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गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

हिन्दी ब्लॉगरी की दशकोत्सव यात्रा - 5 [नौ गम्भीर]

पिछले से आगे...

पहले अश'आर बोलने का नुस्खा!
Anurag Sharma उवाच
_____________
मुंह में ज़र्दे वाला पान घोलकर बोलिए आ,फिर ज़रा (जरा नहीं वरना क़यामत हो जाएगी) रुकिए फिर बोलिए शआर, उसके बाद पान को बगल में थूक दीजिये, तब बनेगा खालिस अ'शआर
... और कहीं गलती से पिलूरल कर दिया तो शेर में तब्दील हो जाएगा ...
___________
फेसबुक पर यात्रा जारी है। ऊपर का नुस्खा भी वहीं से आयातित है ।
आज नौ गम्भीर ब्लॉग ब्लॉगर। इन नगीनों से हिन्दी ब्लॉगरी गौरवान्वित है।  
 

36 गढ़ की धरती ब्लॉगरी के लिये बहुत उपजाऊ है! राहुल सिंह के गम्भीर शोधपरक आलेख एकदम कसे बसे और नयी जानकारियों से भरे होते हैं। ब्लॉग जगत के जो कुछ जन अकादमिक गरिमा रखते हैं उनमें राहुल जी शीर्षस्थ हैं। इनके ब्लॉग का नाम है 'सिंहावलोकन' तो श्लेष बनता है, एक अर्थ में कुलनाम से संगति और दूसरे अर्थ में सिंह की प्रसिद्ध चाल जिसमें वह चलते हुये रह रह पीछे देख लेता है। अपने संस्मरणों को राहुल सिंह वैसे ही देख कर सबके सामने रख देते हैं।
इनके विषय हैं संस्कृति, लोक कला और पुरातत्त्व और सिंहावलोकन को यूँ बताते हैं 'आगे बढ़ते हुए पूर्व कृत पर वय वानप्रस्‍थ दृष्टि'। ललित गद्य भी बहुत अच्छा लिखते हैं।
देखिये एक पत्र का नमूना। पूरा ब्लॉग ही ऐसी जाने कितनी अछूती बातों पर लेखन से भरा हुआ है।
http://akaltara.blogspot.in/2013/01/blog-post.html

कविता, आलोचना, पुरातत्त्व, ज्ञान विज्ञान, पास पड़ोस सब पर समान अधिकार और उत्कृष्टता के साथ लिखने वाले शरद कोकास की ब्लॉगीय चुप्पी अब अखरने लगी है। आशा है कि पुकार सुनेंगे Sharad Kokas इनके ब्लॉग लिंक यहाँ मिल जायेंगे:
http://www.blogger.com/profile/09435360513561915427

उत्कृष्ट विश्व साहित्य अनुवाद, कवितायें, फिल्म, संगीत, फोटोग्राफी आदि विविध विषयों के कबाड़ी पाये जाते हैं अशोक पांडे के ब्लॉग कबाड़खाना पर। फुलाये फूलों, पसीजते प्रेम, उखड़ी उदासी, बुलाती प्रकृति के गद्य और काव्य यहाँ प्रचुर हैं। कभी कभी तो सन्दर्भ ब्लॉग सा लगता है। कोई आश्चर्य नहीं कि 910 जनों ने इससे स्वयं को जोड़ रखा है।
http://kabaadkhaana.blogspot.in/

दक्षिण के हिन्दी अध्येता हैं पा.ना. सुब्रमणियन। गाते हैं राग मल्हार - पुरातत्त्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर। http://mallar.wordpress.com इनके ब्लॉग पर ऐसे ऐसे स्थलों के रोचक और ज्ञानवर्द्धक विवरण मिलेंगे कि आप दंग रह जायेंगे - भारत में ऐसा भी है!
चुपचाप उत्कृष्ट रचनाकर्म में रत ये उन जनों में से एक हैं जिनके कारण हिन्दी ब्लॉगरी समृद्ध है। पढ़िये आदि शंकर की एक 'और' जन्मस्थली के बारे में:
आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली और भी है!

'हिन्दी वालों' से रूठे साहित्यकार उदय प्रकाश का हिन्दी ब्लॉग UDAY PRAKASH लगभग डेढ़ वर्ष से चुप है। निर्वासन जैसी बातें करते ये पाठकों के प्रेम पर निहाल होते हैं। फेसबुक पर खासे सक्रिय हैं। प्रतिष्ठित कथाकार हैं, कई भाषाओं में अनुवादित भी! ब्लॉग जगत वाली एक विशेष आत्ममुग्धता इन पर भी छायी दिख जाती है।
पढ़िये कि ये आदिवासी हैं:
http://uday-prakash.blogspot.in/2011/07/blog-post.html

कविता, साहित्य, ललित गद्य, राजनीति, वाद प्रतिवाद, सम सामयिक मुद्दों पर लिखते हैं और प्रसिद्ध व्यक्तियों की रचनाओं से भी परिचय करवाते हैं कम्युनिस्ट बनारसी ब्लॉगर रंगनाथ सिंह। इनका ब्लॉग है 'बना रहे बनारस'।
पढ़िये मुक्तिबोध पर हरिशंकर परसाई का संस्मरण:
http://www.banarahebanaras.com/2013/01/blog-post_6729.html

कम लिखने वाले सौरभ मालवीय अपने ब्लॉग सुमन सौरभ पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को केन्द्र में रख कर लिखते हैं।
http://sumansourabh.blogspot.in/

संगणक, मुक्त सॉफ्टवेयर, लिनुक्स, तकनीकी, ग़ैजेट, इंटरनेट हिन्दी, व्यंग्य, कहानियाँ  एवं मुफ्त डाउनलोड जैसे विशाल परास पर रचना संसार है रविशंकर श्रीवास्तव उर्फ रवि रतलामी का। इनका ब्लॉग है छींटे और बौछारें।
इनसे बस एक अनुरोध है कि अपने ब्लॉग का कलेवर बदलें। हम जैसे सौन्दर्य प्रेमी यहाँ पहुँच कर गड़बड़ा जाते हैं!  

अजय ब्रह्मात्मज अपने ब्लॉग चवन्नी चैप पर हिन्दी फिल्मों के बारे में हिन्दी में लिखते हैं और परिचय अंग्रेजी/रोमन में यूँ देते हैं:
i am a common audience of hindi cinema.critics and film industry call me CHAVANNI CHAP.i love this name.visit me to know my views. aur haan...yahan se aap apne pasandida sitaron aur filmon ki duniya mein seedhe ja sakte hain.to der kis baat ki..abhi click karen..aur bar-bar aayen. (और हाँ...यहाँ से आप अपने पसन्दीदा सितारों और फिल्मों की दुनिया में सीधे जा सकते हैं. तो देर किस बात की..अभी क्लिक करें..और बराबर आयें.)

(नोट : ब्लॉग क्रम का श्रेष्ठता कोटि से कोई सम्बन्ध नहीं है)

