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बुधवार, 13 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 4 : वनसरू और अभिशप्त कवयित्री का आशीर्वाद

भाग 1,  2 और 3 से आगे... 


शूकर समूह के पीछे हम रेत चढ़ते हैं। सामने वृक्षों का एक बड़ा मानव रोपित क्षेत्र है जिससे रह रह दुर्गन्ध आ रही है। निकलते हुये बेटी पूछ पड़ती है – पापा, ये पेंड़ पाइन जैसे दिखते हैं। यहाँ?

पाइन! मैं ठिठक जाता हूँ। निकट जा कर देखता हूँ, चित्र लेता हूँ। पहले कभी नहीं देखा, इनमें तो सूई जैसे पत्ते (अगर कह सकें तो) हैं! क्या हैं ये? यहाँ क्यों हैं? आम उड़िया जन पेड़ पौधों के बारे में उतने ही निष्णात हैं जितने और जगहों के लोग। किससे पूछूँ?

मोबाइल पर chandrabhaga beach tree डाल कर सर्च करता हूँ। तीसरे स्थान पर ही दिखता है:

The golden sand and the casurina trees add to the natural glamor of the beach. But the biggest claim to fame of the Chandrabhaga beach is the Konarak Temple 

मैं ढूँढ़ता चला जाता हूँ, पहले परिणाम में वर्तनी ठीक नहीं है, सही नाम है Casuarina, वैज्ञानिक नाम Casuarina equisetifolia, हिन्दी में जंगली या विलायती सरू, उड़िया व बंगला में झाऊ।


बंगाल! ... अचानक ही पढ़ाते हुये पिताजी की स्मृति हो आती है और फिर एक क्षयरोग (टी बी)  अभिशप्त युवा कवयित्री तोरू दत्त की जिसने इस वृक्ष को अपनी कविता में अमर कर दिया। अंग्रेजी साहित्य में वह कविता क्लासिक मानी जाती है – Our Casuarina Tree

धन्य हुये आज तो! तोरू के प्यार के दर्शन जो हो गये! ...  

 

... यूरोप के अपने प्रवास में आसन्न मृत्यु की छाँव में रहती तोरू दत्त खिड़की खोलने पर दूर भारत की भोर में एक वनसरू को याद करती है, याद करती है उसकी छाँव में बहनों के साथ खेलता अपना बचपन:

  At dawn, my eyes delighted on it rest; 
Sometimes, and most in winter,—on its crest 
.. And far and near kokilas hail the day; 
And to their pastures wend our sleepy cows; 
And in the shadow, on the broad tank cast 
By that hoar tree, so beautiful and vast, 
The water-lilies spring, like snow enmassed. 
...

Beneath it we have played; though years may roll, 
O sweet companions, loved with love intense, 
For your sakes, shall the tree be ever dear. 
Blent with your images, it shall arise 
In memory, till the hot tears blind mine eyes! 
...
Unknown, yet well-known to the eye of faith! 
Ah, I have heard that wail far, far away 
In distant lands, by many a sheltered bay, 
When slumbered in his cave the water-wraith 
And the waves gently kissed the classic shore 
Of France or Italy, beneath the moon, 
When earth lay trancèd in a dreamless swoon: 
And every time the music rose,—before 
Mine inner vision rose a form sublime, 
Thy form, O Tree, as in my happy prime 
I saw thee, in my own loved native clime. 


 ...“पापा! चलें?”

मैं टूटता हूँ। मोबाइल स्क्रीन से दृष्टि हटा देखता हूँ। बिन देखे जानता हूँ कि कपड़ों के नीचे शरीर भीग रही है, भीतर भी कुछ भीग उठा है – समुद्री किनारा होगा, सरू वृक्ष से आती मर्मर ध्वनि होगी – एक आह सी कि उसकी संगिनी कुछ दिनों की मेहमान है:


What is that dirge-like murmur that I hear 
Like the sea breaking on a shingle-beach? 
It is the tree’s lament, an eerie speech, 
That haply to the unknown land may reach. 


...यहाँ भी समुद्री किनारा है, बू भरी हवा है – मृत्यु की बू, ध्वंस की बू, शाप की मल बू। क्या सभी शापित एक ही तरह होते हैं? तो फिर यह कविता इतनी हृदयस्पर्शी क्यों है? मरती हुई कवयित्री वनसरू वृक्ष पर आशीर्वादों की झड़ी लगा देती है:


Mayst thou be numbered when my days are done
With deathless trees—like those in Borrowdale,
Under whose awful branches lingered pale
“Fear, trembling Hope, and Death, the skeleton,
And Time the shadow;” and though weak the verse
That would thy beauty fain, oh, fain rehearse,
May Love defend thee from Oblivion’s curse.

