शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

अभिमन्यु वध के पश्चात श्रीकृष्ण की वैकल्पिक योजना Plan - B

श्रीराम एवं बाली का प्रसङ्ग तो लगाया ही था। अब देखिये एक दूसरे अवतारी श्रीकृष्ण को जिन्हों ने महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी। सम्भावित आपदा काल हेतु क्या योजना बनाये थे?     
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कुरुवंश की नयी पीढ़ी के सबसे योग्य कुमार अभिमन्यु का छल पूर्वक वध किया जा चुका था। अधर्मपूर्वक उन्हें घेर कर मारने वाले छ: महारथियों में आचार्य द्रोण एवं कर्ण भी थे। अन्य चार थे - कृपाचार्य, कृतवर्मा, बृहद्वल एवं अश्वत्थामा। अभिमन्यु के संतप्त पिता अर्जुन ने प्रतिज्ञा कर ली कि जिस जयद्रथ ने व्यूह में अभिमन्यु की रक्षा हेतु मेरे भाइयों को प्रवेश नहीं करने दिया, यदि उसने,
- मारे जाने के भय से धृतराष्ट्रपुत्रों का त्याग नहीं कर दिया,
या
- मेरी, श्रीकृष्ण या महाराज युधिष्ठिर की शरण में नहीं आ गया,
तो कल मैं उसका वध अवश्य कर डालूँगा।
न चेद्वधभयाद्भीतो धार्तराष्ट्रांप्रहास्यति 
न चास्माञ्शरणं गच्छेत्कृष्णं वा पुरुषोत्तमम्
भवन्‍तं वा महाराज श्वोऽस्मि हन्ता जयद्रथम् 
इसमें असफल होने पर अपने ऊपर संसार भर के ढेर सारे विविध पापों के पड़ने की बात करते हुये अर्जुन ने जोड़ दिया :
यद्यस्मिन्नहते पापे सूर्योऽस्तमुप्यास्यति 
इहैव सम्प्रवेष्टाहं ज्वलितं जातवेदसम् 
यदि पापी जयद्रथ को मारे बिना ही सूर्य अस्त हो गये तो मैं यहीं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के क्रोध में साथ देते हुये उस समय अपना पाञ्चजन्य शङ्ख फूँक दिया। अर्जुन ने अपना देवदत्त शंख फूँका। सेना उत्साह में भर गयी। पाण्डव पक्ष का सिंहनाद उस अतीव शोक के समय में भी समस्त अवनी को पाताल सहित कम्पित करने लगा - जगत् सपाताल ... प्रकम्पयामास !
[युद्ध में स्थायी शोक के लिये न समय होता है, न अवसर। हृदय पर पत्थर रख कर भी सेना का मनोबल बना रहे, ऐसा करने रहना पड़ता है। जो नेतृत्त्व में हैं, उन्हें तो दैन्य कदापि नहीं प्रदर्शित करना चाहिये।] 
दुर्योधन के पक्ष ने सुना तो सभी का उत्साह क्षीण हो गया। जयद्रथ तो मारे भय के काँपने लगा। द्रोण ने उसे आश्वस्त किया कि तुम्हारी रक्षा मैं करूँगा तथा जिसकी रक्षा मैं करूँ उस पर देवताओं का भी वश नहीं चलना - अहं हि रक्षिता तात भयात्त्वां नात्र संशय:, न हि मद्बाहुगुप्तस्य प्रभवन्‍त्यमरा अपि
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सब हो गया तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को झिड़का, बिना मुझसे मंत्रणा किये तुमने यह बड़ा भारी भार उठा लिया। ऐसी स्थिति में हम सम्पूर्ण लोकों के उपहास के पात्र कैसे नहीं बनेंगे (यदि असफल हुये तो) - असम्मन्त्र्य मया सार्धमतिभारोऽयमुद्यत:, कथं तु सर्वलोकस्य नावहास्या भवेमहि ? 
मैंने दुर्योधन के शिविर में गुप्तचर भेजे थे तथा वे वहाँ का समस्त समाचार मुझे बता गये हैं। जयद्रथ तो भाग जाना चाहता था किंतु उसकी रक्षा हेतु द्रोण ने विशेष प्रबंध किये तो रह गया।
कर्ण, भूरिश्रवा, अश्वत्थामा, वृषसेन, कृपाचार्य एवं शल्य; ये छ: महारथी कल उसकी रक्षा में उससे आगे रहेंगे। द्रोण ने शकट-कमल व्यूह रचने का निर्णय लिया है। पिछले कमल व्यूह के मध्य की कर्णिमा के बीच सूचीव्यूह होगा तथा उसके पार्श्व में अन्यान्य वीरों से रक्षित जयद्रथ रहेगा।
अर्जुन ने सुना तथा वीर वचन कहने लगे कि मधुसूदन, जिन छ: के नाम आप ने गिनाये हैं उनका बल मेरे आधे जितना भी नहीं है - तेषां वीर्यं ममार्धेन न तुल्यमिति मे मति: । केशव ! उस दुर्मति पापी जयद्रथ की रक्षा का बीड़ा उठाये जो द्रोण हैं न, पहले उन्हीं पर आक्रमण करूँगा - यस्तु गोप्ता महेष्वासस्तस्य पापस्य दुर्मते:, तमेव प्रथमं द्रोणम् अभियास्यामि केशव
आप की कृपा से इस युद्धस्थल में कौन सी ऐसी शक्ति है, जो मेरे लिये असह्य हो !  तव प्रसादाद्भगवन्‍किमिवास्ति रणे मम !  जिस प्रकार यज्ञ में लक्ष्मी का होना ध्रुवसत्य है, उसी प्रकार जहाँ आप नारायण विद्यमान हैं, वहाँ विजय भी अटल है - श्रीर्ध्रुवापि च यज्ञेषु ध्रुवो नारायणे जय: । अर्जुन ने श्रीकृष्ण को रात बीतते ही सर्वसज्ज रथ प्रस्तुत करने का निर्देश भी दे दिया - संदिदेशार्जुनो नर्दन्‍वासवि: केशवं प्रभुम्, यथा प्रभातां रजनीं कल्पित: स्याद रथो मम। 
अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा एवं अभिमन्यु पत्नी उत्तरा सहित अन्य स्त्रियों को ढाँढ़स बँधाने चले गये।
