शनिवार, 22 मई 2010

इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 2

पहले भाग से जारी 
[अपनी बात: पिछली कड़ी में अमरेन्द्र जी   ने अपनी टिप्पणी और बाद के व्यक्तिगत संवाद के दौरान अनुवाद में सरलता की आवश्यकता बताई। अंग्रेजी और हिन्दी के व्याकरण और अभिव्यक्ति विधि परम्पराओं में बहुत असमानताएँ हैं जिनके कारण सरलता का निर्वाह मुझे बहुत कठिन लगता है ।प्रशिक्षित अनुवादकों के लिए सम्भवत: यह कठिन न होता हो। 
 एक ओर तो भाषिक सम्प्रेषणीयता की बात है तो दूसरी ओर यह डर कि जाने कौन सा तकनीकी शब्द आनुवादिक सरलीकरण की प्रक्रिया में वधित हो जाए ! ... इतने वर्षों के बाद मार्क्सवादी धार पर पुन: चलते हुए  लुहलुहान हो रहा हूँ जिसके बारे में फिर कभी बात करूँगा। सम्प्रति यही निवेदन है कि यत्र तत्र मैंने अपनी समझ के अनुसार भावानुवाद का प्रयास किया है। कहीं कहीं अपनी ओर से स्पष्टीकरण भी जोड़े हैं जो चिह्नित है। शुद्धता के आग्रही जन डा. केली रॉस के मूल अंग्रेजी लेख    को  देख सकते हैं। अनुवाद के छोटे छोटे अंश ही दूँगा ताकि ब्लॉग प्लेटफॉर्म की सीमा में भी पाठकों को पढ़ने, गुनने और समझने में आसानी हो।]
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मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार हमारे कुछ निर्णयों के कारण नहीं बल्कि आर्थिक परिस्थितियों में अंतर्निहित कारकों के कारण संसार बदलेगा। उनका सिद्धांत मानव स्वभाव (1) या मानव मनोविज्ञान (1) का सिद्धांत न होकर यह बताता था कि माल और सेवा उत्पादन की आर्थिक विधियाँ एक समाज की अन्य सभी राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक संरचनाओं को तय करती हैं ( हालाँकि कुछ मार्क्सवादी इसे पूर्ण रूप से सही मानने में संकोच करते हैं)। इस प्रकार मार्क्स के नकार के बावजूद ‘क्षुद्र अंग्रेजी बुर्जुआ’ की आवश्यकताएँ ‘अवास्तविक (false) आवश्यकताएँ (1)’ न होकर उत्पादन के पूँजीवादी विधि से सम्बन्धित ‘वास्तविक आवश्यकताएँ’ हैं – वे आवश्यकताएँ जो ऐतिहासिक सूझ के अनुसार समय के साथ साथ उत्पादन विधियों के बदलने पर ही बदलेंगी। इतिहास के ‘विज्ञान’ के रूप में मार्क्सवाद की सफलता या असफलता इस बात से तय होती है कि यह उत्पादन के विकास और उसके विभिन्न प्रभावों की भविष्यवाणी किस सीमा तक कर सकता है।
मार्क्स के अनुसार जिस तरह से सामंतवाद को पूँजीवाद ने एक नई, बेहतर और दक्ष उत्पादन विधि के रूप में प्रतिस्थापित किया, उसी तरह से पूँजीवाद को विस्थापित करती एक दूसरी व्यवस्था भी जन्म लेगी। अंतत: मजदूरी के निरंतर कम होते जाने से निर्धन होते जाते मज़दूर और प्रतिस्पर्धा की जगह वृहद एकाधिकारी प्रवृत्तियों के आने से पूँजीपतियों की घटती संख्या के कारण पूँजीपतियों को सामान बेचने के लिए कोई नहीं बचेगा और उनके पास लाभांश द्वारा जमा की गई पूँजी निरर्थक हो जाएगी। यह स्थिति क्रेडिट और बैंकिंग की उत्तरोत्तर कठिन परिस्थितियाँ तब तक उत्पन्न करती जाएगी जब तक कि सर्वहारा सड़ चुके पूरे तंत्र को आसानी से ध्वस्त कर एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर लेंगे।
"उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रमिकों का सामाजीकरण अंतत: उस बिन्दु तक पहुँचेगा जहाँ वे अपने पूँजीवादी खोल को बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। तब यह खोल खण्ड खण्ड हो बिखर जाएगा।"
[द कैपिटल, भाग एक, पृ.837, चार्ल्स एच. केर एण्ड कं., शिकागो, 1906, एडवर्ड अवेलिंग द्वारा अनुवादित और थॉमस सोवेल द्वारा ऑन क्लासिकल इकोनॉमिक्स , येल,2006, पृ.170 पर उद्धृत]
मार्क्सवादी अर्थशास्त्र की भ्रांति का सार हमें इसमें मिल जाता है। मार्क्स का यह विश्वास है कि इतिहास की द्वन्द्वात्मकता के विकास के साथ साथ उत्पादन की नई विधियों का विकास होगा। इससे उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक पूँजी का सृजन होगा जिससे अंतत: मज़दूर को अलगाव और शोषण से मुक्ति मिलेगी। लेकिन, मार्क्सवादी मूल्य सिद्धांत में इस बढ़ी हुई उत्पादकता को सुनिश्चित करने वाला कोई कारक (variable) नहीं है। यदि श्रमिक ( या ‘सामाजिक रूप से आवश्यक’ श्रम) मूल्य का सृजन करता है तो अधिक श्रम अधिक मूल्य सृजित करेगा लेकिन यह वैविध्य लिए हुए न होकर केवल मात्रात्मक होगा। पिरामिड बनाने के लिए किया जाने वाला अधिक श्रम केवल अधिक पिरामिडों की ही रचना करेगा (कुछ और नहीं**)। अत: यह सिद्ध हो जाता है कि (गुणात्मक मूल्य संवर्धन के लिए**) श्रम के अलावा कोई और कारक भी है। यह कारक ‘पूँजी’ है। श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। पूँजी के आधिक्य से केवल मात्रात्मक ही नहीं बल्कि गुणात्मक उत्पादन की अधिकता भी सुनिश्चित होती है। लेकिन मार्क्स पूँजी के अस्तित्त्व में विश्वास नहीं रखते इसीलिए (अपने वाद से अलगाव जताने के लिए**) ‘पूँजीवाद’ नाम का प्रयोग करते हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि मार्क्सवाद उत्पादन में बढ़ोत्तरी को व्याख्यायित नहीं कर सकता (क्यों कि इसमें उसके लिए किसी अतिरिक्त कारक की व्यवस्था ही नहीं है**)। (जारी)
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** अनुवादक द्वारा जोड़े गए अंश इस रंग के फॉण्ट में हैं और दो ताराओं द्वारा चिह्नित हैं। 