 

तुम्हारा सौन्दर्य भले ढल जाय, मैं भले न रहूँ; मेरा प्रेम तुम्हें विस्मृति के अभिशाप से बचा लेगा।


 मनभावन वनसरुओं से घिरा कोणार्क मन्दिर भी ऐसा ही होगा – शिल्पियों द्वारा पत्थरों पर उकेरा गया महाकाव्य। आराधना नहीं की होगी धर्मपाद ने उसके प्रांगण में किंतु जीवन की अंतिम भोर किरणों से ऐसे ही आशीर्वाद माँगा होगा। शापितों के वरदान ऐसे ही होते हैं – कालजयी, कालातीत।


मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया? मन में काल और स्थान की कोई सीमा नहीं। कैसे आये होंगे सरू वृक्ष भारत में? मूलत: यहाँ के तो हैं नहीं। नेट बताता है कि संसार के अनेक तटीय भागों में ये वृक्ष पाये जाते हैं, समुद्र की क्षारीय वायु को नियंत्रित करने के लिये लगाये जाते हैं, कोणार्क मन्दिर को बचाने के लिये भी लगाये जा रहे हैं। मूलत: ऑस्ट्रेलिया या सम्भवत: मेडागास्कर के हैं? कौन लाया होगा इन्हें यहाँ? पश्चिमी तट पर भी तो नहीं पाये जाते?


मेडागास्कर यानि मालागासी यानि प्राचीन भारत में यमक्षेत्र के नाम से जानी जाती भूमि। मगद्वीप से आते सकलदीपी कहीं इसके समुद्री हवारोधी गुण से परिचित तो नहीं थे? लेकिन वे यमभूमि क्यों जायेंगे? यमभूमि में भी सूर्यपूजा स्थापित थी। गुरुपुत्र को बचाने गये कृष्ण कहीं वहाँ पर तो नहीं मिले उनसे?

साम्ब को स्वस्थ करने वाले  सकलदीपी पुरोहित तो नहीं ले आये वनसरू को यहाँ? 


मित्र और वरुण के देश के अभिचारी पुरोहित, सूर्यविद्या के ज्ञाता:

  • जलदेव के रूप में वरुण का सम्बन्ध स्वाधिष्ठान चक्र से है  - कफ दोष निवारण।
  • सौर अग्नि के रूप में मित्र का सम्बन्ध मणिपुर चक्र से है - पित्त दोष निवारण।
  • तड़ितझंझा इन्द्र रूपी सूर्य का सम्बन्ध हृदयचक्र अंत:प्राण से है – वात दोष निवारण।
यम का अर्थ होता है – नियंत्रण। यमभूमि के सूर्य पूजकों द्वारा साम्ब की रोग मुक्ति – त्रिकोणार्क क्षेत्र में त्रिदोष नियंत्रण द्वारा। त्रिकोण भूमि बाद के वृक्षरूप दारुविष्णु की उपासना करने वालों के क्षेत्र पुरी के उत्तरपूर्व यानि पवित्र ईशान कोण में पड़ती है।

पवित्र दारु किस वृक्ष का भाग थी? सरू पर बढ़ईगीरी के काम नहीं हो पाते और पुरी मन्दिर में स्थापित चतुर्मूर्तियों से लगता है कि बहुत कठिनाई हुई होगी उन्हें गढ़ते! चेहरे तो बन ही नहीं पाये! सपाट तल पर रंग द्वारा बनाये जाते हैं। कहीं बन्द कमरे में काम करते विश्वकर्मा को बीच में ही बाधित कर देने से अधूरी रह गई मूर्तियों का मिथक इस तथ्य से तो नहीं जुड़ता कि वह लकड़ी नक्कासी या तरास दृष्टि से बहुत कठोर रही होगी? वर्तमान विग्रह नीम की लकड़ी से बनाये जाते हैं लेकिन इन विग्रहों को तो कई बार आक्रमणकारियों के भय से गर्भ गृह से बाहर ले जा छिपाया जाता रहा। हर बारह से अट्ठारह वर्ष पर अब भी बदल दिया जाता है। यह किसी पुरानी स्मृति का दुहराव तो नहीं? मूल विग्रह किसी और लकड़ी के तो नहीं थे? 


नीम ही क्यों? नीम का सम्बन्ध सूर्य से माना जाता है। एक वैष्णव सम्प्रदाय है - 'निम्बार्क' - अर्क माने सूर्य। सूर्य है निम्ब यानि नीम में। पुन: साम्ब के सूर्योपासक पुरोहितों की ओर ध्यान जाता है और साथ ही वैदिक देवता विष्णु की ओर जो कि सौरदेव आदित्य ही हैं। नीम विशुद्ध भारतीय वृक्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मग देश और अर्क क्षेत्र की सूर्योपासना पद्धतियों का समन्वय हुआ?     


त्रिकोण का रहस्य क्या है? भुबनेश्वर, पुरी और कोणार्क का वर्तमान स्वर्ण त्रिकोण या कोणार्क मन्दिर में प्रभात, मध्याह्न, अस्त सूर्य प्रतिमाओं से बना त्रिकोण? त्रिकोण जो तंत्र मार्ग में अनेक अर्थ रखता है, कुछ और तो नहीं? सूर्यतंत्र जैसा भी कुछ था क्या?

