रविवार, 5 दिसंबर 2010

बाउ और नेबुआ के झाँखी - 2

...देख सँभाल के चल नहीं पाता, मेरी पनही में कीचड़ लगा ही रहता है। संतोष है कि मन, मस्तिष्क, शरीर सब निर्मल थे और हैं। आगम की कौन कहे, उसे किसने जाना है?


भाग –1 से आगे...

(ऊ)
मानुख मन धरती जैसा ही होता है। जाने कितने विरोधों को धारण किए रहता है। अस्पृश्य का इतना खयाल रखने वाले खदेरन पंडित कि दृष्टि पड़ जाय तो पत्रा बन्द कर दें, उस समय इसलिए भागे थे कि राहुकाल का समय हो चला था और उसके पहले ही चमटोली की फेंकरनी को चेता देना था। चेताना क्या, तंत्र साधना के लिए निमंत्रण देना था। वेदपाठी अग्निहोत्री उस समय मसानी मंतर दोहरा रहा था:

आवाँ दहके दिन के टार, रुख मारो जियता गाड़
सोना हीरा गलें उजियार, होन लगे रतन बौछार
दूजा कोई जो जाने पावे,रोक के राखे आगे अन्हियार
रुख नीचे जो डोमिन भोगे, अरि बंसवरी तुरते संहार।
शुक्ल पक्ष के दिन में सूरज दहक रहा हो और रविवार को पौधा उखाड़ कर फिर से रोपने के बाद अगर उच्चवर्णी दम्पति दिन में ही संभोग करें तो ऐसे जातक से वंश की अतिशय वृद्धि होती है। कोई दूसरा उस पौधे के पास अमावस्या की रात में डोमिन साधना करे, उसके शत्रु के वंश का शीघ्र ही नाश हो जाता है।

नाश और सरजन को एक साथ साधना कोई आसान काम थोड़े है? डोमिन न सही, चमइन चलेगी। पद्मिनी तो है ही।
... सन्ध्याकाल अग्निहोत्र करते खदेरन पंडित उद्गाता थे। गुरु गम्भीर स्वर- भरद्वाज ऋषि सन्निधान।
यज्ञा यज्ञा व अगन्ये , गिरा गिरा च गच्छसे ...मित्रम न ...न द्वितीय

(ए)
फेंकरनी। कभी कारी बदरी के नीचे से झाँकती लाली देखी है? नहीं, तो देख लीजिए। फेंकरनी वैसी ही थी। सातो जाति की वल्लभा। फोकट में ही कुलटा नाम प्रसिद्ध। गौने गई और अगले दिन ही वापस आ गई। मरद नपुंसक निकला। चमटोली में किनारे की झोपड़ी में माई बेटी साथ साथ रहते थे।
गाँव का ऐसा कोई घर नहीं था जिसमें ललन के आगमन पर थाली बजने या ललना के आगमन पर मुँह लटकने के पहले फेंकरनी और उसकी माई के पैर न पड़े हों। प्रसूत विज्ञान विशेषज्ञ माई बेटी ने कभी जच्चा बच्चा पर खतरा नहीं आने दिया लेकिन ज़वानी, सुन्दरता और अकेलेपन की त्रिवेणी बह रही हो तो लोगों के पापी मन कृतज्ञता का चोला फेंक गोता लगाने के मनमनसायन से बाज नहीं आते। इस गाँव में भी इंसान ही बसते थे।
खदेरन पंडित अपने काम से काम रखने वाले जीव थे लेकिन साधना के लिए जिस जाति की जैसी स्त्री चाहिए थी वह कहीं न मिली, मिली तो गोंयड़े ही। मनुहार और मीठी बातों से फेंकरनी के सूने मन का द्वार खुल गया लेकिन खदेरन ने मरजाद की वह रेख नहीं लाँघी जिसके भीतर बस मतवा बसती थीं। नि:संतान खदेरन के मन में जो अग्निशाला थी उसमें बस एक ही आग जलती रहती थी – चाचा चंडी के खानदान के समूल नाश की।
सग्गरवंश महोधियों का नाश करेगा।
...ब्रह्महत्या! अरे पातकी, अपने ही रक्त का संहार करायेगा और दूसरों को भी घोर पाप का भागी बनाएगा? मन में अट्टहास गूँजा – माँ की उपेक्षा और पीड़ा के कारक रहे हैं चाचा चंडी। मुझे मिटा देने में उन्हों ने और उनके फुटकरों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके नाश के लिए कोई कर्म पाप नहीं। और सग्गर पर तो एहसान ही कर रहा हूँ। उसका खानदान तो चल निकलेगा। मूर्खों ने सोचा ही नहीं कि मैं अपना वंश ही नहीं चला पा रहा। हा, हा, हा।
...डोमिन साधना! मनु को याद कर, कृष्ण को याद कर पापी!! ब्राह्मण शूद्रा संगम.... हाहाकार! हा, हा, हा। 
योगेश्वर! एक ही स्त्री के पाँच पाँच पति। इसे क्या कहेंगे? धर्म? हा, हा, हा।
खदेरन अभी तक शुद्ध है। आगे की देव जानें! अग्नि कभी अशुद्ध नहीं होती।