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श्रीकृष्ण के मन में बहुत कुछ चल रहा था। लौट कर अर्जुन के शिविर पहुँचे, जलस्पर्श किये, कुश की शय्या बना कर अक्षत, गंध, माला सहित उस पर समस्त शस्त्रास्त्र रखे तथा अर्जुन से आचमन करवाया। परिचारकों ने उन्हें दिखाते हुये त्र्यम्बक निशा बलि पूजन किया - नैशं त्रैयम्बकं बलिम् । अर्जुन ने समस्त पूजा उपहार श्रीकृष्ण को अर्पित कर दिये। श्रीकृष्ण ने उन्हें शयन करने को कहते हुये यह भी बताया कि मैं अब तुम्हारा कल्याण साधन करने जा रहा हूँ - सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय व्रजाम्यहम्
सोना कहाँ था, उस रात शिविर में कोई सो न सका, सब में जागरण का आवेश हो गया था - प्रजागर: सर्वजनं ह्याविवेश विशाम्‍पते
अर्द्धरात्रि हुयी तथा अर्जुन की प्रतिज्ञा का स्मरण करते हुये श्रीकृष्ण जाग उठे। अपने सारथी दारुक से बोले कि कल जयद्रथ की रक्षा हेतु समूचा दुर्योधन पक्ष लग जायेगा। दैत्यों एवं दानवों के दर्प का दलन करने वाले त्रिलोकी में एकमात्र वीर इंद्र हैं परंतु वे भी द्रोणाचार्य से रक्षित जयद्रथ को नहीं मार सकते - एको वीर: सहस्राक्षो दैत्यदानवदर्पहा, सोऽपि तं नोत्सहेताजौ हन्तुं द्रोणेन रक्षितम्। मैं कल कुछ ऐसा करूँगा कि सूर्यास्त के पूर्व अर्जुन जयद्रथ का वध कर दें। मित्रता से भीने भगवान कहते चले गये :
 न हि दारा न मित्राणि ज्ञातयो न च बान्धवाः
 कश्चिन्नान्यः प्रियतरः कुन्तीपुत्रान्ममार्जुनात्
 अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमपि दारुक
 उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत्तथा
 अहं ध्वजिन्यः शत्रूणां सहयाः सरथद्विपाः
 अर्जुनार्थे हनिष्यामि सकर्णाः ससुयोधनाः
 श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रयो लोका महाहवे
 धनंजयार्थं समरे पराक्रान्तस्य दारुक
 श्वो नरेन्द्रसहस्राणि राजपुत्रशतानि च
 साश्वद्विपरथान्याजौ विद्रविष्यन्ति दारुक
 श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम्
 मया क्रुद्धेन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम्
 ... 
 ज्ञास्यन्ति लोकाः सर्वे मां सुहृदं सव्यसाचिनः
 यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्तमनु स मामनु
 इति संकल्प्यतां बुद्ध्या शरीरार्धं ममार्जुनः
मुझे स्त्री, मित्र, ज्ञाति, बंधु तथा अन्य कोई भी कुन्तीपुत्र अर्जुन से अधिक प्रिय नहीं है। मैं अर्जुन से रहित इस संसार को दो घड़ी भी नहीं देख सकता। ऐसा हो ही नहीं सकता (कि मेरे रहते अर्जुन का अनिष्ट हो)।
मैं अर्जुन के लिये हाथी घोड़े, कर्ण एवं दुर्योधन सहित समस्त शत्रुओं को जीत कर सहसा उनका संहार कर डालूँगा। तुम कल देखोगे कि मैंने समराङ्गण में कुपित हो कर पाण्डव अर्जुन हेतु सारी शत्रु राजसेना को चक्र से प्रमथित कर मार गिराया है। कल सभी जानेंगे कि मैं अर्जुन का सुहृद हूँ। जो अर्जुन से द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है और जो अर्जुन का अनुगामी है, वह मेरा अनुगामी है, तुम अपनी बुद्धि से निश्चय कर लो कि अर्जुन मेरा आधा शरीर है।
 यथा त्वमप्रभातायामस्यां निशि रथोत्तमम्
 कल्पयित्वा यथाशास्त्रमादाय व्रतसंयतः
 गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनुः शरान्
 आरोप्य वै रथे सूत सर्वोपकरणानि च
 स्थानं हि कल्पयित्वा च रथोपस्थे ध्वजस्य मे
 वैनतेयस्य वीरस्य समरे रथशोभिनः
 छत्रं जाम्बूनदैर्जालैरर्कज्वलनसंनिभैः
 विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि च भूषितान्
 बलाहकं मेघपुष्पं सैन्यं सुग्रीवमेव च
 युक्त्वा वाजिवरान्यत्तः कवची तिष्ठ दारुक
कल प्रात:काल तुम शास्त्रविधि के अनुसार मेरे उत्तम रथ को ससुज्जित करके सावधानी के साथ ले कर युद्धस्थल में चलना। कौमोदकी गदा, दिव्य शक्ति, चक्र, धनुष, बाण तथा अन्य समस्त सामग्रियों को रथ पर रखकर उसके पिछले भाग में समराङ्गण रथ पर शोभा पाने वाले वीर विनतानन्‍दन गरुड़ के चिह्न वाले ध्वज के लिये भी स्थान बना लेना। उसमें मेरे चारो श्रेष्ठ अश्वों - बलाहक, मेघपुष्प, शैव्य तथा सुग्रीव को जोत लेना और स्वयं भी कवच धारण कर विराजमान रहना।
श्रीकृष्ण ने वह सङ्केत भी बताया जिसके होने पर दारुक को बड़े वेग से उनके पास पहुँचना था - पाञ्चजन्य शङ्ख का ऋषभ स्वर में नाद। वह भैरव नाद जब सुनाई दे तब बड़े वेग से मेरे पास सज्जित युद्धक रथ ले कर पहुँच जाना।
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषमार्षभेणैव पूरितम्
 श्रुत्वा तु भैरवं नादमुपयाया जवेन माम्   
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यह बात और है कि इसकी आवश्यकता नहींं पड़ी किन्‍तु श्रीकृष्ण अपने कर्म के बारे में, कर्तव्य के बारे में पूर्णत: निश्चित थे तथा परिणाम की गुरुता को देखते हुये उसके लिये अपनी प्रतिज्ञा को भी तोड़ने हेतु सन्नद्ध थे।

