हर अदमी परेसान ह, हर अदमी त्रस्त ह
मार पटक के जे कहे पन्द्रह अगस्त ह।
आज स्वतंत्रता दिवस है। मुझे स्वयं को या किसी को बधाई देने का मन नहीं कर रहा। कल से ही चकाचक बनारसी की काशिका में रची उपर्युक्त पंक्तियाँ मस्तिष्क में घन मार रही हैं। इसे निराशा कहें, कुंठा कहें या चाहे जो कहें, वस्तुत: मैं निराश हूँ और जबरन दाँत चियारते किसी को शुभकामना सन्देश देना कष्टदायी लग रहा है। स्वतंत्र माने ‘अपना तंत्र’ – स्वाधीन जिसका कि पराधीन के उलट अर्थ ‘अपने अधीन’ होता है, इसके पासंग नहीं आता। 64 वर्ष हो गये हमें पराधीनता से मुक्त हुये और हम ‘स्वतंत्रता’ को लेकर कोई बहानेबाजी अब नहीं कर सकते। अर्थ यह कि जो भी स्थिति है, हम उसके लिये स्वयं उत्तरदायी हैं। सुराज तो छोड़ दें, स्वराज की स्थिति भी है?
(पाँचवी में पढ़ता था जब इस अवसर पर पहली बार स्टेज पर पिताजी द्वारा तैयार किया अंग्रेजी भाषण पढ़ा था। उसका अंत कुछ इस तरह का था – We, the children, shall be future units of the union which is India. In our strength will be strength of the nation and we shall strive for it. उस समय नहीं पता था कि संघ (union) और गणराज्य (republic) में क्या अंतर होता है? बस रटने के बाद उनकी समझावन से यह लगा था कि it स्वयं और देश दोनों की शक्ति के लिये प्रयुक्त हुआ था और 3-4 मिनट लम्बे भाषण के इसी अंतिम अंश पर मैं लड़खड़ाया था। आज लगता है कि हमारी पूरी पीढ़ी ही लड़खड़ा गई है)।
मुख पर कालिख पोते निर्लज्ज भंडों की टोलियाँ हमारे मुँह पर थूक रही हैं और हम हैं कि पोंछे कि न पोंछें, यही सोच रहे हैं। वे कह रही हैं कि उन कलमुहों के काले कारनामों पर अंकुश लगाने की बात तक करने वालों को मनुष्य नहीं निष्पाप देवदूत होना होगा। अण्णा हों या रामदेव, उनके चरित्रहनन में लगे चमचों और उनके मूक समर्थक सत्ताधीशों को न अपने किये पर लाज है और न इस चुनौती की परवाह कि ज़रा अपने दामन को भी तो देख कर बोलें। अण्णा और रामदेव तो फिर भी कुछ हैसियत रखते हैं, ज़रा सोचिये अगर कोई आम आदमी भ्रष्टाचार के प्रश्न उठाता तो ये क्या करते? तुमने हाउस टैक्स का मूल्यांकन ठीक से नहीं कराया, तुमने तीन साल पहले बिजली के मीटर में गड़बड़ी की थी ... आदि आदि जाने कितने ही घेरे घेर कर ये उसे चन्द घंटों में ही पस्त कर देते!
फिर भी हम उनके बेहूदे तर्कों को सुन रहे हैं और अब लोग कहने भी लगे हैं कि इसमें इन दोनों का स्वार्थ है – एक को एन जी ओ को बचाना है तो दूसरे को फ्रॉड से अर्जित सम्पत्ति साम्राज्य की चिंता है। जब तक इन लोगों ने मुहिम नहीं छेड़ी थी तब तक ये ठीक थे, अंगुली उठाते ही इन पर हाथ पड़ने लगे। कैसा ‘स्व-तंत्र’ है यह जो हर व्यक्ति को भ्रष्ट होने की पूरी स्वतंत्रता देता है ताकि बाद में वह बड़े घोटालों पर कुछ कहने लायक भी न रहे?
