शुक्रवार, 25 जून 2010

बिल्ला नं 70

उत्तर मध्य रेलवे ने पहली बार महिला पोर्टरों की भर्ती की है। 4800 अभ्यर्थियों के बीच हुई प्रतियोगिता में बिना किसी आरक्षण के अंचितपुर जिला फतेहपुर की निवासी ऊषा ने भी सफलता प्राप्त की। उन्हें बिल्ला नं 70 दिया जाएगा। उनके अतिरिक्त एक और महिला निर्मला ने भी सफलता प्राप्त की।
प्रतियोगिता में उन्हें पुरुषों की तरह ही 25 किलो वज़न को सिर पर रख 200 मीटर तक ले जाना था। उनके लिए समय सीमा थी 4 मिनट जब कि पुरुषों के लिए 3 मिनट। इसके अतिरिक्त इन दोनों ने मानसिक परीक्षण में भी सफलता प्राप्त की।
ग़रीब ऊषा ने यह कदम बच्चों की अच्छी शिक्षा दीक्षा के लिए उठाया है जब कि वह स्वयं आठवीं तक ही पढ़ी हैं।
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चलते चलते :
नैनी क्षेत्र में इन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए सूखी धरती पर महिलाओं ने खुद जुत कर हल चलाए।
 (समाचार और चित्र आभार: इंडियन एक्सप्रेस)  

25 टिप्‍पणियां:

  1. जो कार्य महिलाये घरो में करती है उसे जब जीविका का साधन बनाया जाता है तो पुरुषो द्वारा वो कार्य किया जाता है. जैसे खाना बनाना, कपडे धोना या सिलना आदि.घरो में महिलाये काफी मेहनत का कार्य करती है तो वे कुली का कार्य भी कर सकती है. ये प्रयोग अच्छे रहेंगे.

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  2. उत्तर पूर्व व पहाड़ों में तो पूरी अर्थ व्यवस्था महिलायें सम्हालती हैं ।

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  3. समय समय पर महिलाएं साबित करती रहती हैं कि वे किसी से कम नहीं ...
    अभी कुछ दिनों पहले शहर के एक पेट्रोल पम्प पर सिर्फ महिला स्टाफ को देखा ....बिलिंग से लेकर क्लीनिंग करते ...!!

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  4. राव साहब महिलाये तो जिंदगी के बोझ को हँसते हंसते उठा लेती हैं तो दुसरे बोझों की क्या बिसात हाँ खुद की बात करूँ तो मैं कभी भी किसी महिला को कुली, रिक्शेवाला या ऐसे ही किसी और बोझा ढोने वाले व्यवसाय में देख कर खुश नहीं हो सकता और कभी ऐसी जगह पर महिलाओं की सेवा लेने का अवसर आया जो जरुर ही हिचक होगी और में पीछे हट जाऊंगा .मैं कभी भी किसी महिला से अपना बोझा नहीं उठवा सकता. मेरी पुरुषवादी मानसिकता ऐसी ही है.

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  5. इसे महिला सशक्तिकरण माना जाना चाहिये क्या?
    विचारशून्य वाले दीप से सहमत।

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  6. main VICHAAR SHOONYA ki rai se sahmat houn....hamare desh main mahilao ko samman kee drishtee se dekha jata hai...ismain main kabhee bhee unse bojha uthane wale karya se sahmat nahi houn..na hee unse koi bhojha uthwa paunga...

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  7. इंद्र देव पिघलेंगे? हडपौरी कहते हैं इसे हमारी तरफ.

