फागुन गीतों में अभिधा, लक्षणा और व्यञ्जना तीनों शब्द शक्तियाँ मिलती हैं। हमारे गाँव के पास के एक गाँव चितामन चक (चक चिंतामणि) के रामबली मास्टर साहब फगुआ और नौटंकियों के बहाने ज्वलंत मुद्दे उठाने के लिये जाने जाते थे। बचपन में उन्हें सुना था। आज सोचा कि भोजपुरी में स्वयं प्रयास करूँ।
कुछ संकेत दे दे रहा हूँ। पहला अंतरा 'नरेगा' के भ्रष्टाचार और किसानी के चौपट होने से सम्बन्धित है। दूसरा अंतरा चौपट होती ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था से, तीसरा सत्तासीन प्रभु वर्ग द्वारा जनता को लूट कर विदेशी बैंकों में धन जमा करने से, चौथा जो कि बाकियों से दुगुना है, मनुष्य द्वारा प्रकृति के दोहन और आपदाओं (जापानी भूकम्प) से, पाँचवाँ आप समझ ही गये होंगे ;) और छ्ठा क्रिकेट में व्याप्त भ्रष्टाचार और जनता की आँखमूँदू दीवानगी से सम्बन्धित है।
'जोबना' उरूज के लिये प्रयुक्त हुआ है, 'उरोज' के लिये नहीं ;)। 'ताक न रे!' की टेक आँख खोलने की चेतावनी है। 'बकलोल' देसज शब्द है जिसका हिन्दी अर्थ देसभाषा और हिन्दी दोनों में निष्णात 'आचारज जी' ही बता पायेंगे :) मैं तो एक अदना सा विद्यार्थी हूँ। 'गोल' शब्द आकार के लिये नहीं बल्कि व्यवस्था की प्रकृति को दर्शाने के लिये प्रयुक्त हुआ है - चाहे जितना घूम लो, वापस पहुँचोगे उसी दर पर।
चित्र जहाँ से लिया है, वहाँ इसे पाकिस्तानी होली का चित्र बताया गया है। राम जाने क्या सच है? इतनी हिन्दू लड़कियाँ एक साथ इतनी उन्मुक्त होकर वहाँ होली खेल सकती हैं? पता नहीं। वहाँ इतनी बची भी हैं? फोटो प्यारा लगा, लगा दिया। आप आँख मूँद सकते हैं या बिना देखे जा सकते हैं। :)
कुछ ईश्वरभीरु धर्मप्राण पवित्र संस्कारी जन को मेरे ब्लॉग के चित्रों से कष्ट पहुँचता है, इसके लिये उनसे क्षमा। एक पुरुष का अस्तित्त्व और पूर्णता, स्त्री के जननी, भगिनी, पुत्री, सखी,अंकिनी और पत्नी आदि सभी रूपों से है। स्त्रियाँ इस मामले में क्या सोचती हैं, मुझे नहीं पता। पता लगाने के प्रयास कर पिटने की कोई इच्छा नहीं है :) .... शुचिता और अश्लीलता दोनों के अतिरेक मुझे अप्राकृतिक और त्याज्य लगते हैं... अपनी अपनी दृष्टि है...सब केहू काकी त केकरे ओर ताकीं?... बुरा न मानो होली है! .... सर र र र sssss
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जोबना हमार गोल गोल, अरे बकलोल, ताक न रे!
माया से हमरे लोग बउराइल
छूटल गरीबी अमीरी आइल
मुरगा छटके थरिया, रोटी बड़ी पनछोर
अरे बकलोल, ताक न रे! ~1~
इसकूले के खिचड़ी में मूस मलाई
पंडीजी खाईं हरिजन जी खाईं
लइका कुल खाई लइकी कुल खाई
लाँणे के दक्खिन पढ़इया, उत्तर में पोल
अरे बकलोल, ताक न रे! ~2~
तोहरे पसीना फसल इतराये
लूटें बहिन जी मैडम जी भाये
साहब मिलावें फोन, धन घन इटलिया शोर
अरे बकलोल, ताक न रे! ~3~
जोबना में हमरे बहुते गरमी
लुग्गा हटावें सइयाँ बेशरमी
धधकल करेजवा जालिम, उठल लहरिया जोर
अरे बकलोल, ताक न रे!
पोछिटा खुलल जो सइयाँ जी भगलें
गरमी के डर से दुख सब जगलें
नोचे कपार बड़ि जोर, आइल जबर भुँइडोल
अरे बकलोल, ताक न रे! ~4~
बड़की ईमानी बड़ी परधानी
पोसे पगड़िया सगर बैमानी
नाचें उघारे भड़ुआ, फाइल घुमे गोल गोल
अरे बकलोल, ताक न रे! ~5~
हमरे जोबन के एगारे दीवाने
करोड़ीदेई जनता बहुते सयाने
फर्जी घुमावें बल्ला, गेना चले चोर चोर
अरे बकलोल, ताक न रे ! ~6~