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

हिन्दी ब्लॉगरी की दशकोत्सव यात्रा - 4

अधिकांश हिन्दी ब्लॉगर अब फेसबुक पर हैं/भी हैं - 'हैं' उनके लिये जो ब्लॉग का लगभग त्याग ही कर चुके हैं; 'भी हैं' उनके लिये जो दोनों स्थानों पर अपने को स्थापित किये हुये हैं। कुछ तो ट्विटर पर भी सक्रिय हैं। आज के समय की आवश्यकता है इंटरनेट जिसे कतिपय जन अब नागरिक 'मौलिक अधिकारों' में सम्मिलित करने की माँग भी करने लगे हैं। जीवन की आपा धापी में पारम्परिक दृष्टि से देखें तो एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से दूर हुआ है किंतु एक दृष्टि से देखें तो इतना पास हुआ है जितना कभी नहीं था। भूगोल, लिंग, पंथ आदि की सीमायें ध्वस्त हो चली हैं और सोशल साइटों के द्वारा लोग बेतहाशा एक दूसरे से सम्वादित हो चले हैं। इस के नकारात्मक पहलू भी हैं लेकिन विधेयात्मक पक्ष यह है कि इसने उन्हें भी अभिव्यक्ति दे दी है जिन्हें व्यवस्था ने चुप कर रखा था। स्त्रियाँ इतनी मुखर पहले कभी नहीं हुईं! और वे आधी जनसंख्या हैं। यह एक बहुत बड़ा परिवर्तन है जिसके प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में दिखने लगे हैं।
फेसबुक या ट्विटर के 'हिट' होने के पहले सम्वाद की त्वरा की आवश्यकता की पूर्ति ब्लॉग प्लेटफार्म करता था। परिणामत: अधिक जीवन्त लगता था। इनके आने से त्वरित और लघु सम्वाद एवं उनके अन्य प्रकार ब्लॉग से हट गये। ऊबे और त्वरा की प्रचुरता के आदी जन ने ब्लॉग को बीते युग की बात घोषित कर दी एवं फेसबुक पर ‘फुल्ल' या 'प्रफुल्ल टाइमर' हो गये। हिन्दी ब्लॉगरी में ऐसा अधिक दिखा लेकिन अन्य भाषाओं से तुलना करें या आज भी स्वयं हिन्दी ब्लॉग जगत की सक्रियता और गुणवत्ता देखें तो 'बीते युग की बात' बकवाद ही लगती है। सोशल साइट और ब्लॉग एक साथ चल रहे हैं और चलते रहेंगे।
फेसबुक त्वरित है। अधिकतर विचार या अभिव्यक्ति आते हैं और बिना परिपाक हुये छप जाते हैं। विविधता और नयापन तो प्रचुर हैं लेकिन विकसित करने में समय न दिये जाने के कारण गुणवत्ता और गहराई की कमी ही दिखती है। सुतली बम कस के बाँधा न जाय तो धमाके और प्रभाव में कमी हो जाती है! यदि उन्हीं फेसबुकिया विचारों या अभिव्यक्तियों को ब्लॉग पर परिवर्धित और थोड़ा समय दे परिमार्जित कर डाला जाय तो क्या बात हो! फेसबुकिया ब्लॉगर या ब्लॉगर फेसबुकिये ध्यान दें! 
2013 में हिन्दी ब्लॉगरी के दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर मैंने सोचा कि क्यों न फेसबुक के उन जनों को हिन्दी ब्लॉगरी की झलकियाँ दिखाई जायँ जो इससे अनभिज्ञ हैं? फेसबुकिया शैली में ही बिना वर्तनी या व्याकरण पर अधिक ध्यान दिये मैंने ब्लॉग जगत का परिचय देना प्रारम्भ किया तो लोग रुचि लेने लगे। मित्र निवेदन और चैट सन्देश भी मिलने लगे। मैं सनातन कालयात्री आगे बढ़ता चला गया। शिवम मिश्र ने ब्लॉग बुलेटिन पर छापना चाहा तो मैंने कहा कि डाल दीजिये [जब सामने वाला पश्चात प्रभाव झेलने को तैयार है तो अपने को क्या?] उन्हों ने ये तीन लिंक छापे: 1, 2, 3 । वह चाहें तो इसे भी अपने यहाँ कॉपी पेस्ट कर सकते हैं, वहाँ रहने पर पहुँच बढ़ेगी ही।
फेसबुक पर ही इस घोषणा के बावजूद कि
हिन्दी ब्लॉगरी के दस वर्ष पूरे होने वाले हैं। अपनी पसन्द के लेख शेयर करता रहूँगा- दशकोत्सव की अपनी विधि! इसमें कोई 'राजनैतिक या गुटीय' मंतव्य न ढूँढ़े जायँ, प्लीज! ;)'परशुराम जी' ठाकुर विश्वामित्र और बाभन वशिष्ठ प्रकरण ले आये जिससे मामला तनि एक रोचक हुआ। कुछ जन बिदके भी लेकिन टिप्पणी का सार समझते हुये पब्लिक चुप ही रही! इस स्टेट्स पर नम्बरी बिलागर समीर लाल ने लिखा: jindaabaad!! किसका जिन्दाबाद? ये तो वही जानें।
आप सब अपने अपने ब्लॉगों पर कुछ नया करें। अपने बारे में कॉलर टाइट करते रहे, पल्लू लहराते रहे; अब दूजों की सोचें। छिपो को प्रगटो करें, प्रशंसा करें, उनके योगदान को चिह्नित करें।  फागुन का महीना आ ही रहा है, नमकीन या रंगीन भी हो सकते हैं।
कविता के मारे हैं तो गद्य का लठ्ठ भाँजें, चुपो रहे हैं तो अनुराग शर्मा, अर्चना चाव जी, पद्म सिंह, सलिल वर्मा, हिन्द युग्म, रेडियो प्लेबैक इंडिया आदि के सहजोग से मुखो हो पॉडकास्ट ट्राई करें। आवाज के मामले में निश्चिंत रहें, जब मेरी आवाज को भी पसन्द किया जा सकता है तो सबके पसन्दकर्ता उपलब्ध होंगे। अस्तु, आगे बढ़ते हैं।

फिल्मों पर लिखते हैं स्वघोषित आवारा मिहिर पंड्या अपने ब्लॉग http://mihirpandya.com पर। वह अपने इस ब्लॉग पर अनवरत रचना संसार सृजित कर रहे हैं। सेल्यूलाइड पर अमर कर दिए गए दृश्य, ध्वनियाँ, गीत, संगीत, भावनाएँ, प्रकाश, अन्धकार .... सबको बहुत बारीकी से विश्लेषित करते हैं और तह दर तह खोलते जाते हैं।
लाइट, कैमरा, ऐक्शन !!
ये तीन शब्द जो रचते हैं, उस पर बहुत कुछ रचा जा सकता है। ज़रा देखिए तो सही । बस समीक्षा नहीं, साहित्य भी मिलेगा। 
 
अंग्रेजी की मास्टरनी शेफाली पांडेय अपने को कुमाउँनी चेली कहती हैं। http://shefalipande.blogspot.in में ग़जब के व्यंग्य रचती हैं। स्वभाव से ही विरोधी हैं, पुरस्कारों की भी। ये बात और है कि 'जब मुझे पुरस्कार मिल जाता था तो मैं उन लोगों की बातों का पुरज़ोर विरोध करती थी जो पुरस्कारों की पारदर्शिता पर संदेह करते थे'  
राजस्थान की धरती से किशोर चौधरी के मित्र संजय व्यास ब्लॉग लिखते हैं http://sanjayvyasjod.blogspot.in/ अपने बारे में कहते हैं कि मुझे तैरना बिल्कुल नहीं आता लेकिन मरुस्थल की रेत पर लहरों सा आनन्द लेना हो तो इन्हें पढ़िये। राजस्थान का रंग है, गँवई प्रेक्षण हैं, खिलखिलाती लड़कियाँ भी हैं, कुछ कवितायें भी और कुछ अद्भुत गद्य भी। व्यक्तिगत कहूँ तो दोनों में मुझे ये अधिक पसन्द हैं।  
लखनवी विनय प्रजापति कम्प्यूटर तकनीकी के टिप्स देते हैं अपने ब्लॉग http://www.techprevue.com/ पर। अब अंग्रेजियाने लगे हैं। नज़र तखल्लुस (यही कहते हैं न?) से ग़जलियाते भी हैं और ब्लॉग की अलेक्सा वलेक्सा रैंकिंग कैसे दुरुस्त रहे इसका भी खयाल रखते हैं। कविताकोश पर भी पाये गये हैं। 
शिक्षा, विज्ञान, सामयिकी, कविता, ललित गद्य, स्त्री मुद्दे आदि में निष्णात हैं अल्पना वर्मा। व्योम के पार मध्य पूर्व से लिखा जाने वाला इनका ब्लॉग है http://alpana-verma.blogspot.in
वतन से दूर हैं लेकिन इसकी मिट्टी से खिंचते रहने की बात कहती हैं। इन्हों ने जावा स्क्रिप्ट एनेबल कर ब्लॉग से कॉपी पेस्ट बन्द कर रखा है :) गायन भी करती हैं।
उम्मतें http://ummaten.blogspot.in/ नाम से ब्लॉग रचते हैं अली सईद। सुन्दर ललित विचारपूर्ण गद्य लिखते हैं। लेफ्ट सेंटर चलते हुये कहते हैं जो जी चाहे ले लीजिये ! कोई कापी राईट नहीं !.
नहीं जी, इनका ट्रैफिक विभाग से सम्बन्ध नहीं, छत्तीसगढ़ शिक्षा में उच्च पद पर हैं।  
अलग तरह का साहित्य है ब्लॉगर नवीन रांगियाल के ब्लॉग औघट घाट http://aughatghat.blogspot.in पर। राजेश खन्ना के अवसान के बाद चुप हैं लेकिन ब्लॉग के पुराने लेख भी पठनीय हैं। उनके मित्र उनके बारे में लिखते हैं:क्‍या कहूं तुम्‍हें                                                                  
कि तुम जितने पुराने हो रहे हो
उतना ही ताजा बन पडे हो..
रंगों मे रहकर रंगहीन क्‍यों हो तुम
काफ्काई गद्य पढ़ना हो तो आई टी क्षेत्र से जुड़े युवा ब्लॉगर नीरज बसलियाल के ब्लॉग काँव काँव प्रकाशन लि. http://kaanv-kaanv.blogspot.in/ पर जाइये। कम सामग्री है लेकिन जो है वह कभी कभी गुरुदत्त के सिनेमाई बिम्बों सा भी लगता है।
दीपक बाबा अब कम बकबक http://deepakmystical.blogspot.in करते हैं लेकिन जो करते हैं अलगे अन्दाज में करते हैं। चचा जैसे जन इनके टाइप की ब्लॉगरी को ही ब्लॉगरी मानते हैं। बाकी तो साहित्त फाहित्त सभी रच लेते हैं! है कि नहीं?
रोटी की रोजी का टैम हो गया, फिर मिलते हैं।

बुधवार, 20 जून 2012

पूर्वग्रह, पूर्वाग्रह, अडीची और एक पुनर्प्रस्तुति

हिन्दी ब्लॉगरी के दशकोत्सव का प्रारम्भ तोरू दत्त की कविता Our Casuarina Tree के अविनाश चन्द्र द्वारा किये भावानुवाद से हो चुका है। शुभारम्भ के लिये वह बहुत ही उपयुक्त कड़ी थी।

इस दौरान पुनर्प्रस्तुतियाँ होंगी जिनमें मैं अपनी और पूर्व अनुमति ले कर दूसरे ब्लॉगों की उत्तम रचनाओं को प्रस्तुत करूँगा। चन्द्रहार शृंखला तो रहेगी ही। 

आज की कड़ी के लिये सामग्री ढूँढ़ते हुये एक शिल्पी से भेंट हुई। जिन चन्द जन को पूर्वग्रह (prejudices) और पूर्वाग्रह (pre-requests) के शाब्दिक और अर्थसम्बन्धित भेद पता हैं, उनमें वह भी एक हैं।  गत दिनों में हिन्दी ब्लॉग जगत में इस ब्लॉग पर हुये प्रियता आयोजन और उसके परिणामों को लेकर थोड़ी बहुत उथल पुथल हुईं है, उस सन्दर्भ में इन दो शब्दों के भिन्नार्थ बहुअर्थी हो जाते हैं। लिखे हुये अक्षर भी भिन्न भिन्न अर्थ देने लगते हैं। बेचारे ब्रह्म स्वरूप अक्षर!