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  8. दिक़्क़त ये है कि रेलवे पोर्टर भर्ती पर मीडिया की रुचि इस नन्हे मुन्ने प्रकरण को चमत्कारिक उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करने में है वर्ना महिलायें मर्दों के शारीरिक श्रेष्ठ्ता के दम्भ को पहले ही तोड चुकी हैं आप कभी आदिवासी क्षेत्रों मे आयें और महिलाओं की ऊर्जा की तुलना दारू पीकर घर में निठल्ले पडे मर्दों से करें ! यहां स्त्रियों को घर और बाहर समान दक्षता से काम करते देखिये बहरहाल उनसे इस मामले में पिछड चुका पुरुष श्रेष्ठि, स्त्री धन का जुगाड करने और विवाह के लिये याचना करने में जरुर आगे बना हुआ है :
    )

    खैर अलग सामाजिक परिवेश की ऊषा और निर्मला की उपलब्धियों को हमारा सलाम !

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  10. अली साहब,
    यही हम कहना चाह रहे हैं कि इस बात को ही हाईलाईट करने से महिआयें सशक्त नहीं हो रही हैं। न सिर्फ़ आदिवासी व पहाड़ी राज्यों में, बल्कि और भी बहुत से प्रदेशों में श्रम कार्य में महिलाओं का योगदान कहीं कम नहीं है। मैंने हरियाणा पंजाब में भी बहुत देखा है कि मर्द लोग सारा सारा दिन ताश पीटते रहते हैं और स्त्रियां घर बाहर का बहुत सा काम बखूबी निभा रही हैं। सिर्फ़ महिला सशक्तिकरण के नारे को सिद्ध करने के लिये पोर्टर जैसे काम में उनके आने को लेकर जो हाईप क्रियेट हो रहा है, वो समझ नहीं आता।
    और किसी महिला से बोझा उठवाकर खुद हाथ लटकाते हुये चलना अपने से भी नहीं होगा।

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  11. विचार शून्य की बात से पूरी तरह सहमत।

    वैसे तो कई प्रदेशों में महिलाएं ही डॉमिनेटे़ पोजिशन में रहती है...वही घर का सारा काम और बाहर का काम निपटाती हैं लेकिन पोर्टर के तौर पर उन्हें देखना थोड़ा अजीब लग रहा है.....हाथ झुलाते हुए चलना मुझसे भी नहीं हो पाएगा संजय जी की तरह।

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  12. अलग से विषय पर चिंतन का मौक़ा देने का धन्यवाद. व्यक्ति द्वारा अपनी ज़रुरत के हिसाब से काम चुन सकने की स्वतन्त्रता किसी भी समाज के उत्थान का कारक हो सकती है.

    @अभिषेक ओझा ने कहा…
    इंद्र देव पिघलेंगे?

    महिलायें कमर कस लें तो हिमालय के ग्लेशियर उतार लायें - इंद्र देव क्या चीज़ हैं.

    @VICHAAR SHOONYA ने कहा…
    मैं कभी भी किसी महिला से अपना बोझा नहीं उठवा सकता. मेरी पुरुषवादी मानसिकता ऐसी ही है.

    अब वाद के बारे में क्या कहें - कुछ लोगों के अनुसार, गलत तो वह मनोवृत्ति ही है जिसमें अपना बोझा किसी और से उठवाया जाता है. पश्चिम में महिलायें सभी काम करती हैं. जबकि सौदी अरब में टैक्सी चलाना तो दूर उसमें अकेले बैठ भी नहीं सकतीं. भारत में भी थोड़े साल पहले तक एक विशेष समुदाय की महिलायें सर पर मैला भी उठाती थीं और यह सामान्य समझा जाता था.

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  13. आज से दो साल पहले रांची गए थे ...सारे पेट्रोल पम्प में महिलाएं ही काम करती हैं अब...और सबसे अच्छा लगा जान कर कि रांची से लोहरदगा बड़ी लाइन की ट्रेन की ड्राइवर एक महिला है....
    गर्व से भर उठे थे हम...एक रिपोर्ट लिखूंगी बहुत जल्द..!!

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  14. हम भी आज कुछ प्रात चिंतन किये हैं .रऊर देखी न !

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  15. @ व्यक्ति द्वारा अपनी ज़रुरत के हिसाब से काम चुन सकने की स्वतन्त्रता किसी भी समाज के उत्थान का कारक हो सकती है.