(1) ये पद आचारनीति ( Ethics) की पुस्तक मॉरल रिजनिंग, विक्टर ग्रैसियन, पृ. 59 पर परिभाषित और व्याख्यायित हैं।


















33 टिप्‍पणियां:

  1. आपने लिखा निसंदेह बहुत बढ़िया है मगर मार्क्स की बातें मेरे सर के ऊपर से गुजर जाता है -

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  2. पर बिना मार्क्सिज्म के डेवलपमेंट भी नहीं होना है.... Das Capital पढने से सब साफ़ हो जाता है....

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  3. हमें यहां से प्रेरणा मिली कि क्यूं ना सीधे मार्क्स और लेनिन को पढ़कर ही उनके सिद्धांतों से परिचित हुआ जाए...

    फिर इस पर ख़ुद ही विचार करेंगे...
    आलोचनाओं की अपनी ख़ुद एक दृष्टि होती है...

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  4. @ अरविन्द जी
    यह भी एक विज्ञान है। साथ चलिए या मूल ही पढ़ डालिए। क्या पता कुछ नया ही मिल जाय।
    @ महफूज़ अली
    मार्क्सवाद विकास का कारक नहीं, उसकी प्रक्रिया को और भावी परिवर्तनों को समझने की एक राह भर है। इसको 'लागू करने' की सोच में आधारभूत भूलें थीं जो आगे समझ में आएँगी। साथ बने रहिए।
    @ रवि जी,
    आप ने अच्छी बात कही। लेकिन कभी कभी शिक्षक की आवश्यकता पड़ ही जाती है। मैं एक बार इन दोनों को पढ़ चुका हूँ और मुझे अपनी समझ अधूरी लगी। साथ ही कई बार यह भी लगा कि कुछ है जो छूट रहा है - वाद में भी और अध्ययन में भी। अब नौकरी करते फिर से आवारगी के दिनों जैसा समय निकालना असम्भव है। इसलिए खुद के लिए और अपने जैसों के लिए यह अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ।

