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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी - 4 : गउरा सिव बियाह

पिछली कड़ियाँ: 
(1) साहेब राउर भेदवा 
(2) कवने ठगवा 
(3) लोकसुर में सूर - सिव भोला हउवें दानी बड़ लहरी 
 
कहते हैं कि महाशिवरात्रि के दिन शिव का विवाह गौरी से हुआ था। दिगम्बर शिव से लिपट गौरी ने उन्हें दिव्याम्बर कर दिया। वही गौरी जिनके बिना शिव उनके शव को कन्धे पर लिये ब्रह्मांड में घूमने लगे और सृष्टि से शव लुप्त हो चले।

तो आइये देखते हैं कि लोक इस विवाह के बारे में क्या कहता है? लोक जीवन में गउरा महादेव एक आदर्श कम, सामान्य दम्पति के रूप में अधिक पहचाने जाने जाते हैं। उनमें आपसी झगड़े होते हैं, मेल मिलाप होते हैं; वे झगड़ा लगाते भी हैं और भेष बदल सुलझाते भी हैं। जाने कितनी लोक कथाओं में यह दम्पति गुम्फित है।
पिछली पोस्ट की इन पंक्तियों को देखिये:

खोआ मलाई के हाल न जानें, भँगिया पीसि के पीयेलें
भाँग पिसत में गउरा रोवें, गउरा रानी धइले बाड़ी नइहर के डगरीऽ।
सिव भोला हउवें दानीऽ, बड़ऽ लहरीऽ।

भाँग पीसते पीसते हाथ दुखते हैं, गउरा रोती हैं और फिर रूठ कर नैहर चली जाती हैं! आम जनजीवन से कितने जुड़े हैं ये दोनो! भारत ने महादेव दम्पति को घरेलू सा बना रखा है। 

अम्मा से जब गीत रिकॉर्ड करवा रहा था तो अचानक अम्मा ने गउरा बियाह गाने को कहा। मुझे क्या, जो मिल जाय वही अमृत।  

गीत बहुत सीधा सा है। शिव बारात का वर्णन है। शिव के गले के सर्प की फुफकार और उनके रूप को देख गौरी की माँ और उनकी सखियाँ डर जाती हैं, सब फेंक फाक भाग खड़ी हो उठती हैं। मैना महतारी कहती हैं ऐसे वर से गौरी का विवाह नहीं करना। मेरी गौरी कुमारी ही रहेगी।

तब कलश की ओट से गौरी उनसे निवेदन करती हैं कि एक क्षण के लिये ही सही भेष बदल दीजिये ताकि नैहर के लोक पतिया लें। इतना सुनते ही महादेव गंगा स्नान कर भभूत उतार देते हैं। चन्दन लेप करते हैं और पुकारते हैं – मेरी सास जी कहाँ हैं? मेरी सरहज कहाँ है? अब मेरा रूप देखें। उनका यह रूप देख मैना देवी गौरी शंकर के विवाह को राजी हो जाती हैं। अर्थ सहित गीत (अम्मा की मानें तो कीर्तन) इस प्रकार है: 


