सोमवार, 3 जनवरी 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 6

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मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।
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भाग–1, भाग-2, भाग–3भाग-4, भाग-5  से आगे...
खदेरन की जब नींद खुली तो ऊषाकाल था। देह इतनी हल्की लग रही थी जैसे उड़ने को तैयार हो। भूख मुरमुरा चुकी थी, शिथिलता थी और मन प्रशांत था - किसी लम्बी व्रत साधना की समाप्ति की तरह। मन में एक लहर आई – इन मायावियों ने नींद में कुछ खिला दिया था क्या? या जठराग्नि भी किसी साधना में है? अग्नि से अग्निहोत्र ध्यान में आया और साथ ही भिनसहरी के सुर कानों में पड़े – उठs देव चुचुही चँवर चहुँ दिसि राम, रैना बीतल बैना बहुरि आई याम राम।
इतनी दूर इस भूमि पर यह गायन? यह दोनों हमारी बोली भी बोलती हैं! मायानगरी है यह! स्वर खुले आँगन से लगी एक दूसरी झोपड़ी से आ रहा था। सुभगा झाड़ू लगा रही थी और गा भी रही थी।
“मुझे जल चाहिये और आग भी।“
“आग पानी एक साथ माँगते हो जोगीड़े! यहाँ तुम्हारी घरवाली बैठी है क्या? बाहर कुआँ है और वेदी पर आग। निर्बल तन मन की पूजा! कर लो, कर लो। वेदी पर सब मिलेगा।“
नित्यकर्म के बाद खदेरन ने अग्नि का आह्वान किया। प्राची का मोहक नभ सामने था। लगा जैसे बहुत दिनों के बाद सन्ध्योपासना कर रहे हों। मन कोरा था और होठों पर गायत्री। बाकी सब भूल चले...
“मुझे तुम्हारा नाम नहीं जानना। कामाख्या के आँगन में अपनी सुध? तुम पितृभूमि के एक ब्राह्मण हो, बस।”
वृद्धा ने दूध से भरा कटोरा सामने सरकाते हुए कहा था। खदेरन ने देखा – तेजस्वी मुख, ललाट पर बड़ा सा रक्त गोला, आँखों में लुकाछिपी खेलते मद, ममत्त्व और सिर पर श्वेत केश राशि का जूड़ा। त्रिपुर सुन्दरी!
सुभगा उनकी यौवन मूर्ति थी, आँखों में अपार मद।
“तुम्हारी देह गन्ध और चिह्नों से जाना ... किससे भाग कर यहाँ आये हो? भैरवी साधना करनी है क्या?”
खदेरन के हाथों से कटोरा छूटते छूटते बचा।
“एक ओर वैदिक सन्ध्या और दूसरी ओर वामाचार? दो नावों में पैर? खण्ड खण्ड हो जाओगे मूर्ख! ...भैरवी साधना करनी है क्या? सुभगा तुम्हारी भैरवी होगी। सह पाओगे? लौट नहीं पाओगे।...”
वृद्धा ने विराम लिया। कठोर स्वर में करुणा घुलती चली गई,“...कनफट्टे जोगियों के देश से एक ऐसे ही आया था। काम साधना और नारी से घृणा! उस पाखण्डी की मैं भैरवी बनी और ब्याहता अंकशायिनी भी। लौट नहीं सका। सुभगा उसी का प्रसाद है।...मरते मरते कह गया कि इसका विवाह वहीं के किसी पुरुष से करना जैसे यहाँ पुरुष होते ही नहीं।...किसी के शुभ कर्म तुम्हें लग गये जो मुझे मिले नहीं तो अब तक किसी तांत्रिक की बलि भेंट बन गए होते।“
खदेरन फफक पड़े।
“हाँ माँ, मैं अभागा भागा ही हूँ। सुभगा के लिए मैं सुपात्र नहीं।“
खदेरन अपनी सुनाते चले गए।
अंत आते आते वृद्धा क्रोध से फुफकार उठी,”पापी! कायर!! दो दो स्त्रियों को किसके भरोसे छोड़ आये? तुम्हारा दोष नहीं, वहाँ का अन्न जल ही ऐसा है। वहाँ के जोगीड़े मछिन्दर नाथ के बहाने जिस त्रिया राज की बात करते हैं ,  यह वही धरती है। माया से असंग और सृष्टि का लास्य जानने का मोह!... हा,हा,हा। पाखंडी जोगीड़े! तुमने दुख भोगा, आवश्यक था। लेकिन उनका क्या जो अभी भी भोगे जा रही हैं? कुछ दिन विश्राम कर लो। घूम घाम लो। सुभगा तुम्हें सब बता देगी। लेकिन तुम्हें लौटना होगा।...एक बात का ध्यान रखना। लबार भंडों को घूमते देख भले यह लगे कि यहाँ पंचमकारों की वैतरणी बह रही है लेकिन कामाख्या के आँगन में स्त्रियों का शासन है। पौरुष प्रदर्शन करने वालों को पालतू तोता बनते देर नहीं लगती। तुम्हें बचाने तो कोई गोरखनाथ भी नहीं आएगा ... समझ गए कि नहीं?”
जाने कितने दिन खदेरन सुभगा सौन्दर्यमूर्ति के साथ घूमते रहे। हर रात जैसे दीक्षा की रात होती। मन ठाँव पाता गया। कुछ ही दिनों में जैसे किसी और संसार के जीव हो गए।
लौटने की बेला आशीर्वाद मिला,”घृणा और ईर्ष्या के अतिरेक मनुष्य को राक्षस बना देते हैं। तुम अपने पीछे जिनके लिए जो रच आये हो उसे भोगना उनकी नियति है और अपने रचे ध्वंस को सामने घटित देखना तुम्हारी नियति। कर्म नष्ट नहीं होते, उनके फल घूम फिर कर वापस आते ही हैं। उनसे मुक्ति ही तो सिद्धि है। जाने माँ मेरी कब सुनेंगी? ...घबराओ नहीं, देवी कामाख्या की धरती का पुण्य खाली नहीं जायेगा। अपने जीवनकाल में ही समाहार देखोगे...”
वापस होते खदेरन को दो जोड़ी आँखें दिखती रहीं और उनमें नृत्यरत मद और ममता। फेंकरनी और मतवा।
लौटता जोगीड़ा गुरु मछिन्दर भी था और चेला गोरख भी। प्रकृति की लीला, पुरुष की सीख।
चेत मछिन्दर गोरख आया, अगम निगम हिय खेला जी, एतियो नींद क्यूँ सोया नाथ जी, आप गुरु हम चेला जी... 
खदेरन को नहीं पता था कि दूर भविष्य में एक बनमानुख होने वाला था जिसके गुरु गोनई नट्ट ने उसे नाथ होने की शिक्षा बखूबी दी थी। (जारी)