    समझ अब अलग सी होगी कि क्यों कि साम्यवाद का एक गढ़ तो बहुत पहले ध्वस्त हो चुका है और दूसरा वहाँ पहुँच चुका है जहाँ उसके साम्यवादी होने में ही लोग शक करने लगे हैं। केरल और बंगाल भी हमारे सामने हैं लिहाजा आधुनिक सोच को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले इस वाद की पड़ताल अपेक्षित है।

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  5. चलिए महराज , आज तो कुछ पल्ले पड़ रहा है !
    कम-से-कम सवाल तो किया जा सकता है ! आभार इस हेतु !
    = = = =
    यह मार्क्सवाद की सीमा रही कि वह मनोजगत और बाह्य जगत में
    बाह्य जगत को ही महत्व देता रहा और बाह्य परिवेश से ही चेतना - निर्मिति
    को परिभाषित करता रहा ( यद्यपि यह भी सही है पर यह ही तो कदापि नहीं ) , इस
    स्थिति में व्यक्ति के निजी पक्षों की व्याख्या वह - तार्किकता के अहम् के चलते - नहीं
    कर सका | 'अलगाव' और 'पलायन' की बात करके वह चेतना के निजी पक्ष में
    घुसना चाहा पर वहाँ भी व्याख्या बहिर्गत तत्वों को रेखांकित करते हुए करता रहा |
    मार्क्स की सीमा को फ्रायड दूर करता है पर वहाँ भी चेतना के व्याख्यायित करने में
    एक दूसरी अति दिखती है | इसलिए ऊपरी अनुच्छेद में केली रास महोदय द्वारा कही गयी
    बात से सहमति बनती है |
    = = = =
    @ श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित
    कर दिया जाता है।
    -------- इस पूरे परिप्रेक्ष्य को ( दो तीन वाक्य आगे और पीछे का मिलाकर ) समझा देवें
    तो आगे बतकहीं करने की इच्छा है !

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  6. पूर्वोक्त टिप्पणी जहां मैंने छोडी थी , वहाँ फोनालाप से बात स्पष्ट हो चुकी है | अतः टीप-वस्तु को
    पूर्ण कर दूँ |
    @ श्रमाधिक्य वाला उत्पादन तंत्र पूँजी आधिक्य वाले तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है।
    --- ऐसा कहना मरकस बाबा के अपने दर्शन की नीव के तहत ही है | अगर ये यहाँ पूंजी को महत्व
    देते तो अपने दर्शन में श्रम की ( मजदूरों की ) उज्ज्वल भविष्यवाणी कैसे करते ! जबकि यह स्पष्ट
    है कि महज श्रम मात्रात्मक वृद्धि ला सकता है परन्तु गुणात्मक नहीं | मरकस बाबा ने इस विषय
    में भी एक सरलीकरण ही किया है , अन्य जगहों पर किये गए सरलीकरण की ही तरह |
    उलझन होती है कि क्या मार्क्स जैसा बौद्धिक ऐसा सरलीकरण
    जान बूझ कर ( निजी योजना के तहत ) करता था ?
    ==========
    अच्छी श्रृंखला चल रही है , जारी रखियेगा साहब ! , इसी बहाने कुछ सोचना भी हो रहा है और आप
    फरमा भी चुके हैं :-
    - ' इतने वर्षों के बाद मार्क्सवादी धार पर पुन: चलते हुए लुहलुहान हो रहा हूँ जिसके बारे में फिर
    कभी बात करूँगा।'
    अच्छा है , पहले यह हो जाय फिर आप द्वारा संकेतित 'वह' भी जानना दिलचस्प होगा |

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  7. ..."उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रमिकों का सामाजीकरण अंतत: उस बिन्दु तक पहुँचेगा जहाँ वे अपने पूँजीवादी खोल को बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे। तब यह खोल खण्ड खण्ड हो बिखर जाएगा।"...
    ..यह सिद्धांत कितने पूंजीपतियों की नींद उड़ाने और जिग्यांसू विद्यार्थियों के लिए 'नए ख्वाब' लेकर आया था...मगर तबतक न जाने कितने पूंजीपति.. 'यह झूठ है' कहते हुए मर गए और न जाने कितने विद्यार्थियों ने सोवियत संघ को खंड-खंड बिखरते देखा.
    ...दरअसल किसी भी सिद्धांत को लोग जमीनी सच्चाई में परिवर्तित होते तत्काल देखना चाहते हैं जबकि सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत को
    सच में परिणित होने के लिए सदियों लग सकते हैं.