...अनेक प्रश्नों की मेरी मनयात्रा को बाधित करता है पुत्री का स्वर – वो देखिये! यहाँ लाइट हाउस भी है। चलती गाड़ी से नाविकों को रात में दिशा दिखाने वाला प्रकाश स्तम्भ दिखता है। 


बोर्ड से पता चलता है कि दर्शकों के लिये खुला हुआ है। क्या अब भी यह उपयोगी है? या केवल पुराने गौरव की पुनर्स्थापना को यूँ ही बना दिया गया? पता नहीं। कहते हैं किसी समय सूर्यमन्दिर का उपयोग यूरोपीय लोग दिशा निर्देशक प्रकाश स्तम्भ के तौर पर करते थे।


“नहीं रुकना हमें यहाँ, हमें तो उसका महालय देखना है जो समस्त संसार को प्रकाशित करता है।“


(जारी)           



सोमवार, 4 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 2 : चन्द्रभागा का आशीर्वाद

... भाग-1 से जारी
लहरों की थपकन है। भूत भावुकता शमित हो चली है। मैं वर्तमान में थोड़ा सा पीछे चला गया हूँ।

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पुरी कोणार्क मार्ग मनोरम है। समुद्र तट के समान्तर चलते लगता रहा कि मैं आशीर्वादों की भूमि की ओर अग्रसर हूँ।

62चन्द्रभागा पहुँचने के बहुत पहले से ही तट दर्शन देता रहा – स्वच्छ निमंत्रित करता जनहीन तट। लगा कि समुद्र किसी सभ्यता का आदि पुरुष है जो आगंतुकों के स्वागत को अदृश्य पवन के साथ खड़ा है। श्वेत वस्त्रों में लहरें उठ रही हैं। श्वेत केश, श्वेत श्मश्रु, आशीर्वादों के छीटें मारता कुल वृद्ध ठहर कर आतिथ्य स्वीकार कर लेने को निमंत्रित करता है:
“आदित्य से मिलने जा रहे हो? अतिथि! हमारा आतिथ्य अर्घ्य तो स्वीकार करते जाओ।“

“कृतार्थ हुये पूज्य! ...लेकिन नहीं रुक सकते। चन्द्रभागा देवी के सान्निध्य में हमें उसकी आलस भरी लाल आँखें देखनी हैं। रुके तो विलम्ब हो जायेगा। तुम्हारा निमंत्रण अनजाना भी है। जाने इन तटों पर ऐसे स्थान हों जो हमारे लिये संकटकारी हों! नागों की भूमि है यह। धन्यवाद ... नहीं रुक सकते।“

लगता है बाबा समुद्र रूठ गये। उनकी रह रह घह घह है। कहाँ हो आदित्य?
भूदृश्य पर, क्षितिज पर, सब पर वर्णहीनता का प्रसार है। हे गैरिक! आओ न, रंग बिखेर जाओ।

 आकाश में सर्वत्र मेघ हैं। तट पर जनरव है। दर्शनाभिलाषियों की प्रतीक्षा है किंतु यहाँ के वासियों को इनसे क्या लेना देना? यह तो प्रतिदिन होता है। जीवन को आगे बढ़ाने हेतु लहरों से संघर्ष है -  क्षितिज पर मछुआरों की नावें उबड़ खाबड़ उद्धत नृत्य कर रही हैं। वे श्रमसीकर बहा रहे हैं। खारा पानी, खारी लहरें, देह में दौड़ता रक्त – खारा प्रवाह। अपनी उपस्थिति जताता रक्त – खारा पसीना बह चला है। उमस है। कहाँ हो सवितृदेव? अहं आह्वये!
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये। स चेत्ता देवता पदम्॥
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः। सवितारं नृचक्षसम्॥
समय 5:25। नभ में नील नहीं, रेत जमी है। कारी, धूसर, सफेद। कोई दर्पण है ऊपर जो नीचे को प्रतिबिम्बित कर रहा है।
2012-05-29-592
हुस्स! उसमें हम कहाँ हैं? लहरें कहाँ हैं? किनारे की लघु हरीतिमा कहाँ है?
आदित्य ने आज गोपन उदय का निर्णय लिया है। नहीं दिखेंगे? तीन पगों में पृथ्वी को नाप लेने वाले वामन का यात्रा आरम्भ हमें नहीं दिखेगा।
...विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्॥
 बादलों के पीछे उदय कब का हो चुका है।
2012-05-29-602तट पर रहने वाले मछुआरों की झोपड़ियों से आ कर एक सूअर दौड़ रहा है। वामन अवतार तो नहीं दिखे, वाराह अवतार दिख गये!
वेदों के विष्णु ही सूर्य हैं। उन्हें आदित्य वर्ग का सौर देवता कहा गया है।
सूर्य न हो तो बाबा समुद्र की आर्द्रता नभ में कैसे पहुँचे? पर्जन्य कैसे उमगें? अक्षार वर्षा से धरा तृप्त कैसे हो? रत्नगर्भा से चमकते अन्नकण कैसे निकसें? भूख कैसे मिटे? जग का पालन कैसे हो?
 जगत के पालनकर्त्ता सूर्य ही विष्णु हैं। संसार में चहुँओर इनकी पूजा होती रही है। मिस्र, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, मध्यपूर्व आदि आदि सब ओर उनके आराधनस्थलों के अवशेष अपनी समूची भव्यता के साथ आज भी देखे जा सकते हैं। भारत में क्या हुआ था? चन्द्रभागा! कहाँ हो? बताओ न! 