मित्रता हेतु सीख : 

- संकट की स्थिति में साथ बना रहे,
- युद्ध में साथी योद्धा द्वारा सहसा निर्णय लेने पर भी सबके सामने उत्साह बढ़ाये,
- जब एकान्‍त हो तो उसकी करनी की गुरुता बताये,
- उसकी सुने, विश्वास बनाये रखे,
- वह मनोवैज्ञानिक रूप से सबल रहे, इस हेतु उपाय करे,
तथा
- विचार कर के ऐसी वैकल्पिक योजना Plan B बना कर नियोजित रखे कि आवश्यकता पड़ने पर तुरन्‍त प्रयोग में लाई जा सके।
    

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें


श्रीराम ने बाली को छिप कर मारा। रामायण में बाली ने उन्हें बहुत खरी खोटी सुनाई है। स्वयं क्या किया था उसने? भाई को निर्वासित कर एक निश्चित घेरे में रहने पर विवश कर दिया था। पुत्रवधू समान अनुजवधू से बलात संसर्ग करता था, मारा गया तो धर्म की बातें करने लगा।
बाली के चरित्र को आजकल के कम्युनिस्टों एवं मुसलमानों का प्रतिनिधि समझें, अपने तो सारे कुकर्म करेंगे किंतु जब प्रतिकार होगा तो स्वयं को धर्मात्मा बताते हुये सामने वाले पर टूट पड़ेंगे। मीडिया से ले कर नेता अभिनेता तक जो कुछ हो रहा है, बाली कर्म ही है।
बाली ने क्या बातें कहीं हैं! पठनीय हैं -
राजा के गुण गिनाते हुये श्रीराम की भर्त्सना करता है - दम: शम: क्षमा धर्मो धृति: सत्य पराक्रम: । पार्थिवानां गुणा राओजन् दण्डश्चाप्ययकारिषु॥
तुमको तो बड़ा धर्मात्मा सुना था, बड़े अधर्मी निकले ! तुम्हारी बुद्धि मारी गयी है - विनिहतात्मानं। तुम्हारा आचार पापपूर्ण है - पापसमाचारम्। तुम घास फूस से ढके कुँये के समान धोखा देने वाले हो - तृणै: कूपमिवावृतम्। साधुओं के वेश में पापी हो - सतां वेषधरं पापं, राख से ढकी अग्नि समान हो, धर्म का छ्द्माभ्यास करते हो - धर्मच्छद्मानिसंवृतम्
मैं तो तुम्हारे राज्य में कोई उपद्रव नहीं कर रहा था, तब भी मुझ निरपराध को क्यों मारा? - विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम् ... कस्मात् तं हंस्य?
महान क्षत्रियकुल में जन्मा, धर्म ज्ञाता बताते हुये उसने उन्हें क्रूरकर्मा कह कर ग्लानि से ग्रस्त करने का प्रयास भी किया, जैसे आज कल बरखा से रबिश तक सभी हिंदुओं पर लगे हुये हैं - धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्न: क्रूरं कर्म समाचरेत् ! अखलाक के वध पर जैसी प्रतिक्रियायें आई थीं, इस अंश को पढ़ते हुये वे सभी ध्यान में आती हैं।
तुम्हें नीति एवं विनय नहीं ज्ञात, दण्ड एवं अनुग्रह का राजधर्म भी नहीं पता, तुम तो बड़े संकीर्ण, क्रोधी अमर्यादित हो - कोपनश्चानवस्थित:, संकीर्ण:। जहाँ कहीं भी बाण चलाते फिरते हो - शरासनपरायण:। तुम्हारी बुद्धि स्थिर नहीं है।
मुसलमानों की ही भाँति विक्टिम कार्ड भी खेलने लगा -
हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम् ।
किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥
मुझ निरपराध को बाण से मारने का जुगुप्सित कर्म कर तुम सत्पुरुषों के बीच में क्या कहोगे?

बाली ने इतना तक कह दिया कि अरे !  तुम शठ हो, अपकारी हो, क्षुद्र हो,  मिथ्या ही अपने को शांतचित्त दिखाते रहते हो। महात्मा जैसे राजा दशरथ से तुम्हारे जैसा पापी कैसे उत्पन्न हो गया !
शठो नैकृतिक: क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानस: । कथं दशरथेन त्वं जात: पापो महात्मना !
श्रीराम आज कल के मोहनदासी हिंदू होते तो पानी पानी हो गये होते!

श्रीराम ने उत्तर देना आरम्भ किया - धर्म, अर्थ, काम एवं लौकिक आचार को तो तुम स्वयं नहीं जानते, बालोचित अविवेक से ग्रस्त हो मेरी निंदा करते हो? - अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे ! यह समस्त पृथ्वी इक्ष्वाकुओं की है, वे पशु पक्षी सहित समस्त मनुष्यों पर दया करने एवं दण्ड देने के अधिकारी हैं।
धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वी का पालन करते हैं - तां पालयति धर्मात्मा भरत: सत्यवानृजु:। भरत की ओर से हमें तथा अन्य पार्थिवों को यह आदेश प्राप्त है कि जगत में धर्म पालन एवं प्रचार का यत्न किया जाय। अत: हमलोग धर्म का प्रसार करने की इच्छा से इस पृथ्वी पर विचरते हैं :
तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवा: ।
चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छव: ॥
राम ने भरत की महिमा बताई तथा आगे वह कारण गिनाये जिनके कारण बाली को उन्हें मारना पड़ा, तुलसीदास ने अनुवाद किया - अनुजबधू भगिनी सुतनारी  ...
राम ने पापकर्म का दण्ड भरत के प्रतिनिधि होने के कारण दिया।
तदेतत्कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः
भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्
अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः
रुमायां वर्तसे कामात्स्नुषायां पापकर्मकृत्
तद्व्यतीतस्य ते धर्मात्कामवृत्तस्य वानर
भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन्दण्डोऽयं प्रतिपादितः
न हि धर्मविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः
दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप
औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः
प्रचरेत नरः कामात्तस्य दण्डो वधः स्मृतः
भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः
त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम्
गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन्
भरतः कामवृत्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः
वयं तु भरतादेशं विधिं कृत्वा हरीश्वर
त्वद्विधान्भिन्नमर्यादान्नियन्तुं पर्यवस्थिताः
श्रीराम ने यह भी बताया कि दण्ड देने में प्रमाद करने पर राजा को दूसरों के पाप भोगने पड़ते हैं। भारत की समस्या यही है कि राजदण्ड या तो है ही नहीं या मोहनदासी प्रभाव में चलता ही नहीं।
लोकतंत्र में तो लोक ही राजा है न? सरकार उसकी प्रतिनिधि। प्रतिनिधि दण्ड नहीं देगा तो राजा पाप भोगेगा अर्थात लोग कष्ट भोगेंगे। भारत की जनता भोग रही है।
victim card ख़ेल कर आजकल के वामपंथी प्रयासों की भाँति उन्हें अवसाद एवं पछतावे, ग्लानि आदि से भर देने के बाली के कथनों पर श्रीराम ने बहुत स्पष्ट कह दिया :
न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुङ्गव ।
वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नरा :॥
इस कार्य के लिये मेरे मन में न तो संताप होता है और न खेद ही। मनुष्य जाल बिछा कर, पाश पसार कर तथा नाना प्रकार के कूट उपाय कर मृगों को पकड़ लेते हैं, तू तो शाखामृग (उत्पाती) है - यस्माच्छाखामृगो ह्यसि !
...
शत्रु कपटी हो, शक्तिशाली हो तो कपट से या छिप कर मारें । मन में कोई अपराध भाव या ग्लानि न रखते हुये दुरात्माओं को येन केन प्रकारेण नष्ट करने वाले क्षात्रधर्म की आवश्यकता है।  