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  8. @गिरिजेश जी

    किश्तों में आलेख तो ज़ायज है पर खंडित किश्तें विचारण में व्यवधान डालती हैं ! नेट कनेक्शन की समस्या है , एक तो ब्लाग्स ही बडी मुश्किल से खुल पाते है फिर विषय का पुनरावलोकन किये बिना आगे बढ्ना अच्छा भी नही लगता ! खैर जारी को भी पढ लें तो ...


    @अमरेन्द्र जी

    पता नही क्यों ? व्यक्तिगत रूप से मुझे नाम से छेडछाड अच्छी नही लगती किसी विशिष्ट प्रसंग में सम्भव है यह प्रयोग उचित लगा हो किंतु दैनन्दिक प्रयोग ... मैने कल्पना करके देखा कि ...मेरे लिये अलयस ... आपके लिये अमरद... और गिरिजेश जी के लिये गरजश बाबा कैसा लगेगा ?
    फिर लगा ग्राम्य / लोकजीवन / प्रसंग विशेष मे व्यवह्रत बातें वहां की शोभा हो सकती हैं बशर्ते वही तक सीमित रहे किंतु अन्य परिवेश / स्थान मे उनकी पुनराव्रत्ति खटकती है !
    निवेदन ही कर सकता हूं ...क्या यहां भी मरकस बाबा कहना जरुरी है ? सम्बोधनों की शुद्धता का आग्रह नितान्त व्यक्तिगत है जरुरी नही कि इसे स्वीकार भी किया जाये ! क्योंकि इस विषय में आपके अपने आग्रह / धारणायें भी होंगे जिनका मुझे सम्मान करना है !

    आदर सहित !

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  9. @ जारी को भी पढ लें तो ...
    यह 'तो' भयकारी है भंते! बालक नादान है। इसे ज्ञानगंगा में ठीक से तैरना भी नहीं आता। कृपादृष्टि बनाए रखें।
    अचानक टिप्पणी करते हुए ही यह बात ध्यान में आई कि 'अलेक्ज़ेंडर' 'सिकन्दर' कैसे हुआ और 'पुरुषोत्तम' या 'पुरु' 'पोरस' कैसे ? ... 'मार्क्स' उर्फ 'मरकस'... हम्म्म्म्म।

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  10. @ अली जी ,
    हुजूर , मरकस की छेड़ मैंने नहीं की , मैं तो प्रयोक्ता भर हूँ , असल कार्य तो
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा किया गया है , इन्हीं द्वारा 'मरकस बाबा' कहा गया !
    हाँ, मैं समर्थन तो करता हूँ राहुल जी का !
    लोक-मत का आग्रही हूँ इसलिए भी !
    जहां तक आपने तीन नाम गिनाये हैं तो इनमें भी
    लोक सुभीते के लिए फेरबदल कर सकता है , पर आपने जो फेर-बदल किये वे
    सहज नहीं चिढाऊ से लगे | फेरबदल सुविधानुसार होते हैं , अपने भाषिक संस्कारों को
    आगे रखते हुए |
    अधिकाँश साहित्य और संस्कृति ऐसा करती आयी है , और करना अनुचित नहीं !
    लक्ष्मण को लोक ने सुभीते के लिहाज से 'लखन' कर दिया , क्या जरूरत है जीभ को तीन
    बार फिजूल का घुमाने की !
    ब्रेष्ट , 'ब्रेख्त' होते रहे !
    'एलेक्जेंडर' को प्रसाद जी ने 'अलक्षेन्द्र' कहा , संस्कृत सौन्दर्य से मोहित होकर !
    अरस्तू को 'अफलातून' !
    फिलासफी को 'फलसफा' !
    डॉक्टर को 'डाग्डर' / 'डाक्टर' !
    ========
    पर एक नई रीति-नीति (?) है , शुद्धतावादी आग्रह की , लोग कष्टपूर्ण ढंग से अपने को
    हीन ग्रंथि से ग्रसित रखते हुए किसी भी चीज को हू-ब-हू लेने पर उतारू रहते हैं और
    इसी मानसिकता की परिणति में लोग राम गोपाल नाम को बदल कर 'पॉल गोमरा' रखा
    देते हैं ! मूल में मानसिकता और नीयत की छानबीन आवश्यक है , आखिर त्यौरी
    क्यों चढ़ती है ?
    ========
    मार्क्स से उच्चारण में ज्यादा सहज है 'मरकस' ! लोकाग्रह वरेण्य है मेरे लिए !
    टाइप में मरकस ज्यादा अक्षर लेता है फिर भी 'मरकस' खींचता अधिक है !
    अरे ज़रा देखिये अंग्रेज लोग हमारे शब्दों को कैसे लेते हैं ?
    ऐसा मेरा आग्रह और पक्ष मात्र है , आगे आपकी इच्छा ! आभार !