जिस पोस्ट पर ये भेद बताये गये हैं, उससे और उस पर आई टिप्पणियों से पता चलता है कि प्राचीनकाल (हिन्दी ब्लॉगरी के लिखित और लिखे जा रहे, छपे, छपते और छपे जा रहे इतिहास में छ: वर्ष पुरानी बातें प्राचीन ही कहलायेंगी) में स्थिति कुछ अधिक ही जीवंत थी। :)

फुरसत, खुरपेंच, चेतना सम्पन्नता, रचनाशीलता, हम किसी से कम नहीं/क्यों/क्यों नहीं, हमसे पूछा क्या, लिया क्या, दिया क्या, टिप्पणी, लेता, देता, दाता, लाता, उद्गाता,  रोता, गाता, हँसता, चुटकी लेता, गरियाता, फरियाता आदि आदि में जिस श्रेणी की विदग्धता थी, वह आज दुर्लभ है। पारम्परिक रूप से हमारी प्राचीन परम्परा हर क्षेत्र में स्वर्णिम होने के लिये अभिशप्त रही है, अब भी है। दश वर्ष पश्चात जब कोई इसे पढ़ेगा तो गौरवशाली परम्परा के अवसान पर या ह्रासोन्मुख होते जाने पर उसी तरह से आहें अवश्य भरेगा जैसे अब मैं भर रहा हूँ। :(  :)  

उनकी जन्मतिथि से सम्बन्धित एक और पोस्ट पर जिस तरह की टिप्पणियाँ उतरी हैं, उनसे पता चलता है कि प्राचीन काल में भी नेट पर लिखने के अतिरिक्त पढ़ने और टिप्पणी करने की सीमायें यथावत थीं।

कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं, सम्पूर्ण के लिये वहीं जायें:

nalin thakar says: April 20, 2007 at 11:18 am

dear sir

please let me know “JANMA NAKSHTRA” of kumbh rashi born on 20/09/1983 at 09.47 pm.

Reply

rajinder says: June 19, 2008 at 5:52 pm

tell me about may life

Reply

Mohit Bagaria says:August 30, 2008 at 5:10 pm

mul nakshra hamesha bura nahi hota. yah jatak ko vishesh pratibhashali bhi bana sakta hai.

Reply

manish ku. pandey says:May 16, 2009 at 11:07 am

my date of birth 1-1-1990 at 2.40pm

Reply

आश्चर्य नहीं कि उथल पुथल के दौरान कैवल्य प्राप्त प्रज्ञावान जन मौन रहना ही ठीक समझते हैं :) अस्तु।

बहुत पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी - मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ?  यह प्रश्न अब भी मुझे लगभग प्रतिदिन मथता है। आज की कड़ी के लिये उस पोस्ट को ही पुनर्प्रस्तुत कर रहा हूँ। तब चिमामन्डा अडीची के भाषण का अंग्रेजी पाठ दिया था, बाद में जिसका हिन्दी अनुवाद निशांत मिश्र ने इस आलेख में प्रस्तुत किया था। यहाँ उसे पुन: प्रस्तुत करने की अनुमति देने के लिये उन्हें धन्यवाद देता हूँ, इसके लिये भी कि चर्चा में उन्हों ने स्याह अक्षरों को रोशनाई दिखाई। 

आज लिखने बैठा तो कुछ प्रश्न मन में आये - मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ? 

बाउ के बहाने पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक निहायत ही उपेक्षित ग्रामक्षेत्र की भूली बिसरी गाथाओं की कथामाला हो या सम्भावनाओं की समाप्ति के कई वर्षों के बाद बीते युग में भटकता प्रेम के तंतुओं की दुबारा बुनाई करता मनु हो, मैं क्यों लिखे जा रहा हूँ? 

मैं वर्तमान पर कहानियाँ क्यों नहीं लिख रहा?

अंतिम प्रश्न - जाने कितनों ने ऐसे विषयों पर लिख मारा होगा, तुम कौन सा नया कालजयी तीर चला रहे हो?  

उत्तर भी आये हैं - तुम इसलिए लिख रहे हो कि लिखे बिना रह ही नहीं सकते। कभी वर्तमान पर भी लिखने लगोगे। कहानियाँ समाप्त कहाँ होती हैं?

अंतिम प्रश्न का तो कमाल का उत्तर आया, ऊर्मि की वाणी "तुम फालतू बहुत सोचते हो।"

तय किया कि  स्वांत:सुखाय लिखते जाना है, No further questions and no फालतू सोच। 

यह सब TED पर नाइजीरियाई उपन्यासकार Chimamanda Adichie  के व्याख्यान The danger of a single story सुनते हुए लिख रहा हूँ। नाम रोमन में ही रहने दिया क्यों कि सही उच्चारण नहीं पता। मैं तो धोखे में पहले चिदानन्द और चिन्मयानन्द जैसा कुछ पढ़ने लगा, अभी चिमामंडा अदिची फाइनल किया है। सही जानने की जहमत कौन उठाये? अपने नाम के ग्रिजेश, गृजेश, गिर्जेश , गिरजेश, गिरीजेश, गीरिजेश आदि आदि रूपों से हर महीने एकाध बार साक्षात्कार हो ही जाता है। उन्हें ही ठीक कराने में नानी याद आ जाती है। अस्तु...  

सुनाते रहेंगे यूँ दास्तान-ए-मुहब्बत

तुम्हें फुरसत नहीं, कोई बात नहीं।

पुनश्च: कहानियों के पात्र लिखने वाले से हँसने बतियाने लगें तो उस स्थिति को क्या कहते हैं? बचपना? पागलपन? 

अभी अभी श्रीमती जी ने बताया है - रात नींद में आप हँसे जा रहे थे।

...मुझे कुछ याद ही नहीं!
...और इस व्याख्यान से कुछ : I started to write about things I recognized....
...when we reject the single story, when we realize that there is never a single story about any place, we regain a kind of paradise.
(...मैंने उनके बारे में लिखना शुरू किया, जिन्हें पहचानता था...
...जब हम 'अकेली कहानी' से इनकार करते हैं, जब हम यह अनुभव करते हैं कि किसी भी जगह के बारे में 'एक ही कहानी' नहीं होती, हम एक तरह के स्वर्ग को फिर से पाते हैं।)
______________________________________
मूल व्याख्यान:

मैं एक कहानीकार हूँ और मैं आपको कुछ निजी कहानियाँ सुनाना चाहती हूँ जिन्हें मैं “अकेली कहानी के खतरे” कहती हूँ.
 
मैं पूर्वी नाइजीरिया के एक यूनीवर्सिटी कैंपस में बड़ी हुई. मेरी माँ बताती हैं कि मैंने दो साल की होने पर पढ़ना शुरु कर दिया था, पर मुझे लगता है कि यह चार साल के आसपास हुआ होगा. इस तरह मैंने जल्दी पढ़ना शुरु कर दिया. मैं ब्रिटिश व अमेरिकी बाल साहित्य पढ़ती थी.
 
मैंने लिखना भी जल्दी शुरु कर दिया. जब मैं लगभग सात साल की थी तभी से मैं पेंसिल और क्रेयॉन से चित्रित करके कहानियाँ लिखने लगी जिन्हें मेरी बेचारी माँ को ही पढ़ना पड़ता था.
 
मैं वैसी ही कहानियाँ लिख रही थी जैसी मैं पढ़ती थी. मेरी कहानियों के सारे चरित्र गोरे थे और उनकी आंखें नीली होती थीं. वे बर्फ़ में खेलते थे और सेब खाते थे. (हँसी) वे मौसम के बारे में बहुत बातें करते थे - जैसे सूरज निकलने पर कितना अच्छा लगता है. (हँसी) हांलाकि, मैं जन्म से ही नाइजीरिया में ही रह रही थी और वहाँ से बाहर कभी नहीं गई थी. हमने बर्फ़ कभी नहीं देखी. हम आम खाते थे. और हम मौसम के बारे में कभी बात नहीं करते थे, क्योंकि उसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी.
 
