रविवार, 2 जनवरी 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 5

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मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।
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भाग–1, भाग-2, भाग–3भाग-4  से आगे...
खदेरन को जब चेत हुआ तो निशाबेला थी। झोपड़ी में लोहबान की गन्ध थी और उनकी देह भूमि पर ही नर्म बिस्तर में थी। आँखें खुलीं तो जाने कितने दीपों के प्रकाश में उन्हें सामने वेदिका दिखी। उस पर प्रतिमा थी क्या? दो विशाल नेत्र और अधखुला त्रिनेत्र जैसे उन्हें ही घूर रहे थे। सन जैसे सफेद केश वाली एक वृद्धा बैठी पूजा कर रही थी:
मदन्तिका मानिनी मंगला च सुभगा च सा सुन्दरी सिद्धिमत्ता।
लज्जा मतिस्तुष्टिरिष्टा च पुष्टा लक्ष्मीरुमा ललिता लालपंती।
इमां विज्ञाय सुधया मदनी परिसृता तर्पयंत: स्वपीठम्
नाकस्य पृष्ठे वसंति परं धाम त्रैपुरं चाविशंति।
कामो योनि: कामकला ...
सचेत साधिकार परुष स्वर। खदेरन को माता की याद हो आई, सन जैसे केश - गाँव भर की काकी याद आईं।
मैं तुम्हारी गोद में पहुँच ही गया माँ! - आँखों के कोनों से आँसू बह चले।
“तुम चेत गए ब्राह्मण! चुपचाप लेटे रहो। वहाँ से आये हो न जहाँ कनफट्टे जोगी फेरी लगाते हैं? तुम्हारा स्वागत है।“
वही, वही ममतामय परुष स्वर! ब्राह्मण!! कनफट्टे जोगियों की धरती!!! – माँ तुम्हें कैसे पता?
“माँ के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। प्रश्नों को विराम दो। त्रिपुर सुन्दरी की उपासना का समय है। उसके बाद समय ही समय है।“
मन की बात कैसे..? खदेरन आश्चर्य से भर उठे।
वृद्धा का स्वर तीव्र हो गया। ममता का स्थान जैसे संहार ने ले लिया हो –
भस्मांगरागायोग्रतेजसे हनहन दहदह पचपच मथमथ
विध्वंसयविध्वंसय हलभञ्जन शूलमूले व्यञ्जनसिद्धिं कुरुकुरु
समुद्रं पूर्वप्रतिष्ठिअतं शोषयशोषय स्तंभयस्तम्भय
परमंत्रपरयंत्रपरतंत्रपरदूतपरकटकपरच्छेदनकर
विदारयविदारयच्छिन्धिच्छिन्धि ह्रीं फट स्वाहा...
खदेरन आतंक से पहले जड़ हुए और फिर चेतन – उपासना में ऐसे मंत्र! स्तम्भन किसका? जननी के द्वारा? नहीं रहा गया। चीख उठे – माँ!
“चुप रह षंड! पामर!! तू स्वस्थ होता तो अब तक इस विघ्न अपराध के लिए तुम्हारी बलि चढ़ चुकी होती...”
वृद्धा ने पुकार लगाई,”अरी सुभगा! कहाँ हो? इस पापी को कुछ देर चुप रखने का यत्न करो। तुम्हारे पिता की धरती से आया है।“
...कुलकुमारि विद्म्हे मंत्रकोटिसुधीमहि। तन्न: कौलि: प्रचोदयात्।
गायत्री? खदेरन अपने अज्ञान पर लज्जित हो उठे। वृद्धा का स्वर चढ़ता ही चला गया...।
“श्श! माँ से बात न करो। जितनी बार विघ्न होगा, उतनी बार उन्हें पुन: प्रारम्भ करना पड़ेगा, वह भी दो बार। ...सारी रात बीत जाएगी। फिर स्वप्नसाधना कब होगी? शय्या का सुख कैसे मिलेगा जोगीड़े!”
जोगीड़े? मधुमय स्वर। युवती आकर खदेरन के पास बैठ चुकी थी। खदेरन ने दृष्टि फेरी और स्तब्ध रह गए। फेंकरनी जैसे गोरी होकर शय्या पर आ बैठी हो! मन में नाम दुहराया – सुभगा।
जोगीड़ों की बानी – जगत की उत्पत्ति के हेतु लाये माया कौ लावण्य ताँसौ असंग जोगधर्म – द्रष्टा रमण कियौ है आत्मरूप सौं सर्व जीवन मैं। तत् शिष्य गोरखनाथ।