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  11. @ अमरेन्द्र जी,
    अरे महराज, अली जी की बात का मैंने अर्थ यही लगाया कि गम्भीर विषय में बेसिक औपचारिकता बनी रहे तो वातावरण चिंतन के अनुकूल रहता है। धीरे धीरे लोक प्रयोग भी शास्त्रीय बन जाते हैं और शास्त्रीय प्रयोग लोकोन्मुख। प्रक्रिया चलती रहती है। गाड़ी बढ़ती रहती है। मरकस नाम प्रचलित नहीं हुआ। लेकिन आप ने यहाँ प्रयोग कर और सन्दर्भ बता कर बहुत अच्छा किया है।
    आप की टिप्पणी का दूसरा पैरा तिक्त है। अभी तो यात्रा का प्रारम्भ है। आगे हो सकता है कि कभी कहीं आवश्यक हो जाय। अभी तो नहीं है।...
    अब झुँझला कर टिप्पणी ही न मिटा दीजिएगा। मेरे पास सुरक्षित है, फिर छाप दूँगा। :)

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  12. @ अमरेन्द्र जी ,

    मैने ऐसा तो नही कहा कि फेरबदल आपने किया और ये भी कि आप मेरा कहा मान ही ले !
    मैने केवल राहुल जी के प्रसंग से इतर 'मरकस' के बारम्बार अनुप्रयोग की ओर संकेत किया था !
    तीनो उद्धरण के लिये खेद है किंतु खुश हूँ कि ये आपको चिढाऊ लगे ऐसा ही 'कुछ' मुझे भी लगा था सो कह कर हल्का हुआ ! मै पहले ही कह चुका हूँ कि मुझे आपके आग्रह का सम्मान करना है ! अंतत: सहजता और चिढ व्यक्तिगत बोध है आपका / मेरा / गिरिजेश जी का अपना अपना आग्रह स्वत्व है और उसका सम्मान भी किया जाना चाहिये ! किसी भी आग्रह को हीन भावना या कुंठा कहने का साहस मुझमें नहीं है फिर चाहे वो शुद्धता के पक्ष हों याकि नही !
    मुद्दे पर सहमत होने या असहमत बने रहने पर भी सम्वाद कायम रहे ! प्रतिक्रिया के लिये आपका आभारी हूं ! पुन: आदर सहित !

    @ गिरिजेश जी
    बन्दा 'पुरु' ही कह्ता है ...ऐसा लगता है कि आप मेरे ब्लाग की तरफ झांकते भी नही :)
    मित्र मैं सच कह रहा हूं कि नेट कनेक्शन मेरे लेखन / मेरी पठनीयता / मेरी प्रतिक्रियाओं की बैंड बजाये हुए है ! उम्र का तकाज़ा भी है याददाश्त पर ज्यादा भरोसा नही इसीलिये पुरानी कडी को खोज कर पढ्ने की अनिवार्यता है !

