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गुरुवार, 20 जून 2019

नववर्ष के पूर्व दिवस शुभकामनायें

कल २१ जून को ग्रीष्म अयनांत है अर्थात शीत अयनांत के दिन से उत्तरायण होते सूर्य कल अपनी उत्तरी यात्रा के चरम पर होंगे। उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे बड़ी अवधि का दिन होगा। इस दिन भारत के मध्य से जाती कर्क रेखा पर सूर्य लम्बवत होंगे। प्रेक्षण आधारित ज्योतिष हेतु ये समय एवं स्थान बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। आश्चर्य नहीं कि पुरातन काल से ही उज्जैन, ऐरण आदि स्थानों पर प्रेक्षण मंदिर एवं निर्माण रहे जिन्हें मुसलमान आक्रमणकारियों ने ध्वस्त कर दिया।
कर्क रेखा का यह नाम ही क्यों है? जिस समय इस रेखा का नामकरण किया गया, उस समय आज के दिन सूर्य कर्क राशि में होते थे। आज पश्चाभिगन के कारण इस समय वृष राशि में होते हैं एवं अगले ही दिन मिथुन राशि में प्रवेश कर जाते हैं। मैं पश्चिमी फलित ज्योतिष वाले राशि की बात नहीं कर रहा, आकाश में प्रेक्षणीय तारकसमूहों की बात कर रहा हूँ जो तुलनात्मक रूप से स्थिर माने जा सकते हैं। अर्थात किसी निश्चित दिनांक को सूर्य की स्थिर राशियों के सापेक्ष स्थिति कालक्रम में परिवर्तित होती रहती है। इस प्रकार किसी निश्चित अयन सापेक्ष (सायण) दिनांक को सूर्य की विविध राशियों में 'गति' का आवर्ती काल आज कल २५७७२ वर्ष पाया गया है। किसी निश्चित दिन को सूर्य जिस स्थिति में होता है उसी पर पुन: पहुँचने में इतने वर्ष लगते हैं अर्थात एक राशि से दूसरी राशि तक जाने में २५७७२/१२ = २१४७ वर्ष लगते हैं। कर्क से मिथुन तक एक राशि का अंतर है अर्थात कर्क रेखा का यह नाम आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व रखा गया था।
भारत में प्रेक्षण ज्योतिष का इतिहास बहुत पुराना है तथा ऋग्वेद में आज से नौ हजार वर्ष पूर्व के प्रेक्षण भी मिलते हैं। ऋग्वेद का जो पाठ आज मिलता है, वह इतना प्राचीन होते हुये भी अपना प्राचीनतम रूप नहीं लिये हुये है। बीच के मण्डलों में उस प्राचीनता के संकेत मिलते हैं तथा अन्य मण्डलों में 'पूर्वे', 'पूर्व' आदि शब्द उस प्राचीनता के संकेतक हैं जिसके बारे में पुराण कहते हैं कि वेद लुप्त हुये, भगवान ने उद्धार किया। अस्तु।
एक बात स्पष्ट हो जानी चाहिये कि जहाँ भी कर्क रेखा नाम मिले, वह अंश दो हजार वर्ष से पुराना नहीं हो सकता। ऐसे तथ्यों को काल निर्धारण में आंतरिक प्रमाण कहा जाता है।
प्राचीनतम उपलब्ध ज्योतिष ग्रंथ वेदांग ज्योतिष के आज से लगभग तीन हजार तीन सौ वर्ष पुराने होने के आंतरिक प्रमाण हैं।
ग्रीष्म अयनांत से शीत अयनांत तक छ: महीने की अवधि होती है। शीत अयनांत वही है जिसे आज उत्तरायण संक्रांति से मनाया जाता है। किसी समय शीत अयनांत एवं मकर संक्रांति सम्पाती थे, आज नहीं हैं।