मेरी कहानियों के चरित्र जिंजर बीयर बहुत पीते थे क्योंकि जो ब्रिटिश कहानियाँ मैं पढ़ती थी उनके चरित्र भी जिंजर बीयर पीते थे. मैं जानती ही नहीं थी कि जिंजर बीयर कैसी होती है. (हँसी) और आगे कई सालों तक मेरे भीतर जिंजर बीयर चखने की बहुत गहरी इच्छा बनी रही. पर वह दूसरी बात है.
 
मैं सोचती हूँ कि इस सब से यह दिखता है कि छोटे बच्चों के रूप में हम सभी किसी कहानी से कितनी आसानी से प्रभावित हो जाते हैं और कितने सुभेद्य हैं.
 
मैं वही पुस्तकें पढ़ती थी जिनके चरित्र विदेशी थे, इसलिए मैं आश्वस्त हो गई थी कि यह पुस्तकों का मूल स्वभाव ही है कि उनमें विदेशी तत्व हों. यही कारण है कि मैंने अपनी कहानियों में वे बातें कीं जिनसे मैं स्वयं तादात्म्य का अनुभव नहीं करती थी. लेकिन जब मैंने अफ़्रीकी पुस्तकें पढ़ना शुरु किया तो चीजें बदल गईं. उस दिनों बहुत कम पुस्तकें उपलब्ध थीं. और जो थीं वे भी विदेशी पुस्तकों जितनी आसानी से नहीं मिलतीं थीं. लेकिन चिनुआ अचेबे और कमारा लाए जैसे लेखकों को पढ़ने पर मेरे साहित्यबोध में सहसा बहुत बड़ा परिवर्तन आया. मुझे लगा कि मेरे जैसी चाकलेटी कांति वाली लड़कियाँ भी साहित्य का अंग हो सकती हैं जिनके घुंघराले बालों से पोनीटेल नहीं बनती.
 
मैंने उन चीजों के बारे में लिखना शुरु किया जिन्हें मैं पहचानती थी. वैसे, मुझे अमेरिकी और ब्रिटिश पुस्तकों से प्रेम था. उन्होंने मुझे कल्पनाशील बनाया. मेरे लिए नई दुनिया का दरवाज़ा खोला. लेकिन इसका अनचाहा परिणाम यह हुआ कि मुझे इस बात का ज्ञान नहीं हो सका कि मेरे जैसे लोगों का भी साहित्य में कोई स्थान है. मुझे अफ़्रीकी लेखकों की जानकारी मिलने का परिणाम यह हुआ कि इसने मेरी कहानी को अकेलेपन से बचा लिया, जैसा पहले हो रहा था.
 
मेरा जन्म एक पारंपरिक मध्यवर्गीय नाइजीरियाई परिवार में हुआ था. मेरे पिता प्रोफ़ेसर थे. मेरी माँ प्रशासक के पद पर थीं. और इस तरह, जैसा वहां चलन था, हमारे घर में नौकर-चाकर थे जो पास के गांव-देहात से आते थे. जब मैं आठ साल की हुई तब हमारे घर में काम करने के लिए एक लड़का आया. उसका नाम फ़ीडे था. मेरी मां ने उसके बारे में यह बताया कि उसका परिवार बहुत गरीब था. माँ ने उसके घर जिमीकंद, चावल, और हम लोगों के पुराने कपड़े भेजे. और जब कभी मैं अपना खाना छोड़ देती, तो मेरी मां कहतीं, “खाना मत छोड़ो, तुम जानती हो, फ़ीडे जैसे लोगों के पास खाने को भी नहीं है”. तब मुझे फ़ीडे के परिवार पर बहुत दया आती थी. फिर एक शनिवार को मैं उसके गाँव तक गई. उसकी मां ने मुझे खूबसूरत बुनाईवाली बास्केट दिखाई, जो उसके भाई ने ताड़ के रंगे हुए पत्तों से बनाई थी. वह देखकर मैं हैरान रह गई. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि उसके परिवार में वास्तव में कोई कुछ बना सकता था. मैं तब तक सिर्फ यही सुनती आई थी कि वे बहुत गरीब थे. और इस तरह मैं उनके बारे में कुछ और नहीं जान सकी थी इसके सिवाय कि वे बहुत गरीब थे. उनकी गरीबी मेरे लिए उनकी एकमात्र कहानी थी.
 
सालों बाद मैंने इस बारे में सोचा जब मैं नाइजीरिया छोड़कर यूनाइटेड स्टेट्स के विश्वविद्यालय में पढ़ने गई. उस समय मैं 19 साल की थी. मेरी अमेरिकी रूम-मेट मुझसे मिलकर बहुत अचंभित हुई. उसने मुझसे पूछा कि मैंने इतनी अच्छी अंग्रेजी कहाँ सीखी. मुझसे यह सुनकर वह चकरा गई कि अंग्रेजी नाइजीरिया की राजकीय भाषा है. उसने मुझसे कहा कि वह “मेरा आदिवासी संगीत” सुनना चाहती है, और यह देखकर उसे और भी निराशा हुई जब मैंने उसे मेरे मराइया कैरी के कैसेट दिखाए. (हँसी) उसे यह लगता था कि मुझे स्टोव इस्तेमाल करना नहीं आता होगा. उससे मिलकर मुझे लगा कि हमारी मुलाकात होने के पहले ही उसे मुझपर तरस आने लगा था. एक अफ़्रीकी होने के नाते मेरी स्थिति ने उसमें मेरे प्रति दयालुता, सदाशयता, और करूणा जगा दी थी.
 
मेरी रूम-मेट के पास अफ़्रीका की एक ही कहानी थी - घोर दुर्गति की कहानी. इस अकेली कहानी में कोई संभावना नहीं थी कि उसमें अफ़्रीकावासी कुछ मायनों में उस जैसे लगते. उसमें दयाभाव से इतर भावना की गुंजाइश नहीं थी. सभी मनुष्यों के समान होने के विचार की संभावना उसमें नहीं थी. मैं ज़ोर देकर यह कहूंगी कि अमेरिका जाने के पहले मैं खुद को एक अफ़्रीकी के रूप में गहराई से नहीं जानती थी. लेकिन अमेरिका में जब अफ़्रीका का ज़िक्र चलता तो सारी आँखें मुझपर टिक जातीं थीं. इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं नामीबिया जैसी जगहों के बारे में कुछ नहीं जानती थी. लेकिन मैं अपनी इस नई पहचान से बहुत अच्छे से जुड़ गई. अब मैं स्वयं को कई अर्थों में अफ़्रीकी ही मानती हूँ. हालाँकि मुझे तब बहुत खीझ होती है जब अफ़्रीका को एक बड़े से देश के रूप में देखा जाता है. इसका ताजा उदाहरण ये है कि मेरी एक यात्रा में लागोस से दो दिन पहलेवाली उड़ान में वर्जिन एयरवेज़ के विमान में उन्होंने “भारत, अफ़्रीका, व अन्य देशों में” जारी परोपकारी कार्यों की जानकारी दी. (हँसी)
 
एक अफ़्रीकी के रूप में अमेरिका में कुछ साल बिताने के बाद मैं अपने प्रति मेरी रूम-मेट की प्रतिक्रियाओं को समझने लगी. यदि मैं नाइजीरिया में पलती-बढ़ती नहीं तो मेरे मन में भी अफ़्रीका की पॉपुलर छवियां ही रहतीं. मुझे भी यही लगता कि अफ़्रीका एक स्थान है, जहां रमणीय परिदृश्य, सुंदर जानवर, और अबूझ लोग रहते हैं जो फ़िजूल में लड़ते रहते हैं, गरीबी और एड्स से मरते हैं, जो अपने अधिकारों के लिए कुछ नहीं कर पाते, और इस इंतजार में रहते हैं कि कोई दयालु विदेशी गोरे आकर उन्हें बचाएंगे. मैं अफ़्रीका को उसी प्रकार से देखती जिस तरह से मैंने एक बच्चे की आँखों से फ़ीडे के परिवार को देखा था.
 
मेरे विचार से, अफ़्रीका की बेचारगी की यह कहानी पश्चिमी साहित्य से आती है. मेरे पास यहां एक उद्धरण है जिसमें 1561 मे पश्चिमी अफ़्रीका आनेवाले लंदन के व्यापारी जॉन लॉक ने अपनी यात्रा का रोचक विवरण लिखा है. अश्वेत अफ़्रीकावासियों के लिए वह लिखता है “जंगली जानवर जो घरों में नहीं रहते”, आगे वह लिखता है, “यहां ऐसे लोग भी हैं जिनके सिर नहीं हैं, और जिनके मुँह और आँखें उनकी छाती में हैं”. इसे पढ़ते समय मैं हर बार हँस पड़ती हूँ. जॉन लॉक की कल्पनाशक्ति की तो दाद देनी होगी. लेकिन उसकी कहानी में खास बात यह है कि यह पश्चिम में अफ़्रीका की कहानियों की परंपरा के प्रारंभ का निरूपण करती है. यह अधो-सहारा अफ़्रीका की नकारात्मक बातों से भरी, असमानताओं की, अँधेरेपन की, और इसके निवासियों को बेजोड़ कवि रुडयार्ड किपलिंग के शब्दों में “आधे दैत्य, आधे शिशु” कहने की परंपरा है.
 
