क्षमा करिए,सुबह मुझे आँसू भरी लग रही है।
क्षमा करिए मैं क्षोभग्रस्त हूँ।
क्षमा करिए मुझे निरपेक्ष प्रशांत बौद्धिकता से घृणा हो रही है।
क्षमा करिए अपनी सुविधाजीवी नपुंसक मनोवृत्ति के तले मैं स्यापा कर रहा हूँ।
क्षमा करिए मैं साम्प्रदायिक हूँ।
क्षमा करिए मुझे मानवाधिकार सिर्फ जुमला लग रहा है।
क्षमा करिए मैं यह मान बैठा हूँ कि आप को अंग्रेजी आती ही है।
क्षमा करिए आज अंग्रेजी ब्लॉग का यह लिंक दे रहा हूँ।
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Roots In Kashmir
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सोमवार, 9 नवंबर 2009
रविवार, 8 नवंबर 2009
पुरानी डायरी से - 7 : तलाश
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इस कविता पर कोई समय चिह्न न होना इसे सन्दिग्ध बनाता है।
यह उस समय की लगती है जब बेवकूफी भरे प्रेम से मोहभंग हो गया था।
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_________, ____________ तलाश
तुम पास आती हो तो मैं डर जाता हूँ
कहीं मेरी तनहाइयाँ तुम्हारे वज़ूद को सोख न लें !
मैं जानता हूँ
तुम अभी कहोगी
"कुछ सुनाओ।"
जो कुछ मैं तुम्हें सुनाता रहा आज तक
वह सब कुछ मेरा नहीं था
मेरे शब्दों में दूसरे लोग बोल रहे थे -
तुम्हें शायद पता न हो
मैं तो अभी भी ढूँढ़ रहा हूँ उसे
जिसे 'अपनी कविताएँ' सुना सकूँ।
(कल चुपके से एक सरसराहट हुई मस्तिष्क में
तुम्हारी कविताएँ सिर्फ तुम्हारे लिए हैं-
कमरा बन्द कर लो
और जोर जोर से अपनी कविताएँ पढ़ो
जब तक उनके शब्दों का शून्य
भर न दे पूरे कमरे को
और विवश न कर दे तुम्हें
चिल्लाते हुए बाहर आने को।) - शायद ये पंक्तियाँ भी दूसरे की हैं।
मैं जानता हूँ - अभी तुम ऐसा कहोगी
"कमाल है कि इतने बड़े संसार में
आज तक कोई नहीं मिला तुम्हें
जिसे तुम अपनी सुना सको?"
मैं भयभीत हूँ
अपने ही शब्दों से -
वे बिखरे शब्द
मेरे वाक्यों में बिंध कर
(बँध कर नहीं)
कितने शक्तिशाली हो गए हैं !
मैं पराजित हूँ उनके आगे
कभी कभी मैं भ्रमित हो उठता हूँ
कहीं ऐसा तो नहीं कि ....
छोड़ो
मगर आज के बाद फिर मत कहना
"कुछ सुनाओ"
'दूसरों की' 'दूसरों को' सुनाते-सुनाते
मैं खुद दूसरा हो गया हूँ -
मुझे अपने आप को तलाशना है
अपनी ही कविताओं में।
तब तक 'फरमाइश' न करना
कुछ मत कहना
जब तक कि यह तलाश पूरी न हो जाय।
इस कविता पर कोई समय चिह्न न होना इसे सन्दिग्ध बनाता है।
यह उस समय की लगती है जब बेवकूफी भरे प्रेम से मोहभंग हो गया था।
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_________, ____________ तलाश
तुम पास आती हो तो मैं डर जाता हूँ
कहीं मेरी तनहाइयाँ तुम्हारे वज़ूद को सोख न लें !