मालिकों ने जनता को पालतू कुत्तों जैसा बना दिया है। मतदान के रूप में लोकतंत्र का जो व्यवहार पक्ष सामने है वह अपने आप में इतना अधूरा और दोषयुक्त है कि उससे किसी ‘लगातार सार्थक परिवर्तन’ की प्रक्रिया के प्रारम्भ होने और उसके सतत जारी रहने की कोई आशा नहीं की जा सकती। सत्ता का नहीं, भ्रष्टाचार का विकेन्द्रीकरण हुआ है। सुनियोजित भ्रष्ट तंत्र की पैठ गाँवों तक हो चुकी है और आम आदमी की हालत वही है जो एक भद्दी कहावत में बयाँ होती है – मुँह में पान और _ड़ में बाँस माने मुँह भी लाल और _ड़ भी। लाली लाली के फर्क की और दर्द की मीमांसा आप करते रहिये और उधर लूट तंत्र चलता रहे।
कुछ लोग कहते हैं कि यह तो जनता का ही शासन है और जनता भ्रष्ट है। यह एक आदर्शवादी कथन है जो नमक में दाल पर आँख मूँदता है और दाल में नमक पर नाक भौं सिकोड़ता है – अरे कम है, अरे अधिक है। ये ठीक नहीं है। यह कथन सुनने में बड़ा लुभावना लगता है जिसकी तार्किक परिणति वही होती है कि हमारे ऊपर अंगुली भी उठाने के लिये तुम्हें आदर्शों का आदर्श सुपरमैन होना होगा (होने के बाद की तो तब देखेंगे, अभी तो तुम्हारा दामन ही दागदार है!)
एक वर्ग ऐसा भी है जो इसे मध्यवर्ग का सुरक्षात्मक आक्रमण मानता है ताकि उसके सुविधाजीवी स्वभाव और जीवनशैली पर कोई आँच न आये। एक वर्ग ऐसा भी है जिसे यह सब नाटक जंगलों में फल फूल रही ‘क्रांतिकारिता(?)’ के विरुद्ध सेफ्टी वाल्व जैसा लगता है माने कि अण्णा या रामदेव जैसे लोग सफल हो गये तो हो गई क्रांति की ऐसी तैसी! जितने दिमाग उतने तर्क, करने धरने को कुछ नहीं और सबकी _ड़ लाल (मुँह में क्रांति और पान की लाली तो है ही)।
इन सब बुद्धिभोजियों के पास कोई विकल्प नहीं लेकिन कोई कुछ करेगा तो दंड अवश्य पेलेंगे। पिछ्ले 64 वर्षों में इन सब ने बस व्यर्थ की बहसें की हैं और जब भी कोई अलग सी बयार बही हैं, पहली उबासी भी इन्हीं लोगों ने ली है।
ऐसे जन जाने अनजाने सत्ताधीशों के पैदल बन जाते हैं और उनकी चालों के आगे आगे ये चलते हैं। परिवर्तन की किसी भी चाल को ये लोग पाखंड या निहित स्वार्थ का खेल बताते हैं। यह सब कहते वे अपने ही उन तर्कों को भूल जाते हैं जिनके अनुसार पाखंड और स्वार्थ के खेल अधिक दिन नहीं चल पाते। भैया! अब तक आप खेलते खाते रहे (और खेलते खाते जा रहे हो), ज़रा उन्हें भी तो अवसर दो। लोकतंत्र है, इतना तो समझो।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलनों का विरोध करने वालों या उसके घटकों पर प्रहार करने वाले निठल्ले बुद्धिभोजियों के लिये रोटी, कपड़ा और मकान की पूर्ति की चिंता में व्यस्त मैं, एक मध्यवर्गी, यही कहूँगा।
हाँ, हम एक साफ सुथरा वातावरण और समाज चाहते हैं। हम चाहते हैं कि हम जो टैक्स जमा करते हैं, उसका यहीं सदुपयोग हो न कि वह घूम घाम कर विदेशी बैंक खातों में पहुँचे। हो सकता है कि हमने छोटी टैक्स चोरियाँ की हों, उनका हिसाब तुम जब चाहे कर सकते हो लेकिन हमें तुम्हारी वे मोटी चोरियाँ एकदम बर्दाश्त नहीं हैं जिनका कि न कोई हिसाब था और न है, जो बस बेहिसाब हैं। हम पाखंडी हैं लेकिन हमसे अब बर्दाश्त नहीं होता। हम ऐसे ही हैं और वह शक्ति हैं जिसकी तुम उपेक्षा नहीं कर सकते। तुम्हें लफ्फाजी और खुरपेंची चालों को छोड़ कर कुछ न कुछ ठोस और सार्थक करना ही होगा। सँभल जाओ, बहुत हुआ (अब आपातकाल की न सोचने लग जाना!)
