शुक्रवार, 11 जून 2010

लंठ महाचर्चा : बाउ और नेबुआ के झाँखी - 1

समय:ब्रिटिश काल                                                                       परम्परा: श्रौत
(अ)
कुआर का अँजोरपितरपख  बीत चुका था। भितऊ  बैठके में चौकी बिछी थी। पँचलकड़ियों  से बनी चौकी पर ऐसे मौकों पर ही निकाले जाने वाले तोषक, मसनद, बनारस की धराऊ  चादर और उनके उपर विराजमान थे शास्त्र, तंत्र, मंत्र सर्वज्ञाता खदेरन पंडित। पत्रा और एक लाल बस्ते में रखे भोजपत्र के टुकड़े खुले थे। पंडित तल्लीन थे। उनकी चुप्पी माहौल में फैले तनाव को और गम्भीर बना रही थी।
कोई खास उमस न थी लेकिन सग्गर बाबू धीरे धीरे उनके उपर बेना  झल रहे थे जिसमें आदर प्रदर्शन का भाव अधिक था। उनके बाप ,रामसनेही, पंडित जी के सामने नीची और छोटी चौकी पर बैठे जनेऊ से कभी पीठ खुजाते तो कभी सग्गर बाबू को इशारा करते।
जुग्गुल की तैनाती नीम के नीचे थी। कोई ऐसा वैसा छूत छात वाला मनई  न आ जाय! घर के भीतर सग्गर की महतारी आड़ किए लतमरुआ पर बैठी थीं। हाथ में लकड़ी लिए लँगड़ी पिल्ली को डराए हुए थीं जो बार बार खिरकी  के रस्ते दुआर  की ओर जाने की कोशिश में थी।
खदेरन पंडित बड़े जोगियाह थे। सिले कपड़े नहीं पहनते थे और ऐसे मौकों पर अस्पृश्य की ओर दृष्टि पड़ जाने पर तुरंत काम बन्द कर स्नान करने चल देते थे। रमल, लाल किताब, रोमक और जाने कितने टोटके उनके बाएँ हाथ के खेल थे और सनकें मशहूर थीं।
उनके आने का कारण एक दिन पहले की घटना थी । जंत्री सिंघ बरदेखाई के लिए सुबह सुबह निकले ही थे कि सग्गर सामने पड़ गए।
"धुर बहानचो ! कौनो सुभ कार करे निकल त ई निस्संतानी जरूर समने परि जाला।"
"धुत्त बहनचो! कोई शुभ काम करने निकलो तो यह नि:संतानी जरूर सामने पड़ जाता है।"
जंत्री सिंघ ने जाना टाल दिया और घर के भीतर से जवान सोनमतिया की महतारी सग्गर को कोसने लगी। अठारह बरस से निस्संतानी सग्गर के लिए यह सब सुनना आम हो चला था लेकिन सोनमतिया पट्टीदारी की ही सही उनकी प्यारी भतीजी थी।
उसका विवाह खोजा जा रहा था और उन्हें खबर ही नही !
उनके सामने पड़ जाने से निकलना तक टाल दिया जा रहा है !!
दोहरे धक्के ने कुछ अधिक ही हिला दिया। खटवासि  ले पड़ गए तो दिन भर कुछ नहीं खाए। संझा के बेरा आँख लग गई जो महतारी की फजिहत से खुली,
"ए बेरा सुत्तता। लछमी का अइहें। जाने कौन बाँझ कुलछनी घर में आइल कि एकर सगरी बुद्धी हरि लेहलसि। नाती नतकुर नाही होइहें। निरबंसे होई।" "इस समय सो रहा है। धन सम्पदा क्या आएगी? जाने कौन कुलक्षणा घर में आई कि इसकी सारी बुद्धि ही हर ली। नाती पोते नहीं होंगे, वंश डूब जाएगा।"
प्राणप्यारी सोझवा पत्नी के लिए ऐसी भाखा  सुन सग्गर तमतमा उठे। पहाड़ की तरह उन्हों ने पिछले पन्द्रह वर्षों से दूसरे विवाह के दबावों को झेला था - बिना टसके मसके। लेकिन आज जाने क्या हुआ था, अमर्ष ?... संझा के बेरा  फूट फूट कर रो पड़े थे। बाप ने सुना और वज्र निर्णय लिया।
(आ)