मैं जानता हूँ
तुम अभी कहोगी
"कुछ सुनाओ।"
जो कुछ मैं तुम्हें सुनाता रहा आज तक
वह सब कुछ मेरा नहीं था
मेरे शब्दों में दूसरे लोग बोल रहे थे -
तुम्हें शायद पता न हो
मैं तो अभी भी ढूँढ़ रहा हूँ उसे
जिसे 'अपनी कविताएँ' सुना सकूँ।
(कल चुपके से एक सरसराहट हुई मस्तिष्क में
तुम्हारी कविताएँ सिर्फ तुम्हारे लिए हैं-
कमरा बन्द कर लो
और जोर जोर से अपनी कविताएँ पढ़ो
जब तक उनके शब्दों का शून्य
भर न दे पूरे कमरे को
और विवश न कर दे तुम्हें
चिल्लाते हुए बाहर आने को।) - शायद ये पंक्तियाँ भी दूसरे की हैं।
मैं जानता हूँ - अभी तुम ऐसा कहोगी
"कमाल है कि इतने बड़े संसार में
आज तक कोई नहीं मिला तुम्हें
जिसे तुम अपनी सुना सको?"
मैं भयभीत हूँ
अपने ही शब्दों से -
वे बिखरे शब्द
मेरे वाक्यों में बिंध कर
(बँध कर नहीं)
कितने शक्तिशाली हो गए हैं !
मैं पराजित हूँ उनके आगे
कभी कभी मैं भ्रमित हो उठता हूँ
कहीं ऐसा तो नहीं कि ....
छोड़ो
मगर आज के बाद फिर मत कहना
"कुछ सुनाओ"
'दूसरों की' 'दूसरों को' सुनाते-सुनाते
मैं खुद दूसरा हो गया हूँ -
मुझे अपने आप को तलाशना है
अपनी ही कविताओं में।
तब तक 'फरमाइश' न करना
कुछ मत कहना
जब तक कि यह तलाश पूरी न हो जाय।
शब्दचिह्न :
कविता,
पुरानी डायरी से
शनिवार, 7 नवंबर 2009
गेट
घंटी बजी तो प्रकाश ने गेट की तरफ देखा। कामवाली इस समय? प्रिया घर पर नहीं थीं और बच्चे स्कूल गए थे। सामान्यत: ऐसी स्थिति में प्रिया कामवाली को बता कर जाती है ताकि उसके आने के बाद ही कामवाली काम करने आए, नहीं तो उल्टा पल्टा कर के चली जाती है। आज भूल गई क्या? प्रकाश ने देखा, कामवाली मंजू सजी संवरी दिखी। साँवला रंग लेकिन चेहरे की कटिंग और नाटे से शरीर में गजब का अनुपात ! यौवन के पहले ही स्टेज में औरत बना दी गई थी इसलिए चेहरे पर अभी भी किशोरावस्था का लावण्य था। उसने अपने सिर को झटका - ये साला खुराफाती दिमाग भी!
प्रश्नवाचक निगाहों से मंजू को देखा तो बोली,"पड़ोस की भाभी के यहाँ बाद में जाना था सो सोचा यहाँ निपटाती चलूँ। भाभी नाहीं हैं का?.... कउनो बात नहीं।"
मंजू उसे रगड़ती सी गेट से भीतर आई। प्रकाश का मन जाने कैसा हो गया। चुपचाप ड्राइंग रूम में आ कर बासी पेपर पढ़ने लगा लेकिन मन रसोई में हो रही खुड़बुड़ में लगा रहा। मंजू बार बार आती रही जैसे कुछ कहना चाह रही हो। फिर उसने ऐसे ही बात छेड़ दी," का भैया, टी वी नाहीं देख रहे हो?"।
इस तरह उसने आज तक बात नहीं की थी। प्रकाश ने सिर उपर उठाया तो मंजू की निगाहों में अजीब सा निमंत्रण और बेचैनी दिखी। जाने क्या क्या सोच गया प्रकाश! उसे अब मंजू की नीयत पर शक होने लगा था।
