्र से अर्थ की अनर्थकारी व्यर्थता दूर करनी होगी. कैसे? टेक्नॉलॉजी से. क्यों कि टेक्नॉलॉजी का उत्स ही समता और सुलभता के लिए होता है........... बात अभी शेष है.

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

उल्टी बानी (भाग एक) - पंचवर्षीय कर्मकाण्ड

पंचवर्षीय कर्मकाण्ड का प्रथम चरण संपन्न हुआ. ढेर सारे आडम्बर हुए:
- अभिनेताओं ने जनता से अपील की – वोट के दिन घर से बाहर निकलो...
- स्वयंसेवी संस्थाओं ने नुक्क्ड़ नाटक किए.
- अखबारों ने इस्तहार निकाले बड़े बड़े.
- टी.वी. पर एक विज्ञापन खूब चला – वोट करो. 21 वी सदी के मुरीद एक पुराने प्रधानमंत्री ने हमें एक नई शब्दावली दी थी – ‘करा करी’ वाली. उसी की तर्ज़ पर नई पीढ़ी को रिझाने के लिए वोट “करो” ..खूब गूँजा.
- ट्रांसफरेबल नौकरी वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों ने जोश में आ कर नई जगहों पर दुबारा वोटर कार्ड बनवा लिए... क्या फर्क पड़ता है यहाँ के लिए भी एक कार्ड बन जाए? आखिर बंगलादेशी भी लिए घूम रहे हैं! ...
और यह सब अभी चल ही रहा है. अभी तो कितने चरण बाकी हैं! एक राष्ट्रीय टाइम पास हो गया है.. वोट करो..जय हो...भय हो... जय हे.....पैसे बाँटे जा रहे हैं ... बड़ी पुख्ता व्यवस्था है.. ट्रेनिंग दर ट्रेनिंग चल रही है. सरकारी ऑफिसों में अधिकारियों को नया बहाना मिल गया है. इलेक्सन है साहब को फुर्सत कहाँ..आप की फाइल देखने को? गोया पहले निहाल कर देते थे फाइल देख देख कर!
पूरा देश व्यस्त है. सौदे हो रहे हैं किसे कहाँ वोट करना है? किसे घर में ही रहना है.....
और पहले चरण में इतनी नौटंकी के बाद भी यू.पी., बिहार में वही ढाक के तीन पात. आधे मतदाता घर से बाहर ही नहीं निकले.नक्सलियों ने वास्तविक सत्ता किसके हाथ में है इसका क्रांतिकारी शंख़नाद भी अपने तरीके से कइ जगहों पर किया.

