सोमवार, 4 जून 2012

कोणार्क सूर्यमन्दिर - 2 : चन्द्रभागा का आशीर्वाद

... भाग-1 से जारी
लहरों की थपकन है। भूत भावुकता शमित हो चली है। मैं वर्तमान में थोड़ा सा पीछे चला गया हूँ।

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पुरी कोणार्क मार्ग मनोरम है। समुद्र तट के समान्तर चलते लगता रहा कि मैं आशीर्वादों की भूमि की ओर अग्रसर हूँ।

62चन्द्रभागा पहुँचने के बहुत पहले से ही तट दर्शन देता रहा – स्वच्छ निमंत्रित करता जनहीन तट। लगा कि समुद्र किसी सभ्यता का आदि पुरुष है जो आगंतुकों के स्वागत को अदृश्य पवन के साथ खड़ा है। श्वेत वस्त्रों में लहरें उठ रही हैं। श्वेत केश, श्वेत श्मश्रु, आशीर्वादों के छीटें मारता कुल वृद्ध ठहर कर आतिथ्य स्वीकार कर लेने को निमंत्रित करता है:
“आदित्य से मिलने जा रहे हो? अतिथि! हमारा आतिथ्य अर्घ्य तो स्वीकार करते जाओ।“

“कृतार्थ हुये पूज्य! ...लेकिन नहीं रुक सकते। चन्द्रभागा देवी के सान्निध्य में हमें उसकी आलस भरी लाल आँखें देखनी हैं। रुके तो विलम्ब हो जायेगा। तुम्हारा निमंत्रण अनजाना भी है। जाने इन तटों पर ऐसे स्थान हों जो हमारे लिये संकटकारी हों! नागों की भूमि है यह। धन्यवाद ... नहीं रुक सकते।“

लगता है बाबा समुद्र रूठ गये। उनकी रह रह घह घह है। कहाँ हो आदित्य?
भूदृश्य पर, क्षितिज पर, सब पर वर्णहीनता का प्रसार है। हे गैरिक! आओ न, रंग बिखेर जाओ।

 आकाश में सर्वत्र मेघ हैं। तट पर जनरव है। दर्शनाभिलाषियों की प्रतीक्षा है किंतु यहाँ के वासियों को इनसे क्या लेना देना? यह तो प्रतिदिन होता है। जीवन को आगे बढ़ाने हेतु लहरों से संघर्ष है -  क्षितिज पर मछुआरों की नावें उबड़ खाबड़ उद्धत नृत्य कर रही हैं। वे श्रमसीकर बहा रहे हैं। खारा पानी, खारी लहरें, देह में दौड़ता रक्त – खारा प्रवाह। अपनी उपस्थिति जताता रक्त – खारा पसीना बह चला है। उमस है। कहाँ हो सवितृदेव? अहं आह्वये!
हिरण्यपाणिमूतये सवितारमुप ह्वये। स चेत्ता देवता पदम्॥
विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः। सवितारं नृचक्षसम्॥
समय 5:25। नभ में नील नहीं, रेत जमी है। कारी, धूसर, सफेद। कोई दर्पण है ऊपर जो नीचे को प्रतिबिम्बित कर रहा है।
2012-05-29-592
हुस्स! उसमें हम कहाँ हैं? लहरें कहाँ हैं? किनारे की लघु हरीतिमा कहाँ है?
आदित्य ने आज गोपन उदय का निर्णय लिया है। नहीं दिखेंगे? तीन पगों में पृथ्वी को नाप लेने वाले वामन का यात्रा आरम्भ हमें नहीं दिखेगा।
...विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्॥
 बादलों के पीछे उदय कब का हो चुका है।
2012-05-29-602तट पर रहने वाले मछुआरों की झोपड़ियों से आ कर एक सूअर दौड़ रहा है। वामन अवतार तो नहीं दिखे, वाराह अवतार दिख गये!
वेदों के विष्णु ही सूर्य हैं। उन्हें आदित्य वर्ग का सौर देवता कहा गया है।
सूर्य न हो तो बाबा समुद्र की आर्द्रता नभ में कैसे पहुँचे? पर्जन्य कैसे उमगें? अक्षार वर्षा से धरा तृप्त कैसे हो? रत्नगर्भा से चमकते अन्नकण कैसे निकसें? भूख कैसे मिटे? जग का पालन कैसे हो?
 जगत के पालनकर्त्ता सूर्य ही विष्णु हैं। संसार में चहुँओर इनकी पूजा होती रही है। मिस्र, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, मध्यपूर्व आदि आदि सब ओर उनके आराधनस्थलों के अवशेष अपनी समूची भव्यता के साथ आज भी देखे जा सकते हैं। भारत में क्या हुआ था? चन्द्रभागा! कहाँ हो? बताओ न! 