"घर माँ घरनी ना हो तो बड़ा सूना लगत है।" पोंछा लगाती मंजू ने उसके पास आने पर बोला था।
प्रकाश ने नजर उठाई तो ब्लाउज से झाँकते यौवन चिह्न दिख गए।
सॉफ्ट सिडक्सन ! - प्रकाश के मन में तूफान मचलने लगा। किसी तरह उसने खुद को संभाला।
काम खत्म करने के बाद मंजू फिर पास आई," भइया ई पीसीओ कहाँ होगा?"। आँखों में फिर वही खामोश निमंत्रण। प्रकाश ने जैसे तैसे जवाब दिया," रोड पर किसी से पूछ लेना।"
"अच्छा, गेट बन्द कै लो।"
मंजू चली गई। गेट बन्द करते प्रकाश ने राहत की साँस ली। सीने में धौंकनी चल रही थी। कैसी औरत है! एक से संतोष नहीं इसे। प्रकाश को मन ही मन अपने नियंत्रण पर गर्व हो आया। घर में आ कर बैठा ही था कि फिर घंटी बजी।
बाहर आया तो मंजू खड़ी थी।
अब क्या हुआ? उसने सवालिया नज़रों से मंजू को देखा।
"देखे आए रहेन कि गेट ठीक से बन्द किए कि नहीं? आज कल चोर दिन माँ ही हाथ साफ कर देत हैं।"
प्रकाश मन ही मन भुनभुनाया," तुम भी तो दिन में ही मेरी सफाई करना चाहती हो।"
गेट बन्द कर लौटा ही था कि पीछे से आवाज आई," भइया!"। मंजू की आँखों में अनुरोध था !
"क्या है?" प्रकाश खीझ गया।
"एगो फोन लगाय दो। मोबाइल तो है न तुम्हरे पास?" प्रकाश ने गेट नहीं खोला।
"अन्दर आने दो।"
गेट को खुद खोल मंजू भीतर आ गई थी। उसकी ओर देखते हुए उसने चोली में हाथ डाल कर एक कागज का टुकड़ा निकाला। एक बार फिर गोलाइयाँ दिख गईं। चाहते हुए भी प्रकाश नज़र हटा नहीं पाया। मंजू उससे सट कर खड़ी हो गई ,"ई नम्बर लगा दो। मोबाइल नहीं है का? घर माँ चलो।"
" नहीं नहीं तुम यहीं रहो मैं ले आता हूँ।"
मोबाइल ले कर प्रकाश बाहर आया तो हाँफ रहा था।
"का हुआ? तबियत नाहीं ठीक तो घर माँ चले चलो। वहीं से लगा देना।" फिर घर के भीतर जाने की कोशिश !
"नहीं मैं ठीक हूँ।"
प्रकाश ने मोबाइल पर नम्बर लगाया तो नम्बर मौजूद नहीं होने का सन्देश सुनाई दिया। दुबारा ज़ीरो लगा कर ट्राई किया तो भी वही सन्देश।
"नम्बर गलत है।"
"फिर लगाओ। इस पर बात होत है।" मंजू ने जोर दे कर कहा। प्रकाश ने नज़र उठाई तो उसे गेट पर पीठ अड़ा कर सीने से आँचल हटाए पाया। आँखों में फिर वही अनुरोध।
"नहीं लगता।"
"मुझे सुनाओ, क्या कहता है?"
मंजू सट गई।
"जाओ, पीसीओ से ट्राई कर लेना।"
आँखों में हसरत लिए मंजू बाहर गई और प्रकाश ने गेट बन्द किया। बेड रूम में आ कर हाँफता बिस्तर पर ढेर हो गया।
बाप रे !...
...उसे अपने पर फिर गर्व हो आया था।
....