(ऐ)
नींबू का पौधा खिरकी के किनारे रोप दिया गया। खिरकी सीधे गाँव के मुख्य रास्ते पर खुलती थी और नींबू को अगर बढ़ना था तो रास्ते को सिकुड़ना था, खिरकी का प्रवेश भी बन्द होना था। सग्गरसिंघ के खानदान की राह में कई रुकावटें थीं लेकिन उस दिन सग्गर बहू ने पिया मिलन की राह में उजाले की लाज को अड़ने नहीं दिया। हीरा सोना गल कर एक हो गए।  
अगले दिन खदेरन पंडित ने देखा तो मुस्कुराये थे। नींबू - काँटेदार झाड़ियाँ, फल अफरात लेकिन बला की खटास! तुम बढ़ोगे और तुम्हारा खानदान भी बढ़ेगा। खदेरन है न! इसके लिए रास्ता, खिरकी सब बन्द होंगे।
जिनके यहाँ सृजन होना था उस रामसनेही ने नींबू देख सिर पीट लिया था और जिसे नाश कराना था वह खदेरन प्रसन्न था। जिसका नाश होना था, उस महोधिया वंश का एक लाल माधव फेंकरनी को पाने की जुगत में कई दिनों से चमटोली के चक्कर लगा रहा था।...

नींबू के पौधे के पास सिन्दूर से खदेरन अघोर चक्र खींचने लगे और बलबलहट मच गई। रामसनेही, सग्गर, पट्टीदार सब इकठ्ठे हो गए। विरोध के जाने कितने स्वर, जोग टोग – दिनवें में?
खदेरन ने हाथ का इशारा किया और सभी खामोश हो गए,
“...यह अभिचार समूचे वंश की वृद्धि, सुख और समृद्धि के लिए है। धन्य मनाइए बाबू रामसनेही का और सग्गर का जो वह काम कर रहे हैं जिसे करने का साहस किसी में नहीं। मैं तो बस पुरोहित हूँ।...”
खदेरन रुके और फिर स्वर में परिचित रुक्षता आ गई। कर्णकटु स्वर गूँज उठा,
“... अगर किसी को उज्र हो तो उखाड़ दे और यह चक्र मिटा दे। अनुष्ठान के विघ्न का परिणाम भी उसे ही भोगना होगा।“
सभी सन्न हो गए। मन ही मन रामसनेही को गरियाते लौट गए। भावी क्या हो सकता था, किसी ने सोचा ही नहीं।
नींबू के पौधे को इन सबसे क्या लेना देना था, हवा की पुचकार पर लहकता रहा और फेंकरनी तो बस... 
“पंडित हो, अन्हरिया में बड़ी डर लागेला लेकिन अमवसा के राति जरूर अइबे।”
...और अमावस्या आ ही गई। 
(जारी)

19 टिप्‍पणियां:

  1. मज़ा आ गया. बहुत दिनों के बाद बाऊ वापस आये हैं, उम्मीद हैं कि जल्दी नहीं जायेंगे