तट पर कृष्णपुत्र साम्ब द्वारा स्थापित चन्द्रभागा मन्दिर दिख रहा है। मैं सुदूर पीछे इतिहास के उस आवरण को पार कर चुका हूँ जिसे मिथक कहते हैं...   
...परिपाटी विद्रोही कृष्ण। समुद्र पार कर यमलोक से गुरु की संतति को वापस लाने वाले कृष्ण समुद्र तट के वासी पंचजनों के मित्र बने। उनसे उन्हें वह महाशंख भेंट में मिला जो कि उनकी पहचान बन गया – पाञ्चजन्य! जब पृथ्वी के शत्रुओं से भय हुआ तो जलधि की ओर भागे कृष्ण, समुद्र के पश्चिमी तट पर एक योजनाबद्ध नगर ने रूप विस्तार लिया – द्वारका।
अपने जीवन में ही अवतारी मान लिये गये कृष्ण जल तत्त्व के महत्त्व को जानते थे। उस विश्वात्मा को नारायण यूँ ही नहीं कहा गया:
पतिं विश्वस्य आत्मा ईश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम्।  
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्॥
नार+अयण, जो नर शरीर के भीतर के जलतत्त्व को बखूबी जानता है। सूर्य और जल की मैत्री जीवन के लिये आवश्यक है। कहते भी हैं – सूर्यनारायण।
द्वारकाधीश के महल के पीछे गोमती नदी बहती थी। समुद्र से उसके पावन संगम स्थल किनारे कृष्ण का आवास था। मीठे पानी का स्रोत पीछे और आगे विशाल खारा जलधि। यहाँ विद्रोही जीवन पर धरती की ओर से आपदायें नहीं आ सकती थीं। समुद्र के पंचजन उनके साथ थे। दूर यमलोक से व्यापार की कड़ियाँ निर्मित हो गईं। कृष्ण का यदुवंश सुरक्षित हो गया।
ऐसे में सूर्य समान ज्योति वाली स्यमंतक मणि के रखवाले और स्थानीय भूमि के जनप्रमुख जामवंत की पुत्री के साथ कृष्ण ने विवाह किया। उनसे एक अद्भुत रूपवान पुत्र हुआ। संहारक देव सोमनाथ यानि शिव की आराधना कर कृष्ण ने वह पुत्र पाया। उन्हों ने समुद्र तट पर सोमनाथ का चन्दनचैत्य बनवाया।
यह वही स्थान था जहाँ चन्द्रपूजकों के मुखिया ने अनुष्ठान कर स्वयं को कुष्ठ और क्षय रोगों से मुक्त किया था।  सोम यानि चन्द्रमा। शीतल चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव की प्रचंड दाही सूर्यस्वरूप विष्णु द्वारा यह कैसी आराधना थी? दो विरुद्धों, ऊष्मा यानि जीवन और शीतलता यानि मृत्यु, को जोड़ने वाला यह कैसा आयोजन था?
 कृष्ण ने यादवों में क्षरणशील वृत्तियों को भाँप लिया था। कहा जाता है कि भविष्य की एक योजना के अनुसार वह चाहते थे कि उनका शंकर स्वरूप पुत्र यदुवंश के संहार का कारण बने।
पुत्र का बचपन बीता लेकिन अपनी माँ और कृष्ण की तमाम पटरानियों का साथ उस पुत्र ने नहीं छोड़ा। कृष्ण ने नाम रखा – साम्ब यानि स+अम्ब, सर्वदा माँ के साथ रहने वाला। माताओं की संगति में लाडला पुत्र उद्धत हो गया और कृष्ण के लिये कई उलझनों का कारण भी। सुयोधन की पुत्री लक्ष्मणा का स्वयंवर से हरण कर उसने कुरुवंश तक को चुनौती दे डाली! बलराम के बीच बचाव से वह विवाह सम्पन्न हुआ।
कृष्ण को अपना यह उद्धत पुत्र अलग तरह से प्रिय लगता था। सुन्दर पुत्र को कोढ़ हो जाय तो पिता क्या करे?
किसी भी तरह की आपदा से सुरक्षित यादव उच्छृंखल हो चले थे। उन्हें केवल एक नाम अनुशासित रख सकता था – कृष्ण, जो कि एक अवतारी था। उसके पुत्र को कोढ़ हो गया! दैवीयता पर प्रश्न का अर्थ था – नियंत्रण और साख में कमी। सूर्यविद्या का ज्ञाता नारायण अवतारी कृष्ण अपनी लाज कैसे बचाये?  
  कृष्ण को राह सूझी। साम्ब का माताओं से प्रेम जगजाहिर था, यह भी कि वह रनिवास में ही घुसा रहता था और सामान्य वयस्क शिष्टाचारों की भी परवाह नहीं करता था। छलिया ने तमाम प्रवाद फैला दिये।
कोई कहता कि कुरूप नारद को देख साम्ब ने उनकी हँसी उड़ाई तो नारद ने उसे मद्य पिला उस समय रनिवास भेज दिया जब कृष्ण की पटरानियाँ एकांत में पानरत थीं। मद्य के मद में चूर रूपवान पुत्र को देख वे कामवश अठखेलियाँ करने लगीं। कृष्ण ने देखा और पुत्र को कोढ़ी होने और पटरानियों को भविष्य में अपहरण कर लिये जाने का शाप दे दिया।
कोई कहता कि उद्धत साम्ब रात में उस समय अपनी माँ के कक्ष में चला गया जब वह कृष्ण के साथ सुरतलीन थीं। क्रोधित कृष्ण ने उसे कोढ़ी होने का शाप दे दिया।