महामहोपाध्याय चण्डीदत्त शुक्ल। गाँव की भाखा में महोधिया चंडी पंडित। गोरख पीठ, काशी और उज्जैन से शिक्षा दीक्षा। भृगु संहिता, रावण संहिता, ज्योतिष और साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान। मलेच्छ भाषा पर भी अधिकार लेकिन वाणी दोष की आशंका के कारण बोलने से बचते थे। महोधिया उपाधि उनकी शोहरत और अंग्रेज बहादुर को भूमि शोधन कर मदद करने से मिली थी। घोड़े पर चलते थे और यजमानों के यहाँ उनके लिए छ्त्र, चँवर अनिवार्य थे।
ऐसे चंडीदत्त के खानदान के थे भ्रष्ट विद्या आचार्य श्मशान साधक खदेरन पंडित। शव साधना, लाल किताब और ऐसे ही जाने कितनी गुप्त विद्याओं के अध्ययन साधन ने उन्हें गाँव का पतित बना दिया था। एक दिन तो हद ही हो गई जब तेलिया मसान  की हड्डी लिए घूमते अघोरी को उन्हों ने भोजन करा दिया।
उग्रधर्मा वयोवृद्ध महोधिया ने निर्णय लिया और बाकी घरानों के साथ खदेरन का खान पान बन्द हो गया। जजमानी टूट गई जिसमें सग्गर का खानदान भी था।
लेकिन खदेरन तो खदेरन थे। बचपन से ही आक्रोश को अग्नि की तरह धारण किए थे। अपने को सच्चा अग्निहोत्री बताते वह अपनी साधना में लगे रहे - एकमात्र उनका ही घर था जिसमें अग्निशाला कभी ठंडी नहीं पड़ी थी। उनकी दृष्टि में चंडी चाचा भ्रष्ट और मलेच्छतुल्य थे और वह खुद खेतिहर अग्निहोत्री ब्राह्मण। जिस ब्राह्मण के घर अग्निहोत्र न हो वह कैसा ब्राह्मण ?
ऐसे पंडित का खदेरन नाम कैसे पड़ा ?
(इ)
" कुलटा ! निकल घर में से। हमरे बीज से चरि चरि गो भवानी होइहें?""कुलटा ! घर में से बाहर निकलो। मेरे वीर्य से चार चार लड़कियाँ होंगी?"   
रात का समय। चतुर्भुज पंडित अपनी घरैतिन को घसीटते घर में से निकाल रहे थे। माँ बाप की रोज रोज की चख चख की अभ्यस्त हो चली चार भवानियाँ सहमी सी दुबकी हुई थीं और मतवा पति से निहोरा कर रही थी,
"राति के बेरा कहाँ जाईं? बिहाने अपने लइकनिन के ले के पोखरा में कूदि जाइब। रउरे मुकुत हो जाइब लेकिन ए बेरा छोड़ि देईं।" "रात के समय कहाँ जाऊँ? सबेरे अपनी बेटियों के साथ पोखरे में कूद जाऊँगी। आप मुक्त हो जाएँगे लेकिन इस समय रहने दीजिए।" 
घर से बाहर अकेली स्त्री का रात बिताना! लोकापवाद की आशंका ने मतवा को निरीह बना दिया था। पति के पैर पकड़ धाड़े मार रो रही थीं लेकिन चतुर्भुज के मन में वही चोर था जिसका मतवा को डर था। घसीटते हुए घर से बाहर ला एक लात जमाया और चाँचर बन्द कर दिया। चारो भवानियाँ चीख चीख रोने लगीं लेकिन पंडित टोले के किसी घर से कोई बाहर नहीं निकला।
रात कुछ अधिक ही काली हो चली थी। रोती बिलखती मतवा बबुआने  पहुँच गई, सीधे भिक्खन के महतारी के पास।


