मंगलवार, 11 अगस्त 2009

अंतिम दिन - प्रथम भाग : बाउ मण्डली और बारात एक हजार

पिछले भाग से जारी. .

(व)

छोटा सा टोला। बात बेबात हो कर फैल गई। भींड़ जहाँ जुटे वहाँ हजार हुज्जत। कोई सुद्धन को दोष दे तो कोई बारात में सुलझे आदमियों की अनुपस्थिति को। कुछ तो आँखों देखा हाल सुनाने में व्यस्त हो गए जैसे कि बाकी लोग अन्धे हों और वे संजय ! कुछ अनुमान शास्त्र का प्रयोग बड़ी गम्भीरता से करने लगे। नाहर तो बस चन्द्र टरै सूरज टरै टरै जगत् व्यवहार। मनौवल अब साझा प्रयास हो चला था - अष्टभुजा, मिसिर, मुनेसर . . .

जहाँ एक साथ कई मुँह जुड़ते हैं वहाँ की हवा गन्धाने लगती है। भाँति भाँति के गन्ध - प्याज, पायरिया, कथ्था, हुक्का, सुरती, जुकाम . ..आक् थू । कुछ ही देर में खलिहान गन्हमातल हो गया।

बाउ को रमरतिया दिख गई अपनी छोटी गोल के साथ - सबसे किनारे हवा पानी सूँघती हुई! गन्ध से बौराए बाउ के नथुनों में जैसे इतनी दूर से भी पद्मिनी की कमल गन्ध समा गई। दिमाग ने उल्टा घूमना शुरू कर दिया - बिनै न मानें जलधि जड़, गए तीन दिन बीत !

बाउ ने मुन्नर को गोहराया। आवाज इतनी तेज की सभी सुन लें," बहुत हो गइल मनउवल। ई ए तरे थोड़े खइहें। गाड़ा पर लादि के कलेवा एहिजा ले आउ। पकड़ी के पेंड़े पर मिसिर गाँठि बान्हि दीहें। रमरतिया के बोलाउ। अब ओन्हईं कूल के हाथे समधी खइहें। जवार के ढेर दिन ले मन परीSS(1) ....."

रमरतिया ! कुछ न जानते हुए भी महेशानन्द ने निहितार्थ भाँप लिया था। बाउ के अगले वाक्य ने बात का उपसंहार उगला,

"....न जाँ घरेSSSएहि खरिहाने मंड़वा अस्थिर होई अउर एहि जा समधी खइहें। नाहीं खइहें त मूहें में हूराई SS। ए रमरतिया ! "(2)

!!!!

खलिहान पर बहती गन्हमातल बयार ठहर गई। बँवड़ेरा के पहले का ठहराव !

और अचानक गति आई। मोछिउखरना ने लठैतों को ललकारा। छ: प्रशिक्षित लठैतों ने क्षण भर में बाउ को घेर लिया। थोड़ी चूक तो हुई लेकिन बाउ मंडली हरकत में आ गई। दर्जनों दिमागों का मौन संवाद ! वार करने और बचाने की जगह छोड़ घेरे के बाहर एक और घेरा कस गया।

बाउ के मन में झालें बजने लगीं - झन ..झनन .. झन झन । आक्रमण नहीं बचाव!. . .सूरसती. . .गुरु गोनई। जैसे दो कंठ लयकारी कर रहे हों।

"ई खेल तमाशा नाहीं बचवा। कटार के धार बचवा। हरदम देखिह कि केहू के लागि न जा(3)"

हट !

" भइया के जनि बोलिह हो बाबाSSS, भइया बड़ीSSS बरजोर हे SS(4)"

भैया !!

सूरसती ! गुरु गोनई, दोहाई !! हमला नाहीं रोक !

...आदेश। " मारSS सो सारे के। इहे सरगना ह S। पहिलही दिन से तमाशा ढीलले बाSS(5)"

रोक !! एक क्षण में जैसे सब हो गया। लठैतों का पहला वार। बाउ ने डँड़ारी मारी। घेरों से बाहर हो गए। निष्फल लाठियाँ एक दूसरे के उपर जमीन पर गिरीं आवाजें ऐसी कि जैसे कउड़ा में नून के ढेले डाल दिए हों ! तड़!तड़ाक! तड़!!!

अष्टभुजा और मिसिर उस समय नाहर को समझा रहे थे। हाँ...हाँ करते पोछिटा सँभालते दोनों दौड़े। लठैतों ने दुबारा घेर लिया था। बाउ मंडली - फिर घेरे के बाहर घेरा। यह खेल हो रहा था क्या?

. . पँचई पर खरिहाने गदका के खेल। सिरे सिर! हाथे हाथ! मार! रोक!! मार! रोक!!! - लेकिन उसमें निहथ्थे पर वार? कत्तई नहीं।

बाउ के हाथ में छोलदारी का बाँस आ चुका था।

रोक !

कटार के धार बचवा !

रोक!!

भइया बड़ीSSS बरजोर हे!

रोक!!!

लाठियों की दूसरी खेप! रोक!!

जाने कैसे अष्टभुजा घेरों को तोड़ते भीतर आ चुके थे। बाउ के पीछे से वार ! लाठी बहकी कि बाँस? अष्टभुजा के नंगे सिर को छूते निकल गया। खल्वाट सिर से रक्तधार बह निकली। गौर रक्तवर्णी चेहरे पर बीच से धार। बाउ ने देखा और याद आया - सूरसती की नाक के नीचे तक फिसल आया सिन्दूर!

यह कैसा विवाह!! बाभन, तें ई का कइले (6)?