15 टिप्‍पणियां:

  1. - पिछ्ले खंड में आये संस्कृत अंश त्रिपुरोपनिषद और त्रिपुरातापिन्युपनिषद से हैं। निर्माण प्रेरक ममत्त्व वासना, संहार और दोनों को जोड़ती गायत्री मेधा को दर्शाने के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
    एक देसज अंश परवर्ती गोरक्ष उपनिषद से भी है।

    - भिनसहरी भोर में गाया जाने वाला भोजपुरी जागरण गीत है, जिसे गाने वाले अब नहीं मिलते। आप के आस पास कोई हो तो अवश्य बतायें।

    - मूलत: दत्तात्रेय और परवर्ती गोरक्षनाथ को मानने वाले नाथपंथी योगियों की एक सशक्त परम्परा गोरखपुर और उसके आस पास के पूर्वी उत्तरप्रदेश में पायी जाती है। शरीर को साधने वाले और फटे कानों में भारी कुंडल पहनने वाले ये हठयोगी 12 वर्षों तक गुदड़ी और खिचड़ी की भिक्षा साधना के लिए प्रसिद्ध हैं। सारंगी बजाते घर घर घूमते ये नाथ परम्परा के गुरुओं का गान करते हैं। लोकजीवन पर एक पीढ़ी पहले तक इनका खासा प्रभाव रहा। अब लुप्तप्राय है। इस क्षत्रिय परम्परा का दावा शरीर पर पूर्ण नियंत्रण है। कहा जाता है कि गुरु मत्स्येन्द्रनाथ(मछिन्दर) अपनी स्तम्भन शक्ति के कारण ही स्त्रियों के राज्य में राजा बन योग से भोग का मार्ग पकड़ लिये। उन्हें चेताने उनके शिष्य़ गोरक्ष(ख)नाथ पहुँचे और उन्हें वहाँ से निकाल कर ले आये।

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  2. ..रहस्य से पर्दा उठ रहा है। अब देखें क्या करते हैं
    खदेरन पंडित।
    ..आपका कमेंट आवश्यक था। नहीं होता तो यह समझ में आता....
    ...वहाँ के जोगीड़े मछिन्दर नाथ के बहाने त्रिया राज की बात करते हैं न? यह वही धरती है।