सोमवार, 15 अगस्त 2011
बुधवार, 10 अगस्त 2011
…land of cows, bulls and bullshit
ऑस्ट्रेलिया में किसी रेडियो जॉकी ने India को shit hole और गंगा को junkyard कह दिया तो वहाँ बवाल हो गया। भारतीय समुदाय ने लड़ने को कमर कस ली। गाय और गंगा को पवित्र मानने वाले देश के लिये तो वाकई यह अपमानजनक है। shit hole विशेषण/संज्ञा सोच में डालती है।
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| इतिहास रूपक - राजा पृथु ने गाय रूपधारी पृथ्वी का दोहन कर मनुष्यों के लिये धान्य का उपाय किया। 'पृथ्वी' नाम उन्हीं से पड़ा। चित्राभार - विकिपीडिया |
बहुत बार लगता है कि India i.e. land of cows, bulls and bullshit.
Bullshit गोबर का slang है और बकवास के लिये प्रयुक्त होता है। आप उत्तर भारत के छोटे बड़े नगरों में देखिये, सड़क पर cows, bulls और bullshit(literally) की भरमार है। ऑस्ट्रेलियन रेसिस्ट की बात पर ही सही, हमें एक बार अपने दामन में झाँकना चाहिये। नई विकसित होती कॉलोनियों में देखिये, पाँच छ: घर आये नहीं कि उनमें से ही कोई किसी भैंस वाले को लेकर आयेगा और पड़ोस के खाली प्लॉट पर या पार्क के लिये छोड़ी गई जगह पर भैंसियाना खुल जायेगा। शुद्ध दूध को लेकर हम इतने सम्मोहित हैं कि भैंसियाने की आड़ में बसती अवैध झुग्गियाँ, उनमें रहते असामाजिक तत्त्व, घुसपैठिये, छेड़खानियाँ, चोरियाँ, सड़कों के बीचोबीच बैठे गाय, भैंस, लोगों में आतंक फैलाते साँड़ आदि की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता या हम जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। शुद्ध दूध के समर्थन में और तमाम असुविधाओं के लिये सरकार आदि पर दोष मढ़ने के लिये हम तमाम तर्क गढ़ लेते हैं जिन्हें simply bullshit कहा जा सकता है और हमारे दिमाग को shit hole जिसमें से bullshit टाइप आइडिया और तर्क निकलते रहते हैं। ऑस्ट्रेलियाई ने कुछ ग़लत नहीं कहा।
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| धन्य गोधन! |
नई पुरानी कॉलोनियों के नाली सीवर हों या हमारी नदियाँ, उनमें कूड़ा फेंकने में हमें कोई गुरेज नहीं। घर चमचमाता रहेगा लेकिन बाहर अपने ही फेंके सड़ते कूड़े से हमें कोई परेशानी नहीं होती। 50 रुपया महीना तक कूड़े वाले को देने को तैयार नहीं। फेंका गया कूड़ा उड़ कर, पानी के साथ बह कर या सीधे फेंक दिया गया कूड़ा सीवर और नालियों को चोक कर देता है और फिर मुहल्ले की सड़क बहुत बड़ा नाबदान हो जाती है जिसमें सूअर लोटते हैं और हम सरकार को कोसते हुये बदस्तूर अपने shit कर्म में लगे रहते हैं। जैसा हमारे समाज में दिखता है वैसा ही हमारी सिविक बॉडीज में। बिना किसी प्रॉपर ट्रीटमेंट के या मानकों की परवाह किये नदियों में गन्दा पानी और औद्योगिक कचरा बहा दिया जाता है। नतीजन पानी प्रदूषित होता है। मछलियाँ और पानी में रहने वाले अन्य जीव मरते हैं। कभी कभी हो हल्ला मचता है लेकिन उस पर लीपा पोती करते हुये हमारे सिविक अधिकारी यथावत अपने काम में लगे रहते हैं। ऐसे कितने ही सीवर सिस्टम हैं जो ऑउटलेट से जुड़े ही नहीं हुये हैं। जरा सोचिये अगर वे भी जुड़ गये तो क्या हाल होगा? केवल गंगा ही नहीं, हमने लगभग सारी नदियों को junkyard बना दिया है। उस रेडियो जॉकी ने क्या ग़लत कह दिया?
