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रविवार, 2 अप्रैल 2017

काशी स्फुट



महादेव के त्रिशूल पर बसी प्रकाशनगरी काशी कसौटी पर कसने में किसी को नहीं छोड़ती, बड़ी निर्मम है। मुझे तो लगता है कि काशी में रहना अर्थात दैहिक, दैविक, भौतिक तापों को दिन प्रतिदिन सहने के साथ आनन्दमग्न रहना। त्रिशूल तीन ताप हैं और महादेव आनन्द। इसका एक पुराना नाम आनन्दवन ऐसे ही नहीं है।  
काशी की एकाध गालियाँ कुछ वर्षों से प्रसिद्ध की जाती रही हैं किंतु वे काशी की पहचान नहीं रहीं। जो घुल कर सामान्य हो जाये उससे क्या पहचान समझना? अपरिचितों को चौंकाने के लिये भले साहित्यकार मिर्च मसाला लगा परोस दें, गालियाँ काशी की पहचान नहीं, सकी जान का एक न्यून भाग बस हैं।
काशी की पहचान अद्भुत लक्षणा और व्यञ्जना युक्त 'काशिका' से है। काशिका बानी न होती तो काशी अपने परिवेश से, बाकी संसार से अलग नहीं होती, न कबीर होते और न तुलसी। काशिका निवासियों और प्रवासियों को दैनन्दिन माँजती है, कुछ घिस जाते हैं, कुछ रोचन हो प्रकाशित हो उठते हैं। मुझे नहीं पता कि काशी की इस विशेषता पर किसी ने लिखा है या नहीं किंतु काशिका ही काशी को अनूठी बनाती है।
‘मर्दनं वर्द्धनं’ सूत्र के तीनों शब्दशक्तियों वाले प्रयोग यहीं दिखते हैं, बानी से ही नहीं, हर तरह से रगड़ने में यह नगरी प्रवीण है। वर्तमान काल में देखें तो यहाँ 'बियच्चू' में आलोचना प्रवीण को ‘नमवरवा’ कहते हुये उसी साँस में विद्यानिवास मिसिर को ‘विद्याबिनास’ की संज्ञा से विभूषित करते गालीबाज सहज ही मिल जायेंगे। उनके लिये वे पान की पीक से अधिक महत्त्व नहीं रखते, भले अपने में उतना भी पानी न हो!
गन्दे पात्र को स्वच्छ कर चमकाने वाले उकछन का दायित्त्व काशी निर्वहन करती रही है। पहली बार पहुँचने पर  काशी का वही उकछनी रूप सामने दिखता जुगुप्सा जगाता है किंतु कुछ बरस घुल जाने पर समझ में आता है कि काशी का विरूप ही तो रूप गढ़ता रहा है।
अध्यात्म में कुछ नया करने की इच्छा रखने वाले काशी के इसी मार्जनी रूप से आकर्षित हो यहाँ धूनी जमाये रहे। जिनकी नवोन्मेष की अपनी कसौटी निर्मम रही उन्हों ने स्वयं को इसे सौंप दिया। इसका मध्यकाल में तुलसीदास से अधिक अच्छा उदाहरण नहीं मिल सकता। बहुत ही प्रौढ़ आयु में ‘रामचरितमानस’ रचे जाने के पूर्व तुलसीदास ने जो झेला वह सब विनयपत्रिका और कवितावली में यत्र तत्र बिखरा हुआ है। ये दो कृतियाँ भर नहीं, काशी की चोट से रोते बिलबिलाते तुलसीदास के नयनों से निकसी गङ्गा के सञ्चय भी हैं।
‘धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ’ में एक बैरागी का उपेक्षा भाव तो है ही, उसके पीछे छिपी वह मर्मांतक पीड़ा भी है जो स्वयं के लिये ‘कुलटा ब्राह्मणी की कोख से उपजी राजपूत संतान’ की 'काशिका वृत्ति' सुनने से उपजी थी। ‘वाल्मीकि का अवतार’ कहे जाने से पूर्व तुलसी ने जाने कितनी बार ‘बड़ा बलमीक बनत हौ सरवा, एकर जनमपतरी देखे के परी’ भी झेला। वाणी प्रहार ही नहीं, तुलसी ने प्राण हर लेने के लिये आक्रमण से लगाई मारण तांत्रिक प्रयोग तो झेले ही, यहाँ के ठगबुद्धि पण्डितों के शास्त्रार्थ भी झेले ठगों का शासन दिल्ली में आज है किंतु ‘राजाविहीन’ काशी तो अपने ठगों के लिये युगों युगों से प्रसिद्ध रही जो मात्र आँखों आँखों ही 'काजल चुराने' से ले कर 'बलात्कार' तक के युक्तिमहारथी थे।   
सबको झेल, दारुण परीक्षा की आग से जब कुन्दन रूप हो तुलसी निकले तो इसी काशी ने उन्हें दैवीय रूप देने में कोई झिझक नहीं बरती। कथायें गढ़ने में निष्णात समाज ने 'मानस' की श्रेष्ठता स्थापित करने को विश्वनाथमन्दिर के गर्भगृह का कथानक तो रचा ही, शैव काशी में वैष्णवी 'रामबोला' के चलाये जाने कितने आचार अपना लिये। पहले का ‘वर्णसंकर’ ‘ब्राह्मणकुलशिरोमणि’ हो गया!