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  3. घृणा व ईर्ष्या पीछा नहीं छोड़ते हैं। एक बार जो व्यक्त हुया, अपने निष्कर्ष तक ही पहुँचता है।

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  4. 'भोर गीत' अब भी विवाह वाले दिन पूर्वी उ.प्र. में गाया जाता है। इस दिन परिवार की महिलायें सुबह सुबह जुट कर विवाह हेतु गड़े बाँस के आसपास भोर गाती हैं, जिसमें कि घर के देवता, स्वर्गीय पुरखा - पुरनिया, का नाम लेकर उन्हें आवाहन करती हैं कि आज इस घर में काज आन पड़ा है, बारात आदि का ढेर सारा इंतजाम होना है, आओ और इस काज को थाम लो, हमे संबल प्रदान करो।

    मूल गीत मुझे नहीं पता और न ही मेरी श्रीमती जी को। कभी गाँव की तरफ रूख किया तो जरूर इस गीत को लिख लाउंगा :)

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  5. कर्म-सिद्धांत एकदम परफ़ैक्ट है। लौटकर आते ही हैं। अगली कड़ियों का बेसब्री से इंतजार।

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  6. @ सतीश पंचम
    अरे भाई विवाह वाले आह्वान गीत को 'पराती' कहते हैं। ग्रामदेवता, कुलदेवतादि और सात पीढ़ी के पुरनियों का आह्वान 'आहो आहो' से किया जाता है। जैसे - आहो आहो बरम बाबा, पइसीं हो दुआर।
    इस गीत की धुन एकदम अलग होती है और एक स्वरी सामगायन से मिलती जुलती है। इसे बहुत पवित्र माना जाता है।

    भिनसहरी एकदम अलग धुन का उत्सव निरपेक्ष गीत है। इसकी धुन कुछ कुछ निरगुनिया जैसी लगती है। काश! मुझे संगीत का ज्ञान होता ...

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  7. बहुत कुछ मैं भी सीख रहा हूँ ,ग्राम्य जीवन के ऐसे -ऐसे शब्द जो वाकई अब विलुप्त होनें को हैं.
    जानदार लेखन,बधाई.

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  8. पंचमजी जिसे कह रहे हैं वो 'साँझा पराती' ही है. ये शाम को भी तो गाती हैं औरतें?

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  9. बहुत ही उत्तम कृति सर्जित होते हुए देख रहे हैं हम, और भोजपुरी समाज तथा भोजपुरी साहित्य आपका सदैव आभारी रहेगा..... बाऊ की यह कथा अपने पूर्ववर्ती कथाओं को पीछे छोड़ रहा है, कथ्य में, अकथ्य में, तथ्य में और कथा की गतिशीलता में.

    माई से फ़ोन पर बात भईल हा अभी आधा घंटा पहिले आ फ़ोन पर भिनसहरी के गीत सुने के मिलल हा. मन हरियराय गईल हा. इयाद पडावे खातिर के धनबाद देत बानी रउवा के. हमनी देने दिवाली और गोधना कुटईला के बाद लइकी मेहरारू सब भोरे भोरे पिंडिया पारे जात रहे लोग, ओहि घरी भिनसहरी गावल जात रहे. पंचम जी बियाह के टाइम के भी कहनी. जब गाँव जाईब त ओकर रेकॉर्डिंग कर के ले आईब. अब देखीं कहिया मौक़ा मिलत बा गावें जाए के.

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  10. @ अभिषेक ओझा
    बियाह करs रजा! संझा पराती दुन्नू सुने के मिली। :)

    हाँ, वैवाहिक अवसरों पर शाम को 'संझा' गीत गाया जाता है।

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  11. विस्मित- सी पढ़े जा रही हूँ -
    वामाचार में जो पढ़ा-पढ़ाया था उसे घटते देख रही हूँ .एक ही बुनावट में कितने सूत्र पिरो कर ये चरित्र आँक दिए उन रहस्य-कथाओं के जीवन्त पात्र से सब. वाह !!

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  12. आज दोनों भाग एक साथ पढ़ा...आत्मविस्मृत किस दुनियां में पहुँच घूम आई,सोच रही हूँ...

    अभी कुछ भी और कहने की मनोवस्था में नहीं....

    क्या लिखते हैं आप..ओह ...

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  13. @ ...........भैरवी साधना करनी है क्या?
    --- बड़े छहरीले विन्यास ले आते हैं , मौके पर ! समझ नहीं आता कि खदेरन मजा मार रहा है या नियति के हाथों खेल बस रहा :)
    -----------------------
    आगे बढ़ता हूँ !

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