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

भार्गव वाल्मीकि एवं जातीय गतिशीलता

जातीय गतिशीलता को नहीं समझने से, काल की बृहद परास में घटित की विस्मृति से या उपेक्षा करने से आज कल की बहुत सी समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। भारत तोड़क प्रचार तंत्र की भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका है।
भार्गव कुल एवं संततियाँ नवोन्मेष हेतु जानी जाती हैं। पनही, छाता, आँवा में पकाये मृद्भाण्ड, परशु आदि कुछ ऐसे क्रांतिकारी नवोन्मेष हैं जिनका उन्हें श्रेय है। महाभारत में कुम्भकार का कर्मस्थल 'भार्गवकर्मशाला' कहा गया है। 
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां; पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ।
तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ; भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्र्यौ॥
[महाभारत (बड़ौदा संस्करण), ०१.१८२.००१]
भार्गवों ने ही स्मृति, पुराण, आख्यान आदि का पुनर्सम्पादन किया, लुप्तप्राय को पुनर्जीवित किया। वाल्मीकि भी भार्गव थे। यदि अतिप्राचीन एकत्त्व से कोई वर्ग आज कहता है कि वाल्मीकि 'वाल्मीकि समाज' से थे तो उसे आज के परिप्रेक्ष्य में नहीं, सहस्राब्दियों पूर्व के एकत्त्व से समझा जाना चाहिये। क्या यह सम्भव नहीं कि कुछ भार्गवों ने शिल्प व्यवसाय चुना हो तथा उसी में रह गये हों? गोत्र की अवधारणा को ही देखिये, क्या सभी समान गोत्र वाले एक ही पुरुष की संतान हैं या एकसमान गुरु, शिक्षा एवं दीक्षा परम्परा के कारण एक गोत्र के कहलाते हैं?
विविधता एवं विविध घटित की उपेक्षा कर अपेक्षतया नये रूपों की संकीर्णता में देखेंगे तो सामाजिक विघटन ही होगा, संगठन नहीं। सनातन शत्रु यही चाहते हैं। कोई आवश्यक नहीं कि सदैव प्रतिक्रिया दी ही जाय, मौन का अपना महत्त्व है। अध्ययन की परास लम्बी अवश्य होनी चाहिये जिससे कि समझ विकसित हो सके।

बुधवार, 16 जनवरी 2019

Mahabharat Shanti Parv महाभारत : शांतिपर्व - 1 [राजा रञ्जयति प्रजाः]

भारत का महाभारत युद्ध अभूतपूर्व विनाश के साथ समाप्त हो चुका था। भरतवंश के उत्तराधिकारी युधिष्ठिर का मन खिन्न था, उचाट। श्रीकृष्ण ने उन्हें शरशय्या पर बुझी हुई अग्नि के समान पड़े वृद्ध भरतवंशी भीष्म के पास जा कर शिक्षा लेने को कहा, कहा कि इस समय भीष्म मेरा ध्यान कर रहे हैं अत: मेरा मन भी उन्हीं में लगा है। 
कहा कि वसिष्ठ मुनि द्वारा शिक्षा प्राप्त भीष्म के अवसान के साथ ही ज्ञान का प्रकाश अस्त हो जायेगा अत: मैं तुम्हें उनके पास चलने को कहता हूँ। 
श्रीकृष्ण ने पास पहुँच कर भीष्म से कहा कि युधिष्ठिर शोकहत हो गये हैं, उन्हें समाधियुक्त धर्मार्थ का सत्य उपदेश करें, इन्हें शोक से मुक्त करें। 
भीष्म ने उत्तर दिया कि कृष्ण, आप के होते हुये यह काम मैं करूँ? गुरु के रहते हुये शिष्य उपदेश देने का अधिकारी भी है? मेरी देह बाणों से पीड़ित है, बुद्धि काम नहीं कर रही, न दिशाओं का ज्ञान है, न आकाश का, न पृथ्वी का। मैं तो केवल आप के प्रभाव से यहाँ बना हुआ हूँ। 
कृष्ण ने उन्हें समस्त दोषों से मुक्त करने हेतु वर दिया, उनकी बुद्धि को सतोगुण में स्थिर कर दिव्य दृष्टि दी तथा अगले दिन आने की कह युधिष्ठिर सहित विदा ले ली। 
वैशम्पायन बताते हैं कि लौट कर कृष्ण एवं पाण्डव ने भवन में ऐसे प्रवेश किया मानों श्रम से थके सिंह अपनी गुहा में प्रविष्ट हो रहे हों - श्रमान्‍विता मृगपतयो गुहा इव
... 
अगले दिन वहाँ पहुँचने पर पाण्डवों ने दाहिने हाथ उठा कर महर्षियों का अभिवादन किया। महर्षियों से घिरे भीष्म इस प्रकार दिख रहे थे जैसे देवताओं से घिरे ब्रह्मा हों। नक्षत्रों से घिरे चंद्रमा की भाँति भाइयों से घिरे युधिष्ठिर ने देखा, कुरुवंश का शलाका पुरुष शरतल्प पर शयन करता ऐसा दिख रहा था मानों सूर्य आकाश से गिर पड़ा हो - शरतल्पे शयानं तमादित्यं पतितं यथा
युधिष्ठिर भय से काँप उठे - भयाच्चागतसाध्वस:
श्रीकृष्ण ने भीष्म से उनकी कुशल पूछी - रात आप ठीक से सोये तो? बुद्धि निर्मल तो है? कोई ग्लानि तो नहीं? मन व्याकुल तो नहीं? 
भीष्म ने उत्तर दिया, हे वार्ष्णेय! तुम्हें देख कर मेरे समस्त दोष दूर हो गये। मैं भूत, भविष्य, भव सब देख रहा हूँ। वेदोक्त धर्म एवं वेदांत को भी साक्षात देख पा रहा हूँ। शिष्ट जन द्वारा बताया धर्म मुझे स्पष्ट है। 
हे जनार्दन!‍ देश, जाति, कुल एवं कुलधर्म का भी मुझे ज्ञान है। आश्रम धर्म एवं राजधर्म मुझे प्रकाशित हैं। जिस विषय में जो कुछ भी कहने योग्य है, मैं कहूँगा। आप के निरंतर स्मरण से मैं युवा हो गया हूँ - युवेवास्मि। आप के प्रसाद से वक्ता हो उपदेश देने में मैं समर्थ हूँ। 
तब भी मैं जानना चाहता हूँ कि आप पाण्डव युधिष्ठिर को स्वयं उपदेश क्यों नहीं करते? माधव, शीघ्र बताइये। 
स्वयं किमर्थं तु भवाञ्श्रेयो न प्राह पाण्डवम् । 
किं ते विवक्षितं चात्र तदाशु वद माधव ॥ 