तट पर कृष्णपुत्र साम्ब द्वारा स्थापित चन्द्रभागा मन्दिर दिख रहा है। मैं सुदूर पीछे इतिहास के उस आवरण को पार कर चुका हूँ जिसे मिथक कहते हैं...   
...परिपाटी विद्रोही कृष्ण। समुद्र पार कर यमलोक से गुरु की संतति को वापस लाने वाले कृष्ण समुद्र तट के वासी पंचजनों के मित्र बने। उनसे उन्हें वह महाशंख भेंट में मिला जो कि उनकी पहचान बन गया – पाञ्चजन्य! जब पृथ्वी के शत्रुओं से भय हुआ तो जलधि की ओर भागे कृष्ण, समुद्र के पश्चिमी तट पर एक योजनाबद्ध नगर ने रूप विस्तार लिया – द्वारका।
अपने जीवन में ही अवतारी मान लिये गये कृष्ण जल तत्त्व के महत्त्व को जानते थे। उस विश्वात्मा को नारायण यूँ ही नहीं कहा गया:
पतिं विश्वस्य आत्मा ईश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम्।  
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्॥
नार+अयण, जो नर शरीर के भीतर के जलतत्त्व को बखूबी जानता है। सूर्य और जल की मैत्री जीवन के लिये आवश्यक है। कहते भी हैं – सूर्यनारायण।
द्वारकाधीश के महल के पीछे गोमती नदी बहती थी। समुद्र से उसके पावन संगम स्थल किनारे कृष्ण का आवास था। मीठे पानी का स्रोत पीछे और आगे विशाल खारा जलधि। यहाँ विद्रोही जीवन पर धरती की ओर से आपदायें नहीं आ सकती थीं। समुद्र के पंचजन उनके साथ थे। दूर यमलोक से व्यापार की कड़ियाँ निर्मित हो गईं। कृष्ण का यदुवंश सुरक्षित हो गया।
ऐसे में सूर्य समान ज्योति वाली स्यमंतक मणि के रखवाले और स्थानीय भूमि के जनप्रमुख जामवंत की पुत्री के साथ कृष्ण ने विवाह किया। उनसे एक अद्भुत रूपवान पुत्र हुआ। संहारक देव सोमनाथ यानि शिव की आराधना कर कृष्ण ने वह पुत्र पाया। उन्हों ने समुद्र तट पर सोमनाथ का चन्दनचैत्य बनवाया।
यह वही स्थान था जहाँ चन्द्रपूजकों के मुखिया ने अनुष्ठान कर स्वयं को कुष्ठ और क्षय रोगों से मुक्त किया था।  सोम यानि चन्द्रमा। शीतल चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव की प्रचंड दाही सूर्यस्वरूप विष्णु द्वारा यह कैसी आराधना थी? दो विरुद्धों, ऊष्मा यानि जीवन और शीतलता यानि मृत्यु, को जोड़ने वाला यह कैसा आयोजन था?
 कृष्ण ने यादवों में क्षरणशील वृत्तियों को भाँप लिया था। कहा जाता है कि भविष्य की एक योजना के अनुसार वह चाहते थे कि उनका शंकर स्वरूप पुत्र यदुवंश के संहार का कारण बने।
पुत्र का बचपन बीता लेकिन अपनी माँ और कृष्ण की तमाम पटरानियों का साथ उस पुत्र ने नहीं छोड़ा। कृष्ण ने नाम रखा – साम्ब यानि स+अम्ब, सर्वदा माँ के साथ रहने वाला। माताओं की संगति में लाडला पुत्र उद्धत हो गया और कृष्ण के लिये कई उलझनों का कारण भी। सुयोधन की पुत्री लक्ष्मणा का स्वयंवर से हरण कर उसने कुरुवंश तक को चुनौती दे डाली! बलराम के बीच बचाव से वह विवाह सम्पन्न हुआ।