गाँव भर की काकी भुनभुनाई,
" कठमरद चतुर्भुजवा। अरे ! औलाद औलाद होले। हमार बोक्का बा तब्बो मालिक कब्बो कुच्छू नाहीं कहलें।"
"कठमर्द चतुर्भुज। अरे! औलाद औलाद होती है। मेरी औलाद तो मन्दबुद्धि है लेकिन मेरे स्वामी ने तो कभी कुछ नहीं कहा !" 
"ए भिखना ! लुकारा धराउ।" "भिक्खन! मशाल जलाओ!" काकी ने अपने मन्दबुद्धि जवान बेटे को जगाते हुए आदेश दिया।      
पोरसा भर लम्बा पहाड़ सा शरीर लिए भिखना मातृ आदेश के पालन हेतु तत्पर हुआ। पति को माजरा बता-समझा कर भिखना और मतवा के साथ काकी चतुर्भुज की अक्ल दुरुस्त करने चल दी।
" ए पंडित ! इ कौनो कायदा हे ? मेहरारू के राति के घर से निकाल देहल ह।"
"ऐ पंडित  ! ये कोई तरीका है ? अपनी स्त्री को रात में घर से बाहर निकाल दिए ?" 

" काकी हो, तू बिच्चे में न पर sss" "काकी! तुम बीच में न पड़ो"
"काकी परिहें बिच्चे में पंडित ! पयलग्गी करिहें लेकिन बइयो झरिहें। भिखना के देखतल कि नाहीं ? अब्बे इशारा करब। बम्मड़ मनई, तोहार पहँटा लगावत देरि नाइ लागी।" "काकी तो बीच में पड़ेगी पंडित! प्रणाम करेगी लेकिन तुम्हारी अक्ल भी दुरुस्त करेगी। भिक्खन को देख रहे हो न ? अभी इशारा करूँगी। मन्दबुद्धि जवान है, तुम्हारी ऐसी तैसी करते देर नहीं लगेगी।" 
चतुर्भुज ने साँड़ सरीखे भिक्खन को लुकारा लिए देखा तो पुत्र की कामना बिला गई। काकी का यह पुत्र काकी को भले नरक से न तार पाए लेकिन चतुर्भुज जैसों को एक इशारे पर नरक में झोंक सकता था।
धमकी काम कर गई। मतवा को गृहप्रवेश मिला और चतुर्भुज को भविष्य में फिर कभी ऐसा न करने की चेतावनी।
लेकिन मतवा का दु:ख और बढ़ गया। पुत्र प्राप्ति हेतु घर और घरैतिन में तारतम्य न होने का कारण बताते हुए महामहोपाध्याय चण्डीदत्त शुक्ल ने व्यवस्था दी,
"चतुर्भुज की स्त्री घर से, ग्राम सीमा से बाहर रहेगी। उत्तरायण सूर्य के रहते हुए पति पत्नी शास्त्रोक्त ऋतुकाल सम्बन्धी मर्यादाओं का पालन करते हुए समागम करेंगे। यदि वर्षांत में भी गर्भ नहीं ठहरा तो चतुर्भुज दूसरे विवाह के लिए स्वतंत्र होंगे।"
चण्डी के मन में चोर था। चतुर्भुज का दूसरा विवाह वह अपने रिश्ते में कराना चाहते थे। उन्हें डर था कि चार चार पुत्रियों को जन्म देने वाली स्त्री पुत्र को भी जन्म दे सकती है। यदि पति पत्नी में अलगाव डाल दिया जाय तो बात बन सकती थी। उन्हों ने तदनुकूल व्यवस्था दी। मतवा गाँव के बाहर 'खदेरा गई'।
नियति के आगे किसी का बस नहीं चलता भले वह महामहोपाध्याय ही क्यों न हो!
काकी ने यह सुना तो मन ही मन चंडी को खूब कोसा। उस रात बिन बुलाए काकी चतुर्भुज के यहाँ गई। भिक्खन दुआरे चतुर्भुज को बिठाए रहा। भीतर काकी मतवा को भूले पाठ याद कराती रही। सोहागिन नारी का कर्तव्य है कि अपना आकर्षण बनाए रखे। 
उस साल सूर्य के उत्तरायण रहते, बस तीन महीने तक भिक्खन रात का सूरज बन चतुर्भुज के दरवाजे आता रहा। मन्दमति की नींद कच्ची थी। मारे डर के चतुर्भुज चुपचाप गाँव के बाहर अपनी निष्कासित पत्नी की झोपड़ी में जाते रहे और रात बिता सुबह घर वापस आते रहे।
इस तरह की अनूठी रखवाली शायद पहले कभी नहीं हुई थी। ..
मतवा गर्भवती हुईं और...
... पुत्र ने जन्म लिया। चंडी के चेहरे पर कालिमा पोतते आह्लादित चतुर्भुज काकी के यहाँ पधारे और अद्भुत बात हुई।
नामकरण बिना किसी आडम्बर कर्मकांड के हो गया।
काकी ने खदेड़ी गई स्त्री के बेटे का नाम रखा "खदेरन"।
उन्हें नहीं पता था कि यह नाम माता के अपमान और पीड़ा की अग्नि को हमेशा हमेशा के लिए पुत्र के मनोमस्तिष्क में स्थापित कर देगा। बड़े होने पर भी खदेरन ने नाम नहीं बदला। यज्ञोपवीत के तुरंत बाद ही खदेरन ने अग्नि की स्थापना की थी। बचपन में न मंत्र आते थे और न कर्मकाण्ड लेकिन अग्नि हमेशा जीवित रही -उनके मन में भी और शाला में भी।
(ई) 
अठ्ठारह वर्ष। पुत्र कामना कामना ही रही।
बन्ध्या धरती - खरपतवार तक न हो!
सग्गर सिंघ के यहाँ कन्या तक का जन्म न हुआ।
पहले वयोवृद्ध चंडी शुक्ल कर्मकाण्ड कराते रहे फिर उनके बेटे भतीजे लेकिन विधाता की लेखनी पुन: स्याही में न डूबी। दबी जुबान से घरैतिन ने कई बार खदेरन पंडित का नाम लिया पर स्वामी की वर्जन दृष्टि के आगे बात बढ़ नहीं सकी।
लेकिन आज ?
... पुत्र की आँखों में आँसू और वंश न चलने के भय ने पिता को परम आदरणीय चण्डी पंडित की व्यवस्था का उल्लंघन करने को बाध्य कर दिया।
गाँव में सर्व बहिष्कृत और गाँव के बाहर सर्व पूजित खदेरन पंडित को बुलावा भेजने का वज्र निर्णय रामसनेही सिंघ ने लिया। जाति से बाहर किए जाने का खतरा कोई मायने नहीं रखता था तब जब कि वयस्क और परम स्नेही पुत्र को रोना पड़े।
(उ) 
सूरज देव बाँस भर आकाश में चढ़ आए थे। खदेरन पंडित ने दृष्टि उठाई तो सब कुछ ठहर गया - सग्गर का बेना, रामसनेही का जनेऊ से खुजलाना, महतारी की लकड़ी, जुग्गुल की चहलकदमी, यहाँ तक कि लँगड़ी पिल्ली भी खिरकी में पटा गई।
हवा ठहर गई जैसे किसी चक्रवात की प्रतीक्षा हो !
खदेरन पंडित ने रुक्ष स्वर में आदेश सुनाया,
" सनातन धर्म के शास्त्रों में मुझे कोई समाधान नहीं दिखता। यजमान ! लोकविद्या, गुह्य विद्या और वामविद्या के समन्वय से राह मिलेगी। पोते का दर्शन आप को होगा ..."
खदेरन ने रुक कर वातावरण के तनाव में उमड़ते घुमड़ते स्वीकार को महसूस किया और पुन: जारी हुए,
" किसी भी रविवार के दिन सूर्य उगने के पहले पूरब दिशा की ओर सागर सिंह प्रस्थान करें। किसी से कुछ न कहें और न किसी की पुकार का उत्तर दें। गाँव की सीमा से बाहर आने पर पहली किरण का दर्शन होने के तुरंत बाद जिस किसी पहले पौधे को देख मन में स्वीकार भाव आए उसे अपने घर आने के लिए निमंत्रित करें, उसे सुरक्षित करें और वापस आ जाँय। अगले रविवार को उसे लाकर पति पत्नी दोनों घर के बाहर रास्ते के किनारे रोपित करें। तत्पश्चात दिन में ही समागम करें।
ईश्वर कृपा से पुत्र की प्राप्ति होगी लेकिन ..."
"... उस पुत्र से आगे की वंशावली उस पौधे के स्वभाव अनुरूप होगी। वंश तब तक चलेगा जब तक वृक्ष रहेगा। वृक्ष की हानि वंश का नाश कर देगी।
ईश्वर पर भरोसा रखें, सब शुभ होगा। मुझे दिख रहा है, यह वंश इतना बड़ा होगा कि रोज मनही भर  नमक लगेगा।" कहते हुए खदेरन ने आसन छोड़ दिया।
चरण छूने को उद्यत हाथों को बरजते और दक्षिणा को घर भेजवा देने का इशारा करते लगभग भागते हुए रुखसत हुए।
नियति भी कैसे कैसे खेल खेलती है!
सग्गर सिंघ को अगले रविवार को गाँव से बाहर गोंयड़े के खेत की मेड़ पर जो पौधा पहली किरण के साथ मिला और स्वीकार्य भी लगा, वह था - 'नींबू'
रामसनेही सिंघ ने सिर पीट लिया - नीबू। काँटेदार झाड़ियाँ, फल अफरात लेकिन बला की खटास ! और नींबू के पेंड़ का जीवन ही कितना ?
मन में खदेरन पंडित की रुक्ष वाणी गूँज उठी, "... उस पुत्र से आगे की वंशावली उस पौधे के स्वभाव अनुरूप होगी। वंश तब तक चलेगा जब तक वृक्ष रहेगा। वृक्ष की हानि वंश का नाश कर देगी।" (अगला भाग)
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शब्द सम्पदा:
(1) कुआर का अँजोर - आश्विन (क्वार) मास का शुक्ल पक्ष (2) पितरपख - पितृपक्ष (3)  भितऊ - मिट्टी की दीवार वाला घर (4) पँचलकड़ियाँ - औषधीय गुणों वाली 5 लकड़ियाँ (5)  बेना - बाँस का या नारियल की पत्ती से बना हाथ का पंखा (6) मनई - व्यक्ति (7) लतमरुआ - खपरैल के घरों में प्रयुक्त मुख्य द्वार की भारी चौखट का निचला भाग (8) पिल्ली - कुतिया (9)  खिरकी - दो घरों के बीच का सँकरा रास्ता/खाली स्थान (10) दुआर - देहाती घरों में आगे छोड़ा गया बड़ा खाली स्थान जिसे बैठने और अन्न प्रसंस्करण के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। (11) जोगियाह - फालतू के नेम टेम मानने वाला (12)  खटवासि - चरम दु:ख के क्षणों में खाट पर पड़े रहना (13)  सोझवा - सीधी साधी (14) भाखा - भाषा, बोली (15) संझा के बेरा - शाम का समय  (16) मलेच्छ भाषा - अंग्रेजी (17)  तेलिया मसान की हड्डी - गुह्य साधना का एक अंग। तेली जाति  के लिए सुरक्षित श्मशान से अधजले शव से खींच लिया गया हड्डी का टुकड़ा (18)  भवानी - पुराने जमाने में बेटी के लिए प्रयुक्त (19) मतवा - ब्राह्मणी, आदर स्वरूप प्रयुक्त, इतर जातियों के लिए किसी भी आयु की विवाहिता ब्राह्मणी माता समान (20) बबुआने - गाँव की राजपूत बस्ती के लिए इतर जातियों द्वारा प्रयुक्त (21) पोरसा भर – हाथ को ऊपर की ओर सीधा फैलाने से हुई ऊँचाई  (22) बिला - खो जाना, भूल जाना (23) खदेरा गई - खदेड़ दी गई, निष्कासित किए जाने के अर्थ में प्रयुक्त (24) सोहागिन - सुहागिन  (25) मनही भर - एक चौथाई सेर, सेर तौल की पुरानी माप थी जो आज के एक किलोग्राम से कुछ कम होती थी। (26) नेबुआ - नींबू

16 टिप्‍पणियां:

  1. अरे वाह ! बाउ का पुनरागमन !
    चहक उठा मैं ! मेरी अतिशय प्रिय प्रविष्टि-श्रृंखला है यह !

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  2. अभी बाऊ के पुनरागमन का स्वागत करने आये हैं. मतलब यह की यह "nice, बहुत अच्छा लिखा है" वाली टिप्पणी है. पढ़कर फिर से करेंगे.

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  3. शुभ पुनरागमन !
    वृक्षारोपण करवाएं और पुष्पंन पल्लवन का काम करते हुए रचनाकर्म का निर्बाध निर्वाह करें ! तथास्तु !!

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  4. झूठ नहीं बोलेंगे हमारे लिए यह प्रथम आगमन ही है , इसलिए पिछली कुछ प्रविष्टियां टटोलेंगे वर्ना बाक़ी टिपेरों की तरह मुस्करा भी नहीं पायेंगे !

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  5. काकी का यह पुत्र काकी को भले नरक से न तार पाए लेकिन चतुर्भुज जैसों को एक इशारे पर नरक में झोंक सकता था।
    ऐसे "बम्मड़" अनजाने ही कितना पुण्य करते रहे हैं!

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  6. गिरिजेश सर, सप्ताह भर बाद लौटा था कल और आते ही आपकी बाऊ पोस्ट पर नजर पढ़ गई। हमारे जाने पर ही लिखनी है हमारी फ़ेवरेट चीज तो फ़िर चले जाते हैं,ये कौन सी बड़ी बात है।
    असली टिप्पणी हम भी बाद में करेंगे।
    अभी तो खुशी जाहिर करने आये हैं कि इतने दिनों के बाद बाऊ की तरफ़ ध्यान गया।

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  7. अद्भुत से ज्यादा लिखने के लिए अनकहे शब्दों की दरकार है ....!!

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  8. अद्भूत लेखन,एकदम लीन हो तंन्द्रा मे गोते लगाते हुए इसे पढा , - सतीश पंचम

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  9. बाऊ श्रृंखला की हर पोस्ट अपने आप में इतनी पूर्ण होती है कि कुछ कहने को बचता ही नहीं.

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  10. .
    .
    .
    अद्भुत, उम्दा, सुन्दर...
    और क्या कहूँ... तारीफ के लिये शब्द तक नहीं हैं मेरे पास...

    आभार!


    ...

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  11. लंठ महाचर्चा - आज पढनी आरम्भ की है. देशज शब्दों की भरमार कई बार खीज पैदा करती है और कई बार अतेरिक्त मज़ा दे रही है.... आशा करता हूँ - पूर्णत दुबकी लगाऊंगा.

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  12. नियोग की देसी बिधि से आगे बढ़ते हैं , अगले हिस्से पर ...

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  13. भाग १३ पढ़ते पढ़ते लगा कुछ भूल रहा हूँ, कुछ आनंद नहीं आया....... अत: दुबारा से ...

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