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  13. @ अली जी,
    अपनी टिप्पणी के केवल 1 मिनट पहले की मेरी टिप्पणी देखिए।
    आप अपनी सुविधानुसार चलें आर्य ! पहले भाग का लिंक भी इस लेख में उपर दिया हुआ है। नेट कनेक्सन से मैं भी परेशाँ रहता हूँ। मोबाइल से जोड़ कर चलाता हूँ लेकिन आज कल काम भर की स्पीड मिल जाती है। ... इस समय चैट उपलब्ध हो जाय तो कितना अच्छा हो। ...
    'पोरस' उदाहरण सामान्य था - आप के उपर केन्द्रित नहीं था।
    आप से गम्भीर विमर्श की आशा है। ऐसे लेखों पर पाठक बहुत कम आते हैं लेकिन जो आते हैं वे 'टंच आइटम' होते हैं।
    आभार।

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  14. @ गिरिजेश जी
    क्षमा ! अमरेन्द्र जी के लिये आपका सन्देश बाद मे पढ पाया ! जीवन मे तिक्तता का भी अपना ही महत्व है इसे अन्दर शेष नही रहना चाहिये बस :)

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  15. @ बेचैन आत्मा
    मुझे भी लगता है कि लेनिन, माओ वगैरह जल्दिया गए। लेकिन मार्क्सवाद की महानता इसमें है कि इसने साफ साफ सोचना सिखाया। अन्वय/खण्डन करना सिखाया। स्वाभाविक था कि अन्वय के बाद अपने हिसाब से जोड़ा जाता। जोड़ में भूलें हुईं लेकिन विश्व ने मानव चेतना के विराट रूप भी देख लिए। लेनिन या माओ के प्रयासों की सार्थकता इसमें है कि ज़िन्दगी के अलग मायनों की स्थापना सी हुई। आज इस वाद, विचारधारा या इसके विकास के जो रूप सामने हैं चाहे माओवादी हिंसा हो या सत्तासुख भोगते समझौतावादी तत्त्व हों - यह सोचने पर मज़बूर कर रहे हैं कि
    - क्या यह 'भविष्यवाणी' के घटित होने में चरण भर हैं?
    - क्या वाकई बदलाव आएगा? वह भी जल्दी? कितनी जल्दी?
    और सबसे महत्त्वपूर्ण
    - क्या मार्क्सवाद कोई ऐसी वैकल्पिक सशक्त विधि है जिसके प्रयोग से व्यापक जन कल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है ?
    मेरी सोच का केन्द्र भारत देश है। वर्तमान व्यवस्था मुझे धनपशुओं की ऐशगाह लगती है लेकिन क्या सचमुच मार्क्सवाद अपने देश के लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है? अभी मुझे 'हाँ' जैसा नहीं लगता। 'नहीं' की स्थिति में मैं खँगाल रहा हूँ, शायद कुछ हाथ लग जाय।

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  16. @ गिरिजेश जी,
    चढ़ते हुए सूरज को सलाम करते हुए अर्ध्य गीत गाना कुछ-कुछ अवसरवादिता सी हो जाती है...

    सफ़लता-असफ़लता को सही-गलत की कसौटी बनाना भी शायद तात्कालिक महत्त्वाकांक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है...

    हमारी समझ अधूरी हो...या कैसी भी...
    नियम अपना काम करते रहते हैं...

    शायद इन्हें ही समझा जाना ज्यादा जरूरी है...
    आप शायद इस प्रक्रिया से ही गुजरना-गुजरवाना चाह रहे हैं...आभार आपका...

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  17. @ अली जी और गिरिजेश जी ,
    दूसरे पैरे को तिक्त रखने की जानबूझकर मैंने कोई कोशिश नहीं की , फिर
    भी ऐसा हुआ तो क्षमाप्रार्थी हूँ | मेरा लक्ष्य किसी व्यक्ति को दुखाना नहीं है |
    वैसे दूसरे पैरे के सन्दर्भ में उदय प्रकाश जी की कहानी 'पॉल गोमरा का
    स्कूटर' याद दिलाने की चेष्टा की थी मैंने | इसलिए जी-द्वय बुरा न मानें !
    संवाद बना रहे , यही मेरी भी चाह है ! आभार !

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  18. मैं इस विचारधारा से सदा दूर रहा,क्षमा याचना सहित.....

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. @ रवि जी
    'अर्ध्य' नहीं 'अर्घ्य' होता है :)
    'चढ़ता हुआ सूरज' कौन है?