कृष्ण को अपना यह उद्धत पुत्र अलग तरह से प्रिय लगता था। सुन्दर पुत्र को कोढ़ हो जाय तो पिता क्या करे?
किसी भी तरह की आपदा से सुरक्षित यादव उच्छृंखल हो चले थे। उन्हें केवल एक नाम अनुशासित रख सकता था – कृष्ण, जो कि एक अवतारी था। उसके पुत्र को कोढ़ हो गया! दैवीयता पर प्रश्न का अर्थ था – नियंत्रण और साख में कमी। सूर्यविद्या का ज्ञाता नारायण अवतारी कृष्ण अपनी लाज कैसे बचाये?  
  कृष्ण को राह सूझी। साम्ब का माताओं से प्रेम जगजाहिर था, यह भी कि वह रनिवास में ही घुसा रहता था और सामान्य वयस्क शिष्टाचारों की भी परवाह नहीं करता था। छलिया ने तमाम प्रवाद फैला दिये।
कोई कहता कि कुरूप नारद को देख साम्ब ने उनकी हँसी उड़ाई तो नारद ने उसे मद्य पिला उस समय रनिवास भेज दिया जब कृष्ण की पटरानियाँ एकांत में पानरत थीं। मद्य के मद में चूर रूपवान पुत्र को देख वे कामवश अठखेलियाँ करने लगीं। कृष्ण ने देखा और पुत्र को कोढ़ी होने और पटरानियों को भविष्य में अपहरण कर लिये जाने का शाप दे दिया।
कोई कहता कि उद्धत साम्ब रात में उस समय अपनी माँ के कक्ष में चला गया जब वह कृष्ण के साथ सुरतलीन थीं। क्रोधित कृष्ण ने उसे कोढ़ी होने का शाप दे दिया।
मिथकीय युग में भी अफवाहों का बोलबाला था!
लोग समझे कि भगवान ने अपने पुत्र के अपराध को भी क्षमा नहीं किया और मर्यादा का अतिक्रमण सहन नहीं किया जायेगा। कृष्ण ने स्थिति सँभाल ली थी।
खारा पानी, मीठा पानी, संगम, सूर्य किरणें और चन्द्र किरणें – कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिये जो प्रक्रिया होनी थी उसके लिये ये आवश्यक थे। कृष्ण चाहते तो वहीं आयोजन कर सकते थे, सारे उपलब्ध थे और सोमनाथ का उदाहरण सामने था लेकिन वह तो पालनकर्त्ता विष्णुरूप भी थे।
भविष्य के महाविनाश के पश्चात क्या होगा? यादव इस क्षेत्र में जाने क्या क्या करेंगे? प्रभास, पाटन, रैवतक, द्वारका आदि क्षेत्रों का क्या होगा?
विकल्प आवश्यक था। बीज वपन हो जाय फिर चाहे साम्ब रहे या न रहे - एक पंथ दो काज।
उन्हों ने कर्क वृत्त के निकट का वह क्षेत्र चुना जो पूर्वी समुद्र का किनारा था – अर्कक्षेत्र!
...कोणादित्य की उपचारी किरणें, पेय जलयुक्त और चन्द्र की शीतलता में नहाती खारे पानी के समुद्र से संगम करती नदी चन्द्रभागा।
 समुद्र तट से व्यापारिक मार्ग तो मिल ही जायेंगे। भविष्य के विध्वंस ग्रस्त पश्चिमी तट से दूर बहुत दूर पूर्वी तट का यह स्थान नयी स्थापना और सृजन के लिये उपयुक्त होगा।...