और तब मुझे यह समझ में आने लगा कि मेरी अमेरिकी रूम-मेट ने उसके पूरे जीवनकाल में ऐसी ही अकेली कहानी के विविध रूप देखे-सुने होंगे, जिस प्रकार मेरे एक प्रोफेसर ने एक बार मुझसे कहा कि मेरे उपन्यास “प्रामाणिक रूप से अफ़्रीकी” नहीं लगते थे. देखिए, मैं यह स्वीकार करती हूँ कि मेरे उपन्यास में कुछ गड़बड़ियाँ तो रही होंगी, और कुछ स्थानों पर मैंने गलतियाँ भी की थीं. लेकिन मैं यह नहीं मान सकती कि मैं अफ़्रीकी प्रामाणिकता को पाने में करने में असफल रही थी. असल में मैं यह जानती ही नहीं थी कि अफ़्रीकी प्रामाणिकता क्या होती है. मेरे प्रोफेसर ने कहा कि मेरे चरित्र बहुत हद तक उनकी ही तरह पढ़े-लिखे और मिडिल-क्लास से संबंधित थे. मेरे चरित्र कार चलाते थे. वे भूखे नहीं मर रहे थे. इसलिए उन्हें प्रमाणिक तौर पर अफ़्रीकी नहीं कहा जा सकता था.
 
लेकिन मैं यह भी स्वीकार करती हूँ कि मैं भी ऐसी ही एक अकेली कहानी रचने की दोषी हूँ. कुछ सालों पहले मैं अमेरिका से मैक्सिको की यात्रा पर गई थी. उन दिनों अमेरिका में राजनीतिक वातावरण तनावपूर्ण था और आप्रवासन के मुद्दे पर बहस छिड़ी थी. और जैसा कि अमेरिका में अक्सर होता है, आप्रवासन के विषय को मैक्सिकोवासियों से जोड़ दिया गया. वहाँ मैक्सिकोवासियों के बारे में बहुतेरी कहानियाँ कही जा रही थीं जैसे कि ये लोग स्वास्थ्य सुविधाओं को चौपट कर रहे थे, सीमाओं पर सेंध लगा रहे थे, उनकी गिरफ़्तारियां हो रहीं थी, ऐसी ही कई बातें. मुझे गुआडालाहारा में पहले दिन बाहर पैदल घूमना याद है जब मैंने लोगों को काम पर जाते, बाजार में टॉर्टिला बनाते, सिगरेट पीते, और हँसते हुए देखा. यह देखकर मुझे होनेवाला आश्चर्य मुझे याद आ रहा है. और फिर मैंने बहुत शर्मिंदगी भी महसूस की. मुझे लगने लगा कि मैं भी मीडियावालों द्वारा मैक्सिकोवासियों की गढ़ी गई छवि को सच मान बैठी थी. मैं भी मन-ही-मन उन्हें अधम आप्रवासी मान चुकी थी. मैंने अपने भीतर मैक्सिकोवासियों की एक कहानी घर कर ली थी और ऐसा करने पर मैं बहुत लज्जित अनुभव कर रही थी.
 
तो ऐसे ही अकेली कहानियाँ बनती रहतीं हैं जो व्यक्तियों को वस्तु की तरह दिखाती हैं - केवल एक वस्तु की तरह बार-बार दिखाती हैं, और वे अंततः वही बन जाते हैं.
 
शक्ति की चर्चा किए बिना अकेली कहानी की बात करना नामुमकिन है. जब भी मैं शक्ति के स्वरूप के बारे में सोचती हूं, तब पश्चिमी अफ़्रीकी भाषा इग्बो में एक शब्द “नकाली” मुझे ध्यान में आता है. यह संज्ञा शब्द है जिसका कुछ-कुछ अनुवाद है “दूसरों से अधिक बड़ा या महत्वपूर्ण होना”. हमारे आर्थिक व राजनीतिक जगत के सदृश कहानियों की व्याख्या भी नकाली के सिद्धांत द्वारा की जाती है. वे कैसे कही जाती हैं? उन्हें कौन कहता है? और जब वे कही जातीं हैं तो कितनी कही जाती हैं? इन सबका निर्धारण शक्ति द्वारा ही होता है. शक्ति संपन्न होने का अधिकार केवल किसी व्यक्ति की कहानी कहने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इसे उस व्यक्ति की निर्णायक कहानी भी बना सकता है. फ़िलिस्तीनी कवि मौरीद बरघूती ने लिखा है कि यदि तुम किन्हीं व्यक्तियों का स्वत्व हरना चाहते हो तो इसका सबसे आसान तरीका है कि तुम उनकी कहानी कहो, और इसे “दुसरे स्थान में” से शुरु करो. अमेरिकी मूल निवासियों के तीरों की बात से कहानी शुरु करो, ब्रिटिश दस्तों के आगमन से नहीं, और तुम्हारे पास एक बिल्कुल अलग कहानी होगी. कहानी की शुरुआत करो अफ़्रीकी राज्यों की विफलताओं से, और अफ़्रीकी राज्यों के औपनिवेशीकरण को दरकिनार कर दो और तुम्हारे पास एक बिल्कुल अलग कहानी होगी.
 
मैंने हाल में ही एक विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया जहां एक विद्यार्थी ने मुझसे कहा कि यह बहुत शर्म की बात है कि नाइजीरियाई पुरुष स्त्रियों का उसी प्रकार शारीरिक शोषण करते हैं जिस तरह मेरे एक उपन्यास में एक पिता का चित्रण किया गया है. मैंने उसे कहा कि हाल में ही मैंने एक उपन्यास पढ़ा है जिसका नाम है “अमेरिकन साइको” — (हँसी) — और यह बड़े शर्म की बात है कि युवा अमेरिकी सीरियल किलर होते हैं. (हँसी) (तालियाँ) देखिए, मैंने यह थोड़ा चिढ़कर कहा था. (हँसी) मैं इस तरह की बात नहीं सोच सकती थी कि किसी अमेरिकी उपन्यास में एक क्रमिक हत्यारे का पात्र होने के नाते वह अकेला आदमी पूरे अमेरिकियों का कुछ-कुछ प्रतिनिधित्व करने लगेगा.
 
परंतु ऐसा इसलिए नहीं है कि मैं उस विद्यार्थी से बेहतर व्यक्ति हूं, बल्कि इसलिए कि मैं अमेरिका की सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति की बहुत सारी कहानियाँ सुन चुकी थी. मैं टाइलर, अपडाइक, स्टाइनबैक, और गैट्सकिल को पढ़ चुकी थी. मेरे पास अमेरिका की कोई एकमात्र कहानी नहीं थी. बरसों पहले जब मैंने यह सुना कि लोग यह मानते थे कि सफल लेखक वे होते हैं जिनका बचपन बहुत बुरा होता है, तो मैं सोचने लगी कि मैं किस तरह उन बुरी बातों की खोज करूं जो मेरे माता-पिता ने मेरे साथ की हों. (हँसी) लेकिन सच यह है कि मेरा बचपन बहुत सुखद था. हमारा परिवार बहुत प्रेम और आनंद के साथ एकजुट रहता था. लेकिन मेरे पितामह आदि भी थे जिनकी मृत्यु शरणार्थी कैंप में हुई थी. मेरा कज़िन पोल मर गया क्योंकि उसे पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिलीं. मेरी बहुत करीबी दोस्त ओकोलोमा विमान दुर्घटना में जलकर मर गई क्योंकि हमारी अग्निशमन गाड़ियों में पानी नहीं था. मैं दमनकारी सैनिक शासन के बीच बड़ी हुई जिसने शिक्षा को चौपट कर दिया. कभी-कभी मेरे माता-पिता को वेतन भी नहीं मिलता था. फिर मैंने बचपन में नाश्ते की टेबल से जैम की बोतल गायब होते देखी, उसके बाद मारजारिन भी गायब हो गया. फिर ब्रैड बहुत महँगी हो गई, और दूध राशन से मिलने लगा. और इससे भी अधिक, किसी मामूली बात की तरह स्वीकार कर लिए गए राजनीतिक भय ने हमारे जीवन को घेर लिया.
 
इन सभी कहानियों ने ही मुझे वह बनाया है जो मैं आज हूँ. लेकिन इन नकारात्मक कहानियों को ही महत्व देना मेरे अनुभवों को कम करके आंकना होगा और इससे वे दूसरी कहानियाँ अनदेखी रह जाएंगीं जिन्होंने मुझे आकार दिया है.
 
एक अकेली कहानी रूढ़ियों का निर्माण करती है. और रूढ़ियों के साथ समस्या यह नहीं है कि वे सत्य नहीं होतीं, बल्कि यह है कि वे अपूर्ण होतीं हैं. वे एक अकेली कहानी को एकमात्र कहानी बना देतीं हैं. बेशक, अफ़्रीका दुःख और दुर्गति की महागाथा है. कुछ बातें जैसे कांगो के वीभत्स बलात्कार अत्यंत घृणास्पद हैं. और कुछ अवसादपूर्ण हैं, जैसे नाइजीरिया में एक भर्ती के लिए 5,000 लोग आवेदन करते हैं. लेकिन वहाँ कुछ ऐसी कहानियां भी हैं जो दर्दनाक नहीं हैं, और यह कहना ज़रूरी है कि वे इतनी महत्वपूर्ण ज़रूर हैं कि उनकी भी चर्चा हो.
 