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी ने भारत के बारे में ऐसा कहा हो। त्रिनिडाडी-ब्रिटिश लेखक वी एस नयपाल ने जब भारत के बारे में ऐसा कुछ लिखा जिसमें Toilet that is India का भाव था तो जोरों की बहस हुई थी। उन्हों ने लिखा था – Indians defecate everywhere. They defecate, mostly, beside the railway tracks. But they also defecate on the beaches; they defecate on the hills; they defecate on the river banks; they defecate on the streets; they never look for cover..
जब ऐसी बातें बार बार होती हैं तो हमें सचाई को स्वीकारना चाहिये। दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव का प्रश्न अपनी ज़गह है, पहले तो यह देखना है कि हम कैसे रहते हैं?हमारी क्वालिटी ऑफ लाइफ क्या है? नागरिक लापरवाही के ऐसे दबाव के चलते क्या सिविक प्रशासन साफ सुथरा वातावरण हमें दे सकता है या बनाये रख सकता है?
नागरिक अगर सँभल जाँय और सिविक सेंस के साथ रहने लगें तो आधी से भी अधिक समस्यायें हो हीं न और जो हैं वे समाप्त हो जाँय। सिविक सिस्टम पर जो अनचाहा लोड है, उनके बजट पर जो बोझ है, वे सब हमारी जरा सी जागरूकता से बहुत कम हो जायेंगे तब सिस्टम बेहतर काम कर पायेगा और हम भी उस पर सही काम करने के लिये बेहतर दबाव बना सकेंगे। सोचिये, क्या आप तैयार हैंbullshit से मुक्त एक ऐसे भारत को बनाने के लिये जो shit hole नहीं और जिसकी नदियाँ junkyard नहीं? ज़रूरत है कि हम खुद सुधरें और दूसरों से इसके लिये निवेदन करें।
(इस पोस्ट का सतीश पंचम के 'क्या' वाद से कुछ नहीं लेना देना।) 
गुगल+ पर जब मैंने 'यथार्थ गीता' वाले स्वामी अड़गड़ानन्द की इस उक्ति को शेयर किया - The cow, an animal, is not Dharma - तो India News नामधारी किसी सज्जन ने अपनी विकृतियों को उजागर करते हुये मेरी माँ, बहन कर दी। आप लोग वैसा न कीजियेगा, बस सोचियेगा कि हमारी सोच में कितना bull shit भरा हुआ है।
cows-indian-roads
चलते चलते एक और निवेदन। यहाँ अवश्य पहुँचें और पढ़ें:
Hall of Shame
शनिवार, 6 अगस्त 2011
सोहनी अब कहाँ नहायेगी?
सुगना सोहनी को देखता रहता है। सबेरे की बेर साया सीने के ऊपर तक बाँध कर नहाती है सोहनी, मजाल क्या कि कोई ऐसा वैसा अंग दिख जाय। यादो जी ने प्लाट पर पानी का कनेक्शन नहीं लिया तो क्या, जोगाड़ में कितनी देर लगती है? सुगना ने वो जोगाड़ किया है कि कोठियों में पानी भले न आये, उसके यहाँ चौबिसो घंटे आता है। अगल बगल की सभी लुगाइयाँ पानी लेने आती हैं, लेकिन उन छिछोरियों में सोहनी जैसी बात कहाँ?
बीड़ी के छल्ले उड़ाता सुगना मगन है। सोहनी के माथे सेनुर अच्छा लगता है। बाकी वैसे सेनुर नहीं लगातीं। साँवले मुखड़े की कटिंग खबसूरत है, ठीक परधान जी की पतोहू की तरह। कितना मानती हैं मुझे – सुगना! का कर तरे सहर में जाके? जब भी गाँव जाओ ज़रूर पूछती हैं।
कमातनि अउर का?
गाँवे में कमाई भले कम होखे, सम्पति त एहिजा बा – कहते हुए दुलहिन उदास हो जाती हैं और बबुना किसी न किसी बात पर तड़क उठते हैं। कुछ ज्यादा ही मानते हैं। हरदम चहकती रहती हैं। सोहनी का मरद तो पियक्कड़ है, तभी तो वह यहाँ रोज नहाने की हिम्मत कर पाती है न! कमाऊ मेहरारू क एतनो न सहे तो दारू पिये के कइसे मिले?
सोहनी के हाथ में अँगूठे के पास गोदना है। स्वास्तिक बना है, कोई नाम नहीं। कभी वहाँ सुगना का नाम... हुर्र! ई कइसे होगा?
