मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 10

मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।

भाग–1, भाग-2, भाग–3भाग-4, भाग-5, भाग-6, भाग-7, भाग-8, भाग-9   से आगे...
(झ)
भुतही रात। दिमागों में जन्म ले जुबान जुबान फुसफुसाहटें बढ़ीं और जमानों के सोये प्रेत केवल जागे ही नहीं, दौड़ पड़े। मानुख का मन जाने क्या क्या भीतर छिपाये रखता है? दो बच्चों का जन्म, एक नींबू के लिये गाँव में दो मौतें और ग़ायब खदेरन का अचानक परगट होना। इन सबके ऊपर गाँव भर के लिये संकट सँजोते रहने वाले जुग्गुल का केश नोचते विलाप। बड़े होने के बाद उसे रोते हुये पहले किसी ने नहीं देखा सुना था। जिसने भी सुना महीनों पहले रास्ते में नींबू के पौधे के पास के तंतर मंतर को याद किया। मनचोरी ने शक के तीन दरवाजे खोल दिये थे – खदेरन, जुग्गुल और नींबू। माधव तो अभी तक गायब था – वह भी लौटेगा?
दो लाशें रात भर संस्कार की प्रतीक्षा में पड़ी रहनी थीं - सबेरे क्या होने वाला था?
हर तरफ एक ही समय एक ही बात। नींबू श्मशान पर इकठ्ठे प्रेतों ने नयों का स्वागत किया और घर घर से उठती भनभनहट की लय पर धीमे धीमे झूमने लगे। सदियों पुराना अभिचार – गाँव का हर वयस्क अपने स्वर दे रहा था। एक ही बात। एक ही समय ... गुड़ेरवा निकला और धीरे धीरे सन्नाटा छा गया। सुत्ता पड़ गया।
शोक के कारण रामसनेही की पट्टी में भोजन नहीं बना और उधर थरिया भर भात खाते गिरधरिया को देख बिघना बहू का रोंआ रोंआ रो उठा। चूल्हे पर तरकारी फदकते फदकते जल गई लेकिन उसकी आँखों के आँसू मृत फेंकरनी को दुलारते रहे, खुद को धिक्कारते रहे। पछताती रही... मतवा के लिये ढेरो आशीष मन से निकले और खाली मन में डर ने घर कर लिया।
अग्निशाला में बैठी मतवा ने खदेरन से पूछा – रुउरे बिना बतवले कहाँ चलि गइल रहलीं? ... एतना ज्ञानी के भरस्ट होखे के चमइने मिललि? (आप बिना बताये कहाँ चले गये थे?... इतने ज्ञानी को भ्रष्ट होने के लिये चमाइन ही मिली?)
बाहर आ कर आकाश को निहारते हुये खदेरन ने खोये स्वर में उत्तर दिया – भ्रष्ट होना था... चमाइन क्या, बाभन क्या?... मैं स्वर्ग से लौटा हूँ, अब कभी भ्रष्ट नहीं होना ...स्वर की चिंता –आँखों में तारे सिहरे और टिमटिमाने लगे।
गोंयड़े के खेत में अकेले दिये के पास आग जला कर माई अपनी बेटी की लाश रखा रही थी। सियारों की हुआँ हुआँ बढ़ती गई। तीखापन रात को चीर उठा – खेंखरि ... खें, खें, खें ...माई की गोद में बच्चा रोने लगा। मतवा का एहसान सोच न पंडित को गाली दिया जाता था और न शरापा जाता था। उसकी पूरी देह ही रूँध गई थी।
चिंतित खदेरन धीरे धीरे पास पहुँचे। लगा जैसे चारो ओर श्मशान ही श्मशान था जिसमें जीवन का एक ही लक्षण बचा था, बस एक ही – श्याम शिशु। उसको लेकर अग्निशाला में घुसे और मतवा का दिया शहद रुई में भिगो उसके होठों पर लगा दिये। पिता की मीठी गोद मिली – बच्चा चुप हो गया, सो गया। ...लकड़ी के खम्भे का सहारा लेकर बैठे खदेरन और मतवा काल की गति तिनजोन्हिया से नापते रहे, आसमान को ताकते रहे। नींद जाने कहाँ थी? ...आखिरकार आँखों की करुआई ने पूरब की ललरौटी से बहिनापा जोड़ ही लिया...