तुलसी के पश्चात हुये थे प्रकाण्ड पण्डित जगन्नाथ। किम्वदंति है कि शाहजहाँ के दरबार में उन्हों ने धर्मध्वजा को ऊँचा किया। वही प्रतिष्ठित विद्वान जगन्नाथ जब मुस्लिम स्त्री लवंगी को ब्याह कर काशी आये तो बहिष्कृत हो गये। ढेर सारे प्रयासों, शास्त्रोक्त (?) प्रायश्चित्त के पश्चात भी काशी की रगड़ वही रही। अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हों ने वर्ष के 52 सोमवार या शुक्रवार दिनों जितना लम्बा कोई व्रत भी किया होगा किंतु काशी नहीं पसिजी तो नहीं पसिजी! अंतत: 52 छन्दों की ‘गङ्गा लहरी’ रचने के पश्चात पण्डित ने पत्नी के साथ गङ्गा मया में जलसमाधि ले ली।
काशी की पुरबिया चेतना ने वैसे ही प्रायश्चित किया जैसे तुलसी के समय किया था – दैवीयता के कथा सृजन द्वारा। अंतर यह रहा कि तुलसी बाबा तो बच गये थे किंतु जगन्नाथ बाबा को अपने प्राण निछावर करने पड़े। 
अब कथा ऐसे चलती है कि दोनों गङ्गा किनारे बैठ स्तोत्र गाने लगे। हर स्तोत्र छन्द पर मइया एक एक सींढ़ी बढ़ती गईं और 52 वीं पर दोनों को अपनी गोद में ले लिया। मइया ने कहा कि तुम्हारी प्रतिष्ठा तो अब इस चमत्कार से वापस हो गई है, तुम समाज में वापस ले भी लिये जाओगे। कहो तो तुम दोनों को वापस तट पर जीवित फेंक दूँ? पण्डित ने कहा कि अब तुम्हारी गोद छोड़ संसार में नहीं जाना, हमें अपने भीतर स्थान दो और माँ ने पुत्र की प्रार्थना स्वीकार कर ली!
आप काशी वाले से पूछेंगे कि ये बताओ, वहाँ 52 छन्दों को यथावत लिख कर सुरक्षित करने वाला कौन बैठा था? और घाट पर सीढ़ियाँ तो मराठों ने बनवाईं!, तो उत्तर मिलेगा बुजरो के, का जनब? बड़े आये बिद्वान!’   
काशी में आये हैं, साधारण मनुष्य हैं तो काशी वालों से और इस नगरी के परिवेश से भी सतर्क और सावधान रहिये।  अधिक वर्ष नहीं बीते जब गर्वी दयानन्द सरस्वती को शास्त्रार्थ में हराने के लिये कोई और उपाय न देख यहाँ के पण्डितों ने औपनिषदीय संस्कृत में आशु प्रमाण रच दिया था!   
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देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥ 1 ॥
भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।
नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ 2 ॥
हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ 3 ॥
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।
मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ 4 ॥
पतितो द्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डित गिरिवरमण्डित भङ्गे ।
भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये ॥ 5 ॥
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।
पारावारविहारिणिगङ्गे विमुखयुवति कृततरलापाङ्गे ॥ 6 ॥
तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः ।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ 7 ॥
पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।
इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ 8 ॥
रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ 9 ॥
अलकान्दे परमान्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ 10 ॥
वरमिह नीरे कमठॊ मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।
अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ 11 ॥
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ 12 ॥
येषां हृदये गङ्गा भक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकन्ता पञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥ 13 ॥
गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् ।
शङ्करसेवक शङ्कर रचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ 14 ॥
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रविवार, 16 मई 2010