लेहु नाहीं बरिया रे हाथे के सोपरिया होऽ, देखि आव सिवा बरियात।
कइ सए हाथी आवे कइ सए घोड़ा आवे, कइ सए आवे बरियात?  
(एक स्त्री माली से कहती है कि हाथ में सुपारी ले उसे देने के बहाने शिव की बारात देख आओ न! वह उससे पूछती है कि कितने सौ हाथी आये हैं, कितने सौ घोड़े और कितने सौ बाराती? वह आँखो देखा हाल सुनाता है।)    
दस सए हाथी आवें, दस सए घोड़ा आवें, बीस सए आवे बरियात।  
बसहा बरध सिवाजी घुरुमत आवेलें, आठो अंगे भभूती लगाइ।
(दस सौ यानि एक हजार हाथी आये हैं और उतने ही घोड़े आये हैं। दो हजार बारात आई है। पर शिव तो बसहा बैल पर सवार हो घूमते हुये आ रहे हैं और उन्हों ने अष्टांग पर श्मशान की राख पोत रखी है।)     
दस सखी आगे भइली, दस सखी पाछे भइली, दस सखि गोहने लगाइ।  
परिछ्न चलेली सासू मएना देबी, सरफ छोड़ेलें फुफुकार।  
(भोजपुरी क्षेत्र में वर को स्त्रियों द्वारा परीक्षित करने की परम्परा है जिसमें मसाला पीसने वाला लोढ़ा थाली में ले कर अक्षत, हल्दी आदि में उसे बोर कर वर के चेहरे के चारो ओर घुमाया जाता है। शिव की भावी सास मैनादेवी दस दस सहेलियों के समूह के साथ उन्हें परिछ्ने गईं तो शिव के गले के सर्प की फुफकार से डर गईं।)    
कतो बिगली लोढ़ा, कतो बिगली थाली हो, पिछऊड़ भागेलि पराइ।  
अइसन बउरहवा सिवा से गउरा नाहीं बिअहब, मोर गउरा रहीहें कुँवारि।
(एक ओर लोढ़ा तो दूसरी ओर थाली फेंक पीछे हटते हुये भाग चलीं। ऐसे बौराये शिव से मैं अपनी गौरी का विवाह नहीं करूँगी। मेरी गौरी कुमारी रहेगी।)   
कलसा के ओटे भइले बोलेलि गउरा देई, सिवाजी से अरज हमार।  
छ्ने एक ए सिवाजी भेस बदलतीं हे, नइहर लोग पतियाइ।
(तब कलश की ओट ले गौरी ने शिव से प्रार्थना की। एक क्षण के लिये ही सही, अपना वेश बदल लीजिये ताकि मायके के लोग विश्वास कर लें।)  
एतना बचन जब सुनेलें महादेव, चलि भइले गंगा असनान।  
आठो अंगे भभूती उतरले महादेव, आठो अंगे चन्दन लगाइ।  
(उनकी प्रार्थना सुन महादेव ने गंगा स्नान कर अष्टांग से विभूतिभस्म उतार दिया और चन्दन लेपन किया।)
कहाँ गइली सासू, कहाँ गइली सरहज, अब रूप देखन हमार।  
अइसन सुन्दर सिवा से गउरी हम बिअहबि, मोर गउरा होइहें बियाह।
(उन्हों ने पुकार लगाई – मेरी सास और सलहज कहाँ हैं? अब आकर मेरा रूप देखें। उनका सुन्दर रूप देख मैनादेवी ने कहा कि ऐसे शिव से मैं अपनी गौरी का विवाह करूँगी। वह विवाहिता होगी।)   

लीजिये सुनिये सीधी अम्मा की सादी गायकी:
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अगले अंक में: 
घुमंतू जोगी - जइसे धधकेले हो गोपीचन्द, लोहरा घरे लोहसाई 