(ञ)
सबेरे बिघना बहू को दाँत पर दाँत लग रहे थे। भोर में फराकत (शौच) से लौटते हुये उसे फेंकरनी ने दौड़ाया था – चुड़ैल के पाँव उल्टे थे। बसखरिया माई को गोहराती सनकिया उसे खरहरे से झार रही थी। अभी देह भी माटी में नहीं मिली थी लेकिन फेंकरनी चुड़ैल हो गई थी।
पंडित टोले से भी खबर थी – रामसनेही को चूना पोते हवा में उड़ते किसी ने देखा था। किसने देखा? किसी को नहीं मालूम। औरत ने देखा कि मर्द ने देखा कि लड़के ने देखा कि लड़की ने देखा? कुच्छ नहीं पता लेकिन बाबू रामसनेही सिंघ भिंसारे चमकते हुए उड़ रहे थे और उनके पैर ग़ायब थे।
जुग्गुल ने सुना और काका की मौत के बाद पहली बार मुस्कुराया – बहान्चो ..लोग के भोरे भोरे भूत परेत लउकतनें (लोगों को भोरहरे भूत प्रेत दिख रहे हैं!), लगा जैसे दिमाग पर पड़ा भारी तिरपाल हट गया हो। लाल लाल आँखें लिये चमरौटी में पहुँचा। गिरधरिया के साथ साँय फुस फुस किया और मगहिया डोम को गरियाते हुये लौटा। डोम दुआरे आ कर जल्दी जल्दी बाँस की टिखटी बनाने लगा।
ऐसे में अग्निहोत्र क्या करते, पुरोहिती का धर्म निभाने खदेरन जब रामसनेही के दुआरे पहुँचे तो सुबह सुबह हरनाचिघार(हाहाकारी रोदन) मच गया। रो रो कर एक दिन पहले सबको अचरज में डालने वाला जुग्गुल चुप रहा, बोला - एहिजा से चलि जा पंडित! अब तू चमार हो गइलss। जा के फेंकरनी के फूँकss अउर लइका खेलावss (यहाँ से चले जाओ पंडित! अब तुम चमार हो गये हो। जा कर फेंकरनी का दाह संस्कार करो और बच्चे को दुलराओ)।
...यहाँ पैदा हुआ लाल तुम्हारे सत्यानाशी ज्ञान की देन है खदेरन! देख लिये न परिणति और अनादर! ... वह चंडी चाचा के खानदान का नाश करेगा? मूर्ख हो तुम!...हाँ माँ! मैं महामूर्ख हूँ।...
बाहरी भीतरी दोनों चोटों से घायल खदेरन बैठे तक नहीं, उल्टे पाँव लौट चले। उन्हें आभास तक नहीं हुआ कि उनके पीछे जुग्गुल ने अपने मीत अँड़ुहर तेली को लगा दिया था। अँड़ुहरवा बड़हर के पेंड़ से लग कर बैठ गया जहाँ से उसे खदेरन का दुआर और गोंयड़े का खेत दोनों दिखते थे। निगरानी अच्छी तरह से हो सकती थी।
रामसनेही को फूँक कर लौटती भींड़ चुप थी लेकिन सबके मन में एक ही कोलाहल ओल्हा पाती खेल रहा था। यह देखना था कि चमरौटी वाले फेंकरनी को कैसे फूँकते हैं? जुग्गुल ने चाल चल दी थी - जाति बाहर का जाति वाले कैसे दाहा (दाह संस्कार) करेंगे? कुजतिहा का दाहा कौन करेगा?...
अँड़ुहर तेली की नज़र सामने पेंड़ से लटकते तनहा बेमौसम कटहल पर पड़ी। उसने अपने अँड़ुआ को धोती से तोपा और कटहल को घूरते वह काम करने लगा जो बहुत कम करता था – सोचने लगा। (जारी)