मिथकीय युग में भी अफवाहों का बोलबाला था!
लोग समझे कि भगवान ने अपने पुत्र के अपराध को भी क्षमा नहीं किया और मर्यादा का अतिक्रमण सहन नहीं किया जायेगा। कृष्ण ने स्थिति सँभाल ली थी।
खारा पानी, मीठा पानी, संगम, सूर्य किरणें और चन्द्र किरणें – कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिये जो प्रक्रिया होनी थी उसके लिये ये आवश्यक थे। कृष्ण चाहते तो वहीं आयोजन कर सकते थे, सारे उपलब्ध थे और सोमनाथ का उदाहरण सामने था लेकिन वह तो पालनकर्त्ता विष्णुरूप भी थे।
भविष्य के महाविनाश के पश्चात क्या होगा? यादव इस क्षेत्र में जाने क्या क्या करेंगे? प्रभास, पाटन, रैवतक, द्वारका आदि क्षेत्रों का क्या होगा?
विकल्प आवश्यक था। बीज वपन हो जाय फिर चाहे साम्ब रहे या न रहे - एक पंथ दो काज।
उन्हों ने कर्क वृत्त के निकट का वह क्षेत्र चुना जो पूर्वी समुद्र का किनारा था – अर्कक्षेत्र!
...कोणादित्य की उपचारी किरणें, पेय जलयुक्त और चन्द्र की शीतलता में नहाती खारे पानी के समुद्र से संगम करती नदी चन्द्रभागा।
 समुद्र तट से व्यापारिक मार्ग तो मिल ही जायेंगे। भविष्य के विध्वंस ग्रस्त पश्चिमी तट से दूर बहुत दूर पूर्वी तट का यह स्थान नयी स्थापना और सृजन के लिये उपयुक्त होगा।...
साम्ब को प्रस्थान का आदेश मिला और समय मिला बारह वर्ष। पारम्परिक पुरोहित वर्ग ऐसे किसी भी अनुष्ठान में भाग लेने से इनकार कर गया। वैसे भी ऐसे पतित के लिये क्यों कुछ करना जो अपनी माताओं से ही ...
 कृष्ण के लिये यह कोई समस्या नहीं थी। शक(सकल)द्वीप या मगदेश (वर्तमान ईरान) के सूर्यपूजकों से उनका सम्पर्क था। वहाँ से अठ्ठारह सूर्यध्वज पुरोहित बुलाये गये। मित्र और वरुण की धरती से आये मेघ मित्र मिहिर यानि सूर्यपूजक सकलद्वीपीय ब्राह्मण – कृष्ण के मित्र। अर्कक्षेत्र का एक नाम मित्रवन भी हो गया।
उनके साथ आईं उनकी कहानियाँ, उनके मिथक...पहले मग आचार्य पहले ब्राह्मण सुजिह्वा की पुत्री निक्षुभा और स्वयं सूर्यदेव के संयोग से उत्पन्न हुये, सकल ब्राह्मणों में श्रेष्ठ...  
बारह वर्षों तक चन्द्रभागा और समुद्र का संगम स्थल अनुष्ठान का साक्षी रहा। आह्वान होते रहे:
यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे।
अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः॥
त्रिवृत्त त्रिकोण अवलम्बित रथ से सूर्य किरणों पर सवार स्वयं अश्विनीकुमार आ कर साम्ब को स्वस्थ कर गये:
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना।
मग ब्राह्मण समूचे भारत में फैलते चले गये – कश्यप देश से चोल देश तक, लाटदेश से कामरूप तक सूर्यमन्दिरों और सूर्यपूजा की एक समांतर पद्धति प्रतिष्ठित हो गई।
गोवर्धन पूजा कर इन्द्र को अपदस्थ करने वाले कृष्ण के पुत्र ने सूर्यपूजा के प्रसार को सुनिश्चित कर दिया जिसके बीज वेदों के विष्णुसूक्त और उससे सम्बन्धित ऋचाओं में थे। देखते देखते इन्द्र, मरुत, अग्नि, पर्जन्य जैसे प्रत्यक्ष देवों का स्थान गूढ़ विष्णु नारायण ने ले लिया।  
इस विकल्प को कोई भारी उलट फेर ही मिटा सकती थी। परम्परा ने तिरस्कारी प्रतीक्षा को अपनाया – सकलदीपी तो ब्राह्मण होते ही नहीं!...
...मैं वर्तमान में लौट आया हूँ। तट पर लोग बढ़ गये हैं। बच्चे खेल रहे हैं। रेत पर बैठ समीर का आनन्द लेने लगा हूँ। दूर लहरों के साथ क्रीड़ा करतीं नावों को देखते मन डोलता है।
परम्परा कहती है कि वर्तमान बिहार कभी सकलदीपियों का एक बड़ा क्षेत्र था जहाँ सूर्योपासना चरम पर थी। पारम्परिक पुरोहित उसे हेय दृष्टि से देखते थे। कहीं इन्हीं मग ब्राह्मणों के कारण ही तो मगध नाम नहीं पड़ा? जो कि आज भी हेय क्षेत्र माना जाता है?
आज भी सूर्यपूजा का छ्ठ पर्व बिहार का सबसे बड़ा पर्व है। भारत में कहीं  और ऐसा आयोजन नहीं होता और आज भी समूचे अनुष्ठान में पारम्परिक पुरोहितों की न आवश्यकता है और न विधान, कोई जबरी कर ले तो कर ले!
चन्द्रभागा! क्या तुम बता सकती हो? ऐसा ही है क्या? तुम्हारे तट पर साम्ब द्वारा बनवाया गया मन्दिर तो देख लिया लेकिन तुम कहाँ हो?