एक हफ्ते के बाद प्रिया ने बताया," आज कामवाली बहुत रो रही थी। उसका मर्द बाहर रहता है। पिछले दो महीनों से कोई खबर नहीं है। मोबाइल नम्बर दिया था, वह भी नहीं लगता।"
उस समय प्रकाश बन्द गेट के पल्ले का सहारा लिए खड़ा था। उसे लगा कि गेट अचानक खुल गया है, भहरा कर वहीं गिर पड़ा।
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इस कहानी का पोडकास्ट श्री अनुराग शर्मा के स्वर में नीचे दिये लिंक पर उपलब्ध है: हिन्दयुग्म पर 'गेट'
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
वन्दे मातरम्
वन्दे मातरम्
माँ ! तुम्हें किसी सम्प्रदाय के प्रमाणीकरण और स्वीकार की आवश्यकता नहीं है।
'वन्दे मातरम'
हे शब्द समूह ! तुम्हें किसी जड़ मान्यता के भाष्य की आवश्यकता नहीं है।
तुम स्वयंसिद्ध हो प्रात: उगते सूर्य को देख उपजे आह्लाद, सम्मान और विनय की तरह।
तुम स्वयंसिद्ध हो हमारे जीवन को ले धमनियों में दौड़ते रक्त प्रवाह की तरह।
तुम स्वयंसिद्ध हो हमारे मन में उमड़ते पुरनियों के प्रति सम्मान की तरह।
हमारी आगामी पीढ़ियाँ भी तुम्हें साँसों में ऐसे ही घुलाए रखेंगी - जीवन दुलार की तरह।
हमारी पीढ़ियाँ कृतघ्न नहीं होंगी।
उन्हें मूर्तिपूजक होने पर गर्व रहेगा
हे शब्द समूह, हम उन्हें ऐसे संस्कार देंगे।
वन्दे मातरम। (चित्राभार: http://kamat.com/kalranga/freedom/s210.htm)
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"This flag is of Indian Independence! Behold, it is born! It has been made sacred by the blood of young Indians who sacrificed their lives. I call upon you, gentlemen to rise and salute this flag of Indian Independence. In the name of this flag, I appeal to lovers of freedom all over the world to support this flag."
-- B. Cama , Stuttgart, Germany, 1907
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"This flag is of Indian Independence! Behold, it is born! It has been made sacred by the blood of young Indians who sacrificed their lives. I call upon you, gentlemen to rise and salute this flag of Indian Independence. In the name of this flag, I appeal to lovers of freedom all over the world to support this flag."
-- B. Cama , Stuttgart, Germany, 1907
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शब्दचिह्न :
वन्दे मातरम
शनिवार, 31 अक्टूबर 2009
बड़ी होती स्कॉलर बेटी
आज बिटिया को स्कॉलर बैज मिला। कुल प्रतिशत 85%, किसी विषय में 60% से कम नहीं और उपस्थिति 90% - इन तीन प्रतिमानों पर खरे उतरने वाले छात्र छात्राओं को यह बैज दिया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, शिक्षा अधिकारी और माता-पिता समुच्चय को जुटा कर जो माहौल बनाया गया था, उसमें विजयी स्कॉलर बहुत उत्साहित दिखे।
गला काटू प्रतिस्पर्धा के जमाने में प्रतिभाएँ संकुचित न हों, दूसरे प्रोत्साहित हों और ध्यान केवल सकल प्रतिशत मार्क्स पर आधारित पहले तीन स्थानों पर ही न हो -यह आयोजन इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता दिखा। अच्छा लगा। अच्छी बात यह लगी कि ग्रेडिंग सिस्टम लागू हो जाने पर भी यह व्यवस्था जारी रह सकती है।
गला काटू प्रतिस्पर्धा के जमाने में प्रतिभाएँ संकुचित न हों, दूसरे प्रोत्साहित हों और ध्यान केवल सकल प्रतिशत मार्क्स पर आधारित पहले तीन स्थानों पर ही न हो -यह आयोजन इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता दिखा। अच्छा लगा। अच्छी बात यह लगी कि ग्रेडिंग सिस्टम लागू हो जाने पर भी यह व्यवस्था जारी रह सकती है।
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कार्यक्रम के पहले जो प्रार्थना बच्चों ने गाई, उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं:| |
हम को मन की शक्ति देना ,मन विजय करें दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें.. झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें.. ख़ुद पर हौसला रहें बदी से न डरें. |
लगा कि प्रार्थनाएँ ऐसी होने के लिए अभिशप्त हैं। मन विजय, खुद पर जय, सच, हौसला, बदी से न डरना - हम जो स्कूलों में सिखाते हैं क्या उसका पालन करते हैं? ये आदर्श बस बच्चों के लिए ही हैं क्या? हम वयस्क कहीं डरे हुए हैं शायद कि हमारी हरकतों को बच्चे अपना कर हमारे लिए सिरदर्द न हो जाँय। बाद में वे असफल भी हो सकते हैं।
क्या सफल होने के लिए अच्छी और बुरी बातों का प्रयोग, समन्वय और संतुलन आवश्यक नहीं है?