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  21. गिरिजेश सर, अक्षरशः अनुवाद के चक्कर में पोस्ट कुछ बोझिल हो गयी है...
    मेरा मानना है कि अक्षरशः अनुवाद और भावानुवाद दोनों का अपना महत्व है- अलग अलग क्षेत्र और समय पर. कौन सा अनुवाद कहाँ उचित होगा यह निर्भर करता है विषय और पाठक की प्रकृति पर.
    तकनीकी विषयों जैसे चिकित्सा, विज्ञान, विधि आदि में अनुवादक के पास स्वतन्त्रता नहीं के बराबर होती है. वहाँ फैक्ट्स को ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया जाना चाहिए चाहे इसके लिए लेखन शैली और भाषा की सुंदरता से समझौता ही क्यों न करना पड़े.

    लेकिन साहित्य, दर्शन, धर्मशास्त्र आदि विषयों में मेरे हिसाब से भावानुवाद अधिक उचित है. हाँ, यह अनुवाद अगर उस विषय के विद्वानों को ध्यान में रखकर किया जा रहा हो तो बात अलग है.

    यहाँ मेरे हिसाब से बेहतर यह होता कि मूल लेख को पूरा पढकर आप उसके भाव को अपनी भाषा में व्यक्त करते.

    मैंने बस अपने विचार रखें हैं. आपकी विद्वता और शानदार लेखन शैली से परिचित हूँ इसलिए आपनी बात रखने की हिम्मत जुटा पाया हूँ.

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  22. @ सत्यार्थी जी,
    आप का स्वागत है। विषयवस्तु से सम्बन्धित किसी प्रश्न या बहस के लिए अपोलेजेटिक होने की आवश्यकता नहीं है। यह अनुवाद प्रस्तुत करने के पीछे हिन्दी में अच्छे लेखों की संख्या बढ़ाना भी था।
    अनुवाद से सम्बन्धित दुविधा मैंने 'अपनी बात' में व्यक्त की है। आप सही कह रहे हैं। कई जगहों पर भाषिक सीमाओं के कारण प्रवाह बाधित सा लगता है। वैसे भी अनुवाद का मेरा यह प्रथम प्रयास है।
    एक समस्या और है - मार्क्सवाद अपने को विज्ञान मानता है और इसके विद्वान लोग भी इसे इसी तरह प्रस्तुत करने के आग्रही रहे हैं। भावानुवाद करते हुए यह डर लगा रहता है कि कहीं कोई गम्भीर तकनीकी त्रुटि न हो जाय।
    फिर भी आप की बात का ध्यान रखूँगा। पहले भाग की तुलना में इस भाग में सुधार हुआ है। एक बार पुन: विश्लेषण करूँगा और यदि भरोसा जमा तो भावानुवाद की राह ही पकड़ूँगा।
    धन्यवाद।

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  23. हम कम से कम यह लेख और पहली कड़ी तीन चार बार पढ़ चुके पर अपनी मोटी बुद्धि में घुस ही नहीं रहा, क्षमा चाहेंगे। यह भी हो सकता है कि हमारे पसंद की विषय वस्तु ना होने से भी अरुचि हो परंतु आपके लेखन के कायल होने के कारण वापिस से पढ़कर समझने का प्रयत्न करेंगे।

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  24. मार्क्स की बातें जिस तरह आप बता रहे हैं ......अच्छी हैं ! मगर भाषा कभी कभी बहुत भारी भरकम हो रही जो ग्राह्यता में बाधा डाल रही है (यह कमी मेरी तरफ से ही है ) ! दोनों लेख अच्छे है इंग्लिश से हिंदी का चक्कर कुछ व्यवधान तो पैदा करता ही है.
    आगे भी प्रतीक्षा रहेगी
    आभार

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  25. @ विवेक जी और singhsdm

    श्रम करने के लिए और टिप्पणियों द्वारा अपनी बात रखने के लिए धन्यवाद।
    मस्तिष्क पर थोड़ा अधिक ज़ोर डालना पड़ेगा। :)
    सत्यार्थी जी के उत्तर में और बातें भी कही हैं।

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  26. गिरिजेश सर, उत्तर देने के धन्यवाद.
    "...यह अनुवाद प्रस्तुत करने के पीछे हिन्दी में अच्छे लेखों की संख्या बढ़ाना भी था।"
    इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. इन्टरनेट पर हिन्दी में अच्छे लेखों की वाकई सख्त जरुरत है.
    एक बात और कहूँगा कि आपका यह लेख एक आम पाठक के भले ही सर के ऊपर से गुजर जाए पर इसकी कठिन भाषा शैक्षिक सामग्री के रूप में इसकी उपयोगिता को और बढ़ा देती है.

    आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ऐसे विषयों का अनुवाद (भावानुवाद) करना बड़ा रिस्की होता है. शब्दों का जरा सा हेर फेर न सिर्फ बात की मौलिकता को बदल देगा बल्कि लेख की पूरी authenticity को नष्ट कर सकता है.

    अच्छे लेखों की संख्या बढ़ाना ही उद्देश्य है फिर तो भाषा की गुणवत्ता से समझौता करना ठीक नहीं है. उस कसौटी पर तो आपके लेख तो १० में से १० नंबर दिए जा सकते हैं.

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  27. मार्क्स पढ़ा था छात्र जीवन में. बाद में सब वाद गड्ड मड्ड हो गये. इतने सालों में एक बोध ये भी हुआ कि वाद (एडम स्मिथ से लेकर मार्क्स तक) तो सभी समाज के भले के लिये ही होते हैं, समस्या वादियों की होती है. वे वाद का अपना अलग ही अर्थ निकाल कर अर्थ का अनर्थ कर देते हैं. अब माओवादियों को ही देखिये, क्या है उनका वाद, शायद माओ को भी समझने में दिक्कत हो.

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  28. - क्या यह 'भविष्यवाणी' के घटित होने में चरण भर हैं?
    ..हाँ, मुझे तो ऐसा ही लगता है कि माओवाद..लेनिन वाद या फिर भारतीय सन्दर्भ में नक्सलवादी हिंसा..सभी भविष्यवाणी के प्रारंभिक चरण भर हैं.
    -- क्या वाकई बदलाव आएगा? वह भी जल्दी? कितनी जल्दी?
    ..बदलाव आ भी सकता है नहीं भी. यह मार्क्सवादियों के ईमानदारी पूर्वक किये जाने वाले संघर्ष पर निर्भर करता है. वे भी यदि दोहरी जिंदगी जियेंगे तो कभी नहीं. वर्तमान व्यवस्था जितनी धनपशुओं की ऐशगाह बनेगी उतना ही इन वादों को बल मिलेगा और ये क्रांति के लिए अग्रसर होंगे. क्रांति तभी होती है जब आभाव होता है. शासन व्यवस्था यदि निर्बलों का सहारा बनेगी...सर्वहारा की मदद के लिए आगे आयेगी तो निश्चय ही किसी प्रकार के बदलाव की जरूरत महसूस नहीं होगी.

    --- क्या मार्क्सवाद कोई ऐसी वैकल्पिक सशक्त विधि है जिसके प्रयोग से व्यापक जन कल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है ?
    ...मुझे तो सबसे अच्छा लोकतंत्र ही लगता है. बस इसको चलाने वालों की नीयत साफ़ और जन कल्याणकारी हो. जब लोक तंत्र, भ्रस्ट तंत्र में परिवर्तित हो जाता है तभी सभी वाद याद आने लगते हैं.
    ...अंत में एक जरूरी बात कि पढ़ा लिखा सब भूल चूका हूँ आपने उद्वेलित किया तो मन के भाव लिख दिया. शेष जो आप पढ़कर समझायेंगे उससे सीखने का प्रयास करूँगा.

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  29. टिप्पणीयों के जरिए कुछ कुछ समझ पाया हूँ बाकि तो अक्षरक्ष के चक्कर में कम ही पल्ले पड रहा था ।
    वैसे भी मार्क्स को कम ही जाना है मैंने।

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  30. आश्चर्य है यहाँ अरस्तू को अफलातून कहा गया और विद्वानों ने नोटिस नहीं ली -जहाँ तक मुझे ज्ञात है प्लेटो को अफलातून कहा जाता है -और किस नियम से बन्दा आज तक नहीं जान पाया !

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  31. मेरे लिखने में त्रुटि रही , यूनानी दार्शनिक प्लेटो का ही अरबी नाम
    अफलातून है |
    अतःअपनी टीप में हुई इस तथ्यात्मक त्रुटि के लिए क्षमा चाहूँगा ! आभार !

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  32. प्लेटो और अफलातून पर ये पढ़ा जाय. यही अखबार पढता हूँ तो चर्चा देखकर ये याद आया. http://www.livemint.com/2010/04/22212129/How-mystic-Plato-became-genius.html?d=1 फिलहाल यात्रा की थकान है... इस पोस्ट को फिर से पढना पड़ेगा.

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