साम्ब को प्रस्थान का आदेश मिला और समय मिला बारह वर्ष। पारम्परिक पुरोहित वर्ग ऐसे किसी भी अनुष्ठान में भाग लेने से इनकार कर गया। वैसे भी ऐसे पतित के लिये क्यों कुछ करना जो अपनी माताओं से ही ...
 कृष्ण के लिये यह कोई समस्या नहीं थी। शक(सकल)द्वीप या मगदेश (वर्तमान ईरान) के सूर्यपूजकों से उनका सम्पर्क था। वहाँ से अठ्ठारह सूर्यध्वज पुरोहित बुलाये गये। मित्र और वरुण की धरती से आये मेघ मित्र मिहिर यानि सूर्यपूजक सकलद्वीपीय ब्राह्मण – कृष्ण के मित्र। अर्कक्षेत्र का एक नाम मित्रवन भी हो गया।
उनके साथ आईं उनकी कहानियाँ, उनके मिथक...पहले मग आचार्य पहले ब्राह्मण सुजिह्वा की पुत्री निक्षुभा और स्वयं सूर्यदेव के संयोग से उत्पन्न हुये, सकल ब्राह्मणों में श्रेष्ठ...  
बारह वर्षों तक चन्द्रभागा और समुद्र का संगम स्थल अनुष्ठान का साक्षी रहा। आह्वान होते रहे:
यन्नासत्या परावति यद्वा स्थो अधि तुर्वशे।
अतो रथेन सुवृता न आ गतं साकं सूर्यस्य रश्मिभिः॥
त्रिवृत्त त्रिकोण अवलम्बित रथ से सूर्य किरणों पर सवार स्वयं अश्विनीकुमार आ कर साम्ब को स्वस्थ कर गये:
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता सुपेशसा रथेना यातमश्विना।
मग ब्राह्मण समूचे भारत में फैलते चले गये – कश्यप देश से चोल देश तक, लाटदेश से कामरूप तक सूर्यमन्दिरों और सूर्यपूजा की एक समांतर पद्धति प्रतिष्ठित हो गई।
गोवर्धन पूजा कर इन्द्र को अपदस्थ करने वाले कृष्ण के पुत्र ने सूर्यपूजा के प्रसार को सुनिश्चित कर दिया जिसके बीज वेदों के विष्णुसूक्त और उससे सम्बन्धित ऋचाओं में थे। देखते देखते इन्द्र, मरुत, अग्नि, पर्जन्य जैसे प्रत्यक्ष देवों का स्थान गूढ़ विष्णु नारायण ने ले लिया।  
इस विकल्प को कोई भारी उलट फेर ही मिटा सकती थी। परम्परा ने तिरस्कारी प्रतीक्षा को अपनाया – सकलदीपी तो ब्राह्मण होते ही नहीं!...
...मैं वर्तमान में लौट आया हूँ। तट पर लोग बढ़ गये हैं। बच्चे खेल रहे हैं। रेत पर बैठ समीर का आनन्द लेने लगा हूँ। दूर लहरों के साथ क्रीड़ा करतीं नावों को देखते मन डोलता है।
परम्परा कहती है कि वर्तमान बिहार कभी सकलदीपियों का एक बड़ा क्षेत्र था जहाँ सूर्योपासना चरम पर थी। पारम्परिक पुरोहित उसे हेय दृष्टि से देखते थे। कहीं इन्हीं मग ब्राह्मणों के कारण ही तो मगध नाम नहीं पड़ा? जो कि आज भी हेय क्षेत्र माना जाता है?
आज भी सूर्यपूजा का छ्ठ पर्व बिहार का सबसे बड़ा पर्व है। भारत में कहीं  और ऐसा आयोजन नहीं होता और आज भी समूचे अनुष्ठान में पारम्परिक पुरोहितों की न आवश्यकता है और न विधान, कोई जबरी कर ले तो कर ले!
चन्द्रभागा! क्या तुम बता सकती हो? ऐसा ही है क्या? तुम्हारे तट पर साम्ब द्वारा बनवाया गया मन्दिर तो देख लिया लेकिन तुम कहाँ हो?