वासुदेव ने उत्तर दिया, हे कौरव ! यश एवं श्रेय का मूल मैं हूँ। सत एवं असत पदार्थ मुझसे ही उत्पन्न हैं। चंद्रमा शीतल किरणों से सम्पन्न है, यह कहने पर किसे विस्मय होगा ! सम्पूर्ण यश से सम्पन्न मुझसे उपदेश प्राप्त कर किसे आश्चर्य होगा ! मुझे आप के यश की प्रतिष्ठा करनी है। जब तक यह पृथ्वी रहेगी, आप की कीर्ति सम्पूर्ण लोकों में रहेगी। आप पाण्डव युधिष्ठिर के पूछने पर जो भी कहेंगे, वह वेद सिद्धांत की भाँति इस वसुधा पर मान्य होगा - वेदप्रवाद इव ते स्थास्यते वसुधातले। 
मरने से बचे हुये राजन्य गण आप के पास धर्म का अनुनय ले कर बैठे हैं, उन्हें बतायें। आप वृद्ध हैं, श्रुति आचार से समन्‍वित हैं, राजधर्म के ज्ञाता सदाचारी हैं। राजन्य को उसी प्रकार उपदेश दें जिस प्रकार एक पिता पुत्र को देता है। इसे धर्म बताया गया है कि सुनने की इच्छा रखने वाले को श्रेष्ठ विद्वान पूछने पर उपदेश दे। 
भीष्म ने सहर्ष स्वीकृति देते हुये युधिष्ठिर की प्रशंसा में जो शब्द कहे, वे प्रकारान्तर से मानों गम्भीर विषयों पर प्रश्न करने की पात्रता के निकष हैं : 
सर्वेषां दीप्तयशसां कुरूणां धर्मचारिणाम्
यस्य नास्ति समः कश्चित्स मां पृच्छतु पाण्डवः
धृतिर्दमो ब्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा
यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः
सत्यं दानं तपः शौचं शान्तिर्दाक्ष्यमसंभ्रमः
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः
यो न कामान्न संरम्भान्न भयान्नार्थकारणात्
कुर्यादधर्मं धर्मात्मा स मां पृच्छतु पाण्डवः
संबन्धिनोऽतिथीन्भृत्यान्संश्रितोपाश्रितांश्च यः
संमानयति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण्डवः
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः
इज्याध्ययननित्यश्च धर्मे च निरतः सदा
शान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः

कृष्ण ने कहा कि युधिष्ठिर तो लज्जा से ग्रस्त हैं कि मुझसे इतना बड़ा जगत संहार हो गया, वे तो शाप के भय से भयभीत हैं, अत: नहीं पूछ रहे - अभिशापभयाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति। 
... 
वासुदेव की भूमिका पूर्ण हुई। अपने ही रक्त, पीव में सना पुरा-भारत भविष्य के भारत को उपदेश देने की भङ्गिमा में आ गया। वह रणक्षेत्र जो शवभक्षी जंतुओं का मोदस्थल बना हुआ था, समस्त महर्षियों एवं स्वयं भगवान की उपस्थिति में, ध्वंस की पृष्ठभूमि में, शान्ति के उपदेश का, प्रजा के दुख को राजा कैसे शांत रखे, इस उपदेश का साक्षी हुआ, नाम पड़ा - शांतिपर्व। 
पहला श्लोक, दो अग्रणी वर्णों के धर्म क्या हैं, बताते हुये निस्सृत हुआ जो कृष्ण को सम्बोधित था। जैसे कभी अर्जुन ने युद्ध आरम्भ से पूर्व गुरु द्रोण के पाँव शर संधान कर आशीर्वाद लिया था, वैसे ही भीष्म ने पहला श्लोक गुरु कृष्ण को धर्म बताते हुये कहा : 
ब्राह्मणानां यथा धर्मो दानमध्ययनं तपः
क्षत्रियाणां तथा कृष्ण समरे देहपातनम्

श्लोक युधिष्ठिर हेतु अभयदान था कि पूछो वत्स, जो कुछ पूछना है। युधिष्ठिर पास गये तो उनका मस्तक सूँघ पास बैठा लिये - तात! मैं स्वस्थ हूँ, निर्भय हो कर प्रश्न करो - पृच्छ मां तात विस्रब्धं मा भैस्त्वं कुरुसत्तम। 
युधिष्ठिर ने पहला प्रश्न पूछा, धर्मज्ञ विद्वानों का कहना है कि राजाओं का धर्म परम धर्म है, मैं इसे बहुत बड़ा भार मानता हूँ। 
हे पार्थिव! मुझे राजधर्म का उपदेश करें : 
राज्यं वै परमो धर्म इति धर्मविदो विदुः
महान्तमेतं भारं च मन्ये तद्ब्रूहि पार्थिव