राग यमन को सुनते हुए

यह बंदिश राग यमन को सुनते हुए रची गई:
जागो जागो देश महादेव

बन्द आँख कैसा ये ध्यान
जपते जो उद्दाम काम
कामारि तुम भूले उदात्त भाव
खोलो त्रिनेत्र नंग भस्म, अनंग
जागो जागो देश महादेव।

जटाजूट सँभारो अधोमुख गंगा
पतित न हो पावनी ज्ञानगंगा
सँभारो हे देश तुम शंकर
शमन करो दुर्वह वेग
जागो जागो देश महादेव ।


शंकर भारत के प्रतीक पुरुष हैं। बचपन से ही उनकी परिकल्पना मुझे मुग्ध करती रही है। . .. 

सरस्वती के किनारे का पशुपति, वैदिक बलियूप विकसित लिंग, देवासुर रुद्र और गाँव गाँव हिमालय सुता गौरा पार्वती के साथ भटकता लोककथाओं का महादेव - खेतों में बैल की पीठ पर श्रमसीकर बहाता, जंगलों के साँप बिच्छू धारण करता सबका शमन करता भोगी विलासी महात्यागी महायोगी महादेव ।
काम को अपने उपर सवारी नहीं करने देने वाला शंकर, कामदेव को भस्म करने वाला शंकर लेकिन लोकहित शक्ति के साथ हजारो वर्षों तक संभोगरत रहने वाला महादेव क्या कुछ संकेत नहीं देता!
यौन उच्छृंखलता और मध्ययुगीन/विक्टोरियन नैतिकता के पाखंड के दो अतिवादी किनारों के बीच ज्ञान गंगा का प्रबल प्रवाह है। उसके वेग, उसकी उद्दामता को थाम नई दिशा देने को यह देश उठ क्यों नहीं पा रहा?
किसकी प्रतीक्षा है

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

मदार :वनस्पति,पौधा,लता,वृक्ष -3


पौधा है : मदार , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Calotropis gigantea,
अन्य नाम - अर्क(संस्कृत), आक, अकौआ
मदार आदमी की ऊँचाई से भी अधिक बढ़ने वाला झाड़ी प्रकार का पौधा है। इसकी पत्तियाँ स्निग्ध, मांसल सी और कोमल होती हैं। तोड़ने पर दूध सा स्राव निकलता है जिसे लोग विषैला बताते हैं।

मुख्यत: यह दो प्रकार का होता है। एक प्रकार में पुष्प एकदम श्वेत होते हैं। पत्तियाँ कुछ छोटी तो पौधा बृक्ष सा आकार लेता हुआ। दूसरे प्रकार में पत्तियाँ अपेक्षाकृत बड़ी, पौधा छोटा और पुष्प बैगनी रंगत लिए होते हैं।

इसके संस्कृत नाम 'अर्क' का एक अर्थ सूर्य भी होता है। प्रात: बेला में सूर्य की किरणों से नहाए इसके श्वेत पुष्पों को देखने से इस संज्ञा की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। अद्भुत कांति !

यह पौधा तमाम औषधीय गुण रखता है और नानियों, दादियों का प्रिय रहा है। इसके फल जब पक कर बीज प्रसारण के लिए चिटकते हैं तो उनसे रूई निकलती है। इस रूई से बने तकिये को लगा कर सोने से 'अधकपारी' शिरोपीड़ा में लाभ होता है। इस प्रयोग को सफल होते मैंने स्वयं देखा है।

बचपन में हम लोग इसके दूध को प्रतिदिन्द्वी की आँखों मे डाल उन्हें फोड़ देने की धमकियाँ दिया करते थे। नाना नानी ने हमेशा इस पौधे के निकट जाने से मना किया - सम्भवत: इसके दूध से आतंकित रहने के कारण। वाकई इतना त्वरित प्रभाव होता है, इसकी परीक्षा नहीं कर सके। आँखों से चांस कौन ले?

महादेव की पूजा में इसके पुष्पों का प्रयोग होता है। किसी और देवी देवता की पूजा में इसे प्रयुक्त होता मैंने नहीं देखा। भाँग और धतूरा की तरह ही औघड़दानी शिव ने इस सर्वहारा पौधे पर भी अपनी कृपा रखी है। शिव से सम्बद्ध और पौधों की तरह ही टोटका वग़ैरह में भी इसका प्रयोग होता है।

सम्भवत: आप ने ध्यान न दिया हो - गाँवों में कोला कोलवाई, बँसवारी और सरेह में पाया जाने वाला यह पौधा अब कम दिखने लगा है। यहाँ गोमती नगर में एल डी ए इस पर कुछ अधिक ही मेहरबान है जिसके कारण इसके पौधे बाकायदे रोपित किए गए हैं। मैंने बड़े अनूठे चित्र मोबाइल से खींचे थे लेकिन दुर्भाग्य से कुछ चित्र गायब हो गए। इसी कारण उपर के दो चित्रों के लिए वीकीपीडिया की शरण लेनी पड़ी। वीकीपीडिया को आभार

नए घर में आया तो आसपास इसके दूसरे प्रकार की बहुतायत दिखी। अपनी पूरी देहाती गरिमा के साथ यह पौधा यहाँ बहुतायत में उपलब्ध है। यहाँ पादप और जंतु जगत की अन्योन्याश्रयिता का एक उदाहरण मैंने पाया है। एक बहुत ही रंग बिरंगी टिड्डे की जाति आहार के लिए पूरी तरह से इसकी कोमल पत्तियों पर निर्भर है। ये टिड्डे इन पत्तियों पर ही रहते हैं, उन्हें खाते हैं, वहीं सम्भोग करते हैं . .। किसी और पौधे पर मैंने उन्हें नहीं पाया। नीचे कुछ चित्र दे रहा हूँ।
क्या आप इस टिड्डे की जाति बता सकते हैं?