साम्ब और चन्द्रभागा की स्मृति में, रोगमुक्ति की आस में हर वर्ष माघ शुक्ल सप्तमी तिथि को लोग जिस नदी में स्नान करते हैं, पर्व मनाते हैं; वह नदी कहाँ है?
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मन्दिर के दूसरी ओर सौ डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर है कथित चन्द्रभागा नदी या झील, जो कह लें  - एक जलभराव जैसा है कुछ।  
 मर गई चन्द्रभागा, दूर पश्चिम में मृत सरस्वती के स्यमंतपंचक कुंडों की तरह ही है यह अवशेष!
कृष्ण के युग में सरस्वती लुप्त हो चली थी और उनके बाद के युग में वैकल्पिक अनुष्ठान की साक्षी चन्द्रभागा!
काल किसी को नहीं छोड़ता...
...चन्द्रभागा ही वह नदी है जिसके वक्ष पर चलती काष्ठनौकाओं में लगभग साठ किलोमीटर की दूरी से वे पत्थर लाये गये थे जिनसे कोणार्क के सूर्य मन्दिर का निर्माण हुआ। उस समय कोणार्क के आँगन का अभिषेक समुन्दर दादा करते थे – निलछौहीं देह, श्वेत केश, श्वेत श्मश्रु, श्वेत वेश। सामने विशाल प्रस्तर रथ में आदित्य। कितना भव्य रहा होगा परिकल्पना का मूर्तिकरण!
दादा अब चार किलोमीटर पीछे आ गये हैं। सुना है उनकी लहरों की स्मृति में मन्दिर काला पड़ता जा रहा है – काला मन्दिर यानि Black Pagoda...
 चन्द्रभागा संगम विन्दु पर अब गहरी और ऊँची बालुकाराशि है।
सूर्य ने कुछ नहीं किया था, सन् 1250 ई. में मन्दिर पूर्ण होने तक राजा नरसिंहदेव ने बारह वर्षों तक चन्द्रभागा नदी की धार और संगम स्थान के साथ छेड़छाड़ की। पहले से ही क्षीण संतप्त नदी ने आत्महत्या कर ली, उसके आशीर्वाद पत्थरों में घनीभूत हो गये। जड़ ऐसे ही चेतन होता है और निर्जीव सजीव भी।  
किंतु आम जन ने इस अपराध को क्षमा नहीं किया। सकलदीपी ब्राह्मणों के आदि पुरुष वाले मिथक ने राह बदली और कालांतर में सूर्यमन्दिर के ध्वस्त होने पर लोककथा सामने आई:
चन्द्रभागा के साथ सूर्य ने दुर्व्यवहार किया। पुत्री की आत्महत्या से क्षुब्ध सुमन्यु ने शाप दिया और कोणार्क ध्वस्त हो गया।
सुजिह्वा, सुमन्यु, जिह्वा, मन्यु...जिह्वा पर नियंत्रण नहीं, छिपा क्रोध रिसता रहा। लोग भूलते गये।  
शापित नहीं, चन्द्रभागा के आशीर्वादों की स्थापना है कोणार्क का सूर्यमन्दिर!   
समय 6:02। तट की मन यात्रा समाप्त हुई।
 2012-05-29-617
आकाश में मेघों के पीछे से आदित्य झाँक रहे हैं।
झिड़की दे रहे हैं – चन्द्रभागा के साथ इतना समय लगा दिया! कहीं तुम भी तो...
नहीं देव!... बस आशीर्वाद सँजो रहा था। मैं आ रहा हूँ। आप तो पिता हैं, जल को वाष्पित कर, हवि ले दे कर समस्त भूतों का पोषण करते हैं - हविषा जारो अपां पिपर्ति पपुरिर्नरा। पिता कुटस्य चर्षणिः॥
अब जब कि आप की स्वर्ण चमक नभ में उठ चुकी है, मुझे देखना है कि अचर प्रस्तरों में प्राण भी होते हैं।
2012-05-29-614
देवज्योति नभ में उत्थित, मित्र वरुणाग्नि नेत्र सम
चर अचर आत्मा समस्त, सूर्यमय वायु पृथ्वी नभ।
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥

2012-05-29-707

20120529-053323
 (जारी)
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यात्रावृत्त जारी है और सबसे प्रिय ब्लॉग की खोज भी।
आप लोग अपना मत व्यक्त करते रहिये।
अंतिम तिथि : 07/06/2012

18 टिप्‍पणियां:

  1. पुरी से कोणार्क के बीच की दूरी कई स्थानों पर रुक रुक कर पूरी की। वहाँ के सौन्दर्य में देवत्व बसता था।

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  2. अद्भुत आख्यान! किन-किन स्रोतों से लिये हैं आपने ये कथानक जानने की जिज्ञासा है।

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    1. महाभारत, हरिवंश, भागवत सहित कई पुराणों में आख्यान बिखरे हुये हैं। समय समय पर उन्हें पढ़ते हुये अंतर्दृष्टि विकसित होती रही। कन्हैयालाल मुंशी की कृष्णावतार शृंखला का आभारी हूँ जिसने समझ को पक्की किया। छान्दस अंश ऋक़् संहिता से लिये हैं।
      चन्द्रभागा अंश तथा छ्ठ पर्व और बिहार के सम्बन्ध को लोकगाथाओं और अपनी सहज समझ से विकसित किया। सकलदीपियों एवं साम्ब का इतिहास एक ही स्थान पर अंग्रेजी विकिपीडिया में मिल गया।

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    2. अभी तक उड़ीसा नही गया हूँ, बहुत बड़ी ग़लती की है. महाभारत और भागवत का अध्ययन बहुत पहले किया था, भूलने भी लगा हूँ सब, यादें तरो-ताज़ा करनी पड़ेगी, लेकिन उस से पहले- अबकी बारी उड़ीसा...

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    3. सकलदीपी ब्राह्मणों पर विकि का आलेख पूरा नहीं पढ़ा था। अपनी समझ पर इतना भरोसा था कि बिहार, मगध, सकलदीपियों और छ्ठ पर्व के सम्बन्ध को बिना किसी दो राय के लिख दिया। आज उन्हीं आलेखों को पढ़ते प्रसन्नता हुई कि मेरी समझ एकदम सही थी। मेरे अनपढ़े एक पुराण में इसके संकेत हैं और अन्य विद्वानों ने भी इन तथ्यों को रेखांकित किया है। तो मगध नाम मग ब्राह्मणों के कारण ही पड़ा।
      कुछ और नई बातें पता चलीं - चाणक्य, पुष्यमित्र शुंग और वाराहमिहिर तीनों सकलदीपी ब्राह्मण थे। सम्भवत: भगवती चरण वर्मा की स्थापना थी कि विष्णुगुप्त, विष्णु शर्मा और वात्स्यायन तीनों एक ही व्यक्ति हैं। चाणक्यनीति, पंचतंत्र और कामसूत्र एक ही व्यक्ति की रचनायें हैं। ...

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  3. गज़ब! और चित्र भी कितना शानदार संजोया है।
    दिव्य यात्रा!

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  4. कमाल के फोटो लगी हैं आपने।
    वर्षों पहले गए थे, यादें ताज़ा हुईं।

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  5. अद्भुत यात्रावृतांत, वर्तमान भ्रमण के साथ साथ ग्रंथ आरोहण सहित अतीत यात्रा!! कमाल का प्रस्तुतिकरण और मनभावन छायांकन!!

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  6. वापसी का स्वागत है। गम्भीर पोस्ट है, आराम से वापस आकर पढूंगा!

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  7. अद्भुत पोस्ट है.शानदार प्रस्तुतिकरण.

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  8. ~~~~~~~~~जड़ ऐसे ही चेतन होता है और निर्जीव सजीव भी। ~~~~~~~
    ऐसा अनूठा यात्रा वृतांत पहली बार पढ़ा .[जिसे समझते हुए पढ़ना पढ़ा .]
    कभी पहेलियों के ज़माने में कोणार्क मंदिर, उड़ीसा पुरी यात्रा के बहुत ही सुन्दर अद्भुत चित्र ताऊ रामपुरिया जी ने दिखाए थे .तब पहली बार इस स्थान को स्वयं देखने की उत्सुकता बढ़ी थी.

    संग्रहणीय एवं ज्ञानवर्धक लेख.

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  9. समुद्र सभ्यता का आदि पुरुष है. अनुपम.

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  10. रोचक रूप से दी गई अद्भुत जानकारी...भूत और वर्तमान के झोंके भी अच्छे लगे संतुलन बना रहा...

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  11. बस यही तो चाहिए था तृषित मन को ..

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