मैं हमेशा से यह मानती आई हूँ कि किसी परिवेश या व्यक्ति से भली-भांति जुड़े बिना उस स्थान या व्यक्ति की सभी कहानियों से संबद्ध हो पाना संभव नहीं है. एक अकेली कहानी की परिणति यह होती है कि यह मनुष्य को उसकी गरिमा से वंचित कर देती है. यह हमारी समतुल्य मानवता की पहचान को कठिन बना देती है. यह दर्शाने की बजाय कि हम कितने एक-जैसे हैं, यह ये दिखाती है कि हमारे बीच कितने भेद हैं. तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है यदि मैक्सिको जाने से पहले मैंने आप्रवासन पर हुए वाद-विवादों में सं. रा. अमेरिका और मैक्सिको दोनों ही पक्षों का साथ दिया? क्या हुआ जो मेरी माँ ने मुझे बताया कि फ़ीडे का परिवार बहुत गरीब और मेहनती है? और क्या होता यदि हमारे पास अफ़्रीकी टीवी नेटवर्क होता जो विविध अफ़्रीकी कहानियों को दुनिया भर में प्रसारित करता? यह वही होता जिसे नाइजीरियाई लेखक चिनुआ अचेबे ने “कहानियों का संतुलन” कहा है.
 
क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को नाइजीरियाई प्रकाशक मुक्ता बकारे के बारे में पता होता? इस असाधारण आदमी ने बैंक की नौकरी छोड़कर अपने सपनों की राह पर चलकर प्रकाशनगृह चालू किया. लेकिन आम धारणा तो यह थी कि नाइजीरियाइ लोग साहित्य नहीं पढ़ते. उसने इसका विरोध किया. उसे लगा कि जो लोग पढ़ना जानते थे वे ज़रूर पढ़ेंगे यदि हम खरीद पाने लायक मूल्य में उन्हें साहित्य उपलब्ध कराएँ. उसने मेरा पहला उपन्यास छापा और इसके कुछ समय भीतर ही मैं लागोस में एक टीवी स्टेशन में साक्षात्कार देने गई. वहां मैसेंजर का काम करनेवाली एक महिला मेरे पास आई और मुझसे बोली, “मुझे आपका उपन्यास अच्छा लगा, पर मुझे उसका अंत पसंद नहीं आया. अब आप उसका सिक्वेल ज़रूर लिखें, और उसमें ऐसा होना चाहिए कि…”. (हँसी) वह मुझे बताने लगी कि मुझे सिक्वेल में क्या लिखना चाहिए. उसकी बातों ने मुझे न सिर्फ़ मोहित किया बल्कि भीतर तक छू लिया. वह एक आम औरत थी, नाइजीरियाई जनता का एक अंशमात्र जिसे हम अपने पाठकवर्ग में नहीं गिनते थे. उसने न सिर्फ़ वह पुस्तक पढ़ी, बल्कि उसे वह उसकी पुस्तक जैसी लगी. मुझे यह बताना उसे तर्कसंगत लगा कि मुझे पुस्तक का सिक्वेल लिखना चाहिए.
 
क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को लागोस में एक टीवी कार्यक्रम की होस्ट मेरी निडर मित्र फूमी ओंडा के बारे में पता होता? वह उन कहानियों को सामने लाना चाहती है जिन्हें हम भूलना ही ठीक समझते हैं. क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को हृदय के उस ऑपरेशन के बारे में पता होता जिसे लागोस के अस्पताल में पिछले सप्ताह अंजाम दिया गया? क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को समकालीन नाइजीरियन संगीत के बारे में पता होता जिसमें प्रतिभाशाली गायक अंग्रेजी और पिजिन में, इग्बो में, योरूबा में, और इजो में, जे-ज़ी से लेकर फ़ेला, और बॉब मार्ली से लेकर अपने पितामहों के सुमेलित प्रभाव में गाते हैं. क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को उन महिला वकीलों के बारे में पता होता जो हाल में ही नाइजीरिया की अदालत में एक हास्यास्पद कानून को चुनौती देने गईं जिसके अनुसार किसी स्त्री को अपने पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए अपने पति की स्वीकृति लेना आवश्यक कर दिया गया था. क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को नॉलीवुड के बारे में पता होता, जहां विशाल तकनीकी कठिनाइयों के बाद भी मौलिकता से तर लोग फ़िल्म बना रहे हैं. ये पॉपुलर फ़िल्में इस बात का बेहतरीन उदाहरण हैं कि नाइजीरियाइ लोग भी हावी करनेवाली चीजें बना सकते हैं. क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को मेरी चोटी बनानेवाली प्यारी व महत्वाकांक्षी लड़की के बारे में पता होता जिसने हाल में ही बालों में लगाई जानेवाली चीजों का व्यापार शुरु किया है. क्या होता यदि मेरी रूम-मेट को उन लाखों नाइजीरियाइ लोगों के बारे में पता होता जो कामधंधा शुरु करते हैं और कभी-कभी असफल हो जाते हैं, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षाओं का पोषण करते रहते हैं?
 
हर बार जब मैं घर जाती हूँ तो मेरा सामना होता है नाइजीरियाई लोगों की आम शिकायतों से, जैसे हमारा बुनियादी ढाँचा खराब है, हमारी सरकार नाकारा है. लेकिन मैं उनके अविश्वसनीय लचीलेपन को भी देखती हूं. वे शासन व्यवस्था के साए में नहीं बल्कि उसके अभाव में पनपते हैं.
 
मैं हर गर्मियों में लागोस में लेखन कार्यशाला में पढ़ाती हूँ. और यह देखकर हैरत होती है कि कितने लोग आवेदन करते हैं, कितने सारे लोग लिखने के लिए व्यग्र हैं, अपनी कहानियां कहना चाहते हैं. मैंने अपने नाइजीरियाइ प्रकाशक के साथ हाल में ही एक नॉन-प्रॉफ़िट ट्रस्ट बनाया है जिसका नाम फ़ाराफ़िना ट्रस्ट है. हमारा बड़ा सपना यह है कि हम नए पुस्तकालय बनाएँ, पुराने पुस्तकालयों का नवीनीकरण करें, उन शासकीय विद्यालयों को पुस्तकें उपलब्ध कराएँ जिनके पुस्तकालयों में कुछ भी नहीं है, और पठन-पाठन से संबंधित अनेकानेक कार्यशालाओं का आयोजन करें, ताकि अपनी कहानियां कहना चाहनेवाले व्यक्तियों को अवसर मिलें.
 
कहानियाँ महत्वपूर्ण हैं. असंख्य कहानियों का महत्व है. कहानियों का उपयोग वंचित करने व मलिन करने के लिए होता आया है. लेकिन कहानियाँ सामर्थ्यवान बनातीं हैं और मानवीकरण करतीं हैं. कहानियाँ लोगों की गरिमा को भंग कर सकतीं हैं. पर वे उनकी खंडित गरिमा का उपचार भी कर सकतीं हैं.
 
अमेरिकी लेखिका ऐलिस वॉकर ने उनके दक्षिणी संबंधियों के बारे में लिखा है जो उत्तर में जाकर बस गए थे. उन्होंने अपने संबंधियों को एक पुस्तक सुझाई जिसमें पीछे छूट गए उनके दक्षिणी जीवन का वर्णन था. “वे मेरे इर्द-गिर्द बैठे, खुद उस पुस्तक को पढ़ते हुए, और मुझसे उस पुस्तक को सुनते समय, लगा जैसे स्वर्ग की पुनःप्राप्ति हो गई”.
 
मैं इस विचार के साथ समापन करना चाहूँगी - जब हम किसी अकेली कहानी को ठुकरा देते हैं, और जब हम यह जान जाते हैं कि किसी स्थानविशेष की कभी कोई अकेली कहानी नही होती, तो हम भी अपने स्वर्ग की पुनःप्राप्ति कर लेते हैं.
 
धन्यवाद.
 
