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बुधवार, 14 सितंबर 2011

आमार तमारो हिन्दी

...what are your hobbies?”
“Hindi literature, music, computer software, reading and writing.”
“Hindi! … writing?... I guess in Hindi?”
“Yes sir”
वे हिन्दी पर उतर आये थे।
आप राष्ट्रभाषा के बारे में कुछ बतायेंगे? भारत में राष्ट्रभाषा की अवधारणा पर कुछ कहिये।“
“सर, भारत विविधताओं का देश है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से अरुणांचल तक फैले इस देश की अनेक राष्ट्रभाषायें हैं जैसे कश्मीरी, पंजाबी, मराठी, तेलुगू, कन्नड़, बंगला, हिन्दी आदि। इन भाषाओं के समान्तर वे भाषायें भी हैं जिनका आम जन प्रयोग करते हैं लेकिन जो आज पिछली पंक्ति में हैं...”
”एक मिनट। आप ने अनेक राष्ट्रभाषायें कहा? Right?”
यस सर।“
“राष्ट्रभाषा तो हिन्दी है न? इतनी भाषायें कैसे राष्ट्रभाषा हो सकती हैं? ...यह आम खास का क्या चक्कर है?” उनका चौंकने का अभिनय लाजवाब था।
“सर, आप जिस अर्थ में कह रहे हैं, वह राजभाषा से सम्बन्धित है। व्यावहारिक रूप में  देखें तो हिन्दी भारत की दूसरी राजभाषा है और अंग्रेजी पहली। राजभाषा माने जिस भाषा में सरकारी काम काज होता हो, राज काज चलता हो। जहाँ तक राष्ट्रभाषा की बात है, किसी भी देश की सारी भाषायें वैसे ही राष्ट्रभाषा होती हैं जैसे सारे जन नागरिक – बराबर। राष्ट्र और राज में अंतर है। सारी राष्ट्रभाषाओं के प्रकट रूपों के पीछे उनसे पुरानी भाषायें हैं जिनमें प्रचुर साहित्य उपलब्ध है और जिनका प्रयोग आम जन आज भी करते हैं। हिन्दी को देखें तो अवधी, ब्रज, मैथिली आदि। हिन्दी माने हिन्दी क्षेत्र।“
वे पर्याप्त रूप से चौंक चुके थे।
उन्हों ने अंतिम उद्गार व्यक्त किये,” I think you are confused. You should study, rather more to know more about the fields you call your hobbies... No further questions. Thank you.”

वृहत्तर हिन्दी क्षेत्र (विकिपीडिया से साभार)। 
उत्तराखंड, हिमाचल, मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि के कुछ क्षेत्र छूटे हुये हैं। 
विकि को सुधारने के लिये अंग्रेजी में लिखूँगा।     
कंफ्यूजन बहुत भयानक है। हिन्दी को लेकर जाने कितने दुराग्रह हिन्दी समाज पाले हुये है। स्वयं अपने क्षेत्र की भाषाओं की जिन्हें कि माता, मातामही, पितामही जैसा सम्मान मिलना चाहिये, जो अब भी ऊर्जावान, जीवंत और अधिक व्यवहार में हैं, जिन्हें लोक जिह्वा पर हमेशा जीवित रहना है, जिन्हें उसके लिये सरकारी सहयोग की बैसाखी की आवश्यकता नहीं है और जो वाकई बहता नीर हैं; कितनी उपेक्षा हो रही है!

कितने ऐसे हिन्दीभाषी हैं जो किसी अन्य भारतीय भाषा को जानते हैं या जानने का प्रयास किये हैं? दयानन्द सरस्वती और कन्हैयालाल मुंशी जैसे प्रखर हिन्दी समर्थकों की भूमि गुजरात में जब मैंने गुजराती सीखनी चाही तो ऐसा उत्तर सुनने को मिला,”तमारे सीखवाने शी जरूर छे? बध्धा गुजरात हिन्दी समझता है साहब।“ (गुजराती भाई सुधार लेंगे, आज भी गुजराती समझ सकता हूँ लेकिन लिख नहीं सकता। पढ़ सकता हूँ क्यों कि उसकी लिपि देवनागरी से मिलती जुलती है लेकिन बोल नहीं पाता)। मुंशी जी के गुजराती साहित्य का हिन्दी अनुवाद पढ़ पढ़ कर निहाल होता रहा हूँ और सोचता भी रहा हूँ कि मूल तो और सुन्दर होंगे। बारहवीं या इंजीनियरिंग के दौरान मराठी से अनुवादित ‘ययाति’ को पढ़ना  एक अद्भुत अनुभव रहा। शरत बाबू की बंगला कृतियों का क्या कहना

अभी कुछ महीनों पहले लघु उपन्यास ‘अग्निपरीक्षा’ को लिखते हुये शोध के चक्कर में अचानक ही मराठी ‘गीत रामायण’ से पाला पड़ा। गजानन दिगंबर माडगूळकर रचित और ‘ज्योति कलश छलके’ प्रसिद्धि वाले सुधीर फड़के द्वारा संगीतबद्ध और गायी गयी इस गीतमाला से इतना सम्मोहित हुआ कि सात आठ दिनों तक सुनता रहा। मेरे मोबाइल में इसके कुछ गीत हैं और गाहे बगाहे सुनता रहता हूँ।

जिस सांस्कृतिक एकता में हम भारतीय बँधे हुये हैं, वह और प्रगाढ़ और आनन्दमयी हो जाय यदि हर भारतवासी अपनी एक दूसरी भाषा को भी सीखे और समझे। हम हिन्दी भाषियों का दायित्त्व सबसे अधिक है क्यों कि हमारा क्षेत्र सबसे बड़ा है और संख्या भी। आज इस ‘राजभाषा दिवस’ पर एक और राष्ट्रभाषा सीखने का संकल्प लें तो कितना अच्छा हो! अपने क्षेत्र की लोकभाषाओं का ही अवगाहन प्रारम्भ करें तो भी अच्छा हो। विश्वास कीजिये उससे हिन्दी मजबूत होगी और कृत्रिमता के आरोप से, जो कि सही भी है, बचने लायक बनेगी।

चलते चलते...

अभी जब मैं महाराष्ट्र भ्रमण पर था तो मेरे छोटे भाई साहब ने एक दिन झुँझलाते हुये बड़े भाई साहब यानि कि बी एस एन एल (नहीं लगता जी ;)) की सेवाओं पर अपना क्रोध प्रकट किया - रोमिंग में लगता ही नहीं। अंत में उन्हों ने कहा कि वैसे मोबाइल मिलाने पर व्यस्तता या नेटवर्क सम्बन्धित सन्देशों को मराठी में सुनना बहुत अच्छा लगता है। मैने पूछा – क्यों? उनका उत्तर था – कभी कभी भोजपुरी जैसी लगती है। मैं सन्न रह गया और बस इतना कहा – ठाकरे परिवार तुम्हें पा जाय तो ....