रविवार, 3 मई 2009

उल्टी बानी (अंतिम भाग) – चुनाव, एक पर्व एक उत्सव

(अ)
बात उस समय की है जब ए टी एम नए नए लगने प्रारम्भ हुए थे. एक समाचारपत्र में किसी आम व्यक्ति की प्रतिक्रिया थी कि ए टी एम की सबसे बड़ी अच्छाई यह है कि यह मुँहदेखी नहीं करता. बैंक में पैसे निकालने जाओ तो क्लर्क पहचान और रसूख वालों के साथ ढंग से बात भी करता है और पैसे भी ज़ल्दी दे देता है. जब कि मुझे घण्टों लगाता है और उपर से सीधे मुँह बात भी नहीं करता. पिछ्ले पोस्ट में मैंने टेक्नॉलॉजी के “समता और सुलभता” वाले पक्ष की जो बात की थी उसका यह एक उदाहरण है. अपने देश में मेधा की कमी नहीं है. आवश्यकता है दृढ़ निश्चय और समर्पण की. सुझाए गए तमाम तकनीकी युक्तियों को लागू कर समूची निर्वाचन प्रक्रिया को आमूल चूल बदला जा सकता है.
तकनीक के प्रयोग का एक सबल पक्ष यह भी है कि दो तिहाई से अधिक मतदाता युवा वर्ग से हैं और स्वभावत: यह वर्ग तकनीकी परिवर्तनों की ओर आकृष्ट हो कर मतदान का प्रतिशत बढ़ाएगा. मेरे पास कोई ठोस तर्क तो नहीं है लेकिन न जाने क्यों लगता है कि यदि मतदान का प्रतिशत 95 या उससे अधिक सुनिश्चित कर दिया जाय तो हमें अल्पमत की सरकारों से छुटकारा मिल जाएगा. अस्थाई, अनैतिक, तिकड़मी और अवसरवादी गठबन्धनों से, जो कि हमारी शासन व्यवस्था की एक दु:खद वास्तविकता बन चुके हैं, भी छुटकारा मिल जाएगा.
अब समय आ गया है कि प्रत्याशियों के मामले में सबको समान अवसर देने की सर्वविनाशी और मूर्खतापूर्ण मानसिकता से मुक्त हो कर हम सीमित पार्टी संख्या वाले लोकतंत्र के मॉडल को अपना लें. निर्दल प्रत्याशियों पर प्रतिबन्ध लगे और भारत की विविधता को देखते हुए कम से कम चार पार्टियों को मान्यता दी जाए. यह पार्टियाँ दक्षिणपंथ, वामपंथ और मध्यमार्ग की राहों वाली हो सकती हैं और चौथा विकल्प किसी भी अन्य मॉडल के लिए रखा जा सकता है. पिछ्ले चुनावों में पाए गए मत प्रतिशत के आधार पर इनकी पहचान हो सकती है. इसके साथ ही क्षेत्रीय पार्टियों को कोई एक विकल्प चुन कर विलय का विकल्प दे दिया जाय. इन चार पार्टियों के संविधान दुबारा लिखे जाँय, नाम और चुनाव चिह्न भी आंतरिक प्रक्रिया द्वारा दुबारा रखे जाँय.
चार पार्टियों की सीमा से यह लाभ होगा कि टेलीफोन, मोबाइल, इंटर्नेट, ए टी एम, पोस्ट ऑफिस, बैंकों आदि सब स्थानों पर तकनीकी प्रयोगों द्वारा मत देने की स्थाई और एक समान तंत्र के विकास और उसे लागू करने में बड़ी सहूलियत हो जाएगी. मतदान की प्रक्रिया भी लचीली, अल्पव्ययसाध्य और साथ ही तीन चार दिनों तक लगातार जारी रह सकेगी जिससे मतदान का प्रतिशत 95 को भी पार कर सकेगा. राज्यसत्ता द्वारा चुनावों की सम्पूर्ण फाइनेंसिंग आसान और अल्पव्यय साध्य हो सकेगी. धन और बाहुबल का जो ज़ोर आज दिख रहा है वह समाप्त हो जाएगा और सही मायने में लोक प्रतिनिधि चुनने में योग्यता और कर्मठता ही कसौटी होंगें न कि यह क्षमता कि प्रत्याशी कितना धन चुनावों में इनवेस्ट कर सकता है.