सुगना ने बीड़ी को मसल दिया है। साँवर मुँह करिक्खा हो गया है। बहुरिया गवने के बाद महीना भितरे भाग गई। बम्मई देखे खातिर गई। दललवा ने बेंच दिया कहीं, कुछ पता नहीं चला। बबुना ने दललवा को पकड़ कर बहुत पीटा था लेकिन उसने मुँह नहीं खोला और लपत्ता हो गया।
जाय दे सुगना, बिधि का लिक्खा होते है।
बबुना हो, कइसन लिक्खा? सम्पति गइल, अब गाँवे कौन मुँह रहीं?
वह सोहनी जैसी खबसूरत नहीं थी, तब्बो वोके... का होई अगर सोहनी के साथे भी कौनो वैसे करे?
सुगना ने बीड़ी सुलगा लिया है। सोहनी जा चुकी है। लेबर चौराहा जाने का मन नहीं। सोय रहो सुगना!
भूख की आग है, रात है। कौन रोटी सेंके - ढाबे पर ही खा लो।
इतनी रात गये सोहनी नहा रही है। आज सुगना पहली बार उससे बोला है – एतना राति के नहा रही हो?
सोहनी तनिक नहीं लजाई है – साफ सुथरा नै रहौं तो सम्पति कैसे आये? सम्पति न आये तो शराब कैसे आये? हम त रोज ऐसहीं रात में नहात हैं।
पोल के लैट में सोहनी पियरा हँसी हँसी है। पियरा हँसी माने दुख के हँसी। सोहनी चली गई है।
तो सोहनी रात में भी नहाती है, किसके लिये? अपने लिये? मरद तो नशे में धुत्त सोता है। सुगना शुरुआती पागल पिल्ले की तरह भटक रहा है। कितना बजा होगा? मोबैल 11 बता रहा है।
काली सकरपी गाड़ी इस समय यहाँ क्यों खड़ी है? दरवाजे खुले हुये हैं। सोहनी आर पार उतान लेटी हुई है। बल्लब की रोशनी की एक लीक हाथ के स्वास्तिक गोदने पर है। तो ये सम्पति है!
सोहनी, भाग चलो हमारे गाँव। हम सहर में नहीं रहेंगे।
सुगना पिट रहा है। साला, कुत्ता! इस समय घूम रहा है? औरतों को छेड़ता है। सोहनी उसके ऊपर लेट गई है। कितनी लातें?
सोहनी, भाग चलो।
उसे छोड़ कहाँ जाऊँ? कैसे जाऊँ?
तुम लोग मुझे समझ में नहीं आती।
यादो जी को बिना बताये सुगना गाँव वापस आ गया है।
दुलहिन खुश हैं। सुगना! अब न जइहे।
दुलहिन के हाथ में पट्टी है। कुत्ते ने काट लिया था। कुत्ता? कैसे??
साँझ है। दुलहिन ने बुलाया है। दुलहिन रो रही हैं। कुत्ते ने नहीं काटा, बबुना ने चक्कू से...सुगना! अब न जइहे।
सुगना जमीन पर स्वास्तिक बना रहा है। सम्पति यहाँ है। सम्पति छोड़ के अब कहीं नहीं जाना।
सोहनी अब कहाँ नहायेगी?
शब्दचिह्न :
कहानी
शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
छ: साँस वर्ष
जब मैं मृत्यु के छ्न्द गढ़ रहा होता हूँ तो तुम पास होती हो। कानों में जीवन की फुसफुसाहट करते नहीं, यह बताते कि मात्राओं और गणों में संगति नहीं। तुम जानती हो कि मैं बहुत पहले ही मर चुका हूँ और अब किसी विज्ञान गल्प के जीवित शव सरीखा स्वयं को ढोये जा रहा हूँ। उसमें तुम कितनी हो?