हम उन्हें समय पड़ने पर बदी से डरने, झूठ बोलने, कायरता और कमजोरी दिखाने जैसी निवेदन वाली प्रार्थनाएँ क्यों नहीं सिखाते? तब जब कि वास्तविक जीवन में हम हमेशा यही होता देखते हैं। दुनिया चलती रहती है, झूठ बोलने या बदी से डरने या कायरता दिखाने से कहीं कोई प्रलय भी नहीं आता। समाज गतिशील बना रहता है। फिर ये और ऐसी प्रार्थनाएँ क्यों?
क्या सफल होने के लिए अच्छी और बुरी बातों का प्रयोग, समन्वय और संतुलन आवश्यक नहीं है?
हम उन्हें समय पड़ने पर बदी से डरने, झूठ बोलने, कायरता और कमजोरी दिखाने जैसी निवेदन वाली प्रार्थनाएँ क्यों नहीं सिखाते? तब जब कि वास्तविक जीवन में हम हमेशा यही होता देखते हैं। दुनिया चलती रहती है, झूठ बोलने या बदी से डरने या कायरता दिखाने से कहीं कोई प्रलय भी नहीं आता। समाज गतिशील बना रहता है। फिर ये और ऐसी प्रार्थनाएँ क्यों?
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एक दूसरे समवेत गायन की ये पंक्तियाँ चौंका गईं: राम और मुहम्मद की धरती किसी से भेदभाव नहीं करती। |
ये धरती मुहम्मद की कब से हो गई? अगर इस्लाम की ही बात करनी थी तो मुहम्मद ही मिले थे? राम और मुहम्मद को इकठ्ठा कर क्या कहना चाहता है रचयिता? दोनों की संगति कहाँ बैठती है? राम ने आदर्शों को जिया, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। मुहम्मद ने एक मजहब चलाया और अपने जीवन काल में ही उसका बाइ हुक या क्रुक प्रचार प्रसार किया। मुहम्मद के चलाए मजहब में तो इंसानों को बाँट कर भेदभाव को क़ोडिफाई तक कर दिया गया है। फिर ये भेदभाव न होने के सन्दर्भ में वह कहाँ से संगत हो जाते हैं? सेकुलरी साधारणीकरण के जोश में हम जाने कितना कूड़ा करकट बच्चों के जेहन में भरते जा रहे हैं! उनके मन मस्तिष्क में एक निहायत ही अवास्तविक दुनिया बिठा रहे हैं। सचाई ठीक उलट है। ये बच्चे जब वास्तविकता का सामना करेंगे तो उन्हें अपने प्रतिमानों को बदलने और दुहराने में कितनी मानसिक यातना भुगतनी होगी - हम यह क्यों नहीं सोच पाते? हम उन्हें सही क्यों नहीं बताते? सच से कैसे नुकसान के होने से हमें डर है? हम इतने कमजोर हैं कि अपनी संतति को सच बता भी नहीं सकते और प्रार्थना सच का दम भरने की गवाते हैं ! हम किसे धोखा दे रहे हैं ?
जैसा कि होता है शिक्षा अधिकारी और प्रधानाचार्या जी आधे घण्टे विलम्ब से आईं - तब जब कि दोनों कार्यालय में ही विराजमान थीं। अभिभावक तो समय से आ ही गए थे - कुछेक विशिष्टों को छोड़ कर। अच्छा लगा कि इस एक हरकत से उन्हों ने बच्चों को जीवन की एक महत्त्वपूर्ण सीख दे दी - यदि समय वग़ैरह की पाबन्दी न माननी हो और फिर भी जलवे बनाए रखने हों तो विशिष्ट बनो। फिर अशिष्टता, झूठ वगैरह मायने नहीं रखते। उनके लिए प्रार्थनाएँ तो वाकई बेमानी हो जाती हैं। |
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