    इसी बात के लिए पोस्ट किया था। दूसरा कारण यह था कि भारतीय समाज के कुछ अलग से पहलुओं को सामने रखना। इन्द्रदेव पर अब भी अधिकांश कृषि आधारित है और सामान्यत: औरतें हल का मूठ नहीं छूतीं। लिहाजा उनके द्वारा हल चलाना एक असामान्य बात मानी जाती है। शर्म करो इन्द्र देव ! अब तो बरसो। हाँ, अभी भी ट्रैक्टर हल को पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर पाए हैं। ऐसे ग़रीब भी हैं जो ट्रैक्टर अफोर्ड नहीं कर सकते। उसका भाड़ा देने तक की भी कुव्वत नहीं!

    मैं कुली तभी करता हूँ जब सामान अपनी वहन क्षमता से अधिक हो या बीमार होऊँ। उस समय अपनी वहन क्षमता तक सामान स्वयं ढोता हूँ। मुझे महिला कुली की सेवाएँ लेने में कोई आपत्ति नहीं ।

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  16. बिल्‍ला पहनने और पारंपरिक रीति का बोझा ढ़ोने दोनों के लिए महिलायें स्‍वप्रेरित हुई यह स्‍वागतेय है.

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  18. @राव साहब महिलाये तो जिंदगी के बोझ को हँसते हंसते उठा लेती हैं तो दुसरे बोझों की क्या बिसात हाँ खुद की बात करूँ तो मैं कभी भी किसी महिला को कुली, रिक्शेवाला या ऐसे ही किसी और बोझा ढोने वाले व्यवसाय में देख कर खुश नहीं हो सकता और कभी ऐसी जगह पर महिलाओं की सेवा लेने का अवसर आया जो जरुर ही हिचक होगी और में पीछे हट जाऊंगा .मैं कभी भी किसी महिला से अपना बोझा नहीं उठवा सकता. मेरी पुरुषवादी मानसिकता ऐसी ही है.

    विचार शून्य साहब की बात से पूरी तरह सहमत।

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. @ मित्रो
    कांधे और सिर पर बोझ की चिंता ...वो तो गर्भ में भी हमें ढोती चली आ रही है !

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  21. @ ali ने कहा…
    @ मित्रो
    कांधे और सिर पर बोझ की चिंता ...वो तो गर्भ में भी हमें ढोती चली आ रही है !

    लाजवाब! इतनी सुन्दर बात तो शायद वर्षों बाद सुनी है. वन्दे मातरम!

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  22. अच्छा लगा...

    कॄषि की शुरूआत का श्रेय स्त्रियों के हिस्से में ही जाता है...शायद परपराओं में ठहरी यही पुरानी स्मृतियां...इस तरह ही विपरीत परिस्थितियों में अभिव्यक्ति पाती हैं...

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  23. गर्भ कोई कुड़ा करकट रखने की जगह नहीं है जिसे ढोया जाए।
    वहां तो स्नेह और वात्सल्य के साथ औरत अपनी जिन्दगी की सबसे कीमती चीज पालती है। जिसकी उसे अपार खुशी होती है और उस क्षण का दुख तकलीफ़ सह कर बेसब्री से ईंतजार करती है जब वह माँ कहलाए।

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  24. देखा आपने निर्मला का नाम लिया और मै हाजिर । निर्मला कहाँ कहाँ नही हैं क्या ब्लागजगत वाली निर्मला को कोई बिल्ला मिलेगा? ये 70 नो तो मुझे चाहिये था मेरी गाडी का नो मेरी गाडी से ले कर फोन आदि सब मे 7 की भरमार है।। अच्छी जानकारी है धन्यवाद।

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  25. गर्भ को 'ढोने' की सीमा में नहीं रखा जा सकता , ललित जी की
    बात से सहमत !
    बाऊ , शीर्षक अपने आपमें रचनात्मक-संवेदनात्मक है !

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