राजधर्म में धर्म, अर्थ एवं काम तीनों का समावेश है - त्रिवर्गो हि समासक्तो राजधर्मेषु। मोक्ष भी उसमें समाविष्ट है। अश्व एवं हाथी को नियंत्रित रखने हेतु जिस प्रकार वल्गा एवं अङ्कुश आवश्यक हैं, उसी प्रकार लोक मर्यादा हेतु राजधर्म आवश्यक है - नरेन्‍द्रधर्मो लोकस्य तथा प्रग्रहणं स्मृतम्। 
राजा प्रमादग्रस्त हो जाय तो समस्त व्यवस्था बिगड़ जाये, सभी व्याकुल हो जायँ। जिस प्रकार सूर्य अंधकार का नाश कर देते हैं, उसी प्रकार राजधर्म मनुष्य के अशुभ आचरणों का निवारण कर देता है ...
... कुरुवंश की दो पीढ़ियाँ एक दूसरे के समक्ष आहत समय पर औषधि लेप की चिंता में बैठी थीं। बताने वाला वह था जिसने सक्षम होते हुये भी राजसिंहासन का त्याग कर दिया था, जिसने मर्यादा की वल्गा तोड़ने की अपेक्षा अशुभ का पोषण रक्षण करना चुना था, जो शरशय्या पर मृत्यु की प्रतीक्षा में था। पूछने वाला भी वृद्ध हो चला था, जाने कितने नरसंहार की सञ्चित पीड़ा के बीच उसके मन में राजसिंहासन की अपेक्षाओं को ले कर शंकायें थीं, जिसका विश्वास डोल रहा था किंतु धर्मबुद्धि तब भी स्थिर थी। मृत्यु को भी वश में करने वाला आहत प्रपितामह धर्म उपदेश देने लगा। युधिष्ठिर जैसा सुपात्र एवं जिज्ञासु श्रोता उसे कभी मिला ही नहीं था। युद्ध पीछे रह गया, प्रशान्‍त ज्ञानसरि बह चली...
राज्ञा रञ्जनकाम्यया - राजा को प्रजा के रञ्जन की कामना से देवता एवं ब्राह्मणों के प्रति यथाविधि व्यवहार करना चाहिये। युधिष्ठिर ! तुम सदैव पुरुषार्थ हेतु प्रयत्नशील रहना। उसके बिना प्रारब्ध राजाओं का प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकता - न ह्युत्थानमृते दैवं राज्ञामर्थं प्रसादयेत्। मैं पुरुषार्थ को ही प्रधान मानता हूँ - पौरुषं हि परं मन्ये। आरम्भ किया हुआ कार्य पूरा न हो तब भी तुम उसका दु:ख न मान अपने पुरुषार्थ में लगे रहना - विपन्ने च समारम्भे संतापं मा स्म वै कृथा:
राजा के लिये सत्य ही परम धन है, ऋषियों हेतु भी - ऋषीणामपि राजेन्‍द्र सत्यमेव परं धनम्।
गुणवाञ्शीलवान्दान्तो मृदुर्धर्म्यो जितेन्द्रियः
सुदर्शः स्थूललक्ष्यश्च न भ्रश्येत सदा श्रियः
आर्जवं सर्वकार्येषु श्रयेथाः कुरुनन्दन
पुनर्नयविचारेण त्रयीसंवरणेन च
मृदुर्हि राजा सततं लङ्घ्यो भवति सर्वशः
तीक्ष्णाच्चोद्विजते लोकस्तस्मादुभयमाचर

गुणी, शीलवान, मन एवं इंद्रियों का संयमी, प्रसन्नमुख एवं दानी राजा की श्री भ्रष्ट नहीं होती। समस्त कार्यों में सरलता एवं कोमलता का अवलम्बन करे किंतु अपने दोष, अपनी मंत्रणा एवं अपने कार्यकौशल; इन तीन में संयम रखे, गोपनीयता रखे तथा सरलता का आश्रय न ले। जो राजा सदैव मृदु रहता है, उसकी आज्ञा का सभी उल्लङ्घन कर जाते हैं तथा जो सदैव तीक्ष्ण एवं कड़ा रहता है, उससे सभी उद्विग्न रहते हैं। राजा को आवश्यकतानुसार कठोरता एवं कोमलता, दोनों का अवलम्बन लेना चाहिये। 
ब्राह्मण पूजनीय है किंतु यदि वह विनाश को उद्यत हो या शस्त्र उठा कर आक्रमण करने आ रहा हो तो उसके वेदांत पारग होने पर भी उसे बंदी बना लेना चाहिये - उद्यम्य शस्त्रमायान्तमपि वेदान्तगं रणे । निगृह्णीयात्स्वधर्मेण धर्मापेक्षी नरेश्वरः ॥
दुर्गेषु च महाराज षट्सु ये शास्त्रनिश्चिताः
सर्वेषु तेषु मन्यन्ते नरदुर्गं सुदुस्तरम्
तस्मान्नित्यं दया कार्या चातुर्वर्ण्ये विपश्चिता
धर्मात्मा सत्यवाक्चैव राजा रञ्जयति प्रजाः

महाराज युधिष्ठिर ! 
रक्षा में समर्थ छ: प्रकार के दुर्ग बताये गये हैं - मरु (जलहीन भूमि क्षेत्र), जल, पृथ्वी, वन, पर्वत एवं मनुष्य । इन सबमें नरदुर्ग अर्थात मनुष्यों द्वारा प्रदत्त रक्षा ही प्रधान है। शास्त्रों को जानने वाले विद्वान समस्त दुर्गों में मानव दुर्ग को ही अत्यंत दुर्लङ्घ्य मानते हैं अर्थात किसी राज्य के यदि समस्त वर्गों के मनुष्य राजा से संतुष्ट हैं तो वे ही उसके सबसे सुदृढ़ दुर्ग हैं। 
अत: विद्वान राजा को चारो वर्णों पर सदा दया करनी चाहिये। धर्मात्मा एवं सत्यवादी राजा ही प्रजा को प्रसन्न रख पाता है। 

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(क्रमश:) 

रविवार, 13 जनवरी 2019

Bhanu Saptami भानु सप्तमी के व्याज से गणित चर्चा

आज भानु सप्तमी है। जिस सप्तमी तिथि को रविवार पड़ता है, वह भानुसप्तमी कहलाती है। क्यों भला?
आप इतना जो जानते ही हैं कि अपने यहाँ दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना गया है अर्थात प्रत्येक दिन सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक होता है। सरल प्रेक्षण से आरम्भ करते हैं। पूर्णिमा तो जानते ही होंगे जिस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होते हैं। आप यह भी जानते हैं कि किसी भी बिंदु पर एक चक्र ३६० अंश का कोणीय घुमाव लिये होता है तथा किसी भी सीधी रेखा का अर्थ उसके किसी भी बिंदु पर १८० अंश होता है अर्थात बिंदु पर होने वाले पूरे कोणीय घुमाव का आधा। 