साम्ब और चन्द्रभागा की स्मृति में, रोगमुक्ति की आस में हर वर्ष माघ शुक्ल सप्तमी तिथि को लोग जिस नदी में स्नान करते हैं, पर्व मनाते हैं; वह नदी कहाँ है?
chandrabhaagaa
मन्दिर के दूसरी ओर सौ डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर है कथित चन्द्रभागा नदी या झील, जो कह लें  - एक जलभराव जैसा है कुछ।  
 मर गई चन्द्रभागा, दूर पश्चिम में मृत सरस्वती के स्यमंतपंचक कुंडों की तरह ही है यह अवशेष!
कृष्ण के युग में सरस्वती लुप्त हो चली थी और उनके बाद के युग में वैकल्पिक अनुष्ठान की साक्षी चन्द्रभागा!
काल किसी को नहीं छोड़ता...
...चन्द्रभागा ही वह नदी है जिसके वक्ष पर चलती काष्ठनौकाओं में लगभग साठ किलोमीटर की दूरी से वे पत्थर लाये गये थे जिनसे कोणार्क के सूर्य मन्दिर का निर्माण हुआ। उस समय कोणार्क के आँगन का अभिषेक समुन्दर दादा करते थे – निलछौहीं देह, श्वेत केश, श्वेत श्मश्रु, श्वेत वेश। सामने विशाल प्रस्तर रथ में आदित्य। कितना भव्य रहा होगा परिकल्पना का मूर्तिकरण!
दादा अब चार किलोमीटर पीछे आ गये हैं। सुना है उनकी लहरों की स्मृति में मन्दिर काला पड़ता जा रहा है – काला मन्दिर यानि Black Pagoda...
 चन्द्रभागा संगम विन्दु पर अब गहरी और ऊँची बालुकाराशि है।
सूर्य ने कुछ नहीं किया था, सन् 1250 ई. में मन्दिर पूर्ण होने तक राजा नरसिंहदेव ने बारह वर्षों तक चन्द्रभागा नदी की धार और संगम स्थान के साथ छेड़छाड़ की। पहले से ही क्षीण संतप्त नदी ने आत्महत्या कर ली, उसके आशीर्वाद पत्थरों में घनीभूत हो गये। जड़ ऐसे ही चेतन होता है और निर्जीव सजीव भी।  
किंतु आम जन ने इस अपराध को क्षमा नहीं किया। सकलदीपी ब्राह्मणों के आदि पुरुष वाले मिथक ने राह बदली और कालांतर में सूर्यमन्दिर के ध्वस्त होने पर लोककथा सामने आई:
चन्द्रभागा के साथ सूर्य ने दुर्व्यवहार किया। पुत्री की आत्महत्या से क्षुब्ध सुमन्यु ने शाप दिया और कोणार्क ध्वस्त हो गया।
सुजिह्वा, सुमन्यु, जिह्वा, मन्यु...जिह्वा पर नियंत्रण नहीं, छिपा क्रोध रिसता रहा। लोग भूलते गये।  
शापित नहीं, चन्द्रभागा के आशीर्वादों की स्थापना है कोणार्क का सूर्यमन्दिर!   
समय 6:02। तट की मन यात्रा समाप्त हुई।
 2012-05-29-617
आकाश में मेघों के पीछे से आदित्य झाँक रहे हैं।
झिड़की दे रहे हैं – चन्द्रभागा के साथ इतना समय लगा दिया! कहीं तुम भी तो...
नहीं देव!... बस आशीर्वाद सँजो रहा था। मैं आ रहा हूँ। आप तो पिता हैं, जल को वाष्पित कर, हवि ले दे कर समस्त भूतों का पोषण करते हैं - हविषा जारो अपां पिपर्ति पपुरिर्नरा। पिता कुटस्य चर्षणिः॥
अब जब कि आप की स्वर्ण चमक नभ में उठ चुकी है, मुझे देखना है कि अचर प्रस्तरों में प्राण भी होते हैं।
2012-05-29-614
देवज्योति नभ में उत्थित, मित्र वरुणाग्नि नेत्र सम
चर अचर आत्मा समस्त, सूर्यमय वायु पृथ्वी नभ।
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥

2012-05-29-707

20120529-053323
 (जारी)
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यात्रावृत्त जारी है और सबसे प्रिय ब्लॉग की खोज भी।
आप लोग अपना मत व्यक्त करते रहिये।
अंतिम तिथि : 07/06/2012

शनिवार, 2 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर- 1 : शापित आशीर्वाद

2012-05-29-628
मोबाइल अलार्म पर भूमि सूक्त बज उठा है:
पुरी।
रात का अंतिम प्रहर 3:30। प्रथम प्रहर में पुरी तट की लहरों पर अठखेलियाँ करती अंग्रेजी कविता लुप्त हो चुकी है। आज धरती नहीं आदित्य से साक्षात्कार है। पुत्री को जगाता हूँ – उठो! तैयार हो जाओ। टैक्सी साढ़े चार तक आ जायेगी। सूर्योदय चन्द्रभागा तट पर देखेंगे...
...प्रसाधन कपाट बन्द होने के साथ वाक्य मन में पूरा करता हूँ ...और किरणों के स्वामी आदित्य को कोणार्क में।
कोणार्क: सन्धि विच्छेद कोण और अर्क क्रमश: ज्यामिति और सूर्य के लिये या कोण से कोना और अर्क से निचोड़ यानि समस्त दिशाओं के कोनों का निचोड़?
इतने महान उद्देश्य और इतनी उदात्तता के साथ स्थापित मन्दिर ध्वस्त कैसे हो गया? शापित क्यों हो गया?
कुछ भी हो शापित के लिये शापित 'कोणादित्य' ही आराध्य है।
एक मिथक कहता है - अनिन्द्य सुन्दरी सुमन्यु पुत्री चन्द्रभागा के साथ कामवश सूर्य ने दुर्व्यवहार किया और उसके पीछे भागा। निज को बचाती भागती चन्द्रभागा ने लज्जा बचाने को जिस नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली, वह उसके नाम से प्रसिद्ध हुई। पुत्री की आत्महत्या से क्षुब्ध सुमन्यु ने सूर्य को शाप दिया। कालांतर में शापित सूर्यमन्दिर ध्वस्त हो गया...
मन्दिर निर्माण के लिये पत्थर नदी मार्ग से लाये गये थे। कौन थी वह नदी? क्या हुआ उसके साथ?
...प्रश्नगुच्छ लिये बाहर आ गया हूँ। नभ में मेघों का आभास है और ऊषा कहीं नहीं है।
प्रणाम पुरी! ऊषा मिले तो ला दो न! अपने आकाश से मेघ घूँघट हटा दो, मैं देखना चाहता हूँ।
भला प्रकृति ने मनुष्य की कब सुनी जो आज सुनेगी?...
...किसी युग में दो ही आराध्य थे – धरती मैया और सूरज दादा। आज धरती मैया अपूजनीय है, चिंत्य है और गिने चुने सूर्य मन्दिर ही बचे हैं। और किस किसने शाप दिये? कुछ नहीं यह चक्र है - सभ्यतायें उत्कर्ष और अपकर्ष को प्राप्त होती हैं। सूर्य और धरती चुपचाप स्वयं को प्रवादग्रस्त होते देखते हैं। मनुष्य निज पछतावों के मिथक गढ़ते जाते हैं...
उमस है, भीगने लगा हूँ।
“पापा, जाइये नहा लीजिये।“
पहले जल स्नान और फिर टाल्क स्नान – घिसे हुये और सुगन्धित किये कोमल पत्थरों के बारीक प्रवाह - मैं श्वेतांग। आदित्य को स्वेद प्रसाद नहीं चढ़ाना लेकिन इस जलवायु में क्या यह सम्भव है? हम दोनों तैयार हैं। परदा हटा कर खिड़की के काँच से बाहर झाँकता हूँ। प्रत्यूष काल है। एक स्मृति जगती है और आश्चर्य से जड़... चेतन हो बाहर आ जाता हूँ। क्या मैं भविष्य देख सकता हूँ? सब कुछ तो वैसा ही है! प्रार्थना के आँसू छ्लक उठे हैं। वही स्वर पुन: उठ रहे हैं:
बन्द गवाक्षों में सागौन से घिरे क्षीण स्फटिक पल्ले हैं। उनसे झाँकता आसमान कुछ कम नीला है।नीचे धरा की लहलहाती चूनर। कोप प्रदर्शन के पहले की शांति? नहीं। दधि अच्छी नहीं बनी तो क्रोध में निकाल निकाल फेंक दिया।  आसमान में यत्र तत्र श्वेत बादलों के टुकड़े हैं और नीचे शांति। खगरव आज बहुत कम है।