(तालियाँ)
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आप ने इतनी लम्बी हाँक को सुना, इसके लिये धन्यवाद। इसमें मनन करने लायक बहुत सी बातें हैं, कभी कभी कर लेना अच्छा होता है :)

इतना तो स्पष्ट ही होगया होगा कि ब्लॉग जगत भी एक स्थान विशेष है और इसकी कोई 'अकेली कहानी' नहीं हो सकती।

इसलिये दशकपूर्ति का उत्सव आप भी अपनी विधि से मनाइये, दूसरे मनायें तो कोहनाइये मत, उत्साह बढ़ाइये। नहीं बढ़ायेंगे तो भी मनाने वाले मनायेंगे ही।

वैसे भी इस ब्लॉग की तो यह खासियत है कि उत्सव अकेले भी मना लेता है। होली के अवसर तो याद हैं न? :)  

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अगली पोस्ट कोणार्क यात्रा पर। 

   

रविवार, 10 जून 2012

सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार - 2 : चन्द्रहार के मोती

पिछले भाग से आगे ...
प्रथम तीन स्थानों का निर्धारण भूली सी विद्या गणित के जटिल अनुप्रयोग को ललचाता रहा। सरलता हेतु बस साधारण अंकगणित और सरल सांख्यिकी के कुछ खुरपेंचों तक ही सीमित रहा। इससे पहले के लेख पर आई टिप्पणियों से लगता है कि निर्णय ठीक ही लिया clip_image002[4]
तीसरे स्थान पर जो तीन ब्लॉग आ जमे उनके इकठ्ठे होने का संयोग इतना चकित कर गया कि मुझे एक्सेल शीट को दुबारा चेक करना पड़ना। चकित इसलिये कि अपनी पसन्द यूँ एक जगह इकठ्ठी होते देखना...
... लिखते हुये राहुल सिंह जी की की यह टिप्पणी ध्यान में आई है:

बढि़या चयन. आप सीधे चुनें तो परिणाम और भी बेहतर हों.
मुझे मेहनत करने की क्या आवश्यकता जब लोग मेरा काम किये दे रहे हैं? clip_image002[4]
पहले वह ब्लॉग जो समसामयिक मुद्दों और गाँव के बूढ़े पीपल के नीचे पड़ी खाट पर सुस्ताती हर गली खिरकी की खबर लेती धूप को सोंधेपन के साथ प्रस्तुत करता है - चूल्हे के किनारे थाली में पड़ी गर्मागर्म ललचाती रोटी, अंगुली जलने की परवाह नहीं, कोंच दिये गब्ब से! उठती भाप की महक याद आ जाती है। महानगर में अपनी खटाई, रोटी और प्याज की गठरी को सँभालते भागते गँवई की चुहुल नई उद्भावनाओं के साथ यहाँ मिलती है।
rangi_safediमैं सफेद घर की बात कर रहा हूँ जिसके बारे में दूर अरब में रहते एक भारतीय सज्जन कहते हैं – connects me to my origin (obviously Ballia, UP) 
कोई आश्चर्य नहीं कि यह ब्लॉग ऐसे हर किसी को गुदगुदाता है जो गाँव की पृष्ठभूमि से है या जो महानगरों को सीधे साधे मनई की चतुराई और अक्खड़ता के साथ देखता है। इस ब्लॉग के लिये गाँव की सरल मिठास वाली पहाड़ी के चन्द सुर आधुनिक वाद्य पर - पंजाबी बातचीत के तड़के के साथ:

बलिया की गलियाँ हों या मैनहट्ट्न न्यूयार्क के राजमार्ग, पटना का बैरीकूल हो या लिव इन रिलेशनशिप वाली ऋचा, यह ब्लॉग सबके साथ अपनी यारी गाँठ लेता है, कुछ ऐसी यारी कि यह उनकी वे अंतरंग बातें जान जाता है जिन्हें शायद वे स्वयं नहीं जानते! ब्लॉग की याद का एक टुकड़ा देखिये:
...एक दस डॉलर का नोट जिस पर किसी का सिग्नेचर ले लिया था,
उसकी कीमत रुपये के गिरने से नहीं बल्कि वक़्त के बदलने से अब कुछ और ही हो गयी है – 
बस एक कागज ही तो रह गया है... नोट तो रहा नहीं,
भगवान पर चढ़ाया फूल हो गया है वो
– क्या करूँ उसका? ! 
clip_image002[4]  
एक पाठक का कहना है – बस यूँ ही किसी पेड़ के नीचे बैठ इसे स्क्रीन पर सरकाते पढ़ने का मन करता है. तब जब सामने सड़क पर लोगों को देखने तक की फुरसत नहीं होती. 

ojhwaओझा उवाच के लिये बिथोवन की पैस्टोरल सिम्फनी का वह अंश जिसमें सीमाहीन कलकल बहता जल है और बाँसुरी, क्लेरिनेट में लवा, बुलबुल,कोयल के बोल भी।




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पिट्सबर्ग अमेरिका से लिखा जाता है एक ऐसा ब्लॉग जिसकी बरेली बाँस चढ़ी दृष्टि समूचे संसार पर फिरती है।  clip_image002[4]   इस बहुआयामी और बहुरंगी ब्लॉग की बड़ाई में एक पाठक केवल दो शब्दों में सब कह देता है - honesty, straightforwardness.
smart_ya_vaishnavविविधता, गुणवत्ता और शोध इस ब्लॉग की विशेषतायें हैं। अपनी मिट्टी से जुड़े और वसुधैव कुटुम्बकं की भावना सँजोये इस उदार चरित ब्लॉग बर्ग वार्ता के लिये एक और अंग्रेजी शब्द ध्यान आता है – No nonsense और सम्भवत: यही कारण है कि ‘उपदेशात्मक ब्लॉगों’ से चिढ़ने वाले भी यहाँ के वैसे टोन का बुरा नहीं मानते।  clip_image002[4]   376 फॉलोवर वाले इस ब्लॉग के एक सद्य: लेख से अंश देखिये:
 मैं अपने आसपास के अंतर्जातीय विवाहों पर नज़र दौड़ाता हूँ तो जन्मना ब्राह्मणों को अग्रणी पाता हूँ। प्रेम की तरह शायद कट्टरता के भी कई रूप होते हैं, एक सर्वभूतहितेरतः वाला और दूसरा अहमिन्द्रो न पराजिग्ये वाला। 
ब्राह्मण याने द्विज यानि दूसरे जन्म याने संस्कार से बना हुआ व्यक्ति। मतलब यह कि ब्राह्मण जन्म से होता ही नहीं। ब्राह्मण होने का मतलब ही है आनुवंशिकता के महत्व को नकारकर ज्ञान, शिक्षा और संस्कार के महत्व को प्रतिपादित करना। विश्व के अन्य राष्ट्रों की तरह भारतीय जातियाँ पितृकुल से भी हैं, मातृकुल से भी। लेकिन ब्राह्मण गोत्र इन दोनों से ही नहीं होते हैं। वे बने हैं गुरुकुल से। जातिवाद और ब्राह्मणत्व दो विरोधी प्रवृत्तियाँ हैं। इनका घालमेल करना निपट अज्ञान ही नहीं,
एक तरह से भारतीय परम्परा का निरादर करना भी है।   
इस ब्लॉग के लिये तुलसी की ये पंक्तियाँ:
~ 23
(अगले अंक में द्वितीय स्थान प्राप्त ब्लॉग)              

शनिवार, 9 जून 2012

सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार -1 : चन्द्रहार के मोती


गत 7 जून को अट्ठारह दिनोंकी वह समय सीमा समाप्त हो गई जिसके दौरान आप सब से अपने प्रिय और अप्रिय तीन तीन ब्लॉगों के नाम कारण सहित बताने को कहा गया था। जिन जनों ने अपने मत व्यक्त किये उनका आभार। धन्यवाद।

कारणों को पढ़ना बहुत ही समृद्धकारी अनुभव रहा। फेसबुक और ट्विटर जैसे त्वरित साधनों के होते हुये भी, पुस्तकों के होते हुये भी ब्लॉग लिखने वाले और उन्हें पढ़ने वाले विविध जीवंतता बनाये हुये हैं। ‘सार्वजनिक व्यक्तिगत’ को समेटे अलग तरह का ब्लॉग प्लेटफॉर्म अपने आप में एक संसार है।

उन सबको एक बार पुन: धन्यवाद जिन्हों ने कारण बताये और क्या खूब बताये!

उस दौरान फेसबुक, गुगल प्लस, ब्लॉग लेख, इंडीब्लॉगर, ई मेल और चैट आदि का उपयोग इस आयोजन को प्रचारित करने के लिये किया।

अब कुछ जिज्ञासाओं पर अपनी बात कहूँगा।

एक प्रश्न आया था – हिन्दी ब्लॉगरी की छिछली कीच वाली प्रवृत्ति आप में भी? स्पष्टत: संकेत पुरस्कारी आयोजनों की ओर था।

ब्लॉगजगत में सक्रियता के गत तीन चार वर्षों में मैंने बहुत कुछ सीखा है। आप को विश्वास नहीं होगा कि कुछ ब्लॉग लेखों को पढ़ कर दिनों तक मन ही मन सराहता रहा हूँ – ये हुई न बात! कई बार तो इतना प्रभावित हुआ कि आलेखों या कविताओं को अपने ब्लॉग पर शेयर कर दिया – कभी भूमिका के साथ, कभी वैसे ही। क्यों किया?
इसे अनुनाद कहते हैं। जब आवृत्तियाँ मिल जाती हैं तो झंकार की पराश बढ़ जाना स्वाभाविक है। बढ़ी हुई पराश आप को उन अनजान आत्माओं से जोड़ती है जो आप की ही तरह हैं।
साझा करना संतृप्त करता है। ‘व्यक्ति’ को विस्तार दे ‘समष्टि’ से जोड़ता है। इससे हमें सुख मिलता है। यह हमारे शिव को शव होने से बचाता है। बहुत बार सोचा कि ऐसा कौन सा ब्लॉग होगा जिसकी पराश ऐसी होगी कि ढेर सारे विविध क्षेत्रों के लोग उससे जुड़ते हों? कैसे पता चले? यह बहुत ही सरल और ईमानदार उत्कंठा थी। यह भी मन में आया कि ऐसे कई होंगे जो अनजान ही रह गये/जाते होंगे।
मैंने यह भी पाया कि संख्या बहुत कम होने के कारण बातें ब्लॉग से ब्लॉगर और उसके बाद उसकी दुर्बलताओं तक कुछ अधिक ही लपकती थीं। व्यक्तिगत घर्षणों के परिणाम सृजन न हो ध्वंस होते थे – कई गम्भीर और गुणवत्ता वाले ब्लॉगों पर लेखन कम होने लगा। कुछ पर तो बन्द ही हो गया।
अन्धकार अधिक लगने लगे तो दिया जला बाहर आना और लोगों को जोड़ना भी एक विकल्प होता है। फंतासी विधान वाली लेंठड़ा शृंखला यही थी। मेरी सोच यह थी कि चन्द अच्छे लोगों के जुड़ने से कुछ ऐसा निकल कर आ सकता है जो एक ऊँची छलांग साबित हो!