वेदांग से सैद्धांतिक ज्योतिष पर आते समय शीत अयनांत का वैदिक महाव्रत संक्रांति संक्रमित हो गया। शीत अयनांत जहाँ ज्योतिष विद्वानों हेतु नववर्ष होता, वहीं वसंत विषुव जब कि वसंत ऋतु में सम पर दिन रात समान अवधि के होते, ऋतु सुखद होती, जनसामान्य का नववर्ष होता। चंद्रआधारित मास नाम से समन्वय होने पर इसे वर्ष प्रतिपदा, गुड़ी पड़वा, युगादि नामों से मनाया जाता है।
शीत अयनांत से कल के ग्रीष्म अयनांत तक की अवधि गवां अयन कहलाती थी। अयन का अर्थ गति है, यथा रामायण राम की अयोध्या से लंका एवं लंका से पुन: अयोध्या तक की गति है। शीत अयनांत से छ: महीने की दूरतम झुकाव तक अर्थात पुनरावर्तन के बिंदु ग्रीष्म अयनान्त को विषुवंत कहा जाता था। विषुव एवं विषुवंत में अंतर है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या दो विषुव एवं दो अयनांत, इन चारो बिंदुओं से नववर्ष आरम्भ होते थे? उत्तर सकारात्मक है। ग्रीष्म अयनांत से ही वर्षा का आरम्भ ब्रह्मावर्त में होता। अत: एक वर्ष वर्षा से भी आरम्भ होता था। वर्ष नाम से वर्षा को मिला कर देखें। उस प्राचीनतम वर्ष को हम भुला चुके हैं। 
बच गया सितम्बर का विषुव, शरद विषुव। क्या उससे भी नववर्ष आरम्भ होता था? यहीं वे विश्वामित्र ध्यान में आते हैं जिन्होंने समांतर विश्व 'रच' दिया था। रचना को बनाने से न समझ एक नयी व्यवस्था के चलन से समझें। इस बात के उल्लेख मिलते हैं कि विश्वामित्र से श्रावण नक्षत्र से नववर्ष बताया। यदि इस पर शोध हो कि शरद विषुव कब श्रावण नक्षत्र पर था तो इस बात के काल पर किसी परिणाम पर पहुँचा जा सकता है। आजकल २३ सितम्बर के शरद विषुव पर सूर्य उत्तरा फाल्गुनी पर हैं। उत्तरा फाल्गुनी से श्रावण दस नक्षत्र की दूरी पर है अर्थात यह बात २५७७२/२७ x १० = ९५४५ वर्ष पुरानी बैठती है। सम्भव है कि उस समय अभिजित को ले कर २७ के स्थान पर २८ नक्षत्र रहे हों, ऐसी स्थिति में अभिजित की स्थिति महत्त्वपूर्ण होगी तथा यह समय १०१२४ वर्ष पूर्व तक हो सकता है, यह इस पर निर्भर है कि अभिजित को श्रावण से पूर्व मानते हैं या नहीं। इसकी संगति ऊपर ऋग्वेद के बारे में बताये गये से भी बैठती है। महाभारत में अभिजित के पतन की कथा है, उस पर पुन: कभी। यह सदैव ध्यान रखें कि पोषण सबसे महत्त्वपूर्ण है तथा कोई भी नववर्ष आरम्भ कृषि चक्र के किसी महत्त्वपूर्ण बिंदु से ही जुड़ा होगा। वर्षा का कृषि हेतु महत्त्व बताना होगा क्या?
नववर्ष के पूर्व दिवस पर शुभकामनायें। प्यासी धरा पर्जन्य को जोह रही है। वर्षा हेतु कल सामूहिक प्रार्थना करें। भूजल का दोहन नियंत्रित करें तथा उसकी पूर्ति हेतु उपाय करें।
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यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः ।
सप्त सत्त्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह ॥ 
सा न: पशून् विश्वरूपां दधातु दीर्घमायुः सविता कृणोतु ।
यस्यामन्नं व्रीहियवौ यत्रेमा: पञ्च कृष्टयः ।
भूम्यै पर्जन्यपत्न्यै नमोस्तु वर्षमेदसे ॥ 
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(अथर्ववेद पैप्पलाद शाखा, १७.४.११-१२) 