समीर कैसा है? घावों के दाह को कोई फूँक फूँक शमित कर रहा है। रह रह झोंके। छींकें, छींकें... भीतर बन्द रहने को अभिशप्त फिर भी घाव पर रह रह फूँक। बुदबुदाते नाना, आदिम मंत्र पढ़ते, चेहरे पर फूँक मारते नाना। देवमन्दिर में प्रकाश नहीं है। आज आराधना नहीं। आने दो छींक को।
नभ को तज कर गायत्री उद्धत विश्व के मित्र के पास कैसे आई होगी? बस चौबीस पगों में अनंत की दूरी पार कर ली!
विश्वामित्र! कितना अधैर्य, कितनी प्रतीक्षा, कितनी करुणा रही होगी तुम्हारी पुकार में!! उस दिन खगरव अवश्य शून्य रहा होगा। धरा उस दिन भी रूठी रही होगी।  ऋचा गायन छोड़ दधि बिलोने में लग गई होगी।
...  शांति इतनी प्रबल भी हो सकती है। ध्वनियाँ होकर भी नहीं हैं।
ऐसे में प्रार्थना गाने को मन करता है।
क्या गाऊँ?
खेळ चाललासे माझ्या पूर्वसंचिताचा,
पराधीन आहे जगतीं पुत्र मानवाचा?
या
अमृतस्य पुत्रा:..
सब दूसरों के स्वर हैं। मुझे तो अपने स्वरों में गाना है।
छत पर समीर से भेंट कर लूँ। दधि टुकड़े नील श्वेत में लुप्त से होने लगे हैं।...
...और मोबाइल में पुन: भूमि सूक्त बज उठा है, इस बार बुलावा है। टैक्सी चालक बाहर खड़ा है – 4:30। तुम्हारी निष्ठा को प्रणाम चालक! ...हम चल पड़े हैं...कोणार्क को जो पुरी से 35 किलोमीटर की दूरी पर है।
भीतर जैसे बाहर का सारा मौन निचुड़ कर समा गया है। मैं वर्षों पीछे जा पहुँचा हूँ...
Sun-Temple2
तुर्कपट्टी महुअवा, जिला कुशीनगर, उत्तर प्रदेश। सूर्यमन्दिर के प्रांगण में खड़ा हूँ। सूर्य की नीलम प्रतिमा सामने है। गुप्तकाल पाँचवी या आठवीं सदी। सिवाय प्रतिमाओं के कुछ नहीं बचा। आदित्यप्रतिमा से पहला साक्षात्कार है। किसी पुराकथा की अंतिम पंक्ति उड़ी सी आती है – मनुष्य नष्ट हुआ और प्रस्तर बच गया...
“मनुष्य पुनर्जन्म ले रहा है। नहीं लेता तो यह प्रतिमा पुन:स्थापित नहीं होती।“
“किस भुलावे में हो यायावर?”
“मैं यायावर नहीं, यहीं का वासी हूँ और तुम्हारा उत्खनन मेरे जन्म के बाद हुआ है। समझे कि नहीं?“...
...पुत्री सो गई है। मैं कालडाल पर पेंगे मार रहा हूँ – स्वप्न, जागृति, स्वप्न, जागृति ... समय में और पीछे चला गया हूँ...
 कार्तिक शुक्ल पक्ष की छठवीं तिथि। सूर्य षष्ठी का पर्व यानि छठ। अपना जन्म किसे याद आता है?
परंतु मैं निज जन्म की रात के पश्चात के सबेरे में हूँ। घाटों पर स्त्रियाँ दीपक जलाये भोर से ही प्रतीक्षा में हैं। प्रसूतिगृह में जलती हुई लालटेन है। पीड़ा की नदी से उबरी मास्टरनी अब ममता तट पर आह्लादित खड़ी है। मास्टर जी सद्य:जात को गोद में लिये बैठे हैं और मन ही मन जैसे उगते सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं:


...पुरी से 31 किलोमीटर पर समुद्र का चन्द्रभागा तट।
2012-05-29-597
नदी कहाँ है? बताओ देव! कहाँ है?
बाबा घहर रहे हैं - घह घह घह घहा घह घह घहा।
आँधी नहीं आ रही। 
दधि के टुकड़ों से  समीर तृप्त हो डकारे ले रहा है। उसका स्वर ऐसा ही होता है। 
यह मेरे बाबा की घहरन नहीं है?

“भविष्यद्रष्टा! तुम्हें चन्द्रभागा नहीं मिलेगी। प्रतीक्षा करो, आदित्य आ रहे हैं। उन्हीं से पूछ लेना।“

आदित्य! आओ न! देखो, हमने स्तूप बनाया है। शिव को स्थापित किया है और मन्दिर भी बनाया है। प्रकाशित कर जाओ न! आओ न!
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