ब्रह्म रक्त! लठैतों के हाथ रुक गए।

बाउ गमछा फाड़ घाव बाँधने चले। चोट छिछली थी। अष्टभुजा ने मना कर दिया। भ्रष्ट कुलगुरु और नाहर की जड़ता के विरुद्ध इस पुरोहित ने व्यवस्था दी, "नाहरसिंह, बाजा बजवाओ। हम भी चलेंगे भात खाने और गारी सुनने।" नाहर के पास आदेश मानने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा था। . . .ज़ारी

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शब्दसम्पदा:1. गन्हमातल - गन्ध से मत्त, 2. बँवड़ेरा - बवण्डर, 3. गोहराया - पुकारा, 4. जवार - क्षेत्र, 5. डँड़ारी - हाथों को हवा में चाप की तरह लहराते हुए और शरीर को झुकाते गति देते हुए जमीन पर लाना और पंजों पर सारे शरीर को साध उछलते दूरी तय करते हुए पुन: पैरों पर खड़े हो जाना, 6. कउड़ा - अलाव, 7. नून - नमक, 8. पोछिटा - धोती के अगले हिस्से के एक कोने को पैरों के मध्य से ले जाते हुए पीछे की तरफ कमरबन्ध में खोंसा हुआ भाग, 9. पँचई - नागपंचमी, 10. खरिहाने - खलिहान पर, 11. गदका - लकड़ी की छोटी गदाओं से खेले जाने वाला पुराना, वार और प्रतिवार के गुर सिखाता हुआ पौरुष भरा रोमांचक खेल, 12. भात - पका हुआ चावल, 13. गारी - गाली, यहाँ विवाह के अवसर पर के विशिष्ट गीतों के अर्थ में प्रयुक्त।

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अनुवाद:

  1. बहुत हो गया मनाना। ये इस तरह थोड़े खाएँगे। बैलगाड़ी पर लाद कर भोजन यहीं लाओ। पाकड़ के पेंड़ पर मिसिर गाँठ बाँध देंगे। रमरतिया को बुलाओ। अब उन्हीं सब के हाथ से समधी खाएँगें। यह क्षेत्र बहुत दिनों तक याद करेगा।
  2. न जाएँ घर ! इसी खलिहान पर मंडप स्थिर होगा और यहीं समधी खाएँगे। नहीं खाएँगे तो मुँह में ठूँस दिया जाएगा। रमरतिया !
  3. बच्चे यह खेल तमाशा नहीं, कटार की धार है। यह हमेशा ध्यान रखना कि किसी को लग न जाय।
  4. एक गीत का अंश - भैया को कुछ मत कहना बाबा। वे बड़े जिद्दी हैं।
  5. मारो साले को। यही सरगना है। पहले दिन से ही तमाशा कर के रखा है।
  6. ब्राह्मण, तुमने ये क्या किया?

10 टिप्‍पणियां:

  1. भाई कमाल करे जात बाट हो ....जरूर कौनो आत्मा का सवारी होई जावं ऐसन काव्य लिखाई लेत बी -जुग जुग जीया !

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  2. रोचक है अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा आभार्

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  3. सरगेउ कुकुरहइ भई ।
    बाउ तो चतुर, राजनैतिक कृष्ण की तरह हर मुसीबत का हल निकाल लेते हैं ।
    विलक्ष्ण है ये शैली ।
    देंखे अगले अंक में नाहर भले आदमी की भात खाते हैं या वहां भी लाठी बजेगी ।

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  4. भोजपुरी से हिन्दी का अनुवाद मुख्य आलेख से अलग करके आपने अच्छा किया। इससे प्रवाह बाधित नहीं होगा। जिन्हें कथिनाई होगी वे नीचे की डिक्शनरी का सहारा आवश्यकतानुसार ले सकते हैं। लेकिन उनके लिए हम अपना मजा क्यों खराब करें?

    बाऊ की लाठी का कुछ और करतब बचा है शायद...!
    हम फिर आएंगे तमाशा देखने। जमाए रहिए जी।

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  5. मिट्टी की महक लिए कउड़ा और नून जैसे शब्‍द अब विस्‍मृत होते जा रहे हैं। आभार उनकी याद दिलाने के लिए। लंठ चर्चा की कई कडि़यां छूट गयी हैं, आते हैं कभी इत्‍मीनान से उन्‍हें पढ़ने के लिए।

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  6. भाई आज तो रोंगटे खड़े हो गए. पता नहीं क्यों ऐसा रोमांच तो नहीं था शायद ! पर ...
    खैर अब तो एक ही बार में पोस्ट कर दीजिये... पढने बैठने के बाद जो दृश्य उपजता है और मन डूबता है तो फिर निकलने पे झटका लगता है.

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  7. का कहे ..हम तं शुरुए से बाऊ कथा की अद्भुत शैली पर मुग्ध हैं....हाँ मुदा ई बार कुछ जादे रहे..नीचे शब्दार्थ लिख कर बढ़िया किये...

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  8. रोचक था यह भाग भी मगर बड़ी जल्दी ख़त्म हो गया. आपके लेखन को बधाई!

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  9. बहुत स्क्रोल करवाया इस बार। पहले जैसे अनुवाद ब्रैकेट में ही दे दिया होता।

    पर पोस्ट अच्छी रही। ऐसे ही कुछ की कल्पना मैंने भी की थी, बाऊ के स्वभाव के अनुमान से।

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  10. मैं तो तल की शब्द-संपदा ही निहार रहा हूँ । पोंछिटा, गदका, कउड़ा - खो ही गये हैं न ! इनका आशीष सम्हाले न सम्हलेगा मेरे अग्रज !

    कथा का प्रभाव व प्रवाह अत्युत्तम है । झुरझुरी दौड़ गयी एक दफा तो ..

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