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रविवार, 16 मई 2010

राग यमन को सुनते हुए

यह बंदिश राग यमन को सुनते हुए रची गई:
जागो जागो देश महादेव

बन्द आँख कैसा ये ध्यान
जपते जो उद्दाम काम
कामारि तुम भूले उदात्त भाव
खोलो त्रिनेत्र नंग भस्म, अनंग
जागो जागो देश महादेव।

जटाजूट सँभारो अधोमुख गंगा
पतित न हो पावनी ज्ञानगंगा
सँभारो हे देश तुम शंकर
शमन करो दुर्वह वेग
जागो जागो देश महादेव ।


शंकर भारत के प्रतीक पुरुष हैं। बचपन से ही उनकी परिकल्पना मुझे मुग्ध करती रही है। . .. 

सरस्वती के किनारे का पशुपति, वैदिक बलियूप विकसित लिंग, देवासुर रुद्र और गाँव गाँव हिमालय सुता गौरा पार्वती के साथ भटकता लोककथाओं का महादेव - खेतों में बैल की पीठ पर श्रमसीकर बहाता, जंगलों के साँप बिच्छू धारण करता सबका शमन करता भोगी विलासी महात्यागी महायोगी महादेव ।
काम को अपने उपर सवारी नहीं करने देने वाला शंकर, कामदेव को भस्म करने वाला शंकर लेकिन लोकहित शक्ति के साथ हजारो वर्षों तक संभोगरत रहने वाला महादेव क्या कुछ संकेत नहीं देता!
यौन उच्छृंखलता और मध्ययुगीन/विक्टोरियन नैतिकता के पाखंड के दो अतिवादी किनारों के बीच ज्ञान गंगा का प्रबल प्रवाह है। उसके वेग, उसकी उद्दामता को थाम नई दिशा देने को यह देश उठ क्यों नहीं पा रहा?
किसकी प्रतीक्षा है