इतना निर्वयक्तिक कभी नहीं रहा कि प्रेम करूँ और अधूरी(पूरी नहीं कहा मैंने) बात कर पाऊँ। संयोगों की प्रकाश झंझा स्मृतियाँ हैं जिनसे आँखें नहीं चौंधियातीं, वाणी मूक होती है। संयोग इतने लम्बे भी होते हैं? वर्षों लम्बे?? अरबों वर्षों पुरानी धरती पर खरबों वर्ष पुराने प्रकाश कण आते हैं, पहचाने जाते हैं और ज्ञान के पन्ने काले होते जाते हैं। चन्द संयोगों की उनके सामने क्या बिसात? फिर भी दो अंकों की वर्ष गणना में सिमटे मन श्मशान में छ: वर्ष बहुत मायने रखते हैं, तब और जब इतने वर्ष बीत जाने पर केवल संयोग लगें।
कहते हैं भूत अच्छा ही लगता है। क्या उन वर्षों के लिये काल विभाजन मायने रखता है? मेरे लिये वे सब वर्तमान में आते हैं। हॉस्पिटल की उस बेड पर तब जब कि हमारी प्रिय भोर थी और तपते होठों की धौंकनी के साथ तुमने कहा था – अब चला चली की बेर है; तुम सन जैसे केशों वाली स्नेहिल वृद्धा लगी थी, यौवनमयी उच्छृंखल बाला नहीं।
पास आने को झुकते हुये मुझे तुमने रोका था – अब दूर जा रही हूँ, इस बेला अधिक निकट आओगे तो मुझे याद भी न रख पाओगे। ... दूर तुम्हारे लिये नहीं पगले! संसार के लिये। मैंने बस ज्वर की बड़बड़ाहट समझा।
बेड पर साथ कोई और आ बैठा और अटकन चटकन खेलने लगा। दो जोड़ी आँखें जीवन खाली कर रही थीं और बस तीन शब्द – मैं नहीं मरूँगी। पहली किरणों ने सोख कर सब कुछ प्रभा पुरुष के हवाले कर दिया और तुम शीतल हो गई। नर्स ने हाथ पकड़ा और मुझे बाहर कर दिया। उसकी आँखों में घृणा थी – मैं एक शव को चूमने जा रहा था। एक मृत कुमारी को जिससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था।
लोग दैवीय प्रेम की बातें करते हैं। मैं जानता हूँ कि वैसा कुछ भी नहीं होता। संयोग मानवीय होते हैं और प्रेम भी। जब मैं संयोगों में होता हूँ तो जीवित और मृत एक साथ होता हूँ। यही कालातीत होना है। छ: साँस वर्ष जीवन के सहारे शव साधना कर रहा हूँ, मैं मरा नहीं जीवित हूँ। तुम्हारी हमारी कहानी लिख रहा हूँ।
न हार रे मन!
खो देने पर स्वयं को पाने के प्रयाण पीड़ादायी होते हैं।
चलना, पहुँचना और पाना तो उत्तरघटित होते हैं।
लगता है कि कोई कितना अकेला होता है!
... आज यूँ ही इसी वर्ष की अपनी इस रचना की स्मृति हो आई। कुछ खास नहीं, बस यूँ ही।
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चलना, पहुँचना और पाना तो उत्तरघटित होते हैं।
लगता है कि कोई कितना अकेला होता है!
... आज यूँ ही इसी वर्ष की अपनी इस रचना की स्मृति हो आई। कुछ खास नहीं, बस यूँ ही।
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रे मन!
अलग न हो, स्वीकार स्व जो जीवन धन
बिलग न हो मन! स्वीकार, न हार रे मन!
सुलग सुलग धधकी धरा जब ताप इक दिन
उमगी सरिता नयनों से निकल, सिहरा तन
भभका भाप उच्छवास, प्रलय प्रतीति जन
कर उठे हाहाकार, कैसी यह रीति प्रीति मन!
बढ़ चले प्राण नि:शंक साँस झरते आनन्द कण
समय नहीं उपयुक्त, सदियों की रीत प्रीत मन!
वृथा सब, आखिर हारे मन!
शीतल विराग, राग तवा ताप, बूँदें छ्न छ्न
उड़ गईं छोड़ चिह्न हर ठाँव टप सन टप सन
निश्चिंत सुहृद – होगा अब समाज हित स्व हित।
न समझे ताप सिकुड़ा कोर, ज्यों भू ज्वालामुख
फूटे, आघातों के विवर रेख लावा लह दह नर्तन।
शीतल अब, उर्वर अब, भू पर लिख छ्न्द गहन
स्वीकार, न हार रे मन!
मान, न कर मान, चलने दे सहज जीवन
सहज सहेज रचते रहे विस्तार हर पल
सहम न देख निज आचार अब हर क्षण।
यह है जीवन धार, जो भीगे न, सूखे न,
न,न करते ठाढ़ छाँव, कैसा आभार घन?
दुन्दुभि ध्वनि लीन अब क्यों मन्द स्वर?
स्वीकार, न हार रे मन!
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