पिता की धरती! मस्तिष्क में सन्नाटा हुआ और खदेरन निद्रा के आगोश में सिमट गए।
(ङ)
जुग्गुल के जियरा जंजाल न हो तो उसे कुछ नहीं सुहाये। गाँव में जंजाल माई धिया समेत विराजमान था और कोई टंटा, हड़हड़, भड़भड़ नहीं? लाठी उठाते बुदबुदाया - बहानचो ई गँउवा मसान हो गइल बा। (बहनचो, यह गाँव श्मशान हो गया है।)
सीधे बायें पैर, लँगड़े दायें पैर और लाठी की पेंगों के सहारे चमरौटी पहुँचते देर नहीं लगी। सीधे गिरधरिया मेठ के यहाँ जा कर चोकारी देने लगा – हरे गिरधरिया! कहाँ बाड़े रे? (हे गिरधरिया! कहाँ हो?)
गिरधरिया चटनी में नून कम होने के कारण अपनी मेहरारू को गरिया रहा था कि पुकार सुना और नून की लोनाई ही भूल गया – आजु कवनो बज्जर जरूर परी। ई लंगड़ा अइसहिं नाहीं आइल होई (आज कोई अनिष्ट अवश्य होगा। ये लंगड़ा ऐसे ही नहीं आया होगा।)
प्रकट में हाथ जोड़े, गमछा कपार पर रखे निकला – दोहाई बाबू! कहींs! (दुहाई बाबू! कहिये।)
इशारे से पास बुला कर जुग्गुल ने कहा – फेंकरनी पेटे से बा। कलिहें देखलींs ओकाति रहे। खदेरन अउर माधो पंडित दुन्नू नपत्ता। तोके कुछ बुझाता? (फेंकरनी पेट से है। कल ही उसे उबकाई लेते देखा था। उधर खदेरन और माधव दोनों पंडित लापता हैं। तुमको कुछ समझ में आ रहा है?)
“नाहीं मालिक! फेंकरनी त ससुरा गइल रहे।(नहीं मालिक! फेंकरनी तो ससुराल गई थी।)
“है बुरियाभागा! तोके मेठ कौन बहानचो बनवलसि रे? लड़झुलहा मरदे से का होई रे? हमके त पंडितवन के कार लागता। मूहें करिख्खा पोति भागि गइलें सो। फेंकरनी के महतरिया त कलाकारि हे। तोहनी के चूतिया बना देहलसि। बभनौटी के गोंयड़े चमरौटी बसताs।“ (बेवकूफ अभागे! तुमको किसने मेठ बना दिया? नामर्द से कुछ होता है? मुझे तो यह काम दोनों पंडितों का लग रहा है। मुँह में कालिख पोत कर भाग गए। फेंकरनी की माँ तो कलाकार है। तुम लोगों को चूतिया बना दी। बभनटोली के किनारे चमटोली बस रही है।)
“मालिक! हम त ओकरे देवरे से सुनले रहलीं।“ (मालिक! मैंने तो सुना था कि उसका अपने देवर से ही सम्बन्ध था।)
“चूतिया सरऊ! रहि गइलs न ऊहे।” (साले! वही के वही रह गए!)
“राउर दया हे मालिक!” (आप की दया है मालिक!)...
बात चलती रही। अंत में जुग्गुल ने पंचायत के लिए सूअर, कच्ची शराब और ताड़ी का इंतजाम करने का बयाना दे दिया। अगली शाम चमटोली के पंच बैठे और फेंकरनी और उसकी माई को जात बाहर कर दिये। अपराध बताया गया – बिना पूछे टोले से बाहर रहना। ऐसा अपराध कभी किसी ने नहीं किया था...
शाम को जुग्गुल हुक्का गुड़गुड़ाते हुए जब इस गुंताड़ में लगा था कि फेंकरनी का झोंपड़ी दहन, उसी के कारण टोले से बाहर रहने पर जाति बाहर, अब अगला कदम क्या हो? उसी समय रामसनेही की धिरवन सुनने को मिली – नींबू के पास पेशाब न किया करो।
जुग्गुल ने हुँकारी भरी, हुक्का किनारे रखा और विचारमग्न हो गया – फेंकरनी से न उसकी कोई दुश्मनी और न काका की। फिर वह क्यों इसमें पड़ा?
मुस्कुराया –का करतीं? गाँवे में बमचक के दूसर कवनो मामलो नाहीं बा! (क्या करता? गाँव में गड़बड़ी का कोई और मामला भी तो नहीं दिख रहा है!) (जारी)