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  2. बाऊ कथा जैसा कि अब तक समझा है उस हिसाब से न सिर्फ हिंदी ब्लॉगजगत के लिये एक नया अध्याय है बल्कि साहित्य क्षेत्र की एक अनुपम कृति बनता जा रहा है।

    इसे बढ़ाते चलो मित्र।

    अन्हरीया बारी जिन्नाबाघ।

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  3. लागत बा आपौ ब्रिट्शाऐ काल क आदमी हैं -टाईम मशीन में बैठकर हम लोगों के बीच अ गए हैं -ई पोल खुल गयी है अब -वरना एकदम से आँखों देखी कैसे कोई बता सुना सकता -एम्मा तो एक दृश्य साकार है-कौनो फिल्म /सीरिअल वाले से जुगाड़ कर भाई -
    ई अमर कृति का दृश्यांकन भी जरुरी है महुआ चैनेल वालन से कौनो कान्टेक्ट साधिये बाऊ ! ई अभय तिवारी कौनो काम आय सकते हैं? कब भला ? यी पट कथा चालू रखिये -एक शूटिंग आपके गाँव और एक मेरे पक्का !

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  4. जय हो! एक रहस्यमयी दास्तान की वापसी का स्वागत है। इत्ती सी कडी? कब खत्म हो गयी पता ही न लगा। अगली कडी का बेसब्री से इंतज़ार है।

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  5. धन्य हो पंडित की अमावास !
    पंडितों की आपसी ... मरौहल भी देखने लायक है ! आगे का इंतिजार है !

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  6. @और अमावस्या आ ही गई।


    ...... एक भदेस पूर्णिमा की इन्तेज़ार करेंगे आचार्य.

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  7. .
    .
    .
    सुखद आश्चर्य,

    बाऊ कथा फिर से लौटी है ब्लॉग पर... पढ़ने पर ऐसा खो जाता है पाठक... कि कभी-कभी तो लगता है कि जो लिखा है वह सब घट रहा है अपनी आंखों के सामने... सारे पात्र सजीव हो जाते हैं...

    कैसे लिख लेते हैं ऐसा ? देव...


    ...

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  8. 'ये साले इंसान हर जगह बसते हैं.'
    बहुत दिन बाद अगली कड़ी आये तो दिमाग पर जोर लगता है पढ़ने में. :)
    मुझे लगता है कि बीच बीच में थोडा ह्यूमर चले तो बाऊ की प्रसिद्धि में इजाफा आएगा. कल ही ये ख़याल आ रहा था.

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  9. अरविन्दजी की टाइम मशीन वाली बात सही ही लग रही है ...
    चमत्कृत करते हैं आप अपनी लेखनी से ..एक -एक चरित्र जैसे सजीव हो उठा है ...!

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  10. इस कथा को पहली बार ही पढ़ रही हूँ , वाममार्गीय साधना के विवरण प्रत्यक्ष रूप में पढ़ कर(अभी तक इस साधना-मार्ग का सैद्धान्तिक पक्ष ही जाना था ) थे जैसे वह युग साकार होने लगा है .आगे क्या कहूँ..बस पढ़ती रहूँगी .

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  11. और नींबू को अगर बढ़ना था तो रास्ते को सिकुड़ना था,....

    अमावस के अन्धकार में इस साधना के कौन से और पक्ष प्रकाशित होते हैं..इसका इंतज़ार रहेगा!

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  12. ामावस को फिर कोई टोटका हुया होगा। आगे का इन्तजार।

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  13. ऐसी कथा, ऐसी भाषा और यह प्रस्‍तुति, आप तो चमत्‍कार ही कर रहे हैं.

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  14. लेकिन उस दिन सग्गर बहू ने पिया मिलन की राह में उजाले की लाज को अड़ने नहीं दिया। हीरा सोना गल कर एक हो गए ।



    :)

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  15. पहली बार पढ़ रही हूँ..बाउ-कथा..ज्यादा समझ तो नहीं आई...पर जितना पढ़ा...जीवंत विवरण लगा...भाषा तो नायाब है ही...

    पर आपसे एक अशुद्धि कैसे रह गयी? ..अब ये मौका तो हम छोड़ने वाले नहीं...:)
    पंडित कि दृष्टि पड़ जाय = पंडित की दृष्टि :)

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