इस बड़े लबड़धोंधों के दौरान क्या आप कभी सोचते भी हैं कि क्या होगा अगर सारे मतदाता सचमुच निकल पड़े वोट देने? क्या तंत्र इसके लिए तैयार है? वोटिंग टाइम और बूथों की संख्या क्या पर्याप्त होगी उसके लिए?
यह सब आप को एक षड़यंत्र नहीं लगता? बहुत ही सुनियोजित वेल स्ट्रक्च्रर्ड ! आखिर 58 सालों से चल रहा है. क्यों वोट देना जनता की इच्छा पर छोड़ दिया गया है? क्यों एक जगह पर एक ही दिन वोट पड़ता है?
क्यों यह प्रचारित नहीं किया जाता कि एक ऑप्सन यह भी उपलब्ध है कि हमें कोई उम्मीदवार पसन्द नहीं? हम सब को लतियाना चाहते हैं क्यों कि ये सभी उठाइगीर इस देश को चलाने के लिए “अयोग्य” हैं...डिस्क्वालिफॉइड!
क्यों यह प्रक्रिया तब तक नहीं चल सकती जब तक कम से कम 95% , 96%..... जैसी पोलिंग नहीं हो जाती?
....नहीं नहीं साहब मुझे मत बताइए कि बड़ी कयामत हो जाएगी. संसाधन कहाँ हैं इसके लिए? लॉ ऐण्ड ऑर्डर का क्या होगा?....आखिर पूरे संसार में ऐसे ही होता है! हम में कौन सुर्खाब के पर लगे हैं !!.....हमारे पास ठीक से कराने के लिए लोग कहाँ हैं?.
इस देश ने कर दिखाया है. बानगी देखिए..शायद आप भूल गए हैं:
- एक निर्वाचन आयुक्त सनक जाता है नौटंकी देखते देखते... और पूरा तंत्र एक ही चुनाव में बदल जाता है. जनता जान जाती है कि अनुशासन के साथ चुनाव कैसे होते हैं. प्रक्रिया जारी रहती है. इलेक्सन दर इलेक्सन.
- एक प्रधानमंत्री और उसका वित्त मंत्री निर्णय लेते हैं... शोर शराबा उठता है देश बेंच रहे हैं. दूसरी ग़ुलामी .... वगैरह... अर्थव्यवस्था खुल जाती है. परिणाम आप के सामने हैं.
- एक प्रधानमंत्री निर्णय लेता है. पूरे भारत को सड़कों के जाल से जोड़ने का. बहुत बवाल. कितनी ज़मीन जाएगी! सीमेंट और बाकी सामान कितने महंगे हो जाएँगें/गए.... सब के बावज़ूद काम हुआ और चल रहा है और सीमेंट कितना ही महंगा हो गया हो गांवों से ले कर शहरों तक घर बनने कम नहीं हुए.....
- एक कं. निर्णय लेती है..सब के हाथ मोबाइल होगा. बहुत फायदा होगा.... और कुछ ही सालों में अंतर...मेरा मोबाइल घनघना रहा है..बीबी जी को बोलना आज काम पर देर से आऊँगी. अर्जेण्ट हो तो मेरे नं. पर मिस कॉल कर देना !!
----- बड़ी लम्बी लिस्ट है गिनाने बैठूं तो. जब अलग अलग क्षेत्रों में क्रांतिकारी कायापलट हो सकती है तो इस क्षेत्र में क्यों नहीं ? विकल्प गिनाता हूँ:
- इनकम टैक्स रिटर्न की तर्ज़ पर यह अनिवार्य कर दिया जाय कि हर वोटर कार्ड धारक को वोट देना ही होगा. वह इंटर्नेट पर करे, ए टी एम से करे या बूथ पर जाए. पोलिंग दो दिन हो और दो दिन के एक्स्टेंडेड पिरियड में पोलियो ड्रॉप की तर्ज पर घर घर जा कर वोट दिलवाए जाँय. इंटर्नेट या ए टी एम या खाताधारक बैंकों के आन लाइन साइट या इलेक्सन कमीशन के साइट पर भी चारो दिन वोटिंग के ऑप्सन उपलब्ध रहें.
- ई मेल सेवा देने वाली कम्पनियॉ आज कल असीमित मेल बॉक्स साइज दे रही हैं. ज़रा सोचिए करोड़ों खाता धारकों को असीमीत मेल बॉक्स साइज अगर एक प्राइवेट कं दे सकती है तो करोड़ों मतदाताओं का ऑन लाइन बायोमेट्रिक डाटा बेस क्यों नहीं बनाया जा सकता?
- क्यों नहीं सेटेलाइट लिंक के ज़रिए गांव गांव पोर्टेबल वोटिंग मशीनें नहीं घुमाई जा सकतीं? बायोमेट्रिक प्रिंट तो हर मत दाता के लिए यूनीक होगा. गांवों के भूलेख यदि ऑन लाइन उपलब्ध हो सकते हैं तो हर टोले पर पटवारी और लेखपाल जा कर वोट क्यों नहीं डलवा सकते.
- हर मतदाता को ए टी एम कॉर्ड के पासवर्ड की तर्ज पर एक टेम्पोरेरी पासवर्ड दिया जा सकता है. अपने मोबाइल से इस का प्रयोग कर वह वोट कर सकता है.
अगर आप सोचें तो आप भी कुछ नायाब तरीका सुझा सकते हैं. यदि कुछ मस्तिष्क में आता है तो उसे पोस्ट करें. कैंची नस्ल के लोग जो हर बात को काटते ही रहते हैं और दोष दर्शन जिनका मौलिक स्वभाव है, मैं उनकी बात नहीं कर रहा.
समस्या यह है कि लोकतंत्र के नाम पर एक बहुत बड़ा षड़यंत्र चल रहा है और हम आप चुपचाप तमाशा कैसे देखते रह सकते हैं? आखिर इतनी महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया को जो पाँच वर्षों में एक बार ही होती है, इतना जटिल, दुरूह और व्यय साध्य क्यों बना दिया गया है? कहीं यह प्रभु वर्ग की हमेशा सत्ता में बने रहने की चाल तो नहीं !...जरा मनन करें..................................जारी