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पिट्ठा, खाजा(खाझा), तिलकुट और पुआ(होली पकवान)

संस्कृत के 'पिष्' धातु से बना है पिसाना जैसे गेहूँ पिसाना (कुछ लोग आटा भी पिसाते हैं!)। 'आटा पिसाने वालों' से ही प्रेरणा ले कर शब्द बना 'पिष्टपेषण'। पिसा हुआ कहलाता है पिष्ट और उसे भी पिसाने की बात हुई पिष्टपेषण माने व्यर्थ का श्रम या दुहराव भरा निरर्थक काम। तर्क वितर्क में व्यर्थ के विवाद के लिये भी इसका प्रयोग होता है। 
पिसे हुये आटे को पानी या दूध में गूँथ कर गोल या चपटे आकार के उबले या तले खाद्य को 'पिष्टक' कहा गया। चावल के आटे से बनाये जाने पर पिष्टिक भी कहा जाता था। पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार का एक व्यंजन पिट्ठा इसी पिष्टक का अपभ्रंश है।
momoभरवा पिट्ठा आजकल 'युवाप्रिय' चीनी व्यंजन मोमो या नेपाली ममचा के तुल्य है। संस्कृतिकरण आर्थिक और औद्योगिक उन्नति एवं प्रभुता से भी निर्धारित होता है, पिट्ठा या ममचा की मोमो की तुलना में स्थिति इसे रेखांकित करती है।
मथने की क्रिया 'खज' कहलाती थी और दही को मथ कर निकलता है मक्खन। उससे बना घी कहलाता था 'खजपं'। विशिष्ट विधि से बेले हुये पिट्ठा को घी में तलने और शर्करा पाग में डुबोने के बाद बनाई गयी मिठाई के लिये जातक कथाओं में संज्ञा मिलती है - 
'पिट्ठखज्जक'।
बताते हैं कि बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र को पिट्ठखज्जक इतना प्रिय था कि उन्हों ने उसे न खाने की शपथ ले ली क्यों कि khajaवह उन्हें लालची बनाता था :) यह कुछ अपने जैसा मामला है। जो मुझे अधिक प्रिय होता है, उससे आगे चल कर सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ ;)
यह 'पिट्ठखज्जक' ही आगे चल कर और घिस गया और लोग 'खाजा' या 'खाझा' कहने लगे। हजारो वर्षों पुरानी यह मिठाई आज भी मंगल कार्यों में देश के पूर्वी क्षेत्रों में बनती है। कन्या की बिदाई के समय लड्डू के साथ यह अनिवार्य है।
tilkutकूट पीस कर बनी तिल की मिठाई के लिये भी पिष्टक संज्ञा ही प्रयुक्त होती थी। आधे पिसे तिल से बनने वाली आज की मिठाई 'तिलकुट' इसी की परवर्ती संस्करण है। पाणिनी इसका नाम 'पलल' भी बताते हैं। यह भी उतना ही पुराना है।

ऋग्वेद में एक मिष्ठान्न चर्चित है 'अपूप'।  देवताओं के प्रिय इस व्यंजन की उन्हें आहुति दी जाती थी और लोकखाद्य तो था ही।
कई नव्यताओं के सर्जक विश्वामित्र पहली बार इसे भुने अन्न और सोम के साथ इन्द्र को अर्पित करते हुये गाते हैं (3.52.1):apoop_rv3_52_1ऋषि अपाला कहती हैं कि कन्यायें इन्द्र को अपूप अर्पित कर रोग मुक्त हो स्वस्थ और कांतिमयी यौवन सम्पन्ना होती हैं (8.91)।
ऋग्वेद में इन्द्र किसी एक अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। यह बहुत ही व्यापक और बहुअर्थी शब्द है। इन ऋचाओं में इन्द्र का अर्थ देह की जीवनशक्ति से है जिसे उत्तम आहार द्वारा पुष्ट करना होता है। यह भी ध्यातव्य है कि एक स्त्री ऋषि ने कन्याओं के हित इसे प्रतिपादित किया है। इन्द्र को आहुति का अर्थ यज्ञकुंड में अपूप झोंकना नहीं है बल्कि सोमादि औषधीय वनस्पतियों के साथ प्रार्थना के पश्चात उसे स्वयं वैसे ही पाना है जैसे आजकल 'तुमहिं निवेदित भोजन करई' भावना के साथ आस्तिक जन भोजन ग्रहण करते हैं: apoop_apala_rv8_91 इस अपूप का जातक कथाओं में भी खूब वर्णन है। आज का पुआ यही 'अपूप' है। इसे बनाने की विधि हजारो वर्षों से यथावत रही है। आटे को दूध में घोल कर घी में छान लिया जाता है और शर्करा पाग में डुबो दिया जाता है। इसमें एक गुण यह भी होता है कि कई दिनों तक बिना दुर्गन्धित हुये खाने लायक बना रहता है। इस गुण की ओर भी ऋग्वेद में संकेत है।
रबड़ी, खोया या मलाई के साथ खाये जाने के कारण बाद में पुआ के साथ 'माल' जुड़ गया होगा जिसमें सम्पन्नता यानि आज की बोली में रिच कैलोरी का भाव है – 'मालपुआ'।
यह होली का प्रमुख पकवान है और युवा गृहिणी का देहराग रूपक भी। यौवन से भरी पुरी देह लिये सहज सुन्दरी आकर्षणगुण सम्पन्ना मधुरा की कामपर्व के दिन इससे अच्छी रसोई क्या हो सकती है? रसिया के लिये चुनौती भी है - शक्ति है लाला तो...मेरे पुये खा कर दिखाओ!
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(सभी चित्र सम्बन्धित साइटों से साभार)