लोकतंत्र की कसौटी निर्बल और सबल दोनों को योग्यता के आधार पर समान अवसर और प्लेट्फॉर्म उपलब्ध करा सकने में सक्षम होने में है न कि सींकिया पहलवानों को रिंग में केवल समान अवसर के पाखण्ड प्रदर्शन के लिए मुहम्म्द अली सरीखे धन पशुओं के सामने उतारने में. ऐसे मामले में परिणाम की प्रतीक्षा तो बस एक खानापूरी ही होती है. सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जनता ऐसे आडम्बर पूर्ण आयोजनों से उदासीन हो जाती है. बहुसंख्यक (चुनावी गणित के अर्थों में न लें) जनता या तो मसखरी का आनन्द लेती है या अपने दैनिक समस्याओं से जूझती इसका मौन बहिष्कार कर देती है. मसखरों के लिए दैनिक मोनोटोनी से मुक्त होने का यह एक बहाना बन जाता है. यही कारण हैं कि हमारे प्रभु वर्ग का हमेशा सत्ता में बने रहने का और धन दोहन का षड़यंत्र स्वतंत्रता के समय से ही फल फूल और सफलीभूत हो रहा है.
(आ)
एक ऐसा आयोजन जिससे हमारा भाग्य सीधा जुड़ा हुआ है, जो 5 वर्षों में केवल एक बार ही होता है, जिससे हमारे दैनिक और आजीवन प्रकल्प सीधे प्रभावित होते हैं और जो हमारी, हमारी आगामी पीढ़ियों और हमारे पूरे देश की नियति को निर्धारित करता हो; उससे हम इतने उदासीन क्यों हैं?
होली, दिवाली, ईद, बैसाखी को मनाने के लिए तो किसी आह्वान की आवश्यकता नहीं पड़ती! फिर इसमें सम्मिलित होने और सक्रिय योगदान देने के लिए प्रचार, आह्वान, नुक्क्ड़ नाटक आदि की आवश्यकता क्यों पड़ती है? हमारी नींद का आलम तो यह है कि ये सब भी हमें जगा नहीं पा रहे हैं.
हम उल्लसित क्यों नहीं हैं? बात लू लगने की नहीं है. बात यह है कि हमारे उर में हिलोरों की इतनी कमी है कि सूरज की गर्मी जैसी दैनिक घटना भी हमें इस महापर्व को मनाने से रोक दे रही है. क्यों?
यह आयोजन तो पर्व और उत्सव की तरह मनाया जाना चाहिए, बल्कि यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा पर्व होना चाहिए. हम इसका शांत और क्लांत भाव से बहिष्कार क्यों कर रहे हैं? हम इतने निष्क्रिय हो कर क्यों इसे चन्द उठाईगीरों के आमोद प्रमोद और उनकी समृद्धि का माध्यम बनाए दे रहे हैं? हम क्यों नहीं एक साथ उठ खड़े हो रहे हैं, एक आमूल चूल परिवर्तन के लिए? आखिर हमें सक्रिय होने से नुकसान ही क्या होने वाला है? सामूहिक प्रमाद की यह महामुद्रा जो हम धारण किए हुए हैं, उसकी सिद्धि क्या है? यही न कि दिन ब दिन हम रसातल में धँसते चले जा रहे हैं !
इन सबका कारण यह है कि हम एक बनी बनाई व्यवस्था को ही सब कुछ मान बैठे हैं. हम यह मान बैठे हैं कि इसमें और कुछ परिवर्तन नहीं हो सकता. हम यह मान बैठे हैं कि धन और बाहुबल का यह अनिष्टकारी मायाजाल ही वास्तविकता है. याद करिए कि सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष ने क्या कर दिखाया. उसे लागू करने के मॉडल पर बहस हो सकती है लेकिन इससे तो इनकार नहीं हो सकता कि बहुत बड़ी शक्ति हमें इस एक अधिकार से मिली है. इसका बहुत ही सार्थक उपयोग भी हो रहा है.
ब्लॉग पर ही सही, परिवर्तन के लिए एक आन्दोलन खड़ा हो सकता है हमारी निर्वाचन प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन के लिए. हमें एक पर्व और उत्सव के नैसर्गिक अधिकार से बंचित कर दिया गया है. क्या यही एक कारण पर्याप्त नहीं है कि हम समूचे तंत्र को झँकझोर दें ! ज़रा सोचिए ! कलम उठाइए और लिखिए. समय की कमी कुछ नहीं है, बस घड़ी के दो हाथों का सम्मोहन है. उससे छूटिए. समय बहुतायत में मिलेगा. लिखिए कि उत्सव आयोजन का निमंत्रण पत्र आने को है.. ....पाँच वर्षों के बाद ! या उससे पहले ही?