ऐसा कुछ न हुआ और मैं असंतुष्ट रहा। बहुत सी सीमायें थीं। सबसे बड़ी सीमा यह कि सुकून से चन्द अक्षर यहाँ भी नहीं लिखने देते, चाहते क्या हो? मैं एकला चलने की सोचने लगा। लेखन भी चलता रहा लेकिन खुजली गई नहीं।

एक ऐसे ब्लॉगर हैं जिनके साथ बहुत खुला हुआ हूँ। उनसे चैट पर चुटीली बातों के दौरान ही अकेले नि:स्वार्थ कुछ सार्थक करने के उद्देश्य से ‘अर्गलाओं के चन्दहार’ शृंखला प्रस्तुत करने का निर्णय लिया लेकिन इसके लिये चुनाव का आधार क्या हो? केवल व्यक्तिगत प्रियता या कुछ और? मैं स्वयं से उलझता रहा।
अंतत: तय किया कि लोगों से अभिमत लिये जायँ कि उनके प्रिय ब्लॉग कौन से हैं? उपयुक्त अवसर भी दिख गया। मैंने सबसे प्रिय ब्लॉग पुरस्कार की चुटीली घोषणा कर डाली। कतिपय लोगों ने समसामयिक समाचार संकेत देती हल्की फुल्की लिखाई के कारण मेरे आयोजन को प्रतिक्रिया समझा लेकिन बहुतों ने तो सदाशयता को समझ ही लिया। परिणामत: बहुत ही उत्साहवर्धक ढंग से लोगों ने अपने मत व्यक्त किये। ब्लॉग पर मैंने उन्हें कुछ कम जाने जाते लेकिन गुणी ब्लॉगों के लिंक भी बताये ताकि उनका निर्णय क्षेत्र बढ़े।  
मैं उनकी सराहना करता हूँ। मेरी मान्यता यह है कि प्रकृति खाली स्थान या निर्वात को पसन्द नहीं करती। अगर अच्छे लोग उन्हें नहीं भरेंगे तो कूड़ा कचरा भरेगा। छिछली कीच के विरुद्ध है यह आयोजन जो बिना सम्मिलित हुये नहीं हो सकता। पग तो उठाने ही पड़ेंगे!

एक प्रश्न था ऋणात्मक मार्किंग क्यों? 
      
मैं आप के भीतर बैठे शिव पर विश्वास करता हूँ। सामान्यत: बुरा सोचना सबसे आसान होता है, कहना उससे कठिन, लिखना और कठिन और किसी को साक्ष्य रूप लिख कर दे देना महाकठिन। मेरा मानना यह था कि जब तक किसी को कोई ब्लॉग एकदम अवांछित नहीं लगेगा तब तक वह उसे ऋणात्मक प्रविष्टि नहीं देगा। यही कारण था कि ऋणात्मक मत को दुगुना वजन दिया गया।
लोगों ने मेरे इस विश्वास को पुख्ता किया। जिसे ऋणात्मक कहा है उसके लिये पुष्ट कारण भी गिनाये हैं। यह भी कि ऋणात्मक मतों की संख्या कम रही है हालाँकि पाने वालों की संख्या कम नहीं है। बड़ी बात यह है कि पढ़ने वालों में नैराश्य की मात्रा उतनी नहीं है जितनी ब्लॉग जगत लेख और टिप्पणियों में प्रक्षेपित करता रहता है।  
ऋणात्मक अंकों से संतुलन भी आया और यह समझ भी मिली कि जनदृष्टि में किसी ब्लॉग में अवांछित क्या क्या हो सकता है।

अपनी पसन्द के ब्लॉग को ही नापसन्द करने का विकल्प क्यों?

ऐसा उन परफेक्शनिस्टों के लिये किया गया जो हिन्दी ब्लॉगों को पढ़ते तो हैं लेकिन मानते हैं कि अभी ‘वो बात’ नहीं आ पाई। लिहाजा जिसे पसन्द करते हैं, उससे बहुत आशायें रखते हैं और उसकी खामियों को इतनी खुन्नुस के साथ सँभाल कर रखते हैं कि ब्लॉग कोई व्यक्ति हो तो सामने पड़ने पर मार बैठें, ब्लॉगर को तो चीर ही डालें कि तुममें इतनी सम्भावनायें हैं लेकिन तुम उस स्तर का लिखते क्यों नहीं?

ब्लॉगर क्यों नहीं?

इसका उत्तर आयोजन घोषणा वाली पोस्ट में है। पाठक ब्लॉग पढ़ता है, बहुत से ब्लॉगरों को तो जानता तक नहीं। एकाध अच्छे तो छ्द्मनामी भी हैं। तो नाम से क्या लेना देना, काम देखो यारों!
सबसे बड़ी बात यह कि ब्लॉग ‘पुरस्कार बवाल’ नहीं काट सकता और न इनकार कर सकता है। काटेगा या इनकार करेगा तो वह ब्लॉगर होगा जो अपनी ही भद्द करेगा ;) नहीं समझे? छोड़िये भी!...कारण तो बहुत हैं, लेंठड़े के प्रवचन ध्यान से सुनिये।
    
प्रक्रिया बहुत ही सरल थी।

-    (1) ब्लॉगों के नाम नहीं सुझाये गये थे, लोगों को स्वयं बताने थे।
-   (2) एक व्यक्ति पसन्दगी और नापसन्दगी प्रत्येक श्रेणी में तीन तीन ब्लॉग बता सकता था - प्रथम, द्वितीय और तृतीय।
-   (3) प्रथम की तुलना में द्वितीय को 67% और तृतीय को 33% गणितीय महत्त्व दिया गया। प्रियता/अप्रियता के कारण नहीं बताने पर मत का महत्त्व आधा कर दिया गया।
-   (4) इस तरह से प्राप्त सकल गुणित धनात्मक और ऋणात्मक अंकों को जोड़ दिया गया। इस योग से प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थानों पर प्रिय ब्लॉगों का निर्धारण किया गया।

उदाहरण:
मान लीजिये कि आलसी नाम के एक ब्लॉग को लोगों ने कुछ यूँ परखा है:

प्रियता: प्रथम स्थान कुल 36 मत, द्वितीय स्थान कुल 44 मत और तृतीय स्थान कुल 18 मत।
प्रियता के कुल गुणित अंक = 36+0.67x44+0.33x18 यानि 95.54
अप्रियता: प्रथम स्थान कुल 6 मत, द्वितीय स्थान कुल 5 मत और तृतीय स्थान कुल 2 मत।
अप्रियता के गुणित अंक = 2x (6+0.67x5+0.33x2) यानि  20.02
सकल योग = 95.54 – 20.02 यानि 75.52 अंक  

चूँकि सबसे अप्रिय ब्लॉग का चयन निर्धारित नहीं था, इसलिये अप्रियता की श्रेणी के ब्लॉग नहीं बताये जायेंगे। बहुतों के बारे में तो आप सहज ही अंनुमान लगा सकते हैं। J कुल एक तिहाई ब्लॉग ऐसे हैं जिन्हें किसी न किसी ने ऋणात्मक मत दिया।
अट्ठारह ब्लॉग ऐसे हैं जिन्हें एक भी धनात्मक मत नहीं मिला! पढ़ने वाले परखने में कंजूसी नहीं करते।

परिणाम:
लोगों ने पसन्द/नापसन्द के कुल 66 हिन्दी ब्लॉगों के नाम बताये। घोषणानुसार तीन विजेता नाम कल विश्लेषण के साथ बताये जायेंगे लेकिन पहले सातवें से चौथे तक स्थान पाये वे ब्लॉग जो उनसे कम नहीं और जिन्हें जनमत का सम्मान करते हुये पुरस्कार स्वरूप जून से दिसम्बर तक वर्ष के बचे सात महीनों में हर माह स्थानक्रम से ‘अर्गलाओं के चन्द्रहार’ शृंखला में प्रथम स्थान पाये तीन ब्लॉगों के अतिरिक्त प्रस्तुति के लिये चुना गया है।
सातवाँ स्थान: अज़दक
 15

छ्ठा स्थान: छीटें और बौछारें  
16.7 

पाँचवा स्थान: फुरसतिया
 18.3

चौथा स्थान: संयुक्त रूप से



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(जारी)