पूर्णिमा के दिन साँझ को खुले में निकल लें तो आप देख पायेंगे कि जब पश्चिम में सूर्य का गोला अस्त हो रहा होता है तो उसके ठीक सामने पूरब में पूर्ण चंद्र का बड़ा सा गोला उदित हो रहा होता है। बड़ा ही मनोहारी दृश्य होता है। उस समय दोनों आप जहाँ खड़े हैं उस बिंदु के दोनो छोरों पर एक रेखा में अर्थात १८० अंश के कोण पर होते हैं। आगे चंद्र का प्रकाशित भाग प्रतिदिन घटने लगता है जिसे कला कहते हैं।
यदि आप प्रतिदिन देखते रहेंगे तो पायेंगे कि चंद्र का उदय सूर्यास्त के पश्चात प्रतिदिन बिलम्ब से होने लगा है तथा क्रमश: चंद्रोदय बिंदु पश्चिम की दिशा में खिसकने लगा है। यही कृष्ण पक्ष है, चंद्रमा घटते जाते हैं। एक दिन ऐसा आता है कि जब चंद्र दिखते ही नहीं अर्थात सूर्य के साथ ही हो जाते हैं। एक चक्र पूरा हो कर ३६० अंश का कोण भी पूरा हो जाता है तथा अदृश्य हो जाते हैं। यही स्थिति अमावस्या कहलाती है आरम्भ ० तथा अंत ३६० अंश सम्पाती। चूँकि इस दिन सूर्य एवं चंद्र 'साथ' होते हैं, अमावस्या को बहुत ही शाक्त साधनाओं के लिये उपयुक्त माना जाता है। 
सूर्योदय से सूर्योदय तक दिन का चंद्र से कुछ नहीं लेना देना, वह चलता रहता है। हम सूर्य एवं चंद्र की परस्पर कोणीय स्थिति का दैनिक परिवर्तन देख चुके हैं। ० से पुन: ३६० अंश तक घूम कर वहीं पहुँचने में चंद्र को लगभग २९.५ दिन लगते हैं अर्थात १८० अंश का अंतर होने में १४.७५ दिन जिसे लगभग कर सुविधा के लिये १५ दिन मान कर ३० दिन का पूरा मास (मास का मा चंद्रमा के मा से सम्बंधित है :) चंदा मामा ऐसे ही हुये।) तथा १५ दिन का एक पक्ष माना जाता है - शुक्ल पक्ष जब चंद्र अमावस्या से बढ़ते होते हैं, कृष्ण पक्ष जब पूर्णिमा से आगे घटते होते हैं।
तो ३६० अंश ३० दिन अर्थात १२ अंश प्रतिदिन का अंतर। सूर्य एवं चंद्र के बीच यही १२ अंश का अंतर होने में लगा समय एक तिथि कहलाता है अर्थात जब पक्ष की तिथि बताई जाये तो आप चंद्रमा एवं सूर्य के बीच का कोण जान लेंगे। उदाहरण के लिये आक शुक्ल पक्ष की सप्तमी है तो चंद्रमा एवं सूर्य के बीच १२x७ = ८४ अंश का कोण होगा। कृष्ण पक्ष की होती तो १८०+८४ अर्थात २६४ अंश का कोण होता।   
समस्या पूर्ण ३० दिन नहीं होने से आती है जिसके समायोजन की अपनी विधियाँ हैं, उसमें नहीं जायेंगे। केवल इतना जान लें कि विश्व की सबसे वैज्ञानिक भारतीय गणना पद्धति में इसे चतुराई से उदया तिथि के माध्यम से सुलझा लिया गया। तिथि वही मानी जाती है जिसमें सूर्योदय होता है अर्थात आवश्यक कोण का अंतर हो जाने के पश्चात के सूर्योदय का दिन उस तिथि का माना जायेगा। यदि सूर्योदय के पश्चात आवश्यक कोण अंतर आता है तो पुरानी तिथि ही मानी जायेगी। इस गणित एवं प्रकृति के संयोजन में कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि पुरानी तिथि में सूर्योदय हुआ तथा अगले सूर्योदय के पूर्व ही कोणीय स्थिति पूर्ण हो अगली तिथि हो गई अर्थात बीच वाली तिथि में सूर्योदय हुआ ही नहीं ! इसे क्षय तिथि कहा जाता है तथा उसकी गिनती होती ही नहीं! 
ऐसा भी होता है कि एक ही तिथि में दो सूर्योदय हो गये। इसे अधिक तिथि या तिथि विस्तार कहते हैं। इस प्रकार वह आधे दिन का अंतर अपने आप समायोजित होता रहता है। 
तो आप ने दिन जान लिया, तिथि जान लिया। 
अब आते हैं वार पर, रविवार, सोमवार, ... कुल सात वार। ये सात ही क्यों हैं? गणित के बारे में कहा जाता है कि प्रकृति से गणित है, गणित से प्रकृति है। कैसे? देखते हैं। पृथ्वी सूर्य का एक चक्र ३६५ से अधिक एवं ३६६ से अल्प दिनों में पूरी करती है। मास के ३० से भाग दे तो १२ की संख्या आती है। यही १२ मास हैं या द्वादश आदित्य भी। सूर्य नमस्कार में १२ नामों से मंत्र हैं न ! 
केवल चंद्र गति देखें तो १२ मास में केवल १२x२९.५ = ३५४ दिन ही हुये। ३५४ एवं ३६६ का औसत हुआ .... हाँ, ३६०। तो किसी बिंदु पर बनने वाले कोण का ३६० भागों में विभाजन इस कारण से है जिससे कि सुविधा रहे, एक तिथि १२ अंश, १२ महीने, ३६० अंश, वर्ष में ३६० दिन, आगे संयोजन आदि सब एक दूसरे से जुड़े हुये हैं जिनके मूल में प्रकृति का प्रेक्षण है तथा प्रकृति का गणित से बंधन भी। 
सात पर लौटते हैं। इसका रहस्य पृथ्वी अर्थात प्रेक्षक के सापेक्ष ग्रहों की गति से जुड़ा है। पुरातन समय में ज्ञात ग्रहों (ग्रह की आज की परिभाषा न लें) को उनकी गति के घटते क्रम में रखें तो यह स्थिति बनती है: 
शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चंद्र। दिनमान को इनसे जोड़ दिया गया। आप के पास दो पद्धतियाँ थीं- सौर एवं चंद्र अर्थात आदित्य एवं सोम। दिन नाम का आरम्भ आदित्यवार (अतवार, इतवार) या सोमवार से कर सकते हैं। चलिये अतवार से करते हैं। दिन के पहले होरा (Hour, कभी पूरा होने पर सूचित करने हेतु नगर चतुष्पथ पर घण्टा बजाया जाता था) को सबसे तीव्र गति वाले चंद्र से जोड़ दें, अगले घण्टे को अगले तीव्र बुध से, अगले को शुक्र से ... उसी प्रकार बढ़ते जायें तो पायेंगे कि दिन के २४ घण्टे पूरे होने पर अगले दिन का पहला होरा चंद्र पर आयेगा अर्थात पहले घण्टे के आधार पर उस दिन का नाम हुआ सोमवार, आगे ४८ घण्टे अर्थात दो दिन बीतने पर अगले दिन के पहले घण्टे का स्वामी हो जायेगा मंगल अर्थात वह दिन मंगलवार। इसी प्रकार चक्रीय क्रम में दिनों के नाम होते जायेंगे। 
यह सात की संख्या भी गणित एवं प्रकृति के परस्पर सम्बंध को दर्शाती है। सूर्य रश्मियों में सात रंग होते हैं। बारह एवं सात का योग उन्नीस होता है जो कि चंद्र गति के एक महत्त्वपूर्ण चक्र के वर्षों से जुड़ा है। प्रत्येक १९ वर्ष पर चंद्र तिथि एवं सौर दिनांक अपना साथ दुहराते चलते हैं। 
बारह में से सात घटायेंगे तो ५ होगा, पाँच तत्त्व। वत्सर भी पाँच नाम से। दो ऋतुओं को मिला कर एक कर छ: के स्थान पर पाँच ऋतुओं की बात वैदिक साहित्य में खूब मिलती है।
शतपथ ब्राह्मण में वर्षा एवं शरद को मिला कर पाँच ऋतुओं की बात की गयी है:
लोको॑वसन्त॑ऋतुर्य॑दूर्ध्व॑मस्मा॑ल्लोका॑दर्वाची॑नमन्त॑रिक्षात्त॑द्द्विती॑यम॑हस्त॑द्वस्याग्रीष्म॑ऋतु॑रन्त॑रिक्षमेवा॒स्य मध्यमम॑हरन्त॑रिक्षमस्य वर्षाशर॑दावृतू य॑दूर्ध्व॑म्न्त॑रिक्षादर्वाची॑नं दिवस्त॑च्चतुर्थम॑हस्त॑द्वस्य हेमन्त॑ऋतुर्द्यउ॑रेवा॒स्य पञ्चमम॑हर्द्यउ॑रस्य शि॑शिर ऋतुरि॑त्यधिदेवतम्।
शतपथ के पुरुषमेध का प्रारम्भ पाँव से होता है और पाँव है ऋतुओं में सर्वश्रेष्ठ बसंत! शतपथ का वर्षा और शरद को मिलाना उस ऋग्वैदिक कूट कथ्य से भी जुड़ता है जिसमें इन्द्र वृत्र को मार कर सूर्य और वर्षा दोनों को नया जीवन देते हैं। पुरुषमेध में यह देह का केन्द्रीय भाग अर्थात कटि है।
ऐसा क्यों? इसमें उस समय की स्मृति है जब वर्ष का आरम्भ वर्षा से था। शरद मिला देने पर शरद विषुव जोकि वसंत विषुव से छ: महीने के अंतर पर पड़ता है, वर्षा के साथ आ जाता है, नाक्षत्रिक एवं ऋत्विक प्रेक्षणों के सम्मिलन से सुविधा हो जाती है।
ऐतरेय ब्राह्मण में हेमंत एवं शिशिर को मिला दिया गया है: हेमन्‍तशिशिरयो: समासेन तावान्‍संवत्सर: संवत्सर: प्रजापति: प्रजापत्यायतनाभिरेवाभी राध्नोति य एवं वेद।
१९ में इस ५ का गुणा करेंगे तो आयेगा ९५। यह संख्या एक युगमान है जिसमें सौर चंद्र गतियों का सूक्ष्म समायोजन किया जाता था। 
१२ का पहाड़ा देखें तो अद्भुत संयोग मिलेंगे - १२ आदित्य; २४ गायत्री मंत्र अक्षर, ३६ तैंतिस देवता एवं त्रिदेव; ४८ सात गुना सात ४९ मरुतों से मात्र एक की न्यूनता; ६० बृहस्पति एवं शनि गति समन्‍वित संवत्सर नाम; ७२ ब्रह्मा के एक चक्र में चतुर्युगी संख्या ७१ एवं ७२ के बीच; ८४ योनिलक्ष; ९६ ९५ वर्ष के शोधन चक्र से आगे की संख्या; १०८ पर कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है।  अन्य अनेक उदाहरण हैं, जिन्हें रुचि हो वे अग्निचयन एवं श्रौत सत्रों की वेदी का गणित ब्राह्मण ग्रंथों से पढ़ें, शुल्व सूत्र देखें। कहने का अर्थ मात्र यह कि जिस प्रकार अंकगणित का उपयोग ज्योतिष में किया जाता था, वह आज कल की प्रचलित शिक्षा पद्धति से लुप्त है, प्रकृति से जुड़ाव कट गया है। 
तो चाहे आदित्य से आरम्भ करें या सोम से, सात की संख्या महत्त्वपूर्ण है। सूर्य की रश्मियों के सात वर्ण, सात 'ग्रह', सात वार आदि से सूर्य आधारित दिनमान पद्धति में सात की संख्या बहुत महत्त्वपूर्ण हो गयी तथा सप्तमी तिथि को सूर्य से जुड़ा मान लिया गया। 
अब सूर्य की संख्या वाली तिथि एवं उनके वार रविवार या आदित्यवार की संगम हो जाये तो पर्व या विशेष व्रत आदि का योग बनता है न? 
आज की भानुसप्तमी वही है। भा को भाने से, प्रभा से, विभा से समझें कि अद्भुत कांति के साथ मनोहारी प्रभाव। सूर्य में तो होती ही है किन्‍तु आज विशेष हो जाती है। मानव का देव पर निज भाव आरोपण।