15 टिप्‍पणियां:

  1. ...एक ओर खदेरन पंडित के माध्यम से तिलस्म का दूसरा दरवाजा खुल रहा है तो दूसरी तरफ गाँव का यह चरित्र भी उजागर हो रहा है कि बड़े लोग मात्र बमचक के शौक के लिए आग लगाते थे।
    ...अनूठा पढ़ने को मिल रहा है।

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  2. जबरदस्त किस्सा चल रहा है।
    सृजन है या आँखों देखा हाल...! अनुमान लगाना असंभव सा हो गया है।

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  3. बहुत खूब, सर्जक के कल्पनाशीलता को सुर्खाब के पर लग गए हैं....राउर कथ्य अउर चरित्र चित्रण के कवनो जवाबे नइखे ए सरकार.

    माई के श्लोक के सन्दर्भ बतावे के कष्ट करीं तनी.

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  4. @सूअर, कच्ची शराब और ताड़ी का इंतजाम

    @ फेंकरनी और उसकी माई को जात बाहर

    कितना सस्ता होता था किसी को जात से बाहर करना....

    खदेरन माँ के पास पहुँच गया है..... मीलों सफर के बाद..... क्या ये उसकी अंतिम यात्रा थी........ नदी चली सागर में..
    समय देगा सभी सवालों के जवाब.....

    आचार्य आपकी लेखनी को हार्दिक प्रणाम.....

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  5. सुबहियै पढ़ा था लेकिन कमेंट न दे सका. अभी दिया बाती के टैम फिर पढ़ा और लगा कि यार इसको जल्दी से जल्दी छपना चाहिये। इससे पहले कि कुछ अवसान हो.....इससे पहले कि स्मृति धोखा देने लगे।

    बहुत ही शानदार लेखन है। एकदम खालिस ।

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    बहुत बेचैन कर देता है बाऊ कथा को पढ़ना... अब आगे क्या होगा ?



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  7. अवधी के जबरदस्त शब्द ,जिसमें कई- एक तो अब अवसान पर है.
    शानदार लेखन.

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  8. बाप रे, ई तो बड़ा लाईव शो है भाई -और कभी बंकिम याद आते हैं तो कभी गीत गोविन्द और कभी शरत चन्द्र तो कभी रेणु..अद्भुत !

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  9. बहुत सुंदर, भाषा ने चार चांद लगा दिये जी, धन्यवाद
    आप ओर आप के परिवार को नव वर्ष की शुभकामनाएं।

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  10. आज कमेन्ट के माले में अभिषेक ओझा के साथ !

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  11. जुग्गल मस्त कैरेक्टर लग रहा